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बिहार में ₹1.30 लाख करोड़ के ऊर्जा निवेश की तैयारी, 6 कंपनियों ने दिखाई रुचि; सौर-पवन परियोजनाओं पर जोर

बिहार राज्य ने 1.30 लाख करोड़ रुपये के बड़े पैमाने के ऊर्जा निवेश की योजना की घोषणा की, जिसमें छह प्रमुख कंपनियों ने अपना रुचि व्यक्त किया है; यह कदम राज्य की बिजली आपूर्ति को सुदृढ़ करने और हरित ऊर्जा उत्पादन को तेज करने का उद्देश्य रखता है।
निवेश के तहत सौर, पवन और अन्य नवीकरणीय स्रोतों में विस्तृत परियोजनाएँ लागू होंगी, जिससे उद्योग और घरेलू दोनों क्षेत्रों में बंपर रोजगार सृजन की उम्मीद है।बिहार में ऊर्जा निवेश का इतिहास देखे तो पिछले दशकों में केवल पारंपरिक थर्मल प्लांटों पर ही ध्यान केंद्रित रहा था। हालांकि, 2015 में शुरू हुए जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील नीतियों ने राज्य सरकार को नवीकरणीय ऊर्जा की ओर धकेल दिया। इस संदर्भ में, 2022 में बिहार ने राष्ट्रीय सौर मिशन के तहत 1 गिगावॉट की स्थापित क्षमता का लक्ष्य रखा था, परंतु परियोजनाओं की गति धीमी रही।

नई योजना के तहत, राज्य सरकार ने विशेष आर्थिक ज़ोन (SEZ) और पावर ट्रेडिंग प्लेटफ़ॉर्म स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है, जिससे निवेशकों को आसान लाइसेंसिंग, कर छूट और तेज़ अनुमोदन प्रक्रिया मिल सकेगी। इसके साथ ही, बिजली ग्रिड की अपग्रेड और स्टोरेज तकनीक में भी बड़ी राशि निवेशित होगी, जिससे उत्पादन‑से‑उपभोग तक की आपूर्ति श्रृंखला में पारदर्शिता बढ़ेगी।

पहली प्रमुख कंपनी, क्रिलोस्कर ब्रदर लिमिटेड, ने 25 बिलियन रुपये के सौर परियोजना निवेश की घोषणा की है, जो बिहार के दक्षिणी जिलों में 500 मेगावॉट क्षमता स्थापित करेगी। कंपनी ने कहा कि यह परियोजना स्थानीय किसानों को भूमि पट्टा के रूप में उपलब्ध कराएगी और उन्हें न्यूनतम आय प्रदान करेगी।

दूसरे चरण में, हिंदुस्तान पावर एक्सचेंज ने 30 बिलियन रुपये के पवन ऊर्जा योजना पर काम करने का इरादा जताया है। यह योजना मुख्यतः बक्सर और भागलपुर के पवन संभावित क्षेत्रों में स्थापित होगी, जहाँ औसत वार्षिक पवन गति 7 मी/सेकंड दर्ज की गई है। कंपनी ने कहा कि यह परियोजना 12 हज़ार सीधे रोजगार और 40 हज़ार परोक्ष रोजगार सृजित करेगी।

तीसरी प्रमुख इकाई, इंडियन एनर्जी एक्सचेंज, ने 20 बिलियन रुपये के हाइड्रोजन उत्पादन और स्टोरेज प्रौद्योगिकी में निवेश का संकेत दिया है। यह परियोजना गंगा नदी के किनारे स्थित होगी और नवीकरणीय स्रोतों से उत्पन्न हाइड्रोजन को उद्योगों को सप्लाई करने के लिए तैयार करेगी। कंपनी ने बताया कि यह पहल बिहार को भारत के हाइड्रोजन हब के रूप में स्थापित करने में मदद करेगी।

अन्य तीन कंपनियों में एशिया एग्रीवोल्टाइक कॉर्पोरेशन, सोलारिया टेक्नोलॉजीज और इकोपावर लिमिटेड शामिल हैं, जो क्रमशः कृषि‑ऊर्जा एकीकरण, सोलर पैनल निर्माण और ऊर्जा‑सहेज इलेक्ट्रिक ग्रिड समाधान में निवेश करने की योजना बना रहे हैं। इन कंपनियों ने कहा कि वे स्थानीय उद्यमियों के साथ सहयोग कर तकनीकी हस्तांतरण और कौशल विकास पर विशेष ध्यान देंगे।

राज्य के ऊर्जा मंत्री ने इस निवेश को बिहार के ऊर्जा स्वावलंबन की दिशा में एक निर्णायक मोड़ कहा और बताया कि सभी कंपनियों को आवश्यक जमीन, जल और बुनियादी ढांचा प्रदान करने के लिए विभाग तत्पर है। उन्होंने कहा कि अगले दो महीनों में सभी प्रोजेक्ट्स के विस्तृत समझौते पर हस्ताक्षर होने की संभावना है।

बिहार के उद्योग एवं वाणिज्य मंडल के अध्यक्ष ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह निवेश न केवल बिजली की आपूर्ति को स्थिर करेगा, बल्कि ग्रामीण उद्योगों को भी नई ऊर्जा स्रोतों के साथ जोड़ देगा। उन्होंने कहा कि इस निवेश से छोटे उद्योगों की उत्पादन क्षमता में 15 % तक वृद्धि की उम्मीद है।

विपक्षी दल के नेता ने इस योजना पर मिश्रित प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जबकि निवेश का पैमाना प्रशंसनीय है, लेकिन पारदर्शिता और पर्यावरणीय अनुमोदन प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने राज्य सरकार को स्थानीय समुदायों के साथ विस्तृत परामर्श करने की अपील भी की।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि 1.30 लाख करोड़ रुपये का निवेश बिहार की जीडीपी को अगले पांच वर्षों में लगभग 2 % तक बढ़ा सकता है। इसके साथ ही, नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में रोजगार सृजन से उपभोक्ता खर्च में वृद्धि होगी, जिससे सामाजिक स्थिरता में सुधार होगा।

सामाजिक दृष्टिकोण से, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण से स्थानीय किसानों के अधिकारों पर असर पड़ सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को उचित पुनर्वास पैकेज और भूमि उपयोग योजना तैयार करनी चाहिए, ताकि सामाजिक विरोध को रोका जा सके।

Bihar’s ₹1.30 lakh‑crore clean‑energy push could turn the state from a chronic power‑shortage zone into a regional green‑tech hub, pulling in skilled jobs and raising industrial output.

सहरसा में पत्रकार पर हमले के खिलाफ स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने राज्य स्तरीय जांच समिति गठित करने का दिया आदेश

प्रभात ख़बर डिजिटल के पत्रकार अभिषेक कुमार के विरुद्ध सहरसा सदर अस्पताल में हुई मारपीट की घटना ने राज्य स्तर पर तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न की, और आज स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने इस मामले को लेकर एक राज्य‑स्तर की जांच समिति बनाने का निर्देश जारी किया। यह कदम इस बात को दर्शाता है कि सरकार इस प्रकार के हिंसात्मक हमले को गंभीरता से ले रही है और न्याय प्रक्रिया को तेज़ी से आगे बढ़ाने का इरादा रखती है। मंत्रालय ने कहा कि समिति को सभी संबंधित पक्षों से तथ्य‑साक्ष्य एकत्र करने का निर्देश दिया गया है, जिससे पारदर्शी और निष्पक्ष रिपोर्ट तैयार की जा सके।

सहरसा में 15 अगस्त को अस्पताल के वार्ड में अभिषेक कुमार को दो व्यक्तियों द्वारा मारपीट किया गया, जब वह एक स्वास्थ्य‑संबंधी मुद्दे पर रिपोर्टिंग कर रहे थे। घटना के बाद स्थानीय पत्रकार संघ ने इस हमले को निंदनीय कहा और तत्काल न्याय की माँग की। इस समय तक, पीड़ित को हल्की चोटों के साथ अस्पताल से छुट्टी मिली थी, लेकिन उनका इलाज अभी भी चल रहा है। पुलिस ने शुरुआती जांच में दो संभावित आरोपियों को हिरासत में लिया था, लेकिन आगे की कार्यवाही में कई अड़चनें आईं, जिससे मामला लम्बित रहा।

पिछले कुछ महीनों में बिहार में पत्रकारों के खिलाफ हिंसा की घटनाएँ बढ़ती दिखाई दे रही हैं, जिसमें कई बार आरोपियों को तुरंत न्याय नहीं मिल पाता। पत्रकार संघों ने इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए सरकार से सख्त कदम माँगे हैं, और कई बार प्रेस फ्रिडम इंडेक्स में भारत की रैंकिंग गिरती दिखाई गई है। इस संदर्भ में सहरसा की घटना को भी राष्ट्रीय स्तर पर एक चेतावनी के रूप में देखा गया है, क्योंकि यह न केवल पत्रकारों की सुरक्षा को सवाल में डालता है, बल्कि सार्वजनिक सूचना तक पहुंच को भी बाधित करता है।

निशांत कुमार ने आज सुबह सहरसा में स्थित स्वास्थ्य मंत्रालय के स्थानीय कार्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उनके संज्ञान में इस मामले की पूरी जानकारी है और उन्होंने तुरंत एक स्वतंत्र और विशेषज्ञों से युक्त जांच समिति गठित करने का आदेश दिया है। समिति के प्रमुख को एक वरिष्ठ चिकित्सक और एक अनुभवी प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त किया गया, जो घटना स्थल, अस्पताल के सुरक्षा प्रोटोकॉल और स्थानीय पुलिस की कार्रवाई की समीक्षा करेंगे।

मंत्री ने यह भी बताया कि जांच के दौरान सभी उपलब्ध CCTV फुटेज, अस्पताल के लॉग‑बुक, और गवाहों के बयान एकत्र किए जाएंगे। उन्हें बताया गया कि समिति को 30 दिनों के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, जिसमें दोषियों की पहचान और अनुशासनिक कार्रवाई के प्रस्ताव शामिल हों। इस कदम को पत्रकार संघों ने सकारात्मक रूप से स्वीकार किया, हालांकि उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए नीतिगत सुधार आवश्यक हैं।

जांच समिति के गठन के बाद, अभिषेक कुमार के सहयोगियों ने कहा कि वे इस कदम को एक सकारात्मक संकेत मानते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने न्याय की गति से जुड़े अपने आशंकाओं को दोहराया। उन्होंने कहा कि यदि रिपोर्ट में कोई भी कमी रह गई तो वे कानूनी कार्रवाई करने से नहीं हिचकेंगे। इस बीच, सहरसा अस्पताल प्रशासन ने भी जांच में सहयोग का आश्वासन दिया, और कहा कि सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए तत्काल उपाय किए जा रहे हैं।

जांच प्रक्रिया में शामिल विभिन्न पक्षों ने अपने-अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। अभिषेक कुमार की टीम ने कहा कि रिपोर्टर की सुरक्षा को लेकर पहले भी कई बार शिकायतें दर्ज करवाई गई थीं, परन्तु उन्हें पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। अस्पताल प्रशासन ने कहा कि वह स्वयं भी इस घटना से आश्चर्यचकित है, और उन्होंने कहा कि उन्होंने सुरक्षा कर्मियों को पुनः प्रशिक्षित करने का निर्णय लिया है।

स्थानीय पुलिस ने बताया कि उन्होंने प्रारंभिक गवाहों के बयान दर्ज किए हैं, लेकिन आगे की जांच में कई अनसुलझे प्रश्न हैं, जैसे कि हमला किस कारण से हुआ और क्या यह व्यक्तिगत विवाद था या पेशेवर विरोध का परिणाम। पुलिस ने कहा कि यदि कोई भी नया साक्ष्य सामने आता है तो वह तुरंत कार्रवाई करेंगे।

राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों ने भी इस मामले पर टिप्पणी की। कांग्रेस ने कहा कि यह घटना पत्रकारों की स्वतंत्रता के खिलाफ एक गंभीर आक्रमण है और सरकार को कड़ाई से सजा देना चाहिए। बीजेपी ने कहा कि वे इस मामले की निष्पक्ष जांच का स्वागत करते हैं, और राज्य सरकार को इस दिशा में आगे बढ़ने की सराहना की।

आर्थिक प्रभाव की दृष्टि से, इस प्रकार की हिंसा से मीडिया संस्थानों के विज्ञापन राजस्व पर असर पड़ सकता है, क्योंकि विज्ञापनदाता ऐसे माहौल में निवेश करने से हिचकिचा सकते हैं। साथ ही, स्वास्थ्य क्षेत्र में विश्वास घटने से रोगियों की अस्पतालों में आने की इच्छा कम हो सकती है, जिससे सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।

सामाजिक स्तर पर इस घटना से पत्रकारों के बीच डर और आत्म-सेंसरशिप की प्रवृत्ति बढ़ सकती है, जिससे सार्वजनिक जानकारी का प्रवाह बाधित हो सकता है। यह लोकतंत्र की नींव को कमजोर करने वाला कारक माना जाता है, क्योंकि एक स्वतंत्र प्रेस बिना

Updated: September 14, 2026

This probe signals a tactical pivot to protect administrative credibility rather than guaranteeing press freedom.
Without systemic reform, such committees risk becoming performative shields against deeper institutional rot.

पश्चिम बंगाल उपचुनाव: समीरुल इस्लाम ने मतदाता सत्यापन और निष्पक्ष प्रक्रिया की मांग को ईसी को लिखा पत्र

पश्चिम बंगाल के दो संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में 6 अक्टूबर को निर्धारित उपचुनाव से पूर्व, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के राज्यसभा सदस्य समीरुल इस्लाम ने चुनाव आयोग को औपचारिक अनुरोध किया। उन्होंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को लिखी चिट्ठी में कहा कि उपचुनाव के दौरान योग्य मतदाता अपने मताधिकार का पूर्ण उपयोग कर सकें, और

आयोग को इस दिशा में सभी आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया। इस पत्र में सांसद ने यह भी उल्लेख किया कि पात्र मतदाताओं का वोट सुनिश्चित करना लोकतंत्र की मूलभूत जिम्मेदारी है, जिससे प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता बनी रहे।

समीरुल इस्लाम का यह कदम उपचुनाव की तैयारी के मध्य में आया, जब विभिन्न राजनीतिक दलों

ने मतदान प्रक्रिया में संभावित अड़चनें और मतदाता सूची में त्रुटियों के बारे में चेतावनी दी थी। पश्चिम बंगाल में 2024 के सामान्य चुनावों के बाद कई सीटों पर अवैध मतों और नामांकन में गड़बड़ियों की रिपोर्टें सामने आई थीं, जिससे उपचुनाव में भी समान समस्याओं का डर बना हुआ था। इस संदर्भ में टीएमसी के

प्रतिनिधियों ने बार-बार चुनाव आयोग से स्पष्टता और शीघ्र कार्रवाई की मांग की थी, ताकि मतदाता सूची में किसी भी प्रकार की अनियमितता को रोका जा सके।

पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल की चुनावी परिदृश्य ने कई बार मतदाता सूची में दोहरी प्रविष्टि, नामांकन में त्रुटि और मतदान केन्द्रों के अधूरे प्रबंध की समस्याएँ उजागर की

हैं। इन समस्याओं के कारण कई बार मतदाताओं को अपनी पहचान सिद्ध करने में कठिनाई का सामना करना पड़ा, जिससे उनका मतदान अधिकार बाधित हुआ। विशेष रूप से, ग्रामीण क्षेत्रों में आधार कार्ड के अभाव या नवीनीकरण की देरी ने कई योग्य मतदाताओं को मतदान से बाहर रखा। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए, समीरुल इस्लाम का

पत्र चुनाव प्रक्रिया में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

चिट्ठी में सांसद ने स्पष्ट रूप से कहा कि पात्र मतदाताओं का वोट सुनिश्चित करना केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा का मुख्य कर्तव्य है। उन्होंने आयोग को अनुरोध किया कि वे मतदाता सूची को अद्यतन करने के

लिए त्वरित कार्यवाही करें, और विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ मतदाता सूची में अनियमितताएँ पाई गई हैं, वहां अतिरिक्त सत्यापन प्रक्रिया लागू करें। इस अनुरोध में उन्होंने यह भी कहा कि मतदान के दिन सभी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ, जैसे कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की उचित संख्या, और मतदान केन्द्रों में सुरक्षा

उपायों को सुदृढ़ किया जाए।

समीरुल इस्लाम ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि उन्होंने इस मुद्दे को राज्य स्तर पर भी उठाया है, और टीएमसी के प्रमुख कार्यकर्ताओं से सहयोग की अपेक्षा की है। उन्होंने कहा कि यदि चुनाव आयोग इस अनुरोध को गंभीरता से नहीं लेता, तो यह न केवल वैध मतदाताओं के

अधिकारों का हनन होगा, बल्कि चुनाव परिणाम की वैधता पर भी प्रश्न उठेगा। इस संदर्भ में उन्होंने आयोग को आश्वस्त किया कि टीएमसी की टीम सभी आवश्यक दस्तावेज़ और डेटा प्रदान करने को तैयार है, जिससे प्रक्रिया तेज़ और पारदर्शी बन सके।

इसी अवधि में, अन्य प्रमुख राजनीतिक दलों ने भी समान मांगें उठाई हैं। कांग्रेस और

भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने मतदाता सूची के अद्यतन, मतदान स्थल की पहुंच, और सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया। इन मांगों के बीच, चुनाव आयोग ने अभी तक कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया है, जिससे विभिन्न पक्षों में असंतोष की लहर चल रही है। आयोग के आधिकारिक बयान के अभाव

में, यह स्पष्ट नहीं है कि उनके पास इस मुद्दे को हल करने के लिए किस प्रकार की योजना या समयसीमा है।

वर्तमान में, उपचुनाव के लिए तैयारियां तेज़ी से चल रही हैं, और कई क्षेत्रों में मतदाता सूचियों का पुनरावलोकन जारी है। चुनाव आयोग के अधीनस्थ कार्यालयों ने स्थानीय स्तर पर कई कार्यशालाओं का आयोजन किया

है, जहाँ अधिकारी मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया को सरल बनाने पर चर्चा कर रहे हैं। इन कार्यशालाओं में चुनाव प्रबंधन अधिकारी, पुलिस प्रतिनिधि और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी भाग ले रहे हैं, जिसका उद्देश्य मतदान प्रक्रिया को सुगम बनाना है। फिर भी, कई नागरिक संगठनों ने इस प्रक्रिया को पर्याप्त नहीं मानते हुए और अधिक पारदर्शिता की

मांग की है।

इस बीच, सामाजिक संगठनों ने भी चुनाव में भागीदारी बढ़ाने के लिए विभिन्न पहलें शुरू की हैं। कुछ NGOs ने जागरूकता अभियानों के माध्यम से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में मतदाता शिक्षा को प्राथमिकता दी है। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं को वोटिंग के महत्व के बारे में बताया, और उन्हें मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया

में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया। इस प्रकार की पहलें चुनाव आयोग के प्रयासों को पूरक करने के साथ-साथ मतदान के अधिकार को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार की मांगें न केवल चुनावी प्रक्रिया को मजबूत

Updated: September 14, 2026


TMC’s Samirul Islam urges the Election Commission to ensure inclusive voting in West Bengal by-elections, citing past irregularities and listing errors. This appeal from a ruling party member mirrors broader cross-party demands as authorities face scrutiny to guarantee a transparent and smooth electoral process.

This plea transforms voter suppression from a technical glitch into a high-stakes democratic crisis, raising fears that flawed lists could invalidate the election’s legitimacy. With the ECI silent, the opposition hopes to force systemic accountability by making every excluded vote a potential legal challenge.

ठाणे समुद्र तट: सुदर्शन पटनायक ने बनाई पंचमुखी गणेश की रेत की प्रतिमा

ठाणे के समुद्र तट पर गणेश चतुर्थी के अवसर पर रेत से बनी पंचमुखी गणेश प्रतिमा ने स्थानीय जनता और पर्यटकों का ध्यान खींचा। सुदर्शन पटनायक, जो भारत के प्रमुख सैंड आर्टिस्टों में से एक हैं, ने इस कलाकृति को तैयार किया। प्रतिमा की पाँच मुखों में विभिन्न भाव प्रदर्शित होते हैं, जिससे धार्मिक और कलात्मक दोनों आयाम उजागर होते हैं। यह प्रस्तुति उत्सव के आध्यात्मिक माहौल को नई दृश्य अभिव्यक्ति देती है।

गणेश चतुर्थी का उत्सव भारत में हर साल बड़े धूमधाम से मनाया जाता है, और महाराष्ट्र में यह विशेष महत्व रखता है। पिछले कुछ वर्षों में इस महोत्सव में रचनात्मक अभिव्यक्तियों का प्रयोग बढ़ा है, जहाँ पंडाल, झांकियों और सार्वजनिक कला के माध्यम से जनता को आकर्षित किया जाता है। ठाणे का समुद्र तट, जो पहले भी कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का स्थल रहा है, इस वर्ष विशेष रूप से सैंड आर्ट के प्रयोग से अलग पहचान बना रहा है।

सुदर्शन पटनायक ने पहले भी कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर रेत की मूर्तियों से प्रशंसा पाई है। उनकी रचनाएँ अक्सर पर्यावरणीय संदेश देती हैं, लेकिन इस बार उन्होंने धार्मिक तत्व को कला के साथ जोड़कर पंचमुखी गणेश की कल्पना को साकार किया। उन्होंने बताया कि पाँच मुख विभिन्न भावों—शांति, शक्ति, प्रेम, करुणा और आनंद—को दर्शाते हैं, जिससे दर्शकों को आध्यात्मिक अनुभूति मिलती है।

प्रतिमा का निर्माण लगभग दो दिनों में पूर्ण हुआ। कलाकार ने समुद्र तट की सूखी रेत को चुनिंदा रूप से छांटा, फिर विशेष तकनीकों से उसे मोड़कर आकार दिया। निर्माण के दौरान मौसम की स्थिति, रेत की नमी और लहरों की गति को लगातार निगरानी में रखा गया। यह प्रक्रिया स्थानीय मीडिया और सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर लाइव प्रसारित हुई, जिससे बड़ी संख्या में दर्शकों ने इसे रियल‑टाइम में देखा।

स्थानीय प्रशासन ने इस आयोजन को सुदूरन की अनुमति के तहत सुविधाजनक बनाया। ठाणे नगर परिषद ने सुरक्षा, सफाई और भीड़ नियंत्रण के उपायों को प्राथमिकता दी। इसके अलावा, उन्होंने इस कला को शहर के पर्यटन आकर्षण के रूप में प्रमोट करने की योजना बनाई। इस पहल से शहर की आर्थिक सक्रियता में संभावित वृद्धि की उम्मीद है।

स्थानीय व्यापारियों ने इस अवसर को लाभ उठाते हुए भोजन, स्मृति चिन्ह और वस्त्रों की बिक्री में वृद्धि दर्ज की। कई छोटे उद्यमियों ने विशेष रूप से गणेश चतुर्थी के थीम पर आधारित उत्पाद तैयार किए। इस आर्थिक गतिविधि से रोजगार के नए अवसर पैदा हुए, जिससे सामाजिक स्थिरता को बल मिला। साथ ही, पर्यटकों की भीड़ ने स्थानीय सेवाओं की मांग को बढ़ाया।

स्थानीय निवासियों ने इस कलाकृति को सांस्कृतिक धरोहर की तरह सराहा। कई लोगों ने बताया कि पंचमुखी गणेश का दृश्य उनके धार्मिक भावनाओं को नई दिशा देता है। कुछ बुज़ुर्ग नागरिकों ने कहा कि यह रेत की मूर्तिकला पारंपरिक पंडाल से अलग नई पहचान स्थापित करती है। युवा वर्ग ने इसे सामाजिक मीडिया पर साझा करने में उत्साह दिखाया, जिससे डिजिटल जुड़ाव बढ़ा।

