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2027 की जंग के लिए सपा का मास्टरस्ट्रोक: अखिलेश यादव ने प्रशांत किशोर की I-PAC को सौंपी यूपी चुनाव की कमान, दिल्ली-बंगाल की सीक्रेट बैठकों के बाद बड़ा फैसला

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। भारतीय जनता पार्टी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सीधी चुनौती देने के लिए समाजवादी पार्टी ने अब अपनी रणनीतिक तैयारी को नए स्तर पर पहुंचा दिया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) की कंपनी Indian Political Action Committee यानी I-PAC को 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव के लिए अपना कैंपेन संभालने की जिम्मेदारी सौंप दी है।

यह फैसला अचानक नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे कई महीनों की गोपनीय बैठकों, राजनीतिक सलाह-मशविरों और राष्ट्रीय स्तर की रणनीतिक सोच का योगदान है। सूत्रों के अनुसार, इस साझेदारी की नींव दिसंबर 2025 में दिल्ली में हुई एक अहम बैठक में पड़ी, जहां अखिलेश और पीके के बीच लंबी चर्चा हुई। इसके बाद जनवरी 2026 में जब अखिलेश पश्चिम बंगाल दौरे पर गए, तब वहां भी दोनों के बीच विस्तार से रणनीति पर मंथन हुआ।

दो मुख्यमंत्रियों की सलाह पर हुआ बड़ा निर्णय

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अखिलेश यादव को I-PAC की सेवाएं लेने की सलाह दी थी। दोनों ही नेताओं की चुनावी सफलताओं में पीके की टीम की भूमिका पहले से चर्चित रही है।

बताया जा रहा है कि दिल्ली और कोलकाता में हुई बैठकों के दौरान यूपी की जातीय संरचना, बूथ मैनेजमेंट, शहरी-ग्रामीण वोटर पैटर्न, युवाओं और महिलाओं के वोट बैंक, और विपक्षी रणनीति जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। इन बैठकों के बाद सपा नेतृत्व ने औपचारिक रूप से I-PAC को हायर करने का फैसला लिया।

नोएडा से होगी कैंपेन की औपचारिक शुरुआत

सूत्रों के मुताबिक 28 मार्च को अखिलेश यादव नोएडा से अपने चुनावी अभियान की औपचारिक शुरुआत करेंगे। यहां “PDA भागीदारी रैली” आयोजित की जाएगी। PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—यह वही सामाजिक समीकरण है, जिसे सपा 2024 के लोकसभा चुनाव में मजबूत कर चुकी है और 2027 में उसे और धार देना चाहती है।

नोएडा से शुरुआत का संदेश भी राजनीतिक है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा की मजबूत पकड़ को चुनौती देना और शहरी वोटर्स तक सीधा संदेश पहुंचाना सपा की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

सपा का मल्टी-लेयर चुनावी मॉडल

समाजवादी पार्टी इस बार सिर्फ एक एजेंसी पर निर्भर नहीं रहना चाहती। अलग-अलग जिम्मेदारियों के लिए अलग कंपनियों को हायर किया गया है।

  • डेटा एनालिसिस और माइक्रो-लेवल स्ट्रैटजी का काम मुंबई की शो टाइम कंसल्टिंग को सौंपा गया है।
  • सर्वे और फील्ड रिसर्च का काम कर्नाटक की एक कंपनी पूर्वी उत्तर प्रदेश से शुरू कर चुकी है।
  • बूथ मैनेजमेंट, डिजिटल आउटरीच और ट्रेनिंग की जिम्मेदारी I-PAC संभालेगी।

I-PAC की टीम लखनऊ में अपना कैंप स्थापित करेगी और जिला स्तर तक संगठनात्मक ढांचा खड़ा करेगी। ऐप आधारित टूल्स, वोटर टर्नआउट बढ़ाने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म, व्हाट्सऐप नेटवर्क और सोशल मीडिया कैंपेन को आक्रामक बनाया जाएगा।

