ABVP ने इस प्रस्ताव के पीछे की प्रमुख प्रेरणा को राष्ट्रीय अखंडता और शिक्षा संस्थानों की स्वच्छता के रूप में प्रस्तुत किया है। इस संगठन ने कहा कि उमर खालिद जैसे व्यक्तियों को शहीद या नायक के रूप में प्रस्तुत करना सामाजिक विभाजन को बढ़ा सकता है, जिससे छात्रों के बीच विचारधारा के आधार पर विभाजन हो सकता है। ABVP ने यह भी कहा कि विश्वविद्यालयों को राजनीति से दूर रहना चाहिए और केवल शैक्षणिक एवं अनुसंधान कार्यों पर ध्यान देना चाहिए।
वहीं, NLSIU के प्रशासन ने इस प्रस्ताव को गंभीरता से लेते हुए कहा कि वे शैक्षणिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए सभी पक्षों के साथ संवाद करने के इच्छुक हैं। विश्वविद्यालय के प्रिंसिपल ने कहा कि डॉक्यूमेंट्री का उद्देश्य छात्र आंदोलन की सामाजिक और कानूनी पहलुओं को समझना है, न कि किसी विचारधारा को बढ़ावा देना। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि स्क्रीनिंग के लिए सभी आवश्यक अनुमतियां प्राप्त की गई थीं और इस प्रक्रिया में कोई भी वैध नियम उल्लंघन नहीं हुआ।
डॉक्यूमेंट्री के निर्माताओं ने ABVP के इस कदम को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आक्रमण के रूप में खारिज किया है। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक संस्थान इतिहास, राजनीति और सामाजिक संघर्षों को समझने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं, और ऐसे विषयों को प्रतिबंधित करना शैक्षणिक विकास को बाधित करेगा। फिल्म निर्माताओं ने यह भी बताया कि उन्होंने सामग्री को तथ्यात्मक आधार पर तैयार किया है और इसमें किसी भी प्रकार की भड़काऊ सामग्री नहीं है।
अभियोजन के बीच, कई छात्र संघों ने इस मुद्दे पर अपने-अपने मत व्यक्त किए हैं। कुछ छात्र समूह ने इस स्क्रीनिंग को छात्र अधिकारों और लोकतांत्रिक बहस को बढ़ावा देने का अवसर बताया, जबकि अन्य ने इस बात पर चिंता जताई कि इससे विश्वविद्यालय का माहौल राजनीतिक उथल-पुथल से प्रभावित हो सकता है। इस प्रकार, कैंपस में विचारधारात्मक विभाजन स्पष्ट रूप से उभर रहा है, जिससे प्रशासन को संतुलन बनाते हुए निर्णय लेना कठिन हो रहा है।
राष्ट्रीय स्तर पर इस विवाद को देख रहे प्रमुख राजनीतिक दलों ने भी अलग-अलग राय व्यक्त की है। केंद्र सरकार की कुछ प्रवक्ता ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षित किया जाना चाहिए, जबकि वह राष्ट्रीय सुरक्षा और एकता को भी प्राथमिकता देने की बात दोहराते हैं। विपक्षी दल ने इस मुद्दे को छात्र आंदोलन की आवाज़ को दबाने की कोशिश के रूप में चित्रित किया है और विश्वविद्यालय में विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार को समर्थन दिया है।
आर्थिक पहलू से देखें तो विश्वविद्यालयों में इस प्रकार की सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यक्रमों पर अक्सर बाहरी फंडिंग और प्रायोजन निर्भर करता है। यदि इस डॉक्यूमेंट्री को रद्द किया जाता है, तो फिल्म निर्माताओं और संभावित प्रायोजकों के बीच विश्वास घट सकता है, जिससे भविष्य में समान कार्यक्रमों की वित्तीय संभावना कम हो सकती है। साथ ही, विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठा पर भी असर पड़ सकता है, जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अनुसंधान ग्रांट्स की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सामाजिक स्तर पर, इस विवाद ने छात्र समुदाय में अभिव्यक्ति की सीमाओं पर नई चर्चा को जन्म दिया है। कई सामाजिक वैज्ञानिकों ने कहा कि विश्वविद्यालयों को विचारों के टकराव के लिए एक सुरक्षित स्थान बनाना चाहिए, जहाँ विभिन्न विचारधाराओं का सम्मान हो। इस प्रकार, डॉक्यूमेंट्री का विवाद सामाजिक संवाद के मंच पर नए प्रश्न उठाता है, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन खोजने की आवश्यकता स्पष्ट होती है।
राजनीतिक प्रभाव के संदर्भ में, यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा नीति और विश्वविद्यालय स्वायत्तता के पुनर्संरचना पर चर्चा को तीव्र कर रहा है।