राजनीतिक प्रतिनिधियों ने इस कार्यक्रम को सांस्कृतिक एकता के प्रतीक के रूप में उल्लेख किया। ठाणे के विधायक ने कहा कि ऐसी रचनात्मक पहलों से शहर की छवि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उन्नत होती है। राज्य सरकार के संस्कृति विभाग के अधिकारी ने इस प्रयास को विरासत संरक्षण और नवाचार का संगम कहा। उन्होंने भविष्य में समान कार्यक्रमों के लिए समर्थन का आश्वासन दिया।

आर्थिक विश्लेषकों ने इस आयोजन के संभावित प्रभाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि सांस्कृतिक पर्यटन की बढ़ती मांग के साथ, स्थानीय व्यवसायों को लाभ पहुंचाने वाले कार्यक्रमों की आवश्यकता है। रेत की कला जैसी अस्थायी संरचनाएँ शहर के ब्रांड मूल्य को बढ़ा सकती हैं, जिससे निवेशकों का ध्यान आकर्षित होता है। इस तरह के इवेंट्स से सार्वजनिक-निजी साझेदारी की संभावनाएँ भी उभरती हैं।

समाजिक दृष्टिकोण से, इस प्रकार की सार्वजनिक कला स्थानीय समुदाय को एकजुट करती है। विभिन्न सामाजिक समूह इस कलाकृति के चारों ओर मिलकर फोटो खींचते, चर्चा करते और धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेते हैं। इससे सामाजिक बंधन मजबूत होते हैं और सांस्कृतिक विविधता को सम्मान मिलता है। साथ ही, रेत के माध्यम से बनायी गई इस प्रतिमा ने पर्यावरणीय जागरूकता को भी प्रोत्साहित किया, क्योंकि रेत एक पुनर्नवीनीकरण सामग्री है।

विशेषज्ञों ने कहा कि पंचमुखी गणेश की इस रचना में परम्परा और आधुनिकता का संत

Updated: September 14, 2026

बागी सांसद बर्मा बसुनिया का दावा: 17 सांसद टीएमसी छोड़कर भाजपा में शामिल होंगे

पिछले सप्ताहांत के शाम के समय, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने उत्तर प्रदेश के एक छोटे हॉल में आयोजित सभा में एक चौंकाने वाला दावा रखा कि टीएमसी छोड़कर राष्ट्रीय कांग्रेस (एनसीपीआई) में शामिल होने वाले बीस सांसदों में से सत्रह सांसद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो जाएंगे। बसुनिया ने कहा

कि यह परिवर्तन अक्टूबर के मध्य में दुर्गा पूजा से पहले या उसके बाद होगा, और वे सभी भाजपा का झंडा थामेंगे। इस बयान ने तत्काल ही राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न कर दी, क्योंकि यह भारतीय राजनीति में संभावित बड़े बदलाव का संकेत था।

इस घोषणा के पहले, बसुनिया ने अपने राजनीतिक सफर की पृष्ठभूमि

का उल्लेख किया। वह 1999 में टीएमसी के साथ अपनी राजनीति की शुरुआत करते हैं और कई बार विधानसभा चुनावों में जीत हासिल कर चुके हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में कूचबिहार से उन्होंने दो बार लगातार जीत दर्ज की, जिससे वह पार्टी के प्रमुख चेहरों में शुमार हो गए। पिछले दो वर्षों में, टीएमसी के भीतर शासी ढांचे

के साथ उनके संबंध बिगड़ते गए, जिसके कारण उन्होंने बागी आंदोलन में हिस्सा लिया और कई बार पार्टी के नेतृत्व को आलोचना की। यह पृष्ठभूमि इस बात को स्पष्ट करती है कि उनका इस तरह का बड़ा कदम क्यों सोचा जा सकता है।

बागी नेताओं के बीच चल रहे विवाद की जड़ में पार्टी के भीतर सत्ता संघर्ष, गठबंधन

नीति और संसदीय सीटों के आवंटन का सवाल है। टीएमसी ने पिछले साल के विधानसभा चुनाव में कई प्रमुख क्षेत्रों में हार झेली, जिससे आंतरिक असंतोष बढ़ा। विशेषकर पश्चिम बंगाल में, जहाँ टीएमसी का दाब मजबूत है, बागी नेताओं ने कई बार कहा कि पार्टी की रणनीति अब पुरानी हो गई है। इस संदर्भ में बसुनिया का बयान एक

रणनीतिक संकेत माना गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह अपने राजनीतिक भविष्य को पुनः स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।

बसुनिया के इस दावे के बाद, उन्होंने अपने समर्थकों को एकत्रित किया और कहा कि ये सभी सांसद नई गठबंधन में शामिल होकर भाजपा के साथ मिलकर राज्य विकास की नई राह तय करेंगे। उन्होंने यह

भी बताया कि यह बदलाव केवल व्यक्तिगत कारणों से नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और आर्थिक विकास के हित में किया जा रहा है। इस दौरान, बसुनिया ने कई वरिष्ठ बागी सांसदों के नाम भी उजागर किए, जिससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि उनके दावे में कुछ हद तक वास्तविकता हो सकती है।

वहीं, पश्चिम बंगाल प्रदेश भाजपा

के अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने तुरंत ही इस दावे को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा कोई भी राजनैतिक दल में बंटवारा करने वाले बागी सांसदों को नहीं लेती, और यह बयान केवल राजनीति का एक खेल है। भट्टाचार्य ने कहा कि पार्टी के सिद्धांत और नैतिकता के दायरे में किसी भी तरह के ‘दलबदल’ को नहीं सहारा

जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि अगर कोई सांसद वास्तव में भाजपा में शामिल होना चाहता है, तो उसे उचित प्रक्रियाओं और विचार-विमर्श के बाद ही यह कदम उठाना चाहिए।

भट्टाचार्य के इस बयान के बाद, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि पार्टी की नीति हमेशा से स्पष्ट रही है: हम

किसी भी दल के बागी सदस्य को अपनी छत्रछाया में नहीं लेंगे। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भाजपा का उद्देश्य केवल राष्ट्रीय एकता और विकास है, न कि राजनैतिक दलबदल। इस प्रकार, भाजपा ने स्पष्ट रूप से यह संकेत दिया कि वह बसुनिया के दावे को वास्तविकता में बदलने के लिए तैयार नहीं है।

ट्रैक्टर-फ्रंटलाइन पर मौजूद कई राजनीतिक

विश्लेषकों ने भी इस घटनाक्रम पर टिप्पणी की। एक प्रमुख विश्लेषक ने कहा कि बसुनिया का दावा सिर्फ एक रणनीतिक चाल हो सकता है, जिससे वह अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूती प्रदान कर सकें। उन्होंने यह भी जोड़ते हुए कहा कि यदि इस दावे के पीछे वास्तविक योजना है, तो यह राज्य राजनीति में एक बड़ा बदलाव ला सकता

है, जिससे भाजपा और टीएमसी दोनों को पुनः अपनी रणनीति पर विचार करना पड़ेगा।

दूसरे विश्लेषकों ने यह तर्क दिया कि बसुनिया के दावे को साकार करना कठिन होगा, क्योंकि पार्टी के भीतर गहरे संबंध और व्यक्तिगत स्वार्थ जटिल हैं। उन्होंने बताया कि कई बागी सांसद पहले ही अपने मतदाताओं के भरोसे को नुकसान पहुँचाने से बचते हुए टीएमसी

में ही बने हुए हैं। इस प्रकार, बसुनिया का दावा वास्तविकता में बदलना पार्टी के भीतर की शक्ति संरचना को बाधित कर सकता है, जिससे राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है।

राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर ने भी इस पर विचार किया और कहा कि भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में इस तरह के बड़े दलबदल दुर्लभ रहे हैं। उन्होंने कहा

कि यदि इस दावे में सच्चाई है, तो यह भारतीय राजनीति में एक नया चरण खोल देगा, जहाँ बड़े दलों के बीच गठबंधन और पुनर्गठन की संभावना बढ़ेगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया में मतदाता की आवाज़ और स्थानीय मुद्दों का महत्व बढ़ेगा, क्योंकि

Updated: September 14, 2026


Trinamool rebel MP Jagdish Chandra Barman claimed that out of twenty legislators planning to quit for the Congress, seventeen will join the BJP around mid‑October, prompting sharp denials from the BJP leadership. Analysts view the statement as a high‑stakes political gambit that could reshape Uttar Pradesh’s party dynamics if it materialises.

Basundia’s “17‑to‑BJP” claim reads less as a genuine defection plan and more as a high‑stakes bargaining chip to force the Trinamool leadership into concessions before the next electoral cycle. If the maneuver stalls, it could still destabilize regional alliances, prompting both the T

बिहार पंचायत कार्यी ‘काला बिल्ला’ से विरोध, मांग पूरा होने तक जारी रहेगा, सरकार से होगी शीघ्र बैठक

पटना के फुलवारी शरीफ में सोमवार को बिहार पंचायत सेवा संघ के आह्वान पर प्रखंड पंचायत राज पदाधिकारियों ने काला बिल्ला लगाकर सांकेतिक विरोध शुरू किया, जिससे राज्य भर में समान कार्यवाही का आह्वान किया गया। यह विरोध तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार द्वारा लंबित मांगों पर ठोस समाधान नहीं दिया जाता, संघ ने स्पष्ट किया। काला बिल्ला लगाना स्थानीय प्रशासनिक प्रतीकात्मकता के रूप में उपयोग किया गया है, जिसमें पदाधिकारियों ने अपने अधिकारों के उल्लंघन और वेतन एवं कार्य स्थितियों में सुधार की माँग की है।

पिछले दो वर्षों में बिहार के पंचायती राज विभाग में पदोन्नति, वेतनभत्ता, तथा कार्यस्थल सुरक्षा के मुद्दे पर कई बार चर्चा हुई, परन्तु समाधान का अभाव बना रहा। इस दौरान कई पदाधिकारियों ने अनौपचारिक तौर पर अपने अधिकारों के लिए लिखित आवेदन दर्ज कराए, लेकिन उत्तर नहीं मिला। संघ ने कहा कि यह विरोध केवल आर्थिक मांगों के लिये नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की भी मांग है।

बिहार पंचायत सेवा संघ की स्थापना 2015 में हुई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण स्तर पर कार्यरत अधिकारियों के अधिकारों की रक्षा करना और उनके कार्य वातावरण को सुधारना रहा है। संघ के अध्यक्ष ने बताया कि 2022 में किए गए सर्वेक्षण में 78 प्रतिशत पदाधिकारियों ने कार्यस्थल पर अनुचित दबाव और समय पर वेतन न मिलने की समस्या बताई। इन आँकड़ों को देखते हुए संघ ने इस बार काला बिल्ला विरोध का रूप चुना, जिससे जनता और मीडिया का ध्यान इस मुद्दे की ओर खींचा जा सके।

विरोध का पहला चरण काला बिल्ला लगाकर सांकेतिक रूप से सरकार को चेतावनी देना था, जिसमें पदाधिकारियों ने अपने कार्यालयों के दरवाज़ों, प्रमुख भवनों और सरकारी विभागों के प्रवेश द्वार पर काली चिट्ठी रखी। इस दौरान उन्होंने अपने प्रस्थापित मांगों की सूची भी सार्वजनिक की, जिसमें वेतनभत्ता में 15 प्रतिशत वृद्धि, पदोन्नति प्रक्रिया का सरलिकरण, तथा कार्यस्थल में सुरक्षा उपायों का सुदृढ़ीकरण शामिल है।

संघ ने यह भी कहा कि यदि इन मांगों को शीघ्रता से पूरा नहीं किया गया तो अगले चरण में वे सामूहिक अवकाश और सड़क बंदी का विकल्प चुनेंगे। इस घोषणा के बाद कई जिलों में पदाधिकारियों ने समान कार्यवाही की, जिससे सरकारी सेवाओं में व्यवधान की संभावना बढ़ी। कुछ जिलों में तो स्थानीय प्रशासन ने पहले ही इस संभावित आंदोलन को रोकने के लिये अतिरिक्त कर्मचारियों को तैनात कर दिया है।

विरोध के दूसरे चरण में पदाधिकारियों ने अपनी कार्यस्थल पर काला बिल्ला लगाने के साथ ही स्थानीय समाचार पत्रों में विज्ञापन देकर अपनी मांगों को सार्वजनिक किया। इस दौरान उन्होंने सोशल मीडिया पर भी अपनी आवाज़ उठाई, जिससे जनता के बीच इस मुद्दे पर चर्चा तेज़ी से बढ़ी। कई नागरिक समूहों ने इस आंदोलन को समर्थन दिया, जबकि कुछ ने इसके संभावित असर को लेकर चिंता व्यक्त की।

संघ के प्रवक्ता ने कहा कि यह विरोध केवल आर्थिक मांगों तक सीमित नहीं है; यह ग्रामीण प्रशासन के कार्यप्रणाली में सुधार, डिजिटल सेवाओं की त्वरित कार्यान्वयन, तथा महिला कर्मचारियों के लिए विशेष सुरक्षा उपायों की भी मांग करता है। उन्होंने कहा कि पंचायती राज विभाग के उच्चाधिकारियों को इस दिशा में तत्काल कदम उठाना चाहिए, अन्यथा आंदोलन बड़े पैमाने पर फैल सकता है।

पटना की मुख्य सरकारी अधिकारी, पंचायती राज विभाग के सचिव ने इस विरोध पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार सभी मांगों को सुनने के लिये तैयार है और शीघ्र ही एक उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि काला बिल्ला लगाना एक वैध लोकतांत्रिक प्रक्रम है, परन्तु यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इससे सार्वजनिक सेवाओं पर असर न पड़े।

बिहार सरकार के मुख्य मंत्री ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए कहा कि वह सभी संबंधित पक्षों के साथ मिलकर समाधान निकालेंगे और किसी भी प्रकार के व्यवधान को रोकने के लिये कदम उठाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि संघ के साथ संवाद की प्रक्रिया में पारदर्शिता और त्वरित कार्यवाही आवश्यक है। इस बीच, राज्य के मुख्य वित्त मंत्री ने बजट में अतिरिक्त निधि आवंटन की संभावना की ओर इशारा किया, जिससे वेतनभत्ता और कार्यस्थल सुधार में मदद मिल सके।

पंचायत राज विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि वर्तमान में विभाग में 45,000 से अधिक पदाधिकारी कार्यरत हैं और इनकी कार्य स्थितियों में सुधार के लिये कई योजनाएँ तैयार हैं, परन्तु बजट सीमाओं और प्रशासनिक अड़चनों के कारण इन योजनाओं की कार्यान्वयन गति धीमी रही है। उन्होंने यह कहा कि संघ के साथ मिलकर एक कार्य योजना तैयार की जा रही है, जिसमें चरणबद्ध वेतनभत्ता वृद्धि और पदोन्नति प्रक्रिया में सुधार शामिल है।

सामाजिक दृष्टिकोण से देखें तो इस आंदोलन का ग्रामीण जनसंख्या पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि पंचायती राज संस्थाएँ ग्रामीण विकास, जल-संधारण, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में मुख्य भूमिका निभाती हैं। यदि सेवा प्रदायगी में व्यवधान आता है तो स्थानीय विकास के कार्य धीमे

Updated: September 14, 2026

The black‑cat protest reveals a tipping point where grassroots bureaucrats are weaponising symbolism to force a governance overhaul, not just a pay rise. If the state caves, it may legitimize a new model of employee‑led accountability that could reshape rural administration across India.

बिहार में गंगा व पुनपुन- बागमती नदियों के जलस्तर बढ़े, राज्य ने बाढ़ नियंत्रण के लिए आपातकालीन कदम उठाए

बिहार में बाढ़ का खतरा अभी भी बना हुआ है, सोमवार दोपहर तक गंगा सहित कई प्रमुख नदियों का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर दर्ज किया गया। जल संसाधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, गंगा पटना के दीघा में 50.81 मीटर, गांधी घाट पर 49.61 मीटर, हथिदह में 42.82 मीटर और मुंगेर में 39.38 मीटर पर बह रही है। इन स्तरों के बावजूद जलमापक केंद्रों पर पानी का स्तर धीरे‑धीरे घट रहा है, जिससे तत्काल आपात स्थिति का आकलन कठिन हो रहा है। वहीं पुनपुन और बागमती नदियों में जलस्तर में वृद्धि ने निचले इलाकों में फसल और बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा को लेकर नई चिंता उत्पन्न कर दी है।

बाढ़ के कारण 2024 के प्रारंभिक महीनों में बिहार में कई जिलों में जलभराव की स्थिति बनी रही, विशेषकर उत्तर प्रदेश की सीमा के निकट स्थित भागों में जलस्रोतों का विस्तार हुआ। पिछले महीने गंगाबंधन परियोजना के पूर्णता चरण में हुई देरी ने जल निकासी की क्षमता को प्रभावित किया, जिससे कई जलमापक केंद्रों ने चेतावनी स्तर पर पहुँच कर अलर्ट जारी किया। इस वर्ष मानसून के देर से शुरू होने और तेज़ हवाओं के साथ बाढ़ का जोखिम बढ़ा, जिससे राज्य सरकार ने आपातकालीन उपायों की घोषणा की थी।

जल संसाधन विभाग ने सोमवार सुबह छह बजे के आंकड़े जारी किए, जिसमें गंगा के विभिन्न बिंदुओं पर जलस्तर का विस्तृत विवरण दिया गया। दीघा, गांधी घाट, हथिदह और मुंगेर के आंकड़े दर्शाते हैं कि गंगा ने कई क्षेत्रों में अपने सामान्य बहाव सीमा को पार कर लिया है। विभाग ने बताया कि जलस्तर घटने के बावजूद, निचले इलाकों में जलधारा की गति तेज़ है, जिससे बाढ़ की पुनरावृत्ति का खतरा बना हुआ है। विभाग ने यह भी कहा कि जलमापक केंद्रों पर लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है और आवश्यकतानुसार चेतावनी जारी की जाएगी।

पुनपुन नदी के जलस्तर में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई, जहां पिछले दो दिनों में जलस्तर में लगभग दो मीटर की उछाल दर्ज हुई। बागमती नदी में भी समान प्रवृत्ति दिखी, जिसके कारण कई बिंदुओं पर जलनिकासी के लिए स्थापित बाढ़रोधी बाड़ें और पंपिंग स्टेशन सक्रिय कर दिए गए। स्थानीय प्रशासन ने बताया कि इन नदियों के किनारे स्थित गांवों में जल निकासी के लिए अतिरिक्त बैरियर स्थापित किए गए हैं, जिससे बाढ़ के प्रभाव को सीमित किया जा सके।

बराजों से भी पानी छोड़ा जा रहा है, जिससे जलसंकट की तीव्रता को कुछ हद तक कम किया जा रहा है। जलभांडारण इकाइयों ने नियत मात्रा में पानी बाहर निकालते हुए निचले क्षेत्रों में जलस्तर को नियंत्रित करने का प्रयास किया। हालांकि, बराजों से निकले पानी की मात्रा अभी भी बाढ़ के जोखिम को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाई है। प्रशासन ने कहा कि यह प्रक्रिया सतत रूप से चलती रहेगी, और जलस्तर की स्थिति के अनुसार समायोजन किया जाएगा।

सप्ताह के शुरुआती दिनों में कई जिलों में जलरोधक बाड़ों और सैंडबैगों की तैनाती की गई, जिससे बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में क्षति को कम किया जा सके। राज्य सरकार ने आपदा प्रबंधन टीम को सक्रिय करके स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर राहत कार्य तेज़ करने का निर्देश दिया। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में पानी के कारण उत्पन्न रोगों की रोकथाम हेतु अतिरिक्त दवाइयों और टीकों की व्यवस्था की गई।

बिहार के मुख्य मंत्री ने बाढ़ के प्रबंधन में सरकारी एजेंसियों के सहयोग को सराहा और कहा कि सभी विभागों को मिलकर जल स्तर को नियंत्रित करने के लिए प्रयास करना चाहिए। मुख्यमंत्री कार्यालय ने बताया कि बाढ़ के कारण प्रभावित लोगों को तत्काल राहत सामग्री प्रदान की जा रही है, जिसमें खाद्य सामग्री, जल शुद्धिकरण किट और अस्थायी आश्रय शामिल हैं।

जल संसाधन विभाग के प्रमुख ने कहा कि गंगा के जलस्तर में गिरावट के बावजूद, निरंतर मॉनिटरिंग और जल निकासी की प्रक्रिया को तेज़ किया जा रहा है। उन्होंने उल्लेख किया कि जलमापकों से प्राप्त डेटा के आधार पर बाढ़ नियंत्रण के लिए नई रणनीतियों को लागू किया जा रहा है, जिसमें जल प्रवाह को संतुलित करने के लिए अतिरिक्त पंप और नालों की स्थापना शामिल है।

बाजारों और स्थानीय व्यापारियों ने भी बाढ़ के प्रभाव को महसूस किया, कई सड़कों और पुलों पर जलजमाव के कारण वस्तुओं का परिवहन बाधित हो गया। कृषि उत्पादन में संभावित नुकसान को लेकर किसान समूहों ने सरकार से अतिरिक्त सहायता की माँग की। कई छोटे व्यवसायों ने बिक्री में कमी की रिपोर्ट दी, जिससे आर्थिक दबाव बढ़ा है।

समाज विज्ञानियों ने बाढ़ के सामाजिक प्रभाव पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन और अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे के कारण बाढ़ की आवृत्ति बढ़ रही है, जिससे ग्रामीण समुदायों की जीवनशैली पर दीर्घकालिक असर पड़ रहा है। महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर विशेष रूप से ध्यान देने की

Updated: September 14, 2026

The rising water levels in the Ganga, Punpun and Bagmati rivers heighten flood risk for low‑lying districts, prompting intensified monitoring and deployment of barriers, pumps and relief resources. Continuous data‑driven management aims to mitigate potential damage to infrastructure and agriculture.

सरण: फर्जी 1964 के बैनामा से जमीन हड़प की साजिश का पर्दाफाश, एक आरोपी की गिरफ्तारी

शहर‑सरण के महामारी‑संकट के बीच, कूटरचना और धोखाधड़ी से जुड़ी एक जमीन हड़पने की साजिश का पर्दाफाश हुआ। पुलिस ने जाली दस्तावेज़ों के माध्यम से 1964 का फर्जी बैनामा तैयार करने का आरोप लगाते हुए एक नामजद अभियुक्त को गिरफ्तार किया। गिरफ्तार व्यक्ति महम्मदपुर गांव के निवासी शुभनाथ भगत हैं। इस कार्रवाई को स्थानीय थाने के प्रमुख ने बताया कि पूछताछ के बाद अभियुक्त को तुरंत जेल भेज दिया गया है, जिससे इस घोटाले की जड़ें खुलने की आशा बढ़ी है।

जमीन के लेन‑देन में अक्सर दाखिल‑खारिज की प्रक्रिया में दस्तावेज़ी कुप्रबंधन की समस्या सामने आती है, पर इस बार मामला अत्यधिक जटिल हो गया। 1964 के बैनामा को फर्जी तौर पर तैयार करके उसे वैध दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत किया गया था, जिससे खरीदार को धोखा दिया गया। इस प्रकार के नकली दस्तावेज़ों का उपयोग करके जमीन को अनधिकृत रूप से कब्जा किया जाता है, जिससे स्थानीय किसानों और निवेशकों को भारी नुकसान होता है।

पृष्ठभूमि में यह स्पष्ट है कि जमीन खरीद‑बिक्री के मामलों में अक्सर स्थानीय ताक़तों द्वारा दबाव बनाया जाता है। इस साजिश में प्रमुख भूमिका निभाने वाले व्यक्तियों ने आधिकारिक रिकार्ड को बदलने के लिए फर्जी बैनामा तैयार किया। 1964 का बैनामा, जो आधिकारिक अभिलेखों में नहीं है, को उन्होंने दस्तावेज़ी रूप से वैध दिखाने की कोशिश की, जिससे खरीदार को विश्वास दिलाया गया कि जमीन का स्वामित्व साफ़ है।

पुलिस ने मामले की शुरुआती जाँच में कई दस्तावेज़ों की जाँच की, जिससे पता चला कि बैनामा का मूल स्वरूप और हस्ताक्षर दोनों ही नकली थे। जांचकर्ताओं ने फर्जी दस्तावेज़ों के निर्माण में उपयोग किए गए कंप्यूटर फाइलें और प्रिंटर इंक की विश्लेषणात्मक रिपोर्ट तैयार की। यह रिपोर्ट साबित करती है कि दस्तावेज़ों की बनावट और कागज का प्रकार मूल दस्तावेज़ों से पूरी तरह अलग है।

जांच के दौरान, स्थानीय पुलिस ने यह भी पाया कि कई व्यक्तियों ने इस साजिश में मिलकर काम किया। ओमप्रकाश कुशवाहा, जो महम्मदपुर गांव के निवासी हैं, ने स्थानीय थाने में प्राथमिकी दर्ज करवाई, जिसमें शुभनाथ भगत, मीरा देवी, लक्ष्मण कुमार और चंदन कुमार के खिलाफ आरोप लगाए गए। यह प्राथमिकी पुलिस को साजिश के अन्य सहयोगियों की पहचान करने में मदद करेगी।

पुलिस ने तुरंत ही इस मामले में जुड़े सभी प्रमुख व्यक्तियों की सूचनाएँ एकत्र कीं। मीरा देवी, लक्ष्मण कुमार और चंदन कुमार पर भी पूछताछ की जा रही है, और उन्हें भी संभावित रूप से हिरासत में ले लिया जा सकता है। जांच के अंतर्गत, पुलिस ने फर्जी दस्तावेज़ों की उत्पत्ति और वितरण के मार्ग को ट्रेस करने के लिए डिजिटल फॉरेंसिक विशेषज्ञों को भी शामिल किया।

जाँच के अगले चरण में, पुलिस ने सभी संदेहित व्यक्तियों के बैंक खातों और लेन‑देन की जांच शुरू कर दी है। इस प्रक्रिया में यह स्पष्ट हो रहा है कि जाली बैनामा के माध्यम से जमीन के लेन‑देन में बड़े पैमाने पर धनराशि की आवाजाही हुई है। वित्तीय ट्रैकिंग से यह पता चला है कि कुछ बड़ी रकम नकद स्वरूप में विभिन्न खातों में जमा की गई थी, जिससे इस घोटाले की आर्थिक परिमाण स्पष्ट हुई।

सरण जिले के स्थानीय प्रशासन ने इस घटना पर गहरी चिंता जताई है। जिला अधिकारी ने कहा कि जमीन‑हड़पने के मामलों में सख़्त निगरानी रखी जानी चाहिए और किसी भी प्रकार की कागजी धोखाधड़ी को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में भूमि लेन‑देन की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक रजिस्टर अपनाने की दिशा में काम किया जाएगा।

राजनीतिक दलों ने इस मामले पर विभिन्न प्रतिक्रियाएँ दीं। विपक्षी दल ने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन‑हड़पने की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं और सरकार को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। वहीं, शासक पक्ष ने कहा कि पुलिस ने इस साजिश को सटीक समय पर उजागर किया है और न्यायिक प्रक्रिया में त्वरित कदम उठाए जाएंगे।

आर्थिक दृष्टिकोण से इस घोटाले का असर स्थानीय कृषि

Updated: September 14, 2026

खगड़िया के एसपी भानु प्रताप सिंह और पत्नी पूजा सिंह के बीच वैवाहिक विवाद; भरतपुर में बेटी से मिलने की शिकायत दर्ज

भानु प्रताप सिंह, खगड़िया एसपी और आईपीएस अधिकारी, तथा उनकी पत्नी पूजा सिंह के बीच चल रहा वैवाहिक संघर्ष अब राजस्थान के भरतपुर तक फैल गया है। पूजन ने मथुरा गेट थाने में शिकायत दर्ज कराते हुए बताया कि छह साल की बेटी से मिलने की अनुमति नहीं दी जा रही है और ससुराल में दरवाजा भी बंद कर दिया गया है। यह घटना तब उत्पन्न हुई जब पूजन ने अपने पति और ससुराल के साथ पारिवारिक संबंधों को सामान्य बनाने की मांग की, जबकि उन्हें लगातार सामाजिक और कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।

भानु प्रताप सिंह ने 2020 में आईपीएस में शामिल होकर कई प्रमुख पदों पर कार्य किया, जिसमें बिहार के खगड़िया में एसपी का कार्यकाल भी शामिल है। उनकी पत्नी पूजा, एक निजी क्षेत्र की पेशेवर, पिछले छह वर्षों से उनके साथ रही हैं और दो बच्चों की मां हैं। इस विवाद की जड़ें तब से हैं जब उनके वैवाहिक जीवन में अंतर-व्यक्तिक मतभेद उभरे, जिससे पारिवारिक माहौल तनावपूर्ण हो गया।

बिहार में उनके कार्यकाल के दौरान कई उच्च-प्रोफ़ाइल केसों में उनका नाम उल्लेखनीय रहा, जिससे उन्हें सार्वजनिक और मीडिया की नजरों में लाया गया। इस दौरान, पूजन ने कई बार सामाजिक कार्यक्रमों और बच्चों की देखभाल में सक्रिय भूमिका निभाई, जिससे उनके बीच सामंजस्य की आशा बनी रही। परन्तु, हाल के वर्षों में ससुराल के साथ संबंध बिगड़ने लगे, और यह मतभेद सार्वजनिक विवाद में बदल गया।

पूजन ने मथुरा गेट थाने में शिकायत दर्ज कराते समय कहा कि उनके पति ने उन्हें घर से बाहर कर दिया और बेटी से मिलने की अनुमति नहीं दी। उन्होंने यह भी बताया कि ससुराल ने दरवाजा बंद करके उन्हें घर से बाहर रहने पर मजबूर किया, जिससे उन्हें मानसिक तनाव और शारीरिक असुविधा का सामना करना पड़ा। इस शिकायत के बाद स्थानीय पुलिस ने मामला दर्ज किया और दोनों पक्षों से बयान लिए।

भानु प्रताप सिंह ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि पारिवारिक विवाद निजी मामला है और इसे सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि वह अपने कर्तव्यों के प्रति पूर्णतः निष्ठावान हैं और इस मुद्दे को अदालत के माध्यम से सुलझाने का इरादा रखते हैं। उन्होंने पुलिस को सहयोग करने का आश्वासन भी दिया, जिससे जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे।

ससुराल के प्रमुख सदस्य ने कहा कि घर में किसी भी प्रकार की अनैतिक गतिविधि नहीं हो रही है और परिवार के अंदर के मतभेद को सुलझाने के लिए सभी पक्षों को संवाद करना चाहिए। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि बेटी का स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए सबसे उपयुक्त माहौल प्रदान करने की कोशिश की जा रही है, और किसी भी बाहरी हस्तक्षेप से बचाव किया जा रहा है।

राज्य के गृह विभाग ने इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई भी सरकारी अधिकारी व्यक्तिगत विवाद में फँसता है, तो उसे अपने कर्तव्यों को प्रभावित नहीं करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी घटनाओं में न्यायिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है और जांच में देरी नहीं होनी चाहिए।

बिहार पुलिस ने बताया कि इस प्रकार के मामलों में सामाजिक प्रभाव को देखते हुए शीघ्र कार्यवाही की जाती है। उन्होंने कहा कि शिकायत के बाद उन्होंने प्रारंभिक जांच शुरू कर दी है और आवश्यक साक्ष्य एकत्र कर रहे हैं। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई कानून का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित अधिकारी पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विवाद का प्रभाव सार्वजनिक विश्वास पर पड़ सकता है, विशेषकर क्योंकि दोनों पक्ष सार्वजनिक सेवा में हैं। उन्होंने यह संकेत दिया कि इस प्रकार के निजी विवादों को सार्वजनिक मंच पर लाने से सरकारी संस्थानों की छवि पर प्रश्न उठ सकते हैं। इस संदर्भ में, विपक्षी पार्टियों ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता की कमी को दर्शाता है।

आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो ऐसे विवादों से सार्वजनिक खर्च पर अनावश्यक बोझ पड़ सकता है, क्योंकि जांच और सुरक्षा व्यवस्था में अतिरिक्त संसाधन लगते हैं। साथ ही, यदि इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया लंबी हो जाती है, तो संबंधित अधिकारी के कार्यस्थल पर अस्थायी अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है, जिससे प्रशासनिक कार्यवाही में बाधा आ सकती है।

सामाजिक प्रभाव के लिहाज़ से, इस मामले ने महिलाओं के अधिकार और पारिवारिक सुरक्षा के मुद्दे को फिर से उभारा है। कई सामाजिक संगठनों ने इस अवसर पर महिला सुरक्षा और बाल अधिकारों के संरक्षण की मांग की है, यह दर्शाते हुए कि घरेलू विवादों को न्यायिक रूप से सुलझाना आवश्यक है। इस दिशा में, महिला सहायता समूह ने समर्थन की

शक्ति के प्रतीक बने अधिकारी का घर में ही वंचित होना समाज की मूल्य नैतिकता पर प्रहार है।
जब काਨून का प्रतीक स्वयं काਨून की जंजीरों में फंसे, तो न्याय की हबक बंदिशी सदाचरण पर प्रश्

दरभंगा में सौर ऊर्जा से बदली खेती की तस्वीर, ‘आशा मॉडल’ से पानी की बचत 30% और बिजली खर्च 45% घटा

बिहार के दरभंगा जिले के एक छोटे से गाँव में सुबह के सवेरे ही धूप की पहली किरणें पनपती पंक्तियों में चमकी, जहाँ किसानों ने नया “आशा मॉडल” स्थापित देखा।
यह मॉडल, जिसका पूरा नाम ऑटोमेटेड सोलर‑पावर्ड बेस्ड हाई इफ़िशिएंसी इरिगेशन एप्लीकेशन है, पहली बार बिहार में किसानों को सौर ऊर्जा से चलित सिंचाई प्रणाली प्रदान करेगा। राज्य सरकार की इस पहल का मुख्य उद्देश्य बिजली के बिल में भारी कटौती और जल संसाधन की कुशल उपयोगिता सुनिश्चित करना है, जिससे कृषि उत्पादन में सुधार की उम्मीद है।पिछले दो दशकों में बिहार की कृषि क्षेत्र ने बिजली की अस्थिर आपूर्ति और जल अभाव जैसी चुनौतियों का सामना किया है। विशेषकर सूखे की स्थितियों में किसान अक्सर टन‑टन जल टैंकों पर निर्भर रहे, जबकि उच्च विद्युत दरों ने लागत को बढ़ा दिया। राज्य के कृषि विभाग ने कई बार वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश में विभिन्न प्रयोग किए, परंतु तकनीकी अड़चनें और वित्तीय बाधाओं ने उन्हें बड़े पैमाने पर लागू करने से रोका।

आशा मॉडल की योजना 2022 में बिहार सरकार के नवीनीकरण ऊर्जा विभाग और कृषि विज्ञान केन्द्र के संयुक्त अनुसंधान के बाद तैयार हुई। इस योजना में सोलर पैनलों को खेतों के किनारे स्थापित कर, ऊर्जा को सीधे पम्पों तक पहुँचाया जाएगा, जिससे जल निकासी और वितरण की प्रक्रिया स्वचालित हो जाएगी। मॉडल को लागू करने के लिए पहले 150 हेक्टेयर भूमि पर पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया, जिसमें 500 किसान भाग ले रहे थे।

पायलट चरण में, किसानों को सोलर पैनलों की स्थापना और रख‑रखाव के लिए तकनीशियनों की टीम द्वारा प्रशिक्षण दिया गया। किसानों को मोबाइल ऐप के माध्यम से पानी की जरूरत और पम्प की स्थिति का रीयल‑टाइम डेटा प्राप्त होने लगा, जिससे वे आवश्यकता अनुसार सिंचाई का समय निर्धारित कर सके। इस तकनीकी सहायता से जल की बर्बादी में 30 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई, जबकि बिजली खर्च में 45 प्रतिशत तक की बचत हुई।

स्थानीय समाचार एजेंसियों ने बताया कि पायलट प्रोजेक्ट के पहले दो महीनों में, किसान फसल के पैदावार में औसतन 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी देख रहे हैं। विशेषकर धान और गेहूँ की फसलों में जल उपलब्धता ने उनकी वृद्धि में प्रमुख भूमिका निभाई। इसके अलावा, किसान संघों ने बताया कि सौर ऊर्जा के उपयोग से धुएँ और कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहा।

सरकार ने इस मॉडल के सफल परिणामों को देखते हुए, अगले वित्तीय वर्ष में इसे पूरे राज्य में विस्तार करने का इरादा जाहिर किया है। इस योजना के तहत, अगले दो वर्षों में लगभग 20,000 हेक्टेयर खेतों को सौर‑सिंचाई प्रणाली से सुसज्जित किया जाएगा। इसके लिए राज्य के कृषि ऋण योजना के तहत विशेष सब्सिडी और न्यूनतम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाएगा।

किसानों ने इस पहल को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ व्यक्त कीं। कई छोटे किसान, जिन्होंने पहले बिजली की दरों के कारण भारी कर्ज उठाया था, उन्होंने कहा कि आशा मॉडल ने उन्हें आर्थिक बोझ से मुक्त किया है। वहीं, कुछ बड़े ज़मींदारों ने कहा कि प्रारम्भिक निवेश की लागत अभी भी उच्च है और उन्हें लाभ प्राप्त करने में समय लग सकता है।

राज्य के कृषि मंत्री ने इस अवसर पर कहा, “आशा मॉडल हमारे किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हम इसे पूरे बिहार में लागू करने के लिए तैयार हैं, जिससे हर किसान को सस्ती और स्थायी ऊर्जा उपलब्ध हो सके।” उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में इस प्रणाली को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाते हुए और भी उन्नत तकनीकियों के साथ जोड़ा जाएगा।

विपक्षी दल के प्रतिनिधियों ने सरकार की इस योजना की सराहना की, परंतु उन्होंने कहा कि वित्तीय प्रबंधन और निगरानी तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सोलर पैनलों की आयु और रख‑रखाव खर्च को स्पष्ट रूप से तय करके ही किसानों को पूर्ण लाभ मिलेगा। इस बीच, कुछ पर्यावरणीय NGOs ने कहा कि यह पहल जल संरक्षण और नवीनीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देती है, परंतु उन्हें निरंतर पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की आवश्यकता है।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि सौर‑सिंचाई प्रणाली से बिजली की आयात लागत में कमी आएगी, जिससे राज्य की कुल ऊर्जा खपत में कमी आएगी।

The “Asha Model” shows how coupling solar power with data‑driven irrigation can turn Bihar’s chronic water‑and‑energy shortages into a competitive edge, potentially reshaping farmer profitability and state‑level energy balances.

दिवाली-छठ बुकिंग में एरर; रेलवे ने बिहार के लिए 8 स्पेशल ट्रेन चलाने का ऐलान किया

दिवाली‑छठ के अवकाश को लक्षित कर बिहार की ओर यात्रा करने वाले यात्रियों को 13 सितंबर को IRCTC पर टिकट बुकिंग के दौरान “हाई सिस्टम लोड”, “एरर” और “रेग्रेट” जैसे संदेशों का सामना करना पड़ा, जिससे व्यापक असंतोष उत्पन्न हुआ।
टिकट आरक्षण का उद्घाटन 12 नवंबर की यात्रा के लिए किया गया था, परन्तु उच्च ट्रैफ़िक के कारण सर्वर पर भारी दबाव बना, जिससे कई उपयोगकर्ता बुकिंग प्रक्रिया में रुकावटों का अनुभव कर रहे थे। सोशल मीडिया पर इस समस्या की व्यापक चर्चा देखने को मिली, और कई यात्रियों ने सीधे रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से समाधान की मांग की।IRCTC की तकनीकी टीम ने बताया कि इस अवधि में वेबसाइट पर उपयोगकर्ता संख्या सामान्य से तीन गुना अधिक थी, जिससे बैक‑एंड सिस्टम में अस्थायी ओवरलोडिंग हुई। प्लेटफ़ॉर्म ने इस समस्या को तुरंत पहचानते हुए सर्वर क्षमता को बढ़ाने के लिए अतिरिक्त क्लाउड संसाधनों का उपयोग किया, परंतु कुछ उपयोगकर्ता अभी भी एरर संदेश देख रहे थे। इस घटना से पहले भी उच्च अवकाशों के दौरान टिकट बुकिंग में समान बाधाएँ रिपोर्ट की गई हैं, लेकिन इस बार समस्या का पैमाना और सामाजिक प्रतिक्रिया अधिक तीव्र रही।

बिहार की ओर जाने वाली प्रमुख ट्रेनों की मांग में निरंतर वृद्धि के कारण पिछले कुछ वर्षों में आरक्षण प्रणाली पर दबाव बढ़ता जा रहा है। विशेषकर दिवाली‑छठ के मिश्रित अवकाश में, प्रवासी कार्यकर्ता, छात्र और व्यापारिक यात्रियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जाती है। भारतीय रेलवे ने इस प्रवृत्ति को पहले भी पहचानते हुए विभिन्न उपाय अपनाए हैं, जैसे विशेष ट्रेनों का परिचालन और बुकिंग विंडो का विस्तारित करना। हालांकि, तकनीकी अवसंरचना में सुधार की गति और उपयोगकर्ता अनुभव के बीच अंतर स्पष्ट रूप से सामने आया है।

स्थिति की गंभीरता को समझते हुए रेलवे ने 8 जोड़ी स्पेशल ट्रेनों का ऐलान किया, जो 12 नवंबर से 15 नवंबर के बीच चलेंगी। इन ट्रेनों को विशेष रूप से बिहार के विभिन्न प्रमुख स्टेशन – पटना, मुजफरपुर, गया और भागलपुर – को जोड़ने के लिए नियोजित किया गया है। प्रत्येक ट्रेन में अतिरिक्त 24 कोच जोड़ने की योजना है, जिससे कुल मिलाकर लगभग 2 हजार अतिरिक्त सीटें उपलब्ध होंगी। यह कदम यात्रियों की तत्काल बुकिंग समस्या को कम करने और यात्रा की सुविधा बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया गया है।

रेल मंत्रालय ने इस मुद्दे पर तत्काल कदम उठाने की घोषणा की और कहा कि भविष्य में ऐसे उच्च‑लोड अवधि में सिस्टम की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सर्वर अपग्रेड, सॉफ्टवेयर पैच और अधिक लचीला बुकिंग इंफ़्रास्ट्रक्चर लागू किया जाएगा। साथ ही, यात्रियों को सलाह दी गई कि वे बुकिंग के शुरुआती घंटों में न लॉगिन करने और वैकल्पिक बुकिंग एजेंसियों या मोबाइल ऐप्स का उपयोग करने का प्रयास करें।

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सोशल मीडिया पर कई यात्रियों की शिकायतों का उत्तर देते हुए कहा, “हमारी प्राथमिकता यात्रियों की सुविधा है, और इस प्रकार की तकनीकी बाधाएँ अस्वीकार्य हैं। हमने त्वरित समाधान के लिए विशेष ट्रेनों का परिचालन किया है और तकनीकी टीम को सर्वर क्षमता बढ़ाने के लिए निर्देशित किया है।” उन्होंने आगे कहा कि भविष्य में ऐसे मुद्दों को रोकने हेतु निरंतर निगरानी और प्री‑इम्प्रूवमेंट योजनाएँ लागू की जाएँगी।

IRCTC की मुख्य अधिकारी ने भी टेलीफ़ोनिक टिप्पणी में कहा, “सिस्टम लोड को कम करने के लिए हमने कई वैकल्पिक पोर्टल तैयार किए हैं, जिसमें मोबाइल ऐप और एपीआई आधारित बुकिंग विकल्प शामिल हैं। उपयोगकर्ता को सलाह दी जाती है कि वे विभिन्न चैनलों पर बुकिंग का प्रयास करें, जिससे सफलता की संभावनाएँ बढ़ेंगी।” उन्होंने यह भी बताया कि अगले दो हफ्तों में सर्वर का फ़ुल अपग्रेडेशन किया जाएगा, जिससे भविष्य में इसी प्रकार की समस्याएँ न्यूनतम रहेंगे।

समुदाय के कई प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया। बिहार की यात्रा के लिए नियमित रूप से ट्रैवल एजेंसियों के प्रतिनिधियों ने कहा, “हम अपने ग्राहकों को पहले से ही वैकल्पिक बुकिंग तिथियों और ट्रेन विकल्पों की सलाह दे रहे हैं, ताकि वे असुविधा से बच सकें।” वहीं, प्रवासी श्रमिक संगठनों ने रेलवे से तुरंत अतिरिक्त कोच और विशेष ट्रेन की मांग की, क्योंकि कई यात्रियों को नौकरी के कारण समय पर यात्रा करना अनिवार्य है।

एक प्रमुख ऑनलाइन यात्रा पोर्टल के विश्लेषक ने बताया कि उच्च-लोड अवधि में टिकट बुकिंग में अक्सर “रेग्रेट” संदेश दिखाई देता है, जिसका अर्थ है कि उपलब्ध सीटें समाप्त हो गई हैं। उन्होंने कहा, “सिस्टम लोड को संभालने के लिए अधिक डायनामिक कैपेसिटी मॉडल अपनाना आवश्यक है, जिससे उपयोगकर्ता को वास्तविक समय में उपलब्धता की स्पष्ट जानकारी मिल सके।”

Updated: September 14, 2026


Heavy traffic paralysed IRCTC bookings for Diwali-Chhath travel, prompting complaints and forcing the Railway Ministry to deploy extra special trains with additional coaches. Officials promised immediate server upgrades while advising passengers to utilize alternative booking channels to secure tickets amidst the surge.

Technical failures during peak holiday travel highlighted critical capacity constraints in the national railway booking infrastructure.
Emergency special train deployments provide immediate relief but confirm the need for sustained digital system upgrades.

