कम कर उन्हें बेहतर शैक्षणिक वातावरण प्रदान करना है। इस कदम को कई छात्र संघों ने “राहत का तोहफा” कहा है, जबकि विरोधी पक्ष ने कहा कि यह केवल अल्पकालिक राहत है और प्रणालीगत समस्याओं को हल नहीं करता।
पीजी छात्रों का मानदेय पहले विभिन्न कॉलेजों में असमान
रूप से निर्धारित था और अक्सर महंगाई के चलते उनकी वास्तविक जरूरतों को पूरा नहीं कर पाता था। पिछले कुछ वर्षों में बिहार में मेडिकल शिक्षा की मांग में तीव्र वृद्धि देखी गई, जिससे छात्रों की संख्या में भी उल्लेखनीय इजाफा हुआ। इस बढ़ती मांग के साथ ही कई
छात्र पार्ट‑टाइम नौकरियों में लगे रहना पड़ता था, जिससे उनका शैक्षणिक प्रदर्शन प्रभावित होता था। सरकार ने इन चुनौतियों को देखते हुए मानदेय में सुधार का प्रस्ताव रखा।
नई मानदेय योजना के अनुसार, प्रथम वर्ष के पीजी छात्रों को प्रत्येक माह 92,800 रुपये, द्वितीय वर्ष के छात्रों को
1,02,000 रुपये और तृतीय वर्ष के छात्रों को 1,12,200 रुपये प्रदान किए जाएंगे। यह वृद्धि पिछले मानदेय स्तर से लगभग 30‑35 प्रतिशत अधिक है, जिससे छात्रों को जीवनयापन खर्च, पुस्तकें, प्रयोगशाला सामग्री और अन्य शैक्षणिक आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त आर्थिक मदद मिलेगी। इस योजना का विस्तृत विवरण स्वास्थ्य विभाग
ने आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित किया है और सभी संबंधित कॉलेजों को सूचना दी गई है।
बिहार स्वास्थ्य विभाग के निदेशक ने बताया कि इस मानदेय वृद्धि का मूल उद्देश्य छात्रों को आर्थिक दबाव से मुक्त कर उन्हें शोध एवं क्लिनिकल प्रैक्टिस पर अधिक ध्यान केंद्रित करने देना
है। उन्होंने कहा कि यह कदम राज्य की स्वास्थ्य प्रणाली को सुदृढ़ करने के लिए एक दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है, क्योंकि बेहतर प्रशिक्षित डॉक्टरों की उपलब्धता स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार लाएगी। इस पहल के साथ ही विभाग ने भविष्य में अधिक छात्रवृत्ति और शोध अनुदान योजनाओं
की संभावना भी जताई है।
राज्य की शिक्षा विभाग ने भी इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि मानदेय में यह वृद्धि छात्रों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को संतुलित करेगी और उन्हें अपने गृह नगर या ग्रामीण क्षेत्रों में रुकने के लिए प्रोत्साहित करेगी। उन्होंने यह भी बताया
कि कई छात्रों ने पहले निजी क्लिनिकों में काम करके अपनी पढ़ाई जारी रखी थी, जिससे उनकी शैक्षणिक प्रगति बाधित होती थी। नई मानदेय नीति के तहत, इन छात्रों को अब अतिरिक्त आय के लिए बाहरी कार्य नहीं करना पड़ेगा।
छात्र संघों ने इस कदम की सराहना की,
परन्तु उन्होंने यह भी कहा कि मानदेय के साथ-साथ बुनियादी सुविधाओं में सुधार, प्रयोगशालाओं का आधुनिकीकरण और शिक्षकों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता है। कई छात्रों ने कहा कि मानदेय केवल एक शुरुआती कदम है और यह अस्थायी राहत प्रदान करता है, जबकि दीर्घकालिक समाधान के लिए संस्थागत सुधार
आवश्यक हैं। इस परिदृश्य में, कई छात्र प्रतिनिधियों ने भविष्य में मानदेय की पुनरावलोकन की मांग भी रखी।
विरोधी दलों ने इस योजना की आलोचना करते हुए कहा कि यह केवल वित्तीय प्रलोभन है और छात्रों की वास्तविक समस्याओं—जैसे कि शैक्षणिक सामग्री की कमी, प्रयोगशाला उपकरणों की खराबी
और अपर्याप्त क्लिनिकल एक्सपोज़र—को नहीं छूता। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि मानदेय में वृद्धि के बाद राज्य की वित्तीय स्थिति पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है, जिससे अन्य स्वास्थ्य योजनाओं पर असर पड़ सकता है। कुछ राजनैतिक विश्लेषकों ने इसे सरकार की आगामी चुनावी रणनीति के रूप में
भी देखा।
आर्थिक विशेषज्ञों ने इस निर्णय के संभावित वित्तीय प्रभाव का विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि मानदेय में वृद्धि के लिए राज्य को वार्षिक लगभग 150 करोड़ रुपये अतिरिक्त बजट आवंटित करना पड़ेगा। यह खर्च राज्य के कुल स्वास्थ्य बजट का लगभग 2‑3 प्रतिशत बनाता है, जो
कि मध्यम स्तर पर माना जाता है। विशेषज्ञों ने कहा कि यदि यह निवेश योग्य परिणाम देता है, तो भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और गुणवत्ता में सुधार संभावित है।
राजनीतिक विश्लेषकों ने इस कदम को बिहार सरकार की सामाजिक नीतियों के
Updated: September 11, 2026
The increased stipend standardizes and raises PG medical students’ allowances across Bihar’s public colleges, aiming to reduce financial pressure and support academic focus.
The policy adds roughly ₹150 crore annually to the state health budget, reflecting a modest investment in health‑education infrastructure.