जहाँ उन्होंने हाल ही में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) द्वारा विरोधी जलाशय कार्यकर्ता भावना टाटक के खिलाफ विदेशी निधियों की प्राप्ति के संदर्भ में दर्ज किए गए केस का उल्लेख भी किया। खांडू ने कहा कि राज्य सरकार पर्यावरणीय नियमों और सामाजिक मानदंडों का सम्मान करती है और जलाशय के प्रोजेक्ट को केवल तकनीकी
और आर्थिक मानदंडों के आधार पर आगे बढ़ाया जाएगा।
सींग नदी, जो भारत-चीन सीमा के निकट बहती है, अरुणाचल के प्रमुख जलस्रोतों में से एक है और इसकी जलधारा पर कई बड़े जलविद्युत परियोजनाओं की योजना बनी हुई है। पिछले कुछ वर्षों में इस नदी पर कई जलाशय प्रस्तावित हुए, जिनमें से कई को स्थानीय
जनसमुदाय और पर्यावरण संगठनों ने विरोध किया। इन विरोधों के कारण कई परियोजनाओं को स्थगित या पुनः मूल्यांकन किया गया। भावना टाटक, जो स्थानीय स्तर पर जल संरक्षण के लिए सक्रिय रहे हैं, को विदेशी निधियों के आरोपों के तहत सीबीआई ने जांच शुरू की, जिससे इस मुद्दे में नई जटिलताएँ जुड़ गईं।
पिछले दो
दशकों में अरुणाचल के जलसंसाधनों का दोहन राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में प्रमुख माना गया है। सरकार ने जलविद्युत को साफ़ ऊर्जा स्रोत के रूप में बढ़ावा दिया, जबकि स्थानीय जनसंख्या में जलस्रोतों के संरक्षण और पारंपरिक जीवनशैली को लेकर चिंता बनी रही। इस बीच, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय रिपोर्टों ने सींग नदी
की जैव विविधता और पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशीलता पर प्रकाश डाला। इन पृष्ठभूमियों को देखते हुए, राज्य सरकार को आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
मुख्यमंत्री ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया कि मेगा जलाशय की योजना का प्राथमिक उद्देश्य राज्य की ऊर्जा जरूरतों
को पूरा करना और राष्ट्रीय ग्रिड में अतिरिक्त शक्ति जोड़ना है। उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट की तकनीकी विश्लेषण, पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन और सामाजिक प्रभाव आकलन को राष्ट्रीय मानकों के अनुसार किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों से परामर्श और उनके सुझावों को शामिल करने की भी प्रतिबद्धता जताई गई। खांडू ने कहा,
“हमारी नीति में कोई भी कदम बल प्रयोग या जबरदस्ती नहीं है; हम संवाद के माध्यम से समाधान ढूँढ़ेंगे।”
पिछले सप्ताह, सीबीआई ने भावना टाटक के खिलाफ विदेशी फंडिंग के आरोप में केस दर्ज किया, जिससे जलाशय विरोधी आंदोलन में उथल-पुथल मची। टाटक ने अपने कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से यह दावा किया कि वे
किसी भी विदेशी निधि का प्राप्त नहीं कर रहे हैं और यह मामला उनके अधिकारों को दबाने की कोशिश है। उनके समर्थन में कई सामाजिक संगठनों ने भी आवाज़ उठाई, यह कहते हुए कि जलाशय विरोधी आंदोलन को लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत सुरक्षित होना चाहिए। इस संदर्भ में, मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार किसी भी
प्रकार की असंतोष को दमन नहीं करेगी, बल्कि कानूनी प्रक्रिया का सम्मान करेगी।
विरोधी समूहों ने जलाशय के संभावित पर्यावरणीय नुकसान को लेकर चिंता जताई। उनका मानना है कि बड़ी मात्रा में जल के भंडारण से नदी की प्राकृतिक प्रवाह में बाधा आएगी, जिससे नदियों के जीव-जंतुओं की प्रजनन स्थल प्रभावित होंगे। इसके अतिरिक्त, जलाशय
के निर्माण से स्थानीय कृषि भूमि और पारंपरिक मछली पकड़ने वाले क्षेत्रों में भी कमी आएगी, जिससे जीवनयापन पर असर पड़ेगा। इन समूहों ने कहा कि जलविद्युत परियोजनाओं को स्थानीय जनसंख्या के साथ मिलकर विकसित किया जाना चाहिए, न कि एकतरफा निर्णय के रूप में लागू किया जाना चाहिए।
राज्य सरकार की इस बयानबाजी पर
राष्ट्रीय मीडिया ने तेज़ी से रिपोर्टिंग शुरू की। कई प्रमुख समाचार एजेंसियों ने मुख्यमंत्री के बयान को उद्धृत किया और सीबीआई के केस की प्रगति पर भी प्रकाश डाला। राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा कि इस प्रकार के विवाद में सरकार को पारदर्शिता और समय पर जानकारी प्रदान करना आवश्यक है, ताकि सार्वजनिक भरोसा बना रहे।
कुछ राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों ने सरकार पर जलाशय को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त सामाजिक संवाद न करने का आरोप लगाया, जबकि अन्य ने इस कदम को ऊर्जा सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया।
अर्थव्यवस्था विशेषज्ञों ने इस प्रोजेक्ट के आर्थिक प्रभावों की जांच की। उन्होंने कहा कि जलविद्युत परियोजनाएं राज्य के लिए बड़ी आय का स्रोत
बन सकती हैं, विशेषकर जब भारत के ऊर्जा मांग में निरंतर वृद्धि हो रही है। जलाशय से उत्पन्न अतिरिक्त बिजली को राष्ट्रीय ग्रिड में भेजा जा सकेगा, जिससे राज्य को राजस्व में वृद्धि होगी। हालांकि, इन लाभों को प्राप्त करने के लिए परियोजना को समय
Updated: September 17, 2026
The project’s approval could add substantial hydroelectric capacity to the state’s power supply and contribute to national energy needs.
Its implementation will be subject to technical, environmental and social assessments under national standards.
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