मोदी ने ब्रिक्स शिखर में रूस, चीन, ईरान सहित 15 द्विपक्षीय बैठकों का शेड्यूल पूरा किया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान तीन दिन में लगभग पंद्रह द्विपक्षीय बैठकों का शेड्यूल पूरा किया।
रूस, चीन, ईरान, दक्षिण अफ्रीका और कई अफ्रीकी, लैटिन अमेरिकी देशों के प्रमुखों के साथ चर्चा में व्यापार, ऊर्जा, रक्षा सहयोग, सीमा शांति और ग्लोबल साउथ की सामूहिक चुनौतियों को प्राथमिकता दी गई। यह तीव्र कार्यक्रम भारत की बहुपक्षीय भूमिका को सुदृढ़ करने के साथ-साथ द्विपक्षीय संबंधों को भी नई दिशा देने का प्रयास रहा।ब्रिक्स के गठन के बाद से भारत ने इस मंच को अपने विदेश नीति के प्रमुख स्तम्भ के रूप में अपनाया है। पिछले शिखर सम्मेलनों में आर्थिक सहयोग, वैकल्पिक विकास मॉडलों और बहुपक्षीयता पर चर्चा मुख्य थी। इस बार दिल्ली ने शिखर को अपनी विदेश नीति की सक्रियता के साथ प्रस्तुत किया, जहाँ मुख्य लक्ष्यों में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में सुधार, विकासशील देशों के लिए तकनीकी सहयोग और वैकल्पिक सप्लाई चेन बनाना शामिल था। इस पृष्ठभूमि में मोदी की द्विपक्षीय मुलाकातों की गिनती बढ़ी।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ हुई बैठक में दो देशों के बीच ऊर्जा सुरक्षा को लेकर समझौते पर सहमति व्यक्त की गई। दोनों पक्षों ने तेल और प्राकृतिक गैस के व्यापार को बढ़ाने, साथ ही एंटी-टेररर रणनीतियों को सुदृढ़ करने की बात की। पुतिन ने भारत को यूरोपीय ऊर्जा संकट में एक विश्वसनीय साझेदार माना और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की आपूर्ति के लिए सहयोग की पुष्टि की। इस समझौते से दोनों देशों के व्यापारिक आंकड़े में अगले वित्तीय वर्ष में 15% तक की बढ़ोतरी की संभावना जताई गई।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई मुलाकात में सामरिक सहयोग और आर्थिक साझेदारी को नई ऊँचाइयों पर ले जाने पर जोर दिया गया। दोनों देशों ने सशस्त्र बलों के बीच संयुक्त अभ्यास, साइबर सुरक्षा सहयोग और वैकल्पिक विनिर्माण आपूर्ति श्रृंखला की स्थापना पर समझौता किया। आर्थिक वार्ता में भारत-चीन व्यापार को 2025 तक दो गुना करने का लक्ष्य रखा गया, जिससे दोनों देशों की निर्यात आय में उल्लेखनीय वृद्धि की उम्मीद है। इस बैठक में दक्षिण एशिया में शांति बनाए रखने की रणनीति को भी प्रमुखता दी गई।

ईरान के राष्ट्रपति हासिन रोमानिया के साथ हुई चर्चा में ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग को बढ़ाने की दिशा में कई प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर हुए। दो देशों ने तेल शोधन, पेट्रोकेमिकल्स और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में साझेदारी की योजना बनाई। भारत ने ईरान के साथ गैस पाइपलाइन परियोजना को आगे बढ़ाने का वचन दिया, जिससे पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद भी ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ किया जा सके। इस समझौते से दोनों देशों की वार्षिक ऊर्जा व्यापारिक मात्रा में 10% की वृद्धि की संभावना है।

दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सीरिल रामाफोसा के साथ हुई बैठक में कृषि, खनन और स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग को विस्तारित करने पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने अफ्रीकी महाद्वीप में भारतीय कंपनियों के निवेश को प्रोत्साहित करने और स्थानीय रोजगार सृजन को बढ़ाने का संकल्प लिया। विशेष रूप से, भारतीय फार्मास्यूटिकल्स को अफ्रीका के सार्वजनिक स्वास्थ्य में योगदान देने के लिए विशेष लाइसेंसिंग प्रक्रिया को तेज करने पर सहमति बनी। इस कदम से दक्षिण अफ्रीका में भारतीय निवेश में अगले पाँच वर्षों में 20% की वृद्धि का अनुमान लगाया गया।

ब्रिक्स शिखर के दौरान ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा और अर्जेंटीना के राष्ट्रपति अल्बर्टो फर्नांडीज के साथ भी कई औपचारिक मुलाकातें हुईं। इन बैठकों में कृषि निर्यात, जलवायु परिवर्तन के प्रति सामूहिक कार्रवाई और वैकल्पिक वित्तीय संस्थानों की स्थापना पर चर्चा की गई। भारत ने इन दो देशों के साथ वस्त्र, सूचना प्रौद्योगिकी और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्रों में द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) की स्थापना का प्रस्ताव रखा। इस पहल से ब्राज़ील और अर्जेंटीना में भारतीय निर्यात में क्रमशः 12% और 9% की संभावित बढ़ोतरी की आशा है।

Updated: September 14, 2026


PM Modi’s packed schedule of bilateral talks at the 18th BRICS Summit underscored India’s strategic push to strengthen ties across energy, defense and trade. These engagements with global leaders reaffirmed New Delhi’s central role in shaping economic partnerships and addressing shared challenges within the Global South.

Insight: मोदी की तेज़ियों से भरी дипломसी सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि यह साझा उद्देश्यों को निजी सहयोग में बदलने का खेल है, यह संकेत है कि भारत अब मार्जिनल आवाज़ नहीं बल्कि निहित स्वार्थ का केंद्र बन रहा है।

बिहार के 17 जिलों में अगले 72 घंटे तक मौसम बिगड़े रहने की संभावना, मौसम विभाग ने जारी किया चेतावनी

बिहार के 17 जिलों में आज से अगले 72 घंटों तक मौसम बिगड़े रहने की संभावना है, मौसम विभाग ने गंभीर आंधी‑तूफान और लगातार बारिश का अलर्ट जारी किया।
यह चेतावनी विशेष रूप से पूर्वी चंपारण, पश्चिम चंपारण, शिवहर, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, गोपालगंज, सारण, सीवान, बख्तियारपुर, भागलपुर और मुजफरपुर में लागू होगी। विभाग ने जनता से सतर्क रहने, जल निकायों के पास न जाने और आवश्यक आपातकालीन उपाय अपनाने का आह्वान किया। इस चेतावनी के बाद स्थानीय प्रशासन ने तुरंत आपातकालीन प्रतिक्रिया दलों को तैनात कर संभावित आपदा प्रबंधन के लिए तैयारी बढ़ा दी।बिहार में पिछले दो हफ्तों से अनियमित वर्षा और उष्णकटिबंधीय तापमान की लहर चल रही थी। अप्रैल‑मई की अवधि में कई क्षेत्रों में पहले ही जल स्तर बढ़ा था, जिससे नदियों के किनारे से बाढ़ की आशंका बनी हुई थी। कृषि क्षेत्र में फसलों के लिये यह मौसम अत्यंत चुनौतीपूर्ण रहा, जहाँ धान और गेहूँ की बुवाई अभी जारी है। इस बीच, राज्य के कई हिस्सों में तापमान 38 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुँच चुका था, जिससे उमस और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़े थे।

मौसम विज्ञान केन्द्र ने पिछले 48 घंटों में सटीक मॉडलिंग के आधार पर यह चेतावनी जारी की। विभाग के अनुसार, अगले तीन दिनों में इन 17 जिलों में तेज़ हवाओं के साथ 50 से 80 मिमी तक की वर्षा की संभावना है। विशेषकर रात के समय में वायुदाब में तीव्र गिरावट और धुंधलापन बढ़ेगा, जिससे सड़कों पर दृश्यता कम होगी। इन आंकड़ों के आधार पर, विभाग ने बाढ़ जोखिम वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हुए निकासी योजना तैयार की है।

बिगड़ते मौसम के दौरान, स्थानीय पुलिस ने कई प्रमुख सड़कों पर ट्रैफिक नियंत्रण स्थापित किया। गाड़ियों को वैकल्पिक मार्गों पर मोड़ने के लिए संकेतक स्थापित किए गए और संभावित जलभराव क्षेत्रों में टोल बूथ को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया। साथ ही, जिला स्तर पर आपातकालीन कक्ष खोले गए, जहाँ नागरिकों को तत्काल मदद और राहत सामग्री प्रदान की जाएगी। स्वास्थ्य विभाग ने भी जलजनित रोगों के प्रकोप को रोकने हेतु प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में अतिरिक्त दवाइयाँ और जल शोधन उपकरण रखे हैं।

पड़ोसी राज्यों के साथ मौसम संबंधी जानकारी का आदान‑प्रदान भी तेज़ी से हो रहा है। उत्तर प्रदेश और झारखंड के मौसम विभागों ने अपने डेटा को बिहार के साथ साझा किया, जिससे सीमा क्षेत्रों में सटीक भविष्यवाणी संभव हो रही है। इस सहयोग से जल निकायों के प्रवाह में होने वाले बदलावों की समय पर जानकारी मिलती है, जिससे जलसंधारण और बाढ़ नियंत्रण के उपायों को त्वरित रूप से लागू किया जा सकता है।

राज्य सरकार ने इस चेतावनी को देखते हुए विशेष आर्थिक राहत पैकेज का एलान किया है। किसानों को अतिरिक्त बीज और उर्वरक प्रदान करने के साथ-साथ जल प्रबंधन परियोजनाओं के लिए त्वरित फंड रिलीज़ करने की घोषणा की गई। साथ ही, छोटे व्यवसायों के लिये वाणिज्यिक बीमा योजना को आसान बनाया गया, जिससे तूफानी मौसम में आर्थिक नुकसान को सीमित किया जा सके। इन उपायों का उद्देश्य न केवल तत्काल राहत प्रदान करना, बल्कि दीर्घकालिक कृषि और व्यापारिक स्थिरता सुनिश्चित करना है।

बिहार के मुख्यमंत्री ने इस चेतावनी पर तुरंत टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने कहा कि सरकार ने आपदा प्रबंधन में पहले ही कई कदम उठाए हैं और सभी नागरिकों से सतर्कता बरतने का आग्रह किया। उन्होंने यह भी बताया कि राज्य के प्रत्येक जिले में एक समन्वय केंद्र स्थापित किया गया है, जहाँ से मौसम की वास्तविक स्थिति की निगरानी की जाएगी। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि अगर स्थिति अधिक गंभीर हो गई तो अतिरिक्त राहत बलों को भेजा जाएगा।

विपरीत रूप से, कई स्थानीय राजनेता और सामाजिक समूहों ने सरकार की तैयारी को लेकर आश्वस्त न होते हुए सवाल उठाए। कुछ ने कहा कि पिछले वर्षों में समान चेतावनियों के बावजूद बुनियादी बुनियादिक संरचनाओं में सुधार नहीं हुआ, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में फिर से व्यापक क्षति हो सकती है।

इन आवाज़ों को सुनते हुए, सरकारी अधिकारियों ने कहा कि इस बार सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं और योजना के कार्यान्वयन में पारदर्शिता बनाए रखी जाएगी।

Updated: September 14, 2026

The storm alert forces Bihar’s agrarian heart into a double‑bind: while flood‑ready infrastructure is finally being mobilized, the same rains threaten to erase weeks of sowing, squeezing farmers between water‑damage and heat‑stress losses.

 

दिल्ली: अटल कैंटीन का विस्तार 100 स्थानों तक, 2026 में 150 तक बढ़ाएंगे; गुणवत्ता पर निगरानी

दिल्ली सरकार ने दिसंबर 2025 में अटल कैंटीन की पहली शाखा खोली, जिसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को ₹5 में पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना था।
आज यह योजना शहर के 100 स्थानों पर फैली हुई है और प्रतिदिन लगभग 50 हजार भोजन प्रदान करती है, जिससे लाखों लोगों का दैनिक आहार सुनिश्चित हुआ है। यह पहल सरकारी सामाजिक सुरक्षा के व्यापक परिदृश्य में एक प्रमुख कदम के रूप में देखी जा रही है।अटल कैंटीन की स्थापना से पहले दिल्ली में कई सार्वजनिक भोजन कार्यक्रम चल रहे थे, परंतु उनका कवरेज सीमित और लागत अधिक थी। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना (NFSA) के तहत सब्सिडी वाली रैशन और मध्याह्न भोजन योजना चल रही थी, परंतु उनका प्रभाव शहरी गरीब वर्ग तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाया। इस अंतर को पाटने के उद्देश्य से दिल्ली सरकार ने विशेष रूप से शहरी कामगार, छात्र और दैनिक मजदूर वर्ग को लक्षित किया।

कैंटीनों का मॉडल सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) पर आधारित है, जहाँ दिल्ली नगरपालिका द्वारा भूमि और बुनियादी ढाँचा प्रदान किया जाता है, जबकि निजी किचन ऑपरेटर भोजन तैयार करते हैं। इस मॉडल ने लागत नियंत्रण और गुणवत्ता मानकों को संतुलित करने की कोशिश की है, जिससे सब्सिडी का प्रभावी उपयोग हो सके। सरकार ने किचन को राष्ट्रीय खाद्य मानकों के अनुरूप प्रमाणित किया है और नियमित निरीक्षण की व्यवस्था की है।

पहले छह महीनों में अटल कैंटीन ने लगभग 3 लाख ग्राहकों को सेवा दी, जिसमें अधिकांश युवा कामगार और कॉलेज छात्र शामिल हैं। उपयोगकर्ताओं ने बताया कि यह सुविधा न केवल किफायती है, बल्कि समय की बचत भी करती है, क्योंकि कैंटीनें प्रमुख सार्वजनिक परिवहन हब और कार्यस्थल के निकट स्थित हैं। कई उपयोगकर्ता ने कहा कि यह पहल उनके दैनिक खर्च में लगभग 30 % की बचत कर रही है, जिससे वे अन्य आवश्यक वस्तुओं पर खर्च कर पाते हैं।

हालांकि, कैंटीनों की लोकप्रियता के साथ ही कुछ शिकायतें भी सामने आई हैं। कई ग्राहक बताते हैं कि भोजन की मात्रा पर्याप्त नहीं है और कुछ व्यंजनों में स्वाद की कमी है। कुछ स्थानों पर सफाई और स्वच्छता के मानकों पर भी प्रश्न उठे हैं, जिससे उपभोक्ता सुरक्षा एजेंसियों ने अनियमित जांचें शुरू कर दी हैं। इन समस्याओं को लेकर स्थानीय निकायों ने सुधारात्मक कदम उठाने का आश्वासन दिया है।

समीक्षक और नागरिक समूह इस पहल को सामाजिक सुरक्षा के एक सकारात्मक कदम के रूप में सराहते हैं, परन्तु वे कहते हैं कि निरंतर गुणवत्ता नियंत्रण आवश्यक है। राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने भी इस कार्यक्रम की निगरानी करने की घोषणा की है, जिससे उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा हो सके। इस बीच, कई गैर-सरकारी संगठनों ने कैंटीनों में पोषण मूल्य वृद्धि के लिए सुझाव प्रस्तुत किए हैं।

दिल्ली के मुख्यमंत्री ने अटल कैंटीन को शहरी गरिबी उन्मूलन की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम कहा, और कहा कि यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है। वित्त मंत्री ने इस पहल को बजट में अतिरिक्त आवंटन के साथ समर्थन दिया, जिससे 2026 में कैंटीनों की संख्या 150 तक बढ़ाने की योजना बनाई गई है।

विपक्षी दल ने इस योजना की कार्यवाही को राजनीतिक लाभ के रूप में देख कर आलोचना की, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि यदि गुणवत्ता सुधार नहीं हुई तो यह योजना विफल हो सकती है। इस बीच, उद्योग संघों ने कहा कि अटल कैंटीन का विस्तार खाद्य उत्पादन और लॉजिस्टिक्स क्षेत्रों में नई नौकरियों का सृजन करेगा।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अटल कैंटीन से शहर के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर हल्का दबाव पड़ेगा, क्योंकि सस्ते भोजन की उपलब्धता से बाजार में कीमतों का स्थिरीकरण हो सकता है। इस योजना से छोटे स्तर पर खाद्य सामग्री की मांग में वृद्धि होगी, जिससे स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं को लाभ होगा।

सामाजिक दृष्टिकोण से, अटल कैंटीन ने शहरी गरीबी के तनाव को कम करने में मदद की है, विशेषकर उन परिवारों के लिए जो दैनिक आय पर निर्भर हैं। यह पहल महिलाओं के कार्यस्थल तक पहुंच में भी सहायक सिद्ध हो रही है, क्योंकि उन्हें सस्ती भोजन सुविधा के कारण काम पर देर से लौटना नहीं पड़ता।

भविष्य में अटल कैंटीन को डिजिटल भुगतान और मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से सेवा में सुधार करने की योजना है, जिससे ग्राहक को भोजन चयन और भुगतान में सुविधा होगी।

Updated: September 14, 2026

The initiative targets urban livelihood gaps by providing subsidized meals to low-income workers and students.
Its public-private model influences local food supply chains while establishing a scalable framework for urban welfare.

मुंबई गणेशोत्सव में सुरक्षा इकाई बढ़ाई, पुलिस ने 16,800 से अधिक कर्मचारियों की तैनाती के लिए दी घोषणा

मुंबई‑फ़ेस्टिवल के मुख्य आकर्षण गणेशोत्सव के अवसर पर शहर में सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने हेतु मुंबई पुलिस ने 16,800 से अधिक कर्मचारियों को तैनात करने की योजना घोषित की है। यह संख्या पिछले वर्षों की तुलना में लगभग दो‑तीन गुना अधिक है और इसका उद्देश्य भीड़‑भाड़ वाले स्थानों पर

क्रमबद्ध नियंत्रण, ट्रैफ़िक प्रबंधन तथा सार्वजनिक व्यवस्था को सुनिश्चित करना है। तैनाती में पुलिस के साथ साथ महिला पुलिस, ट्रैफ़िक पुलिस, थैंपिंग यूनिट और विशेष रूप से नियुक्त सुरक्षा कर्मी शामिल होंगे, जिन्हें विभिन्न प्रमुख स्थानों पर बंटाया जाएगा।

गणेशोत्सव, जो आमतौर पर सितंबर‑अक्टूबर में मनाया जाता है, मुंबई

में सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों का एक बड़ा केंद्र बन चुका है। इस दौरान शहर की सड़कों पर लाखों श्रद्धालु और पर्यटक इकट्ठा होते हैं, जिससे ट्रैफ़िक जाम, भीड़‑भाड़ और असंतुलन की समस्या उत्पन्न होती है। पिछले कुछ वर्षों में भीड़‑संकट के कारण कई बार दंगे और चोरी‑चोरी की

घटनाएँ रिपोर्ट हुई हैं, जिससे पुलिस को सुरक्षा के मानक को लगातार बढ़ाना पड़ता है।

पिछले वर्ष के गणेशोत्सव में, लगभग 10,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती के बावजूद भीड़‑प्रबंधन में कठिनाइयाँ सामने आई थीं। विशेषकर लार्कोवागी, बांधवगढ़, वर्ली और सेंट्रल बॉर्डर पर भीड़‑भाड़ के कारण दुर्घटनाएँ और छोटे‑मोटे अपराध सामने

आए। इस अनुभव के आधार पर इस वर्ष की योजना में सुरक्षा कर्मियों की संख्या को बढ़ाते हुए, विशेष रूप से भीड़‑प्रबंधन में विशेषज्ञता रखने वाली थैंपिंग यूनिट को प्रमुख स्थानों पर तैनात किया जाएगा।

गणेशोत्सव के मुख्य कार्यक्रमों की शुरुआत 18 सितंबर को हुई, जिसमें समुद्र तट पर स्थापित

बड़े पैमाने के पंडालों में प्रथम चरण का पूजा समारंभ आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम के दौरान पुलिस ने प्री‑फ़ेस्टिवल सुरक्षा जाँचें शुरू कर दीं, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर सीसीटीवी कैमरों की संख्या बढ़ाई गई और अस्थायी जांच चौकियों की स्थापना की गई। इसके अतिरिक्त, प्रमुख प्रवेश‑निकास बिंदुओं पर बॅरिकेड

और नियंत्रण बिंदु स्थापित किए गए, जिससे अवैध वस्तुओं और अवांछित भीड़ को रोकने में मदद मिली।

समारोह के पहले दिन, लार्कोवागी के प्रमुख पंडाल के आसपास 2,500 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई, जिसमें 200 महिला पुलिस को भी शामिल किया गया। इस व्यवस्था के तहत भीड़‑प्रबंधन के लिए

दो‑तीन किलोमीटर तक की परिधि में सुरक्षा बाड़ें लगाई गईं, और भीड़‑भाड़ को नियंत्रित करने हेतु सिग्नलिंग उपकरण और ध्वनि संकेतक स्थापित किए गए। यह कदम स्थानीय प्रशासन और पुलिस के संयुक्त प्रयास से संभव हुआ, जिसका उद्देश्य सुरक्षा जोखिम को न्यूनतम स्तर पर रखना था।

उसी ही दिन,

वर्ली के किनारे स्थापित पंडाल के पास भी 2,300 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई, जहाँ ट्रैफ़िक को सुगमता से चलाने के लिए विशेष ट्रैफ़िक पुलिस की इकाइयाँ तैनात की गईं। इस प्रक्रिया में मुख्य सड़कों को एक‑एक कर बंद कर वैकल्पिक मार्गों का निर्माण किया गया, जिससे भीड़‑भाड़ को दूर

रखा जा सके। साथ ही, सार्वजनिक परिवहन के प्रमुख बिंदुओं पर अतिरिक्त रैंच स्थापित किए गए, जिससे यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा दोनों सुनिश्चित हुई।

इन सुरक्षा उपायों पर मुंबई पुलिस के महानिदेशक अजय शर्मा ने कहा कि “गणेशोत्सव के दौरान सार्वजनिक सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है। इस वर्ष हम

अधिक सख्त सुरक्षा मानक लागू कर रहे हैं, जिससे नागरिकों को बिना किसी भय के उत्सव मनाने का अवसर मिले।” उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस ने विशेष रूप से भीड़‑प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित थैंपिंग इकाइयों को सक्रिय किया है, जो भीड़‑भाड़ वाले क्षेत्रों में शांति बनाए रखने में सक्षम

होंगी।

शहर के प्रमुख व्यवसायिक संघ, मुंबई चैंबर ऑफ कॉमर्स और इंडस्ट्री (MCCI) ने भी पुलिस की इस पहल की सराहना की। MCCI के अध्यक्ष ने बताया कि “विस्तारित सुरक्षा व्यवस्था न केवल नागरिकों की सुरक्षा को बढ़ाएगी, बल्कि व्यवसायिक गतिविधियों को भी स्थिर रखेगी। इस दौरान शॉपिंग मॉल,

रेस्तरां और होटल में भीड़‑भाड़ के कारण संभावित नुकसान को रोका जा सकेगा।” उन्होंने कहा कि सुरक्षा की इस ठोस योजना से पर्यटकों का भरोसा बढ़ेगा और आर्थिक लाभ में भी इजाफा होगा।

गणेशोत्सव के प्रमुख आयोजकों में से एक, लार्कोवागी पंडाल ट्रस्ट के प्रमुख ने पुलिस की विस्तृत

तैयारी को “एक सकारात्मक कदम” बताया। उन्होंने कहा कि “बढ़ी हुई पुलिस उपस्थिति और ट्रैफ़िक नियंत्रण से हमें अपने कार्यक्रम को सुरक्षित और सुचारू रूप से संचालित करने में मदद मिलेगी। हम भी अपने स्वयं के सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ करेंगे, जैसे कि प

Updated: September 13, 2026


Mumbai police will deploy over 16,800 officers – including women, traffic units and specialised thumping squads – to tighten crowd control, traffic flow and overall security for the upcoming Ganeshotsav, a three‑fold increase from previous years. The heightened deployment aims to curb past incidents of unrest and crime at key sites such as Larkovagi, Bhandhgaon, Worli and the Central Border, ensuring a safer festive atmosphere for millions of devotees and tourists.

The deployment of over 16,800 police personnel, including specialized units, expands crowd‑control and traffic‑management capacity for the Ganeshotsav celebrations.
Enhanced security measures aim to maintain public order and protect economic activities during the high‑attendance festival.

मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर ने कोझिकोडे यात्रा से पहले कंठपुरम के महिलाओं को घर में सीमित रखने वाले बयानों को अस्वीकार किया, द्व

कोझिकोडे के लिये अपनी आधिकारिक यात्रा से एक दिन पहले, मलयेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने नई दिल्ली में बीआरआईसीएस शिखर सम्मेलन के दौरान मीडिया को बताया कि उन्होंने इस्लामी विद्वान कंठपुरम अहमद का कुछ बयानों से असहमतिपूर्ण रुख अपनाया है। यह टिप्पणी कंठपुरम के हालिया बयानों के बाद आई, जिसमें उन्होंने महिलाओं

को घर के भीतर सीमित रहने की बात कही थी, जिससे सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर व्यापक बहस छिड़ गई। अनवर ने स्पष्ट किया कि वह इस विचारधारा को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर सकते, परंतु भारत‑मलेशिया के द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान नहीं पहुँचाने का आश्वासन भी दिया। यह बयान विदेश मंत्रालय के

साथ समन्वय में दिया गया, जिससे दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों पर प्रभाव को लेकर अटकलें तेज़ हो गईं।

कंठपुरम अहमद, जो भारतीय मुस्लिम समुदाय में एक प्रमुख विद्वान और शिया‑सुन्नी विचारधारा के संग्राहक के रूप में मान्यता प्राप्त हैं, ने पिछले सप्ताह कोझिकोडे के एक सार्वजनिक मंच पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा

कि इस्लामी शरिया के अनुसार महिलाओं को घर में रहना चाहिए और सार्वजनिक स्थानों में उनका प्रवेश सीमित होना चाहिए। यह बयान भारतीय मीडिया में तुरंत चर्चा का विषय बना और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने इसे लैंगिक समानता के विरुद्ध मानते हुए तीखा विरोध किया। इस घटना ने पहले से ही भारत‑मलेशिया के

आपसी समझौते और धार्मिक सौहार्द की नाजुक स्थिति को चुनौती दी।

अनवर इब्राहिम ने इस परिप्रेक्ष्य में कहा कि भारत‑मलेशिया संबंधों को आर्थिक, रक्षा और रणनीतिक स्तर पर गहरा सहयोग मिला है, और इस प्रकार के बयानों का द्विपक्षीय सहयोग पर असर नहीं पड़ना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ते हुए कहा कि वह व्यक्तिगत

विचारों के साथ संरेखित नहीं होते, परंतु धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में विभिन्न विचारधाराओं को सहिष्णुता के साथ स्वीकार करना आवश्यक है। इस बयान को विभिन्न राजनयिक स्रोतों ने संतुलित माना, क्योंकि यह कंठपुरम के विचारों को अस्वीकार करते हुए भी दो देशों के संबंधों को स्थिर रखने का प्रयत्न करता है।

इसी बीच, कंठपुरम के

समर्थक और उनके विरोधियों के बीच तकरार तेज़ हो गई। कंठपुरम के अनुयायियों ने दावा किया कि उनका बयान धार्मिक स्वतंत्रता के तहत है और इसे व्यक्तिगत अधिकारों की उलँघना नहीं माना जाना चाहिए। वहीं महिलाओं के अधिकार संगठनों ने इस बयान को पुरुषवादी और सामाजिक उत्पीड़न का प्रमाण कहा, और कंठपुरम पर

कानूनी कार्रवाई की मांग की। इन दोनों ध्रुवीय समूहों ने सामाजिक मंचों, टेलीविजन और डिजिटल मीडिया में अपने-अपने तर्क पेश किए, जिससे सार्वजनिक विमर्श में तनाव बढ़ा।

कोझिकोडे में अनवर इब्राहिम की आधिकारिक यात्रा के दौरान कई प्रमुख कार्यक्रम निर्धारित थे, जिनमें आर्थिक सहयोग समझौते और शैक्षिक परियोजनाओं पर चर्चा शामिल थी। भारतीय प्रधानमंत्री

नरेंद्र मोदी के साथ होने वाली बैठक में दोनों देशों के व्यापारिक आंकड़े, विशेषकर तेल, गैस और उच्च तकनीकी क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ाने की बात होगी। इस यात्रा को भारत‑मलेशिया के आर्थिक साझेदारी को नई दिशा देने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है, जबकि कंठपुरम के बयानों ने इस

यात्रा के सामाजिक-राजनीतिक आयाम को जटिल बना दिया।

पर्यटक और व्यापारियों के संघ ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि धार्मिक बयानों से व्यापारिक वातावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वे इस तरह की बयानों को नियंत्रण में रखें, जिससे निवेशकों का भरोसा बना रहे।

इसके विपरीत, कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा कि यह मामला धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती है, और यह दोनों देशों की आंतरिक नीतियों को प्रभावित कर सकता है।

मलेशिया के विदेश मंत्रालय ने कोझिकोडे में आयोजित होने वाले आधिकारिक कार्यक्रमों की तैयारी को जारी रखा, जबकि उन्होंने कंठपुरम

के बयानों को अस्वीकृत करने की घोषणा नहीं की। इसके बजाय उन्होंने कहा कि सरकार सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती है और साथ ही सामाजिक सद्भाव को बनाए रखने के लिए सभी पक्षों को संवाद में लाने का प्रयास करेगी। इस बीच, भारत की विदेश मंत्रालय ने भी कहा कि भारत

में धार्मिक विविधता का सम्मान किया जाता है और किसी भी प्रकार के विभाजनकारी बयानों को नज़रअंदाज़ किया जाएगा।

कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों के विदेश मामलों के विशेषज्ञों ने इस विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि इस तरह के बयानों का प्रभाव केवल द्विपक्षीय संबंधों तक

सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक धर्मनिरपेक्ष मंचों में भी चर्चा का विषय बनता है। इस परिप्रेक्ष्य में, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने लैंगिक समानता के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता पर प्रकाश डाला, जिससे इस मुद्दे की अंतरराष्ट्रीय संवेदनशीलता स्पष्ट

Updated: September 13, 2026


Summary: Malaysian Prime Minister Anwar Ibrahim distanced himself from cleric Kanjipuram Ahmad’s remarks urging women to stay home, stressing that such views will not jeopardise the robust India‑Malaysia strategic partnership. The controversy has sparked a heated debate over gender equality and religious freedom as Anwar’s upcoming official visit to Kozhikode proceeds with economic and defence talks on the agenda.

Anwar’s diplomatic tightrope—rejecting a patriarchal creed while preserving a lucrative India‑Malaysia partnership—highlights how economic imperatives now blunt the political cost of religious backlash.
The episode underscores a growing global test: can secular alliances survive when partner societies clash over gender norms, or will trade

बिहार: किसान योजना 2026-27 में 1 लाख से ज्यादा लागत के यंत्रों पर अधिकतम 5 लाख तक सब्सिडी, 30 सितंबर तक आवेदन

बिहार सरकार ने कृषि यंत्रीकरण को तेज़ करने के उद्देश्य से “बिहार किसान योजना 2026‑27” के तहत 1 लाख रुपये की कीमत वाले ट्रैक्टर, रोटावेटर या अन्य खेती‑उपकरणों पर 5 लाख रुपये तक का सब्सिडी प्रदान करने का निर्णय लिया है, जिसमें इच्छुक किसान 30 सितंबर, 2026 तक आवेदन कर सकते हैं। इस योजना के तहत 86 विभिन्न प्रकार के कृषि यंत्रों पर अनुदान उपलब्ध होगा, जिससे छोटे एवं मध्यम आकार के कृषकों को आधुनिक तकनीक अपनाने में वित्तीय बोझ घटेगा। योजना के प्रमुख शर्तों में यंत्र की अधिकतम लागत सीमा, आयु मानदंड और पूर्व‑निर्धारित कृषि उत्पादकता लक्ष्य शामिल हैं।

बिहार में कृषि यंत्रीकरण के इतिहास की जड़ें 2015 में शुरू हुईं, जब राज्य ने पहले बार कृषि उपकरणों पर 30 % तक की सब्सिडी की घोषणा की थी। तब से हर वर्ष अनुदान के प्रतिशत में क्रमिक वृद्धि हुई, लेकिन 2025‑26 के बजट में केवल 1.2 लाख किसानों को लाभ मिला था, जबकि कुल कृषक वर्ग 2.5 करोड़ से अधिक है। इस असंतुलन को पाटने के लिए नई योजना में अनुदान प्रतिशत को 50 % तक बढ़ाया गया है, तथा उच्चतम सब्सिडी राशि को 5 लाख तक बढ़ाया गया है, जिससे बड़े ट्रैक्टर एवं मल्टी‑फंक्शनल यंत्रों की खरीद को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

पिछले वर्षों में राज्य में कृषि उत्पादन में धीमी गति, जलवायु परिवर्तन के कारण फसल विफलता और श्रम की कमी के मुद्दे प्रमुख रहे हैं। सरकार ने इन चुनौतियों का सामना करने के लिए डिजिटल कृषि, सटीक खेती और मशीन‑आधारित उत्पादन को मुख्य रणनीति बनाया। इस दिशा में, 2024‑25 में 1.5 लाख हेक्टेयर भूमि पर ट्रैक्टर‑संचालित खेती का विस्तार किया गया, जिससे प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन में 12 % की वृद्धि दर्ज हुई। नई योजना का उद्देश्य इस प्रगति को दोगुना करके राज्य को भारत का प्रमुख कृषि‑टेक हब बनाना है।

योजना का कार्यान्वयन बिहार कृषि विकास निगम (BADC) और राज्य कृषि विभाग के संयुक्त सहयोग से होगा। इच्छुक किसान को पहले ऑनलाइन पोर्टल पर पंजीकरण करना होगा, उसके बाद वैध पहचान प्रमाण, भूमि रिकॉर्ड और आय प्रमाणपत्र अपलोड करने होंगे। आवेदन की स्वीकृति के बाद, किसान को चयनित मशीनरी निर्माता या डीलर से सीधे उपकरण खरीदने का अधिकार मिलेगा, जहाँ सरकार अनुदान राशि को सीधे विक्रेता को ट्रांसफ़र करेगी।

न्यूनतम 1 लाख रुपये की कीमत वाले यंत्रों के लिए अनुदान का अधिकतम प्रतिशत 50 % है, जबकि 2 लाख रुपये तक के यंत्रों पर 60 % तक की सहायता दी जाएगी। यदि ट्रैक्टर की कीमत 5 लाख रुपये से अधिक हो, तो अतिरिक्त 10 % अतिरिक्त सब्सिडी के रूप में प्रदान की जाएगी, बशर्ते किसान ने पिछले दो वर्षों में कृषि में न्यूनतम 80 % भूमि को यंत्र‑संचालित किया हो। योजना में विशेष रूप से छोटे किसानों को लक्षित किया गया है, इसलिए 1 लाख रुपये से कम कीमत वाले यंत्रों पर कोई अनुदान नहीं दिया जाएगा।

आवेदन प्रक्रिया में प्राथमिकता उन किसानों को दी जाएगी जो पहले से ही बीज, उर्वरक और जल प्रबंधन के लिए सरकारी स्कीमों का लाभ ले रहे हैं। इस वर्गीकरण को डिजिटल भूमि रिकॉर्ड (DLC) और किसान आयु वर्गीकरण (KIS) के माध्यम से सत्यापित किया जाएगा। योजना के तहत एक बार अनुदान मिल जाने पर, वही किसान अगले दो वर्षों में पुनः आवेदन नहीं कर पाएगा, जिससे अनुदान का उचित वितरण सुनिश्चित हो सके।

बिहार के कृषि मंत्री ने योजना की घोषणा के बाद बताया कि इस वर्ष 3 लाख मशीनों की डिलीवरी लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिससे कुल 15 लाख किसान लाभान्वित होंगे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने इस योजना को सफल बनाने के लिए विभिन्न यंत्र निर्माताओं के साथ विशेष मूल्य समझौते किए हैं, जिससे किसानों को बाजार में प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपकरण मिल सकें।

किसान संघों ने योजना को सराहते हुए कहा कि यह छोटे किसानों को आर्थिक दबाव से बाहर निकालने में मदद करेगा। विशेष रूप से किसान परामर्श समिति के अध्यक्ष ने कहा कि सब्सिडी की राशि पर्याप्त है, परन्तु उन्हें प्रक्रिया को सरल बनाना आवश्यक है, ताकि बिन‑तकनीकी किसान भी सहजता से आवेदन कर सके। उन्होंने आवेदन फॉर्म में भाषा समर्थन और ग्रामीण स्तर पर हेल्पडेस्क की मांग भी रखी।

विपरीत रूप में, कुछ कृषि उपकरण डीलरों ने संकेत दिया कि अनुदान राशि की घोषणा से उनके मार्जिन पर दबाव पड़ेगा, जिससे उच्च‑गुणवत्ता वाले यंत्रों की उपलब्धता में कमी आ सकती है। उन्होंने कहा कि सरकार को डीलर‑शोरूम में स्टॉक को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त नियामक उपाय अपनाने चाहिए, ताकि कीमतों में अस्थिरता न हो।

राज्य

Updated: September 13, 2026


Bihar’s new “Kisan Yojana 2026‑27” will subsidise up to 50‑60% of the cost of tractors and other farm equipment priced above ₹1 lakh, with a maximum grant of ₹5 lakh per machine, and applications open until 30 September 2026. The scheme, aimed at small and marginal farmers, seeks to accelerate mechanisation, boost yields and position the state as a leading agri‑tech hub.

दुर्गा पूजा, दीपावली व छठ के लिए रेलवे ने 18 स्पेशल पूजा ट्रेनें शुरू कीं

दिल्ली, कोलकाता और सियालदह से बिहार तक विशेष रूप से दुर्गा पूजा, दीपावली और छठ पूजा के दौरान यात्रियों की बढ़ती भीड़ को ध्यान में रख कर भारतीय रेलवे ने 18 विशेष पूजा ट्रेनों का आयोजन किया है। इन ट्रेनों को विभिन्न प्रमुख रूटों पर चलाने का निर्णय इस वर्ष की सबसे बड़ी धार्मिक यात्रा सुविधा

के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सरकारी सूचना विभाग के आंकड़ों के अनुसार, विशेष रूप से पूर्वी भारत में इन तीन प्रमुख त्यौहारों के दौरान रेलवे को पहले से अधिक यात्रियों की मांग का सामना करना पड़ रहा था, जिससे इस पहल की आवश्यकता स्पष्ट हुई।

पिछले कई वर्षों में धार्मिक त्यौहारों के मौसम

में रेलवे को भारी भीड़, सीटों की कमी और अस्थायी प्लेटफ़ॉर्म समस्याओं का सामना करना पड़ा है। विशेष रूप से दुर्गा पूजा और छठ के समय, उत्तर भारत और पूर्वी भारत के बीच प्रवास की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। 2022‑23 में रेलवे की आधिकारिक रिपोर्ट में बताया गया कि इन तीन प्रमुख त्यौहारों

के दौरान कुल यात्रियों की संख्या सामान्य महीने की तुलना में 35 % अधिक रही। ऐसी स्थितियों में यात्रियों को असुविधा और देरी का सामना करना पड़ा, जिससे रेलवे ने इस साल के लिए विशेष ट्रेनों की योजना बनाई।

संबंधित पृष्ठभूमि को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के

कई जिलों में धार्मिक उत्सवों की अवधि में प्रवास का पैटर्न पारंपरिक रूप से रेलवे पर निर्भर रहा है। इन क्षेत्रों की आर्थिक संरचना कृषि और छोटे उद्योगों पर आधारित है, जिससे लोग अपने घरों में आयोजित पूजा‑समारोहों में भाग लेने के लिये अक्सर दूरस्थ शहरों से यात्रा करते हैं। इस प्रवास की मुख्य रूटें हावड़ा‑रक्सौल,

सियालदह‑पटना और कोलकाता‑पटना के बीच हैं, जो पहले ही भीड़‑भाड़ की समस्या को उजागर करती थीं।

रेलवे ने इस बार 18 विशेष पूजा ट्रेनों को विभिन्न वर्गों में विभाजित किया है। इनमें एसी, एसी 2‑तीर और सामान्य वर्ग की ट्रेनें शामिल हैं, जिससे सभी वर्ग के यात्रियों को सुविधाजनक यात्रा का विकल्प मिल सके। हावड़ा‑रक्सौल रूट

पर 03041 और 03042 क्रमांक की दो ट्रेनें 15 अक्टूबर से 26 नवंबर तक चलेंगी, जिनमें प्रमुख स्टेशनों जैसे झाजा, सियालदह और बोधगया पर ठहराव तय है। इसी प्रकार कोलकाता‑पटना रूट पर भी चार स्पेशल ट्रेनों को निर्धारित किया गया है, जो सभी प्रमुख बिंदुओं पर कम से कम दो घंटे का विराम देंगी।

आसनसोल मंडल के

सूचना पदाधिकारी आशीष कुमार सिंह ने बताया कि इन विशेष ट्रेनों की योजना में यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा को मुख्य मानदंड बनाया गया है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक ट्रेन में अतिरिक्त बगल‑बगल बाथरूम, पावर आउटलेट और स्वच्छता सुविधाओं को बढ़ाया गया है। साथ ही, टिकट बुकिंग की प्रक्रिया को डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सरल बनाया गया

है, जिससे ऑनलाइन आरक्षण की दर में 20 % की वृद्धि की उम्मीद है। इन उपायों के माध्यम से रेलवे ने भीड़‑भाड़ को कम करने और यात्रियों के अनुभव को बेहतर बनाने का लक्ष्य रखा है।

मुख्य घटनाक्रम में यह भी उल्लेखनीय है कि रेलवे ने इन स्पेशल ट्रेनों के लिए विशेष रूप से अतिरिक्त स्टाफ़

की व्यवस्था की है। प्रत्येक रूट पर दो अतिरिक्त नियंत्रक और सुरक्षा गार्ड नियुक्त किए गए हैं, जो यात्रियों की सहायता और आपातकालीन स्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करेंगे। इसके अलावा, ट्रेन संचालन के दौरान रियल‑टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम को सक्रिय किया गया है, जिससे ट्रेन की गति, समय‑सारिणी और प्लेटफ़ॉर्म की स्थिति को निरंतर अपडेट किया

जा सके। इस तकनीकी समर्थन से संभावित देरी को न्यूनतम किया जा रहा है।

इन ट्रेनों के बारे में विभिन्न सामाजिक समूहों की प्रतिक्रियाएँ मिश्रित रही हैं। धार्मिक यात्रियों ने इस कदम को सराहा, यह कहा कि अब उन्हें भीड़‑भाड़ के कारण यात्रा में असुविधा नहीं होगी। वहीं कुछ यात्रियों ने टिकट की कीमत में

संभावित वृद्धि के प्रति चिंता जताई, क्योंकि विशेष ट्रेनों में एसी वर्ग की कीमतें सामान्य ट्रेनों की तुलना में अधिक रखी गई हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ स्थानीय व्यापारी ने आशा व्यक्त की कि बढ़ी हुई यात्रियों की संख्या से उनके व्यापार में भी सुधार होगा, विशेषकर स्टेशन के निकट स्थित खाद्य और वस्तु विक्रेताओं को।

रेलवे अधिकारियों ने इन प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए मूल्य निर्धारण में लचीलापन दिखाने का आश्वासन दिया। केंद्रीय रेल मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि विशेष ट्रेनों के किराए को आर्थिक वर्ग के यात्रियों के लिये सुलभ रखने की पूरी कोशिश की जाएगी, साथ ही एसी वर्ग में अधिक सुविधा प्रदान करने के लिये अतिरिक्त

शुल्क उचित माना गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इन ट्रेनों की आय का एक हिस्सा सामाजिक विकास परियोजनाओं में पुनः निवेश किया जाएगा।

राजनीतिक दायरे में इस कदम को कई नेताओं ने सकारात्मक रूप से देखा है। बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा कि यह पहल

Updated: September 13, 2026


Indian Railways will run 18 special “puja” trains across key eastern routes from mid‑October to late November, adding extra coaches, staff and digital ticketing to ease the surge of pilgrims during Durga Puja, Diwali and Chhath. The move, hailed by travelers and officials, aims to cut overcrowding while keeping fares affordable for budget passengers.

The special pilgrimage trains increase capacity during peak festival periods, addressing the 35 % surge in passenger volumes reported by Indian Railways. Enhanced amenities and staffing aim to reduce crowding and improve travel reliability on key eastern routes.

मुंबई में गणेशोत्सव पंडाल निर्माण की लागत ₹1,250 कोड़, ₹3,400 कोड़ की आय की उम्मीद

मुंबई, 12 सितंबर 2026 – इस वर्ष का गणेश उत्सव, जो 14 सितंबर से शुरू हो रहा है, शहर के आर्थिक और सामाजिक दायरे में विस्तृत प्रभाव डाल रहा है। नगर निगम ने लगभग ₹ 1,250 कोड़ की लागत अनुमानित करते हुए 350 से अधिक पंडालों के निर्माण, प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था और ट्रैफ़िक प्रबंधन के लिए

बजट आवंटित किया है। इस वित्तीय भार के बावजूद, स्थानीय व्यापारियों और उद्योगों ने इस त्योहारी माह को आर्थिक अवसर के रूप में देख कर अतिरिक्त निवेश करने का इरादा जताया है। कुल मिलाकर, इस वर्ष के गणेशोत्सव से मुंबई के रिटेल, आतिथ्य और परिवहन क्षेत्रों में लगभग ₹ 3,400 कोड़ की आय

की उम्मीद की जा रही है।

गणेशोत्सव की पृष्ठभूमि में मुंबई की बहु‑सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक परम्पराओं का गहरा सम्बन्ध है। 1950 के दशक से शहर में पंडाल निर्माण की परम्परा विकसित हुई, जिसके बाद से यह न केवल धार्मिक आस्था बल्कि आर्थिक सक्रियता का भी प्रमुख स्रोत बन

गया। प्रत्येक वर्ष, पंडालों की संख्या और सजावट के स्तर में वृद्धि होती आई है, जिससे निर्माण, डिज़ाइन और सामग्री आपूर्ति में स्थानीय उद्योगों को बड़ी मात्रा में ऑर्डर मिलते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, 2026 का उत्सव भी इस परम्परा को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है,

जहाँ नई तकनीकी समाधान और पर्यावरण‑संकल्पित उपायों को अपनाया जा रहा है।

पिछले दो दशकों में, मुंबई में गणेश पंडालों की कुल लागत में वार्षिक औसत ₹ 300 कोड़ से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। इस वृद्धि का मुख्य कारण पंडालों की आकार, सजावट की जटिलता और सुरक्षा मानकों में

सुधार है। साथ ही, शहर की जनसंख्या और पर्यटन के विस्तार ने इस खर्च को औचित्य प्रदान किया है। आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, इस खर्च को केवल धार्मिक खर्च नहीं बल्कि सार्वजनिक‑निजी सहयोग का एक मॉडल माना जा सकता है, जहाँ सरकारी निकाय, निजी कंपनियां और सामाजिक संगठनों का सहयोग

मिलजुल कर उत्सव को साकार करता है।

उत्सव के प्रमुख पंडालों में ‘लालबागचा राजा’ को सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाला बताया गया है। इस पंडाल का निर्माण 250 किलोमीटर लंबी काँच‑फ्लोअर संरचना और LED‑आधारित प्रकाश व्यवस्था से किया गया है, जिसकी कुल लागत ₹ 85 कोड़ अनुमानित है। पंडाल के डिजाइन में

आधुनिक वास्तुशिल्प और पारंपरिक महाराष्ट्रीय शैली का मिश्रण किया गया है, जिससे यह युवा वर्ग में विशेष लोकप्रियता हासिल कर रहा है। निर्माण कार्य में 1,200 से अधिक स्थानीय कारीगर और 300 व्यावसायिक ठेकेदार शामिल हैं, जो रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

‘मुंबईचा राजा’ पंडाल, जो अंधेरी के

निकट स्थित है, ने ऐतिहासिक थीम को अपनाते हुए 19वीं सदी के मराठी राजवाड़े की झलक पेश की है। इस पंडाल की निर्माण लागत ₹ 68 कोड़ बताई जा रही है, जिसमें प्रमुख रूप से पुनर्नवीनीकरण लकड़ी और बायोडिग्रेडेबल सामग्री का उपयोग किया गया है। पर्यावरणीय जागरूकता को देखते हुए, इस पंडाल में

जल‑संकलन प्रणाली और सौर पैनल स्थापित किए गए हैं, जो ऊर्जा खपत को 30 प्रतिशत तक कम करने का लक्ष्य रखते हैं। इस पहल को पर्यावरण मंत्रालय ने भी सराहा है और इसे सतत विकास के एक मॉडल के रूप में मान्यता दी है।

‘GSB Seva Mandal’ द्वारा आयोजित पंडाल

में धार्मिक और सांस्कृतिक तत्वों का समन्वय देखा गया है। इस पंडाल की सजावट में प्राचीन शिल्प और शास्त्रीय संगीत को मिलाकर एक समग्र अनुभव प्रदान किया गया है। कुल निर्माण लागत ₹ 55 कोड़ रही, जिसमें मुख्यतः स्थानीय कलाकारों की प्रतिपूर्ति और सामग्री की आयात शामिल है। इस पंडाल के प्रबंधक ने

बताया कि उन्होंने इस वर्ष अधिकतम दर्शकों को आकर्षित करने के लिए डिजिटल प्रोजेक्शन और इंटरैक्टिव स्क्रीन स्थापित किए हैं, जिससे युवा वर्ग में इस पंडाल की लोकप्रियता बढ़ी है।

पंडालों की अंतिम रूपरेखा के दौरान, नगर निगम की सुरक्षा विभाग ने 25,000 से अधिक सुरक्षा कर्मियों और 2,000 ड्रोन निगरानी

उपकरणों की तैनाती की घोषणा की है। इस व्यवस्था का उद्देश्य भीड़‑भाड़, जलजला और आतंकवादी जोखिमों को न्यूनतम करना है। साथ ही, सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग ने इस अवसर पर वैक्सीनेशन कैंप और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की विस्तृत योजना बनाई है, जिससे संभावित स्वास्थ्य संकटों से निपटा जा सके। इन उपायों

से न केवल नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हुई है, बल्कि शहर के प्रतिरूपित पर्यटन स्थलों में विश्वास भी बना रहता है।

पंडालों के निर्माण में प्रमुख सामग्री आपूर्तिकर्ता और निर्माण कंपनियों ने इस वर्ष की माँग में

Updated: September 13, 2026


Mumbai’s 2026 Ganesh Utsav, launching on Sept 14, sees the municipal body earmark roughly ₹1,250 crore for over 350 pandals, lighting, security and traffic, while retailers, hospitality and transport firms anticipate a ₹3,400 crore boost. The festival blends high‑tech, eco‑friendly designs—like the LED‑laden “Lalbaugcha Raja” and recycled‑material “Mumbai cha Raja”—with massive security deployments and public

Insight: The festival’s ₹ 1,250 crore municipal budget and projected ₹ 3,400 crore economic boost illustrate its role as a significant driver of employment, commerce and tourism in Mumbai.

Its large‑scale public‑private coordination, including advanced security and sustainability measures, showcases a model for managing high‑attendance civic events.

गणेश चतुर्थी पर 14 सितंबर को महाराष्ट्र में स्कूल बंद, कर्नाटक में खुला, उत्तर प्रदेश में मिश्रित स्थिति बनी रहेगी।

कल स्कूल की छुट्टी के बारे में अटकलें चल रही हैं, क्योंकि 14 सितंबर को गणेश चतुर्थी का पावन पर्व मनाया जाएगा। कई राज्य सरकारों ने इस अवसर को सार्वजनिक अवकाश की सूची में शामिल किया है, परंतु शैक्षणिक संस्थानों की कार्यवाही में विविधता देखी जा रही है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और कुछ उत्तर प्रदेश के जिलों में विद्यालय बंद

रहने की संभावना है, जबकि अन्य राज्यों में स्कूल सामान्य कार्य दिवस माना जा रहा है। इस अंतर के कारण अभिभावक और विद्यार्थियों के बीच भ्रम उत्पन्न हुआ है, जिससे आधिकारिक आदेश की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है। इस लेख में विभिन्न राज्य सरकारों के निर्देश, शिक्षण संस्थानों की नीतियों और संभावित सामाजिक‑आर्थिक प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण

प्रस्तुत किया गया है।

गणेश चतुर्थी भारत के कई हिस्सों में धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व का पर्व है, जिसका आयोजन मुख्यतः महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, गोवा और मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में बड़े उत्साह के साथ किया जाता है। यह तिथि हिन्दू पंचांग के अनुसार शुक्ल पक्ष की आठवीं तिथि पर पड़ती है, और इसे भगवान गणेश की

कृपा प्राप्त करने के लिये विशेष पूजा, रथ यात्रा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ मनाया जाता है। वर्षों से यह पर्व न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों को भी गति देता आया है, जिससे कई सार्वजनिक संस्थानों में कार्य समय में परिवर्तन होता रहा है।

भारत सरकार ने प्रत्येक वर्ष के सार्वजनिक अवकाश को निर्धारित करने

के लिये केंद्रीय और राज्य स्तर पर एक समन्वय समिति स्थापित की है। इस समिति के आदेशों के अनुसार, यदि कोई पर्व राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हो तो वह केंद्रीय अवकाश बनता है, अन्यथा प्रत्येक राज्य अपनी सामाजिक-धार्मिक परिस्थितियों के आधार पर अतिरिक्त छुट्टियों की घोषणा करता है। 2026 की कैलेंडर में गणेश चतुर्थी को आधिकारिक रूप से

सार्वजनिक अवकाश के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, परंतु इस पर राज्य‑स्तर के शैक्षणिक निर्णय अभी भी जारी नहीं किए गये हैं।

महाराष्ट्र सरकार ने 14 सितंबर को सार्वजनिक अवकाश के रूप में मान्यता दी है और साथ ही राज्य के सभी सरकारी स्कूलों को बंद रहने का आदेश जारी किया है। यह निर्णय शिक्षा विभाग के सचिवालय

द्वारा जारी एक आधिकारिक नोटिस में स्पष्ट किया गया है, जिसमें कहा गया है कि इस तिथि को सभी प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक संस्थानों में सामान्य कार्य नहीं होगा। हालांकि निजी विद्यालयों को इस निर्देश का पालन करना अनिवार्य नहीं माना गया, परंतु कई प्रमुख निजी शैक्षणिक संस्थानों ने भी समान रूप से छुट्टी देने का संकेत दिया

है।

कर्नाटक में भी गणेश चतुर्थी को सार्वजनिक अवकाश के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, परंतु शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि स्कूलों को इस दिन खुला रहने की अनुमति है। यह नीति मुख्यतः राज्य के शैक्षणिक कैलेंडर में पहले से निर्धारित परीक्षाओं और सत्र की समाप्ति की तिथियों को ध्यान में रखकर बनाई गई है।

निजी विद्यालयों ने इस दिशा‑निर्देश का पालन कर या नहीं कर, यह प्रत्येक संस्थान की प्रबंधन नीति पर निर्भर करता है। तेलंगाना में भी समान स्थिति है, जहाँ सार्वजनिक कार्यालय बंद रहने के बावजूद कई स्कूल खुले रहने की घोषणा कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में गणेश चतुर्थी को स्थानीय स्तर पर विशेष महत्व दिया

जाता है, परंतु राज्य सरकार ने इसे सार्वभौमिक सार्वजनिक अवकाश नहीं घोषित किया है। इसलिए स्कूलों की कार्यवाही में विविधता स्पष्ट है; कुछ जिलों में छुट्टी दी जा रही है, जबकि अन्य में शिक्षण जारी रहेगा। इस असंगतता के कारण अभिभावकों ने सामाजिक मंचों पर अपने प्रश्न उठाए हैं, जिससे शिक्षा विभाग को स्पष्ट उत्तर देने का दबाव बढ़ा

है।

विभिन्न राज्य सरकारों के आदेशों के अलावा, केंद्रीय बोर्ड ऑफ मिडिया एडुकेशन (CBME) ने भी इस तिथि पर शैक्षणिक कैलेंडर में संभावित बदलावों की सूचना जारी की है। उन्होंने कहा है कि यदि कोई राज्य स्कूलों को बंद रखने का निर्णय लेता है, तो वह उस तिथि को पुनः शिक्षण सत्र में समाहित करने के लिये अतिरिक्त

कक्षाएँ या वैकल्पिक तिथि निर्धारित कर सकता है। इस प्रकार का लचीलापन शैक्षणिक निरंतरता को बनाए रखने के लिये आवश्यक माना गया है।

विद्यार्थी अभिभावकों ने सोशल मीडिया पर विभिन्न अफ़वाहों के कारण भ्रमित होने की शिकायत की है। कई समूहों में कहा गया कि सभी स्कूल बंद रहेंगे, जबकि अन्य में बताया गया कि केवल सरकारी संस्थानों

में ही छुट्टी होगी। इस स्थिति को देखते हुए कई विद्यालयों ने अपने आधिकारिक वेबसाइटों और सूचना बोर्डों पर स्पष्ट सूचनाएँ पोस्ट की हैं। उदाहरण के तौर पर मुंबई के एक प्रमुख निजी स्कूल ने बताया कि वह गणेश चतुर्थी पर अपनी नियमित कक्षाओं को जारी रखेगा, परंतु अतिरिक्त सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करेगा।

शिक्षकों की संघों ने भी

इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। महाराष्ट्र में शिक्षक संघ ने कहा है कि सार्वजनिक अवकाश के कारण वे अपने पारिवारिक कर्तव्यों को बेहतर रूप से निभा सकेंगे, जिससे मनोवैज्ञानिक लाभ होगा। वहीं कर्नाटक के शिक्षक संघ ने इस बात पर जोर दिया कि शैक्षणिक कैलेंडर

Updated: September 13, 2026


School closures on Ganesh Chaturthi vary across India, with Maharashtra confirming a full holiday for all government schools, while Karnataka and Telangana keep institutions open and Uttar Pradesh’s decision differs by district. The patchwork of state directives has sparked confusion among parents and students, prompting calls for clear official guidance.

नेपाल में हिमस्खलन और बाढ़ में 1300 से अधिक मौतें, GSI ने मल्टी-हजार्ड मॉनिटरिंग सिस्टम की मांग की

पहले पैराग्राफ में यह स्पष्ट किया गया कि नेपाल‑तिब्बत सीमा के निकट लांगटांग‑लिरुंग में 26 अगस्त को बर्फ‑चट्टानों के विस्फोट और अस्थायी जलाशय के फटने से उत्पन्न हुई विनाशकारी बाढ़ ने 1,300 से अधिक लोगों की जान ले ली, साथ ही बुनियादी ढाँचे को तहस‑नहस कर दिया। इस

आपदा को लेकर भारतीय भू‑वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने तत्काल मल्टी‑हजार्ड मॉनिटरिंग सिस्टम की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे भविष्य में समान घटनाओं की पूर्वसूचना दी जा सके। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस त्रासदी ने हिमालयी क्षेत्रों के पर्यावरणीय जोखिम को पुनः परखने की मांग को

तीव्र कर दिया है।

दूसरे पैराग्राफ में लांगटांग‑लिरुंग की भौगोलिक स्थितियों का संक्षिप्त विवरण दिया गया। यह स्थल नेपाल के मध्य‑हिमालय में स्थित है, जहाँ सर्दियों में भारी बर्फबारी और गर्मियों में तेज़ी से पिघलते हिमखंडों का मिश्रण रहता है। इस क्षेत्र में पहले भी छोटे‑मोटे हिमस्खलन और

बाढ़ की घटनाएँ दर्ज की गई थीं, परन्तु 2024 की इस आपदा की तीव्रता और पैमाना अभूतपूर्व रहा। स्थानीय जनसंख्या मुख्यतः कृषि और पशुपालन पर निर्भर थी, जिससे बाढ़ के बाद सामाजिक‑आर्थिक प्रभाव और अधिक गंभीर हो गया।

तीसरे पैराग्राफ में इस आपदा की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला

गया। पिछले कुछ वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय की बर्फ़ीली परत में तेज़ी से पतन हो रहा है, जिससे जल‑स्रोतों में अस्थिरता बढ़ी है। साथ ही, क्षेत्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा और तेज़ तापमान में बदलाव आया है, जो बर्फ‑और‑चट्टान‑स्खलन की

संभावना को बढ़ाते हैं। वैज्ञानिकों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि इन प्राकृतिक प्रक्रियाओं के साथ मानवीय कारकों, जैसे अंधाधुंध बुनियादी ढाँचा निर्माण, आपदा जोखिम को बढ़ाते हैं।

चौथे पैराग्राफ में आपदा के तुरंत बाद के घटनाक्रम का विवरण दिया गया। बाढ़ के कारण बोटोकोशी नदी

का प्रवाह अचानक रुक गया, जिससे जल की एक अस्थायी झील बन गई। कई घंटे बाद, जलाशय के किनारे की चट्टानें ढह गईं, जिससे जल का विस्फोटक प्रवाह नीचे की घाटी में धावा बोल गया। यह विस्फोट स्थानीय गाँवों को पूरी तरह ध्वस्त कर गया और सड़कों,

पुलों और स्कूलों को भी नुकसान पहुंचा। आपातकालीन टीमों को मौके पर पहुंचने में दो घंटे से अधिक समय लगा, जिससे बचाव कार्य में देरी हुई।

पाँचवे पैराग्राफ में बचाव और राहत कार्यों की प्रगति पर चर्चा की गई। नेपाल सरकार ने तुरंत राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की

और भारतीय सेना तथा अंतरराष्ट्रीय मानवता संगठनों से मदद मांगी। हवाई हेलिकॉप्टरों ने पहाड़ी इलाकों में आपातकालीन चिकित्सा सामग्री पहुंचाई, जबकि स्थानीय स्वयंसेवी समूहों ने प्रभावित परिवारों को अस्थायी आश्रय प्रदान किया। हालांकि, कठिन भू‑आकृति और बाढ़ के बाद बचे मलबे ने राहत कर्मियों की कार्यक्षमता को

सीमित किया।

छठे पैराग्राफ में इस त्रासदी की सामाजिक प्रभावों को उजागर किया गया। हजारों लोग बेघर हो गए, बच्चों की शिक्षा बाधित हुई और कई परिवारों ने अपने मुख्य आय स्रोत—कृषि—खो दिया। स्थानीय बाजारों में खाद्य पदार्थों की कमी और कीमतों में उछाल देखी गई, जिससे गरीबी‑संकट

और बढ़ गया। मनोवैज्ञानिक सहायता के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आपातकालीन काउंसलिंग सेंटर स्थापित किए गए, परन्तु दूरस्थ गाँवों में इस सुविधा तक पहुँच अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।

सातवें पैराग्राफ में GSI के प्रमुख प्रतिनिधि ने इस आपदा पर अपनी टिप्पणी दी। उन्होंने बताया कि इस

घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि हिमालयी क्षेत्रों में खतरे को अलग‑अलग नहीं, बल्कि एकीकृत रूप से देखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि बर्फ‑स्लाइड, जल‑भूआँवली और बाढ़ के बीच परस्पर संबंध जटिल है, और केवल एक‑एक करके उपाय करना पर्याप्त नहीं होगा। इस कारण से, वे

मल्टी‑हजार्ड मॉनिटरिंग सिस्टम के निर्माण की वकालत कर रहे हैं।

आठवें पैराग्राफ में नेपाल के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की प्रतिक्रिया को दर्शाया गया। मंत्री ने कहा कि सरकार अब जलवायु‑अनुकूल बुनियादी ढाँचा विकसित करने पर बल देगी और आपदा‑प्रबंधन में वैज्ञानिक डेटा की भूमिका को सुदृढ़ करेगी।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में जल‑स्रोतों की नियमित निगरानी के लिए उपग्रह‑आधारित प्रणाली स्थापित की जाएगी, जिससे समय पर चेतावनी जारी की जा सके। साथ ही, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए द्विपक्षीय समझौते की बात भी कही।

Updated: September 13, 2026

ब्रिक्स डिनर मेन्यू को लेकर विपक्ष ने सरकार पर निशाना साधा, भाजपा ने औकाट दिखायी

पार्लियामेंट में बहस का विषय बन गया ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के डिनर का मेन्यू। नई दिल्ली के भारत मंडप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को विदेशी नेताओं को शाकाहारी रात्रिभोज परोसा, जिसे कांग्रेस पक्ष ने आलोचना के कगार पर धकेल दिया।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने तर्क दिया कि शाकाहारी भोजन की पाबंदी से अतिथियों को असुविधा हुई और यह भारत के पाक विविधता को नकारात्मक रूप से दिखाता है। वे यह भी कह रहे हैं कि विदेशी राजनयिकों को पारंपरिक भारतीय व्यंजन चखने का मौका नहीं मिला।

इसकी पृष्ठभूमि में यह है कि शिखर सम्मेलन का उद्देश्य वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक सहयोग को बढ़ावा देना था। भारतीय सरकार ने शाकाहारी विकल्प चुना ताकि पर्यावरणीय और स्वास्थ्य कारणों से हरित नीति को आगे बढ़ाया जा सके।

पहली घटना में प्रधानमंत्री ने अपने भाषण के बाद रात्रिभोज का कार्यक्रम घोषित किया, जिसमें शाकाहारी भोजन के विकल्प ही उपलब्ध थे। अतिथियों ने बताया कि मेन्यू में पनीर, सब्ज़ी करी, रोटी और मिठाई शामिल थीं।

दूसरी घटना में कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर टिप्पणी करते हुए लिखा कि भारतीय भोजन में शाकाहारी विकल्प की कमी अस्वीकृति की निशानी है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या शाकाहारी भोजन से विदेशी नेताओं का स्वागत किया गया है।

तीसरी घटना में भाजपा पक्ष ने जवाब दिया कि शाकाहारी भोजन से अतिथियों को संतुष्टि मिली और यह पर्यावरणीय जिम्मेदारी के साथ-साथ शाकाहारी आहार के स्वास्थ्य लाभों को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि अतिथियों ने भोजन का आनंद लिया।

कांग्रेस ने अपने तर्क में कहा कि शाकाहारी भोजन से विदेशी राजनयिकों को भारतीय पाक कला की विविधता का अनुभव नहीं मिला। उन्होंने यह भी दावा किया कि शाकाहारी भोजन को स्वीकार करने से भारतीय भोजन के प्रति अपमान हुआ।

बिहार के राजनेता ने भी इस पर अपने विचार साझा किये, जिसमें उन्होंने बताया कि शाकाहारी भोजन का विकल्प भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है, परंतु विदेशियों के लिए यह अपरिचित हो सकता है।

सामाजिक दृष्टिकोण से, शाकाहारी भोजन की पाबंदी पर चर्चा ने नागरिक समाज में विभाजन पैदा किया। कई लोगों ने कहा कि यह निर्णय एक तरफ पर्यावरणीय चेतना को दर्शाता है, पर दूसरी ओर सांस्कृतिक समावेशिता को नजरअंदाज करता है।

राजनीतिक रूप से, यह मुद्दा कांग्रेस और भाजपा के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ा रहा है। कांग्रेस ने इस घटना को अपनी राजनीतिक कथाओं में इस्तेमाल करते हुए विदेशी नीति में असमर्थता का आरोप लगाया। BJP ने इस पर अपना रुख स्थिर रखा है, कहते हुए कि यह निर्णय शिष्टाचार और स्वास्थ्य के बीच संतुलन साधता है।

आर्थिक रूप से, शाकाहारी मेन्यू के कारण लागत में कुछ कमी आई, जिससे शिखर सम्मेलन के बजट पर असर पड़ा। दूसरी ओर, खाद्य उद्योग के कुछ हिस्सों ने इस निर्णय से निराशा जताई, क्योंकि शाकाहारी उत्पादों की मांग में वृद्धि हुई।

सांस्कृतिक स्तर पर, शाकाहारी भोजन की पाबंदी ने भारतीय व्यंजनों की विविधता पर सवाल उठाए, जिससे पारंपरिक भारतीय व्यंजनों के प्रति विदेशी लोगों की जिज्ञासा बढ़ी।

विशेषज्ञों का मानना है कि शाकाहारी भोजन का चयन वास्तव में एक पर्यावरणीय और स्वास्थ्य नीति के अनुरूप है। पाक इतिहासकारों ने यह बताया कि शाकाहारी व्यंजन भारतीय समाज में गहराई से जड़े हुए हैं, परंतु विदेशी राजनयिकों के लिए यह अनोखा अनुभव हो सकता है।

आगे क्या हो सकता है? यह स्पष्ट है कि कांग्रेस और भाजपा के बीच यह विवाद जारी रहेगा। सरकार संभवतः अगले शिखर सम्मेलन के लिए भोजन विकल्पों को विस्तृत करने पर विचार करेगी, ताकि शाकाहारी और मांसाहारी दोनों विकल्प उपलब्ध हों। इससे भारतीय राजनयिक कार्यक्रमों में संतुलन बन सकता है, साथ ही वैश्विक स्तर पर भारतीय पाक संस्कृति का सही प्रतिबिंब दिखेगा।

Updated: September 13, 2026


Congress lambasted the BRICS summit’s veg-only menu for ignoring culinary diversity, sparking a Parliament row over diplomatic protocol. While the government defended the choice as eco-conscious and healthy, critics argued it misrepresented India’s rich gastronomic heritage.

Insight: Diplomacy is now being fought over dinner plates, where a sustainable menu has been twisted into a tool for domestic political point-scoring.
This debate reveals a deeper ideological rift between viewing Indian culture as a rigid export versus an inclusive, evolving host gesture.

बिहार में भू‑संसाधन सर्वेक्षण के परिणामों पर GSI के साथ नई खनन‑नीलीमी एवं तकनीकी सहयोग बैठक तय हुई।

बिहार के विभिन्न जिलों में हाल ही में आयोजित एक विशेष सर्वेक्षण के परिणामों ने राज्य के भू‑संसाधनों में नई संभावनाओं की ओर संकेत किया है, जिससे खनन एवं भू‑भौतिकी विभाग (GSI) और केंद्र सरकार के बीच एक महत्त्वपूर्ण बैठक का मंच तैयार हुआ है। इस बैठक में नई तकनीकों के

उपयोग, नयी खनिज क्षेत्रों की पहचान और नीलामी प्रक्रिया के सुधार पर व्यापक चर्चा होने की उम्मीद है, जिससे राज्य की आर्थिक विकास रणनीति में बदलाव आ सकता है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य भू‑संसाधनों को आर्थिक उत्पादन के साथ जोड़ना और स्थानीय रोजगार सृजन को बढ़ावा देना है।

बिहार में खनिज

संसाधनों की खोज का इतिहास कई दशकों पुराना है, परन्तु पिछले कुछ वर्षों में भू‑विज्ञानियों ने संकेत दिया है कि राज्य के कई हिस्सों में अभी भी अज्ञात खनिज भंडार छिपे हो सकते हैं। विशेषकर पटना, भागलपुर, बोधगया और झारखण्ड के सीमावर्ती क्षेत्रों में भू‑वैज्ञानिक सर्वेक्षणों ने कई संभावित खनिज धारा

के संकेतक पाए हैं। इन क्षेत्रों में धातु, खनिज तेल और दुर्लभ पृथ्वी धातुओं की संभावना को लेकर प्रारम्भिक अध्ययनों में उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। यह पृष्ठभूमि सरकार को नए निवेश आकर्षित करने और मौजूदा संसाधनों को पुनः मूल्यांकन करने का आधार प्रदान करती है।

केन्द्र सरकार ने हाल ही में

खनन क्षेत्र में प्रौद्योगिकी‑सहायता कार्यक्रम का आरम्भ किया है, जिसका उद्देश्य आधुनिक रिमोट सेंसिंग, जीआईएस मैपिंग और ड्रोन‑आधारित सर्वेक्षण तकनीकों को राज्य‑स्तरीय कार्यान्वयन में लाना है। इस पहल के तहत बिहार सरकार को विशेष फंड एवं तकनीकी समर्थन प्रदान किया जाएगा, जिससे भू‑भौतिकी विभाग को अपने सर्वेक्षण को तेज़ी और सटीकता

के साथ पूरा करने में सहायता मिल सके। इस कार्यक्रम की योजना में स्थानीय विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों को भी सहयोगी बनाकर ज्ञान‑आधारित अनुसंधान को प्रोत्साहित किया जाएगा।

बिहार के भू‑भौतिकी विभाग ने पिछले दो महीनों में १५०० किलोमीटर से अधिक की भू‑भौतिकीय पंक्तियों की जाँच‑परिचालन पूरी की है, जिसमें विद्युत् प्रतिरोध,

चुंबकीय अनियमितता और ग्राविटी डाटा का संग्रह किया गया। इन डाटाओं का प्रारम्भिक विश्लेषण दर्शाता है कि कुछ क्षेत्रों में सिलिकॉन, लौह अयस्क और कोयले के बड़े भंडार मौजूद हो सकते हैं। इसके अलावा, बायो‑माइनरलीकरण के संभावित क्षेत्रों की पहचान भी की गई, जिससे पर्यावरण‑सुरक्षित खनन विधियों पर विचार किया जा

रहा है। विभाग ने इन खोजों को आधिकारिक रिपोर्ट के रूप में तैयार कर, GSI को सौंप दिया है।

भू‑विज्ञान विभाग के प्रमुख ने कहा कि “हमने जो डेटा इकट्ठा किया है, वह न केवल खनिज संभावनाओं को उजागर करता है, बल्कि हमें यह समझ भी देता है कि इन संसाधनों को

सतत् विकास के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है।” उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि भविष्य में नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग के बढ़ते माँग को देखते हुए, दुर्लभ पृथ्वी धातुओं की उपलब्धता राज्य के आर्थिक हित में अहम भूमिका निभा सकती है। इस प्रकार, विभाग ने आगामी

महीनों में विस्तृत भू‑विज्ञानिक मानचित्र तैयार करने का लक्ष्य रखा है।

इन खोजों के प्रकाश में, GSI के साथ नियोजित बैठक में खनिज क्षेत्रों की नीलामी प्रक्रिया को पुनः संरचना करने पर चर्चा होगी। वर्तमान में, खनन लाइसेंस का आवंटन कई चरणों में किया जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि

प्रक्रिया में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने की आवश्यकता है। बैठक में नई नीलामी मॉडल, जैसे दो‑चरणीय बोली प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफ़ॉर्म के उपयोग, को प्रस्तावित किया जाएगा, जिससे छोटे व बड़े निवेशकों दोनों को समान अवसर मिल सके। यह कदम राज्य की आय वृद्धि में सकारात्मक प्रभाव डालने की संभावना

रखता है।

खनन उद्योग के प्रतिनिधियों ने इस पहल को आर्थिक प्रगति की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया है। राज्य के प्रमुख खनन कंपनियों के सीईओ ने कहा कि यदि आधुनिक तकनीक और स्पष्ट नीलामी प्रक्रिया अपनाई जाती है, तो निवेशकों को जोखिम कम महसूस होगा और परियोजनाओं की गति बढ़ेगी।

उन्होंने यह भी उजागर किया कि स्थानीय श्रमिकों को प्रशिक्षण एवं कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से नई नौकरियों की पेशकश की जा सकती है। इस प्रकार, उद्योग के दृष्टिकोण से यह कदम रोजगार सृजन और राज्य के राजस्व में वृद्धि का माध्यम बन सकता है।

वहीं, पर्यावरणीय संगठनों ने इस पहल

पर सतर्क रहने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि खनन कार्यों को शुरू करने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव अध्ययन (EIA) को कठोरता से लागू किया जाना चाहिए, ताकि जलस्रोत, कृषि भूमि और जैव विविधता पर संभावित नुकसान को रोका जा सके। कुछ समूहों ने कहा कि खनन

The survey identified previously unassessed mineral deposits, prompting a joint GSI‑state meeting to evaluate extraction potential. Enhanced technology and revised auction procedures could streamline resource development, influencing Bihar’s economic planning and revenue forecasts.

सहरसा: छात्रों को मारपीट के आरोप और पत्रकार के साथ प्रताड़ना भांडल पर विरोध

सहरसा के कहरा प्रखंड में स्थित वासुदेव स्कूल के पास हाल ही में एमडीएम की रिपोर्ट में छिपकली मिलने की खबर के संकलन के दौरान प्रभात खबर डिजिटल के पत्रकार अभिषेक कुमार को कथित मारपीट का सामना करना पड़ा, यह तथ्य स्थानीय पुलिस ने पुष्टि किया। इस घटना के बाद रविवार को

वीर कुंवर सिंह चौक पर कई छात्र, युवा और सामाजिक संगठनों ने सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें उन्होंने सिविल सर्जन डॉ. राजनारायण प्रसाद का पुतला दहन किया। प्रदर्शनकारियों ने आरोपी कई डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों को तुरंत गिरफ्तार करने की मांग की, जबकि अभी तक किसी को हिरासत

में नहीं लिया गया।

विक्टोरिया सेंट्रल स्कूल के एक पूर्व छात्र ने बताया कि अभिषेक कुमार ने एक समाचार लेख लिखते समय स्कूल के परिसर में छिपकली के बारे में तथ्य इकट्ठा करने के लिए कई शिक्षकों और छात्रों से जानकारी ली थी। इस दौरान उन्हें स्कूल के कुछ वरिष्ठ चिकित्सकों द्वारा बुलाया

गया और कहा गया कि वे इस मुद्दे को जल्दी से निपटाने में मदद करेंगे। लेकिन बाद में इन डॉक्टरों ने अभिषेक को अनजाने में अस्पताल के एक गुप्त कोड में ले जाकर मारपीट करने का आरोप लगाया, जिससे यह मामला सार्वजनिक रूप से उजागर हुआ।

पिछले दो हफ्तों में सहरसा में कई

बार डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों द्वारा छात्रों को बुलाकर मारपीट कराने के आरोप सामने आए हैं। स्थानीय अस्पतालों में रिपोर्टों के अनुसार, कुछ मेडिकल कॉलेज के छात्रों को बिना कारण इंटर्नशिप के दौरान शारीरिक दंड दिया गया, जिससे छात्र संघों में गहरी नाराज़गी पाई जा रही है। इस प्रकार के आरोपों ने

स्वास्थ्य क्षेत्र में मौजूदा तनाव को और बढ़ा दिया है, जहाँ पहले से ही डॉक्टरों-रोगियों के बीच भरोसा क्षीण हो रहा था। इस पृष्ठभूमि में अभिषेक कुमार के साथ हुई घटना को एक बड़ा बिंदु माना जा रहा है।

रविवार को सुबह लगभग नौ बजे, वीर कुंवर सिंह चौक पर लगभग दो सौ

लोगों के समूह ने एकत्रित होकर प्रदर्शन शुरू किया। उन्होंने ध्वज फहराए, नारे लगाए और सिविल सर्जन डॉ. राजनारायण प्रसाद के पुतले को दहन किया, जिसे कई लोगों ने इस क्षेत्र में डॉक्टरों के अनुचित व्यवहार के प्रतीक के रूप में देखा। प्रदर्शन के दौरान कई युवा ने पुलिस को झंडे सौंपे

और मौन धरना रखा, जबकि अन्य ने पृष्ठभूमि में शांति बनाए रखने के लिए स्वयंसेवकों का प्रबंधन किया। स्थानीय व्यापारियों ने भी इस विरोध को देखते हुए अपने व्यापारिक गतिविधियों को सीमित कर दिया।

पुलिस ने प्रदर्शन को रोकने के लिए बड़ी संख्या में अधिकारी तैनात किए और राउंड्स के साथ सुरक्षा जाँच

की। हालांकि, प्रदर्शनकारियों ने शांतिपूर्ण रहने का संकल्प किया और कोई भी हिंसक कार्रवाई नहीं की। पुलिस ने बताया कि वे घटना की पूरी जांच कर रहे हैं और सभी आरोपों की पुष्टि के बाद ही किसी को हिरासत में लेंगे। वहीं प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यदि 48 घंटे के भीतर आरोपी

डॉक्टरों और अस्पताल कर्मचारियों को गिरफ्तार नहीं किया गया, तो वे सहरसा शहर को बंद करने का अल्टीमेटम देंगे, जिससे शहर की सामान्य जीवनधारा में बाधा आएगी।

प्रदर्शन के बाद स्थानीय नागरिकों ने अपने विचार व्यक्त किए, कई लोग डॉक्टरों के खिलाफ सार्वजनिक न्याय की मांग कर रहे थे, जबकि कुछ ने इस

प्रकार के विरोध को अनावश्यक माना। एक स्थानीय व्यापारी ने कहा, यदि शहर बंद हो जाता है तो हमारा व्यापार पूरी तरह ठप हो जाएगा, लेकिन न्याय का सवाल है, हमें भी इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। वहीं कुछ छात्र संघ के प्रतिनिधियों ने कहा, हमें इस घटना को अनदेखा नहीं

किया जा सकता, यह शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों क्षेत्रों को प्रभावित करता है। इस प्रकार विभिन्न वर्गों की प्रतिक्रियाएँ स्पष्ट रूप से विभाजित थीं।

सहरसा की पुलिस ने बताया कि अभिषेक कुमार के खिलाफ कोई आधिकारिक FIR दर्ज नहीं हुई है और अभी तक कोई साक्ष्य नहीं मिला है जो उन पर सीधे

मारपीट का आरोप सिद्ध करे। पुलिस ने यह भी कहा कि उन्होंने डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों के साथ मिलकर एक विशेष जांच टीम गठित की है, जो इस मामले को त्वरित रूप से सुलझाने के लिए काम करेगी। इसके अलावा, पुलिस ने स्थानीय मेडिकल कॉलेजों को भी इस मुद्दे पर सावधानी

बरतने की चेतावनी दी है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएँ न हों।

सहरसा के स्वास्थ्य विभाग ने भी इस मामले पर अपनी टिप्पणी जारी की, जिसमें उन्होंने कहा कि अस्पतालों में सभी कर्मचारियों को पेशेवर आचार संहिता का पालन करना अन

Updated: September 13, 2026

Insight: The incident links alleged assault on a journalist to broader claims of misconduct by medical staff, prompting public protests. Authorities have initiated an investigation, while demonstrators are demanding arrests of the implicated doctors.

उमर खालिद पर फिल्म प्रदर्शन को लेकर विवाद, ABVP ने रोक की मांग उठाई; NLSIU ने दी सफाई

राष्ट्रीय स्तर पर वैधता के प्रश्न उठाते हुए, राष्ट्रीय विधि विद्यालय, बेंगलुरु (NLSIU) में उमर खालिद पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग को रोकने का प्रस्ताव भारतीय राष्ट्रीय विद्यार्थी संघ (ABVP) ने पेश किया है।
ABVP ने अपने बयानों में कहा कि विश्वविद्यालयों को राष्ट्रीय एकता और शैक्षणिक उद्देश्यों पर केंद्रित रहना चाहिए, न कि राजनीतिक प्रवर्तन या सामाजिक अशांति को बढ़ावा देने वाले मंचों के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए। यह प्रस्ताव विश्वविद्यालय प्रबंधन को भेजे गए औपचारिक नोटिस के माध्यम से किया गया, जिसमें स्क्रीनिंग को रद्द करने के साथ ही इस प्रकार के कार्यक्रमों की अनुमति पर पुनर्विचार करने की माँग की गई है।उमर खालिद, जो दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र आंदोलन में शामिल रहने के कारण कई बार कानूनी जाँच का हिस्सा रहे हैं, पर आधारित इस डॉक्यूमेंट्री का निर्माण कई स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं द्वारा किया गया था। यह फिल्म उनके विचारधारा, सामाजिक सहभागिता और न्यायिक प्रक्रिया में उनकी भूमिका को उजागर करती है, जिससे छात्रों और सार्वजनिक वर्ग में चर्चा का मंच तैयार हुआ। इस फिल्म की पहली सार्वजनिक प्रीव्यू NLSIU के कैंपस में आयोजित होने वाली थी, जो शैक्षणिक स्वतंत्रता के दायरे में एक पहल के रूप में देखी जा रही थी।

ABVP ने इस प्रस्ताव के पीछे की प्रमुख प्रेरणा को राष्ट्रीय अखंडता और शिक्षा संस्थानों की स्वच्छता के रूप में प्रस्तुत किया है। इस संगठन ने कहा कि उमर खालिद जैसे व्यक्तियों को शहीद या नायक के रूप में प्रस्तुत करना सामाजिक विभाजन को बढ़ा सकता है, जिससे छात्रों के बीच विचारधारा के आधार पर विभाजन हो सकता है। ABVP ने यह भी कहा कि विश्वविद्यालयों को राजनीति से दूर रहना चाहिए और केवल शैक्षणिक एवं अनुसंधान कार्यों पर ध्यान देना चाहिए।

वहीं, NLSIU के प्रशासन ने इस प्रस्ताव को गंभीरता से लेते हुए कहा कि वे शैक्षणिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए सभी पक्षों के साथ संवाद करने के इच्छुक हैं। विश्वविद्यालय के प्रिंसिपल ने कहा कि डॉक्यूमेंट्री का उद्देश्य छात्र आंदोलन की सामाजिक और कानूनी पहलुओं को समझना है, न कि किसी विचारधारा को बढ़ावा देना। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि स्क्रीनिंग के लिए सभी आवश्यक अनुमतियां प्राप्त की गई थीं और इस प्रक्रिया में कोई भी वैध नियम उल्लंघन नहीं हुआ।

डॉक्यूमेंट्री के निर्माताओं ने ABVP के इस कदम को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आक्रमण के रूप में खारिज किया है। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक संस्थान इतिहास, राजनीति और सामाजिक संघर्षों को समझने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं, और ऐसे विषयों को प्रतिबंधित करना शैक्षणिक विकास को बाधित करेगा। फिल्म निर्माताओं ने यह भी बताया कि उन्होंने सामग्री को तथ्यात्मक आधार पर तैयार किया है और इसमें किसी भी प्रकार की भड़काऊ सामग्री नहीं है।

अभियोजन के बीच, कई छात्र संघों ने इस मुद्दे पर अपने-अपने मत व्यक्त किए हैं। कुछ छात्र समूह ने इस स्क्रीनिंग को छात्र अधिकारों और लोकतांत्रिक बहस को बढ़ावा देने का अवसर बताया, जबकि अन्य ने इस बात पर चिंता जताई कि इससे विश्वविद्यालय का माहौल राजनीतिक उथल-पुथल से प्रभावित हो सकता है। इस प्रकार, कैंपस में विचारधारात्मक विभाजन स्पष्ट रूप से उभर रहा है, जिससे प्रशासन को संतुलन बनाते हुए निर्णय लेना कठिन हो रहा है।

राष्ट्रीय स्तर पर इस विवाद को देख रहे प्रमुख राजनीतिक दलों ने भी अलग-अलग राय व्यक्त की है। केंद्र सरकार की कुछ प्रवक्ता ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षित किया जाना चाहिए, जबकि वह राष्ट्रीय सुरक्षा और एकता को भी प्राथमिकता देने की बात दोहराते हैं। विपक्षी दल ने इस मुद्दे को छात्र आंदोलन की आवाज़ को दबाने की कोशिश के रूप में चित्रित किया है और विश्वविद्यालय में विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार को समर्थन दिया है।

आर्थिक पहलू से देखें तो विश्वविद्यालयों में इस प्रकार की सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यक्रमों पर अक्सर बाहरी फंडिंग और प्रायोजन निर्भर करता है। यदि इस डॉक्यूमेंट्री को रद्द किया जाता है, तो फिल्म निर्माताओं और संभावित प्रायोजकों के बीच विश्वास घट सकता है, जिससे भविष्य में समान कार्यक्रमों की वित्तीय संभावना कम हो सकती है। साथ ही, विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठा पर भी असर पड़ सकता है, जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अनुसंधान ग्रांट्स की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सामाजिक स्तर पर, इस विवाद ने छात्र समुदाय में अभिव्यक्ति की सीमाओं पर नई चर्चा को जन्म दिया है। कई सामाजिक वैज्ञानिकों ने कहा कि विश्वविद्यालयों को विचारों के टकराव के लिए एक सुरक्षित स्थान बनाना चाहिए, जहाँ विभिन्न विचारधाराओं का सम्मान हो। इस प्रकार, डॉक्यूमेंट्री का विवाद सामाजिक संवाद के मंच पर नए प्रश्न उठाता है, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन खोजने की आवश्यकता स्पष्ट होती है।

राजनीतिक प्रभाव के संदर्भ में, यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा नीति और विश्वविद्यालय स्वायत्तता के पुनर्संरचना पर चर्चा को तीव्र कर रहा है।

72 वर्षीय बिहारी ने दिलमाई की 24 हजार फीट ऊंचाई से पैराग्लाइडिंग: भारत के सबसे उम्रदराज उड़ान सौन

कपिलदेव रावत, 72 वर्ष आयु के बिहार के जमुई निवासी, ने हिमाचल प्रदेश के द्रास में लगभग 24 हजार फीट (7 200 मीटर) की ऊँचाई से पैराग्लाइडिंग का साहसिक प्रयास किया, जिससे वह भारत के सबसे उम्रदराज पैराग्लाइडरों में स्थान पा गए। यह उपलब्धि न केवल व्यक्तिगत साहस का प्रमाण

है, बल्कि वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य‑संबंधी मानदंडों को पुनः परिभाषित करती है। रावत की इस उड़ान को राष्ट्रीय एविएशन असोसिएशन ने आधिकारिक तौर पर मान्य किया और इसे ‘उम्र‑सहिष्णुता’ की नई मिसाल के रूप में दर्ज किया गया।

रावत का जन्म 1952 में बिहार के एक

छोटे गाँव में हुआ था। वे पहले कृषि में कार्यरत थे और बाद में छोटे‑मोटे व्यापार में लगे। 2010 के दशक में उन्होंने पहली बार पैराग्लाइडिंग का परिचय प्राप्त किया और धीरे‑धीरे इस खेल के प्रति आकर्षित हो गए। पिछले पाँच वर्षों में उन्होंने लगभग 150 उड़ानें

भरी थीं, जिसमें अधिकांश भारत के विभिन्न पहाड़ी क्षेत्रों में थीं। उनकी निरंतर अभ्यास और शारीरिक फिटनेस ने उन्हें इस उम्र में भी उच्च‑ऊँचाई की उड़ान के योग्य बना दिया।

पैराग्लाइडिंग भारत में एक निचली लोकप्रियता वाला साहसिक खेल माना जाता है, परन्तु हाल के वर्षों

में इसे सख्त सुरक्षा मानकों के तहत व्यवस्थित किया गया है। राष्ट्रीय पैराग्लाइडिंग संघ (NPGA) ने 2020 में एक विशेष आयु‑सीमा निर्धारित की थी, जिसके तहत 70 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए अतिरिक्त मेडिकल चेक‑अप अनिवार्य हो गया। रावत ने इन सभी प्रक्रियाओं को

सफलतापूर्वक पूरा किया और अपने डॉक्टरों से साफ‑साफ अनुमति प्राप्त की। उनकी तैयारी में शारीरिक व्यायाम, पोषण संबंधी सलाह और तनाव‑मुक्ति तकनीकों का समावेश था।

रावत की इस उड़ान का प्रारम्भिक चरण द्रास के प्रमुख पैराग्लाइडिंग क्लब द्वारा आयोजित किया गया, जहाँ उन्होंने दो घंटे की

प्री‑फ़्लाइट ब्रीफ़िंग में भाग लिया। ब्रीफ़िंग के दौरान मौसम विज्ञान विशेषज्ञों ने ऊँचाई, हवा की दिशा और तापमान के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की। रावत ने अपने पायलट गियर की जाँच करवाई, जिसमें पैराशूट, हेलमेट, GPS ट्रैकर और संचार उपकरण शामिल थे। अंत में, प्रशिक्षित पायलट

ने उन्हें लांच प्लेटफ़ॉर्म पर स्थित किया और सुरक्षा मानकों के अनुरूप रिहा किया।

उड़ान के दौरान रावत ने 24 हजार फीट की ऊँचाई तक पहुँचने पर अपने मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से वास्तविक‑समय डेटा रिकॉर्ड किया। इसमें ऊँचाई, गति, हवा की गति और दिशा के आंकड़े

शामिल थे। इस डेटा के अनुसार, उन्होंने औसत 120 किमी/घंटा की गति से यात्रा की और 45 मिनट तक निरंतर ऊँची उड़ान बनी रही। इस दौरान उन्होंने विभिन्न बिंदुओं पर फोटो और वीडियो भी कैप्चर किए, जो बाद में मीडिया और सार्वजनिक उपयोग के लिए उपलब्ध कराए गए।

उड़ान के बाद रावत को स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारी और पैराग्लाइडिंग संघ के प्रतिनिधियों ने बधाई दी। हिमाचल प्रदेश के पर्यटन विभाग के प्रमुख ने कहा कि यह घटना वरिष्ठ नागरिकों को सक्रिय जीवन शैली अपनाने के लिए प्रेरित कर सकती है। उन्होंने इस प्रकार की ऊँची उड़ानों

के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपायों को मजबूत करने का वचन भी दिया। रावत के परिवार ने भी उनके साहस की सराहना की और कहा कि उनकी यह उपलब्धि पूरे बिहार और भारत में गर्व की बात है।

रावत की इस उपलब्धि पर सामाजिक मीडिया में तीव्र

प्रतिक्रियाएँ देखी गईं। ट्विटर और फेसबुक पर कई उपयोगकर्ताओं ने #KapildevParagliding टैग के तहत बधाई संदेश पोस्ट किए। कई वरिष्ठ नागरिक समूहों ने इस घटना को वृद्धावस्था में सक्रियता की नई मिसाल बताया। वहीं, कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस तरह की जोखिम भरी गतिविधियों के लिए विस्तृत

मेडिकल स्क्रीनिंग की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।

राजनीतिक वर्ग से भी इस घटना पर टिप्पणी आई। बिहार के मुख्यमंत्री ने रावत को बढ़ते उम्र के बावजूद साहस और ऊर्जा का प्रतीक कह कर बधाई दी और कहा कि राज्य में वरिष्ठ नागरिकों के लिए खेल और

फिटनेस सुविधाएँ बढ़ाने की आवश्यकता है। केंद्रीय खेल मंत्रालय ने इस उपलब्धि को राष्ट्रीय खेल गौरव का हिस्सा कहा और कहा कि भविष्य में ऐसी उपलब्धियों को समर्थन देने के लिये विशेष कार्यक्रम बनाये जाएंगे।

आर्थिक दृष्टिकोण से इस प्रकार की उच्च‑

Updated: September 13, 2026

The flight validates that senior citizens can meet stringent medical and safety standards for high‑altitude adventure sports. It also provides a data‑driven example for policymakers and health professionals promoting active ageing programs.

बिहार में 100 प्रोफेसरों को ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय पर भेजने की घोषणा, खर्च 150 करोड़

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने रविवार को बापू सभागार में आयोजित 211 नए डिग्री कॉलेजों के उन्मुखीकरण कार्यक्रम में एक महत्वाकांक्षी घोषणा की, जिसमें राज्य के 100 सहायक प्रोफेसरों को ऑक्सफोर्ड सहित विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में एक महीने की प्रशिक्षण यात्रा पर भेजने का प्रस्ताव रखा गया। इस पहल के वित्तीय भार को पूरी तरह से

राज्य सरकार वहन करेगी, जिससे उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीय मानकों तक पहुँचने की दिशा में एक ठोस कदम उठाया जा रहा है। यह योजना बिहार के शैक्षणिक परिदृश्य को पुनर्गठित करने और अनुसंधान एवं शिक्षण गुणवत्ता को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने का लक्ष्य रखती है।

बिहार में उच्च शिक्षा की दशा को देखते हुए

यह पहल कई वर्षों से चल रहे सुधारात्मक प्रयासों का निरंतरता है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य सरकार ने नई डिग्री कॉलेजों की स्थापना, अनुदानित पाठ्यक्रमों का विस्तार और डिजिटल लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म के कार्यान्वयन जैसे कई कदम उठाए हैं। हालांकि, शिक्षकों की योग्यता, शोध क्षमता और अंतरराष्ट्रीय संपर्क के अभाव को लेकर लगातार आलोचना होती रही

है। इस संदर्भ में, सम्राट चौधरी का प्रस्ताव एक रणनीतिक उत्तरदायित्व के रूप में सामने आया, जिससे शिक्षकों को वैश्विक शैक्षणिक वातावरण से परिचित कराकर स्थानीय संस्थानों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाई जा सके।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, जो विश्व के शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों में से एक माना जाता है, में प्रशिक्षण का चयन विशेष रूप से प्रतीकात्मक है।

यह न केवल शिक्षकों को नवीनतम शैक्षणिक पद्धतियों और शोध तकनीकों से रूबरू कराएगा, बल्कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क में जोड़ने का अवसर भी देगा। प्रशिक्षण अवधि के दौरान, सहभागी प्रोफेसर को व्यावहारिक कार्यशालाओं, सैद्धांतिक सेमिनारों और सहयोगी शोध परियोजनाओं में भाग लेने का अधिकार मिलेगा, जिससे उनका शैक्षणिक दृष्टिकोण व्यापक और बहुस्तरीय बन जाएगा।

परियोजना

की तैयारी में बिहार के शिक्षा विभाग ने पहले से ही चयन मानदंड तैयार कर लिए हैं। 100 शिक्षकों का चयन उनके शैक्षणिक योग्यता, अनुसंधान प्रकाशनों, शैक्षणिक अनुभव और राष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त पुरस्कारों के आधार पर किया जाएगा। चयन प्रक्रिया में राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के प्रमुखों को शामिल किया गया है, जिससे

एक पारदर्शी और निष्पक्ष चयन सुनिश्चित किया जा सके। चयनित प्रोफेसरों को एक महीने की विदेश यात्रा के लिए आवश्यक वीज़ा, टिकट, रहने की सुविधा और बीमा आदि सभी व्यवस्था राज्य सरकार द्वारा प्रदान की जाएगी।

वित्तीय पहलू को लेकर सरकार ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का कुल खर्च 150

करोड़ रुपये के आसपास होगा, जिसमें यात्रा, आवास, प्रशिक्षण शुल्क और अन्य सहायक खर्च शामिल हैं। इस राशि को विशेष रूप से शिक्षा विकास कोष से अलग करके आवंटित किया गया है, जिससे अन्य विकास परियोजनाओं पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। वित्त विभाग ने इस खर्च को दीर्घकालिक लाभ के रूप में प्रस्तुत किया, क्योंकि

प्रशिक्षित शिक्षक अपने संस्थानों में लौटकर उच्च मानकों की शिक्षा प्रदान करेंगे, जिससे छात्रों की रोजगार संभावनाएं और अनुसंधान उत्पादन दोनों में वृद्धि होगी।

सम्राट चौधरी ने इस घोषणा के दौरान कहा कि बिहार की शिक्षा को विश्व स्तर पर ले जाना हमारा मुख्य उद्देश्य है, और इस दिशा में विदेश प्रशिक्षण एक महत्वपूर्ण कड़ी

है। उन्होंने यह भी कहा कि इस पहल से न केवल शिक्षकों को व्यक्तिगत रूप से लाभ होगा, बल्कि संपूर्ण शैक्षणिक प्रणाली को नई ऊर्जा और विचारधारा मिलेगी। मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि प्रशिक्षण के बाद शिक्षकों को एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करनी होगी, जिसमें वे अपने अनुभव, सीखे गए नवाचार और संभावित सुधारात्मक उपायों

को सम्मिलित करेंगे, जिन्हें आगे के शैक्षणिक नीति निर्माण में उपयोग किया जाएगा।

राज्य के शिक्षा सचिव ने इस योजना की कार्यान्वयन प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए कहा कि चयनित शिक्षकों को पहले से ही एक विस्तृत ब्रीफ़िंग सत्र में सम्मिलित किया जाएगा, जिसमें यात्रा की तैयारी, सांस्कृतिक अनुकूलन और शैक्षणिक अपेक्षाओं के बारे में

जानकारी दी जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि प्रशिक्षण के बाद एक फॉलो‑अप मॉनिटरिंग टीम स्थापित की जाएगी, जो शिक्षकों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करेगी और उनके द्वारा लाए गए नवाचारों को स्थानीय कॉलेजों में लागू करने में मदद करेगी।

विपक्षी दल के कुछ प्रमुख नेताओं ने इस योजना को सकारात्मक रूप से सराहा, लेकिन

साथ ही इसके कार्यान्वयन में पारदर्शिता और प्रभावशीलता की मांग भी की। उन्होंने कहा कि केवल 100 शिक्षकों को विदेश भेजना पर्याप्त नहीं हो सकता, जब कि बिहार में कुल सहायक प्रोफेसरों की संख्या कई हजार है। इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि भविष्य में इस योजना को विस्तारित किया जाए और अधिक शिक्षक को अंतरराष्ट्रीय मंच

पर ले जाया जाए, ताकि व्यापक स्तर पर शैक्षणिक सुधार संभव हो।

शिक्षा क्षेत्र के कई विशेषज्ञों ने इस कदम की संभावित प्रभावशीलता पर टिप्पणी की। कुछ ने बताया कि विदेश प्रशिक्षण के बाद शिक्षकों को अपने संस्थानों में नई शिक्षण पद्धतियों, जैसे ब्लेंडेड लर्निंग, प्रोजेक्ट‑

The Bihar government will fund one-month training for 100 associate professors at global universities, including Oxford.
This initiative aims to enhance research capabilities and align state higher education standards with international benchmarks.

नेपाल की जलविद्युत सुरंग में बाढ़: 6 कामगार फंसे, बचाव कार्य जारी, 70 मीटर मलबा हटा

सतत तेज़ बरसात से नेपाल के पहाड़ी प्रदेश में आई बाढ़ ने कई पुलों और जलधाराओं को पार कर एक निर्माण स्थल पर स्थित लंबी सुरंग को भी बर्बाद कर दिया। बचाव दलों ने आज सुबह बताया कि छह कामगारों के फँसे होने की सूचना मिलने के बाद उन्होंने तुरंत कार्रवाई शुरू की। आज रात के भीतर बचाव कार्य को पूरा करने के लक्ष्य के साथ टीमों ने 70 मीटर मलबे को साफ़ कर लिया और अब वह बचे हुए कामगारों के पास पहुँचने के कगार पर है।

इस बाढ़ की शुरुआत पिछले दो हफ्तों में हुई जब हिमालयी नदियों में जलस्तर अचानक बढ़ा। नेपाल के कई क्षेत्रों में बाढ़ की लहरें तेज़ी से फैलीं, जिससे सड़कों, पुलों और विद्युत् परियोजनाओं को गंभीर क्षति पहुँची। विशेषकर पूर्वी पहाड़ी प्रदेश में जलस्रोतों का अत्यधिक बहाव स्थानीय प्रशासन को निरंतर आपातकालीन स्थितियों में डाल रहा है।

सुरंग, जो एक जलविद्युत परियोजना के हिस्से के रूप में बनाई जा रही थी, इस बाढ़ के कारण लगभग 150 मीटर के भाग में धँस गई। परियोजना प्रबंधक के अनुसार, इस बिंदु के 60 मीटर आगे एक पावरहाउस स्थित है, जहाँ से अधिकतम ऊर्जा उत्पादन की योजना है। इस पावरहाउस की स्थिति को देखते हुए बचाव कार्य की गति तेज़ करनी अनिवार्य हो गई।

बचाव दलों ने पहले दो घंटे में 70 मीटर मलबा हटाने में सफलता पाई। इस कार्य में विशेषीकृत हाइड्रॉलीक टूल्स और भारी यांत्रिक उपकरणों का उपयोग किया गया। टीम ने मलबे को हटाते समय सतही जलस्तर के अचानक बढ़ने से बचने के लिए सतर्कता बरती। इस बीच, बचाव कर्मियों ने सूचित किया कि अब तक कोई बड़ी चोट नहीं मिली है, परन्तु शारीरिक थकान के कारण टीमों को वैकल्पिक रोटेशन की आवश्यकता है।

स्थानीय प्रशासन ने बताया कि बचाव कार्य के दौरान कई स्वयंसेवक भी शामिल हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि बाढ़ के कारण प्रभावित क्षेत्रों में बिजली और संचार सेवाओं में व्यवधान आया है, जिससे बचाव कार्य में अतिरिक्त कठिनाइयाँ उत्पन्न हो रही हैं। इस बीच, स्थानीय अस्पतालों में बाढ़ से प्रभावित लोगों के लिए विशेष आपातकालीन कक्ष स्थापित किए गए हैं।

भारत के नेपाल में स्थित दूतावास ने इस स्थिति पर टिप्पणी की। दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि भारत की ओर से तुरंत मदद भेजी गई है और भारतीय सेना के बचाव समूह ने भी सहयोग प्रदान किया है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि दोनों देशों के बीच आपदा प्रबंधन में सहयोग की परम्परा हमेशा बनी रही है, और इस बार भी सहयोग की भावना स्पष्ट दिखाई दे रही है।

नेपाल सरकार के गृह मंत्रालय ने भी बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्य को तेज़ करने का निर्देश जारी किया। उन्होंने कहा कि इस आपदा के कारण कई ग्रामीण इलाकों में संचार टूट गया है, इसलिए एरियल सप्लाई और हेलीकॉप्टर रेस्क्यू का उपयोग किया जाएगा। साथ ही, उन्होंने स्थानीय प्रशासन को आवास, भोजन और चिकित्सा सहायता प्रदान करने की सलाह भी दी।

प्रोजेक्ट की मुख्य कंपनी, जो इस जलविद्युत परियोजना की जिम्मेदारी संभाल रही है, ने आधिकारिक बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि सुरक्षा को सबसे ऊपर रखते हुए उन्होंने सभी कर्मचारियों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की कोशिश की है। कंपनी ने कहा कि अब तक कोई गंभीर चोट नहीं हुई है और बचाव कार्य जारी रहेगा।

बचाव कार्य में शामिल विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों ने भी सहायता का प्रस्ताव रखा। यूनाइटेड नेशंस का आपदा प्रबंधन विभाग नेपाल में स्थित अपनी टीम को तैनात कर रहा है, और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बाढ़ से उत्पन्न स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने के लिए तैयारियों की घोषणा की है।

राजनीतिक दृष्टिकोण से इस आपदा ने दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को एक नया मोड़ दिया है। नेपाल के प्रधान मंत्री ने आपदा के बाद भारत के साथ सहयोग को अधिक मजबूत कहकर सराहा। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं में सहयोग ही समाधान है और भविष्य में ऐसी स्थितियों के लिए सामूहिक योजना बनाना आवश्यक है।

आर्थिक प्रभाव की बात करें तो इस जलविद्युत परियोजना में देरी के कारण निवेशकों को संभावित नुकसान हो सकता है। इस बाढ़ से निर्माण लागत में वृद्धि और कार्यकाल में विस्तार की संभावना बढ़ गई है। स्थानीय व्यापारियों को भी बाढ़ के कारण आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान का

Updated: September 13, 2026

भौतिक तबाही से परे, यह घटना ऊर्जा पूर्ति की नाजुक नींव पर प्रकृति के नियंत्रण को उजागर करती है। सहयोग की भावना के बावजूद, यह हमें आपदा-प्रबंधन में न केवल त्वरित प्रतिक्रिया, बल्कि दीर्

बिहार में दशहरा‑दीपावली‑छठ के लिए 1‑Oct से 30‑Nov तक 400 स्पेशल ट्रेनें चलाने का रेलवे बोर्ड ने मंजूर किया

बिहार में दशहरा, दीपावली और छठ महापर्व के आगमन के साथ भारतीय रेलवे ने 1 अक्टूबर से 30 नवंबर तक 400 ट्रिप स्पेशल ट्रेनों को चलाने का प्रस्ताव पारित किया, जिससे प्रवासी यात्रियों को व्यापक राहत मिलने की उम्मीद है। इस पहल से दिल्ली, चंडीगढ़, फिरोजपुर कैंट, ऋषिकेश सहित दस से अधिक प्रमुख

शहरों से बिहार के विभिन्न जंक्शन तक सीधी कनेक्टिविटी प्रदान की जाएगी, जिससे यात्रियों का समय‑सारिणी में सुधार और भीड़भाड़ में कमी आएगी। इस कदम को भारतीय रेलवे बोर्ड ने राष्ट्रीय यात्रा‑सुविधा को सुदृढ़ करने के हिस्से के रूप में मान्य किया है।

दशहरा, दीपावली और छठ का महापर्व भारत के उत्तर‑पूर्वी

क्षेत्र में सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों को तीव्रता से बढ़ाता है, विशेषकर बिहार में जहाँ प्रवासी जनसंख्या का प्रवाह बड़ी मात्रा में रहता है। पिछले वर्षों में इन त्यौहारों के दौरान सामान्य ट्रेनों में अत्यधिक भीड़, देरियों और असुविधा की शिकायतें सुनने को मिली थीं, जिससे यात्रियों की सुरक्षा और आराम को लेकर

चिंताएँ उत्पन्न हुई थीं। इस संदर्भ में, रेलवे ने विशेष रूप से इन महापर्वों को ध्यान में रखकर अतिरिक्त कोच, बेहतर एटीएम सुविधा और सफाई व्यवस्था को भी सम्मिलित किया है।

इतिहास में, रेलवे ने बड़े त्यौहारों के अवसर पर विशेष ट्रेनों की व्यवस्था करके सामाजिक-आर्थिक स्थिरता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण

भूमिका निभाई है। 2017 में दीपावली के दौरान चलायी गयी 250 स्पेशल ट्रेनों ने यात्रियों को समय पर गंतव्य तक पहुँचाने में मदद की थी, जिससे आर्थिक गतिविधियों में तेज़ी आई। वर्तमान योजना में 400 ट्रिप की संख्या पिछले रिकॉर्ड को पार करती है, जिससे यह संकेत मिलता है कि रेलवे ने इस

बार मांग‑आधारित योजना को अपनाया है, जिससे यात्रियों को अधिक विकल्प और लचीलापन मिलेगा।

स्पेशल ट्रेनों की शेड्यूलिंग में प्रमुख मार्गों को प्राथमिकता दी गई है। दिल्ली से पटना, गोरखपुर, बक्सर और भागलपुर तक प्रतिदिन दो-तीन ट्रेनों का संचालन होगा, जबकि चंडीगढ़ से गयापूर, मोसिनर और नालंदा तक भी समान व्यवस्था रखी

गई है। ऋषिकेश से बिहार के कई प्रमुख शहरों तक विशेष रूप से धार्मिक यात्रियों को ध्यान में रख कर ट्रेनें तैनात की गई हैं। इन ट्रेनों में एसी, स्लीपर और जनरल क्लास के कोच उपलब्ध होंगे, जिससे विभिन्न वर्ग के यात्रियों को सुविधा मिल सकेगी।

रेलवे ने यात्रियों की सुरक्षा को

सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा कर्मियों की तैनाती, सिडी‑ट्रेन प्रबंधन प्रणाली और रियल‑टाइम मॉनिटरिंग को लागू करने का भी निर्देश दिया है। प्रत्येक स्टेशन पर सूचना बोर्ड और मोबाइल ऐप के माध्यम से ट्रेन के समय‑सारिणी, प्लेटफ़ॉर्म बदल और यात्रा‑स्थिति की अद्यतित जानकारी दी जाएगी। इस डिजिटल पहल से यात्रियों को अनावश्यक

प्रतीक्षा और भ्रम से बचने में मदद मिलेगी।

ट्रेन संचालन के दौरान, रेलवे ने खाद्य एवं पेय व्यवस्था में भी सुधार करने का इरादा व्यक्त किया है। विशेष रूप से यात्रियों की विविध जरूरतों को देखते हुए, वैजिटेरियन तथा नॉन‑वैजिटेरियन विकल्पों के साथ शाकाहारी भोजन, ताज़ा जल और स्वच्छ शौचालय उपलब्ध कराए

जाएंगे। इस पहल का उद्देश्य यात्रा अनुभव को सुखद बनाना और सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों को बनाए रखना है, विशेषकर त्यौहारों के दौरान बड़ी भीड़ के संदर्भ में।

इन परिवर्तनों पर विभिन्न हितधारकों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है। दिल्ली रेलवे स्टेशनों के प्रबंधक ने कहा कि इस योजना से प्रवासी यात्रियों को

बड़ी सुविधा मिलेगी और दिल्ली‑बिहार मार्ग की भीड़भाड़ में कमी आएगी। चंडीगढ़ के स्थानीय व्यापारियों ने आशा जताई कि बेहतर कनेक्टिविटी से व्यापारिक लेन‑देन में वृद्धि होगी। बिहार में पर्यटन विभाग ने बताया कि छठ महापर्व के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि को देखते हुए, यह कदम आर्थिक लाभ को बढ़ावा देगा।

राज्य सरकार के प्रमुख अधिकारी भी इस पहल को सराहते हुए कहा कि रेलवे द्वारा प्रदान की गई स्पेशल ट्रेनों से बिहार के सामाजिक-आर्थिक विकास को नई दिशा मिलेगी। विशेष रूप से, ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों तक के प्रवास को सुगम बनाने से रोजगार के अवसरों में सुधार होगा और मौसमी कार्यकर्ता

अपने परिवारों के साथ समय बिता सकेंगे। इस संदर्भ में, बिहार के मुख्य मंत्री ने कहा कि सरकार भी इस अवधि में सार्वजनिक परिवहन के समर्थन को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त बस्क सेवाएँ प्रदान करेगी।

वित्तीय विश्लेषकों ने बताया कि इन स्पेशल ट्रेनों से भारतीय रेलवे के राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि

की संभावना है। टिकट बिक्री, कैटरिंग और विज्ञापन आय में वृद्धि के साथ ही, यात्रियों के संतुष्टि स्तर में सुधार से दीर्घकालिक रूप से ग्राहक आधार मजबूत होगा। इसके अतिरिक्त, रेलवे ने इस अवधि में डिजिटल बुकिंग एवं मोबाइल पेमेंट की दर बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, जिससे नकद ले

Updated: September 13, 2026

BRICS शिखर सम्मेलन 2026 का दिल्ली में समापन आज, PM मोदी की चार राष्ट्राध्यक्षों से द्विपक्षीय बैठकें; आर्थिक-ऊर्जा सहयोग पर समझौते

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 का समापन दिवस आज दक्षिण एशिया के राजधानी नई दिल्ली के राजभवन में आयोजित हो रहा है।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मंच पर चार प्रमुख राष्ट्राध्यक्षों के साथ द्विपक्षीय बैठकों का कार्यक्रम तय किया है। यह दिन विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को गहरा करने और वैश्विक आर्थिक व सुरक्षा चुनौतियों पर सामूहिक समाधान खोजने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि इस शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने कई प्रमुख मुद्दों पर समझौते किए हैं, जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर ब्रिक्स की स्थिति को सुदृढ़ करेंगे।ब्रिक्स समूह की स्थापना 2010 में हुई थी, जब ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एक मंच तैयार किया। तब से यह समूह विकासशील देशों की आवाज़ को विश्व मंच पर मजबूत करने के उद्देश्य से कार्य कर रहा है। पिछले कई वर्षों में ब्रिक्स ने व्यापार, ऊर्जा, वित्तीय संस्थानों और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में सहयोग को विस्तार दिया है। 2026 का शिखर सम्मेलन, जो पाँचवीं बार भारत में आयोजित हो रहा है, सदस्य देशों के बीच मौजूदा समझौतों को पुनः पुष्टि करने और नई पहलें प्रस्तावित करने का अवसर प्रदान करता है।

पिछले दो दिनों में शिखर सम्मेलन में विविध कार्यशालाएँ और बहुपक्षीय सत्र आयोजित किए गए, जिसमें जलवायु परिवर्तन, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, और डिजिटल बुनियादी ढाँचा प्रमुख चर्चा के विषय थे। विशेष रूप से, ब्रिक्स के वित्तीय संस्थान, नविन बँक, ने विकासशील देशों के लिए सस्ते ऋण उपलब्ध कराने की योजना को विस्तारित करने का प्रस्ताव रखा। इसके अलावा, सदस्य देशों ने स्वास्थ्य सुरक्षा, विशेषकर कोविड-19 जैसी महामारी से निपटने के लिए एक संयुक्त रिसर्च फंड की घोषणा की। ये कदम समूह की सामरिक दिशा को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।

आज के मुख्य बिंदु में प्रधानमंत्री मोदी की चार द्विपक्षीय बैठकों को प्रमुखता दी गई है। पहली बैठक में वे दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सीरिल रामाफोसा के साथ आर्थिक सहयोग को बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा करेंगे। दूसरी बैठक में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ ऊर्जा सुरक्षा और ऊर्जा निर्यात के मुद्दे प्रमुख रहे हैं।

तीसरी मुलाकात में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ तकनीकी साझेदारी और डिजिटल बुनियादी ढाँचे की संभावनाओं को लेकर वार्ता होगी। अंत में, ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुईज़ इनासियो लुला दा सिल्वा के साथ कृषि व व्यापार सहयोग को सुदृढ़ करने पर चर्चा की जाएगी।

प्रत्येक द्विपक्षीय सत्र में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को आमंत्रित किया गया है, जिससे नीति निर्माताओं को तकनीकी एवं आर्थिक डेटा उपलब्ध कराते हुए अधिक सटीक निर्णय लेने में मदद मिल सके। इस दौरान, भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने नई ऊर्जा प्रौद्योगिकियों, विशेषकर हाइड्रोजन और बैटरी उत्पादन में सहयोग के प्रस्ताव रखे हैं। साथ ही, डिजिटल भुगतान प्रणाली के अंतरराष्ट्रीय मानकों को स्थापित करने हेतु एक संयुक्त कार्यसमिति का गठन भी प्रस्तावित किया गया। यह सभी पहलें ब्रिक्स के आर्थिक एकीकरण को आगे बढ़ाने का लक्ष्य रखती हैं।

वास्तव में, आज के समिट में कई द्विपक्षीय समझौतों