अखिलेश के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति

2022 के विधानसभा चुनाव में सपा को 111 सीटें मिली थीं, जबकि भाजपा 255 सीटों के साथ सत्ता में लौटी थी। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने 37 सीटें जीतकर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया। इस सफलता ने अखिलेश यादव को यह भरोसा दिया है कि सही रणनीति और बेहतर बूथ मैनेजमेंट से 2027 में सत्ता वापसी संभव है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव अखिलेश के लिए ‘करो या मरो’ जैसा है। लगातार दो विधानसभा चुनाव हारने के बाद अब तीसरी बार चूक सपा के लिए भारी पड़ सकती है। इसलिए पार्टी संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय किया जा रहा है। जिलाध्यक्षों से लेकर सेक्टर प्रभारी तक, सभी से रिपोर्ट ली जा रही है।

विपक्षी मुद्दों पर फोकस

अखिलेश यादव पिछले कुछ महीनों से कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी, पेपर लीक, भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे मुद्दों पर भाजपा सरकार को घेर रहे हैं। वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर सीधा हमला करने से भी पीछे नहीं हट रहे।

सपा का मानना है कि शहरी मध्यम वर्ग, बेरोजगार युवा और किसान वर्ग में असंतोष है, जिसे चुनावी मुद्दा बनाया जा सकता है। I-PAC इन मुद्दों को डेटा के आधार पर क्षेत्रवार रणनीति में बदलेगी।

कौन हैं प्रशांत किशोर?

प्रशांत किशोर भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित चुनावी रणनीतिकारों में से एक रहे हैं। 2011 में संयुक्त राष्ट्र की नौकरी छोड़कर उन्होंने भारतीय राजनीति में कदम रखा।

  • 2014 में उन्होंने भाजपा के लिए रणनीति तैयार की, जिसमें नरेंद्र मोदी की ऐतिहासिक जीत हुई।
  • 2015 में बिहार में नीतीश कुमार की जीत में भूमिका निभाई।
  • 2016 में पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए काम किया।
  • पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन की चुनावी सफलता में भी उनकी कंपनी की अहम भूमिका रही।

हालांकि हाल के वर्षों में पीके ने I-PAC से दूरी बनाकर बिहार में अपनी राजनीतिक पहल “जन सुराज” शुरू की है। 2025 के बिहार चुनाव में उन्होंने खुद चुनाव नहीं लड़ा, बल्कि संगठन निर्माण पर ध्यान दिया।

I-PAC अब प्रतीक जैन जैसे पेशेवरों के नेतृत्व में काम कर रही है, जो विभिन्न राज्यों में चुनावी कैंपेन का संचालन कर रहे हैं।

यूपी में पीके का पिछला अनुभव

उत्तर प्रदेश में पीके इससे पहले 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए काम कर चुके हैं। उस समय “27 साल यूपी बेहाल” का नारा दिया गया था। हालांकि बाद में सपा-कांग्रेस गठबंधन बनने के कारण रणनीति में बदलाव करना पड़ा। उस चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 7 सीटें मिलीं और सपा 47 सीटों पर सिमट गई थी।

इस बार हालात अलग हैं। सपा अकेले अपने दम पर मजबूत स्थिति में है और लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन से उसका मनोबल ऊंचा है।

आगे की राह

I-PAC की एंट्री से यूपी की सियासत में नई हलचल मच गई है। भाजपा पहले से ही बूथ स्तर तक मजबूत संगठन का दावा करती रही है। ऐसे में 2027 का मुकाबला पूरी तरह हाई-टेक, डेटा-ड्रिवन और जमीनी रणनीति का होगा।

अखिलेश यादव के सामने चुनौती बड़ी है—योगी सरकार की मजबूत मशीनरी, भाजपा का कैडर और संसाधन। लेकिन सपा का मानना है कि सामाजिक समीकरण, युवाओं की नाराजगी और गठबंधन की संभावनाएं उसे बढ़त दिला सकती हैं।

2027 की जंग अभी दूर है, लेकिन सपा ने अपनी पहली चाल चल दी है। अब देखना होगा कि क्या पीके की रणनीति उत्तर प्रदेश की राजनीति का समीकरण बदल पाएगी, या फिर यह प्रयोग भी 2017 की तरह अधूरा रह जाएगा।

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