MDR का प्रस्ताव अप्रैल 2024 में सरकार द्वारा प्रस्तुत किया गया था, जिसमें डिजिटल लेन‑देन पर 0.1 % से 0.5 % तक का शुल्क लागू किया जाना था। यह कदम वित्त मंत्रालय ने “डिजिटल इकोसिस्टम को स्थायी बनाने” और “भुगतान प्रणाली के विकास के लिए आवश्यक राजस्व” के रूप में औचित्य दिया। हालांकि, कई छोटे वाणिज्यिक संस्थानों ने कहा कि यह शुल्क उनकी मार्जिन को घटा देगा और डिजिटल भुगतान को घटते हुए उपयोग को रोक सकता है।
राहुल गांधी ने इस नीति को “राष्ट्र की आर्थिक स्वायत्तता के खिलाफ एक बड़ी छलाँग” कहा और कहा कि यह कदम विदेशी वित्तीय दबावों के कारण आया है। उन्होंने अपने भाषण में 1971 के आर्थिक संकटकाल और 1991 के आर्थिक सुधारों की तुलना करते हुए कहा कि अब समय है कि सरकार “स्वदेशी और जन‑हितैषी” उपायों की ओर वापस लौटे। इस बीच, विपक्ष ने कई बार UPI‑MDR को वापस लेने का प्रस्ताव रखा, परंतु अब तक इसे संसद में पर्याप्त बहस का अवसर नहीं मिला।
उपभोक्ता संघों ने भी इस शुल्क को लेकर आपत्ति जताई, यह तर्क देते हुए कि छोटे व्यापारियों और क़ीमत‑सेंसिटिव उपभोक्ताओं पर इसका प्रभाव गंभीर होगा। उन्होंने कहा कि UPI ने डिजिटल भुगतान में क्रांति लाने के बाद से ही कई वर्गों को वित्तीय समावेश दिया है, और इस पर नया टैक्स इस प्रगति को उलट देगा।
स्मार्टफ़ोन निर्माता और डिजिटल भुगतान प्लेटफ़ॉर्म प्रदाताओं ने भी इस नीति के संभावित प्रभावों को लेकर चिंता व्यक्त की। कुछ प्रमुख फ़िनटेक कंपनियों के प्रतिनिधियों ने कहा कि MDR के कारण लेन‑देन की संख्या में गिरावट आएगी और इससे डिजिटल इकोसिस्टम के विकास में बाधा उत्पन्न होगी। उन्होंने कहा कि इस नीति से उपयोगकर्ता अनुभव घटेगा और नई सेवाओं के विकास पर भी असर पड़ेगा।
राष्ट्र बैंक और भुगतान प्रणाली नियामक RBI ने पहले इस मुद्दे पर टिप्पणी नहीं की थी, परन्तु बाद में उन्होंने कहा कि नई MDR नीति को “सभी हितधारकों के साथ समुचित परामर्श” के बाद लागू किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि “वित्तीय समावेश के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए, इस नीति का संतुलित मूल्यांकन किया गया है।”
विपक्ष के कई सांसदों ने इस बात पर बल दिया कि MDR को पुनः विचार करने के लिए एक समग्र आयोग का गठन किया जाए, जिसमें उपभोक्ता, व्यापारियों और वित्तीय संस्थाओं की राय शामिल हो। कुछ सांसदों ने कहा कि इस नीति को “संसदीय चर्चा” के बिना लागू करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विरुद्ध है।
वित्त मंत्रालय ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि MDR का उद्देश्य “डिजिटल भुगतान प्रणाली को टिकाऊ बनाना” है और यह “आर्थिक विकास और वित्तीय समावेशन” के लिये आवश्यक कदम है। उन्होंने यह भी बताया कि यह शुल्क अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है और “डिजिटल लेन‑देन में बढ़ती लागत” को संतुलित करने के लिये आवश्यक है।
सिंहली सरकार के वित्तीय सलाहकारों ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि “MDR नीति का उद्देश्य भुगतान बुनियादी ढाँचे के रख‑रखाव और नवाचार को प्रोत्साहित करना है।” उन्होंने यह भी कहा कि “टैक्स के रूप में इसे देखना उचित नहीं है, बल्कि यह एक शुल्क है जो सेवा प्रदाताओं को उनके कार्य के लिए दिया जाता है।”
पर्यावरणीय और सामाजिक समूहों ने भी इस नीति की व्यापकता पर सवाल उठाया, यह तर्क देते हुए कि डिजिटल भुगतान का विस्तार सतत विकास के लिये आवश्यक है और इसे बाधित करने वाले शुल्क से सामाजिक असमानता बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि “डिजिटल भुगतान को सस्ता और सुलभ बनाए रखना ही विकास का प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए।”
राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा कि इस मुद्दे पर विपक्ष द्वारा उठाए गए प्रश्न सरकार की आर्थिक नीति के प्रति सार्वजनिक भरोसे को चुनौती दे रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि MDR की घोषणा के समय व्यापक परामर्श प्रक्रिया न अपनाने से नीति का वैधता प्रश्न उठता है और इससे सरकार को भविष्य में
Updated: September 16, 2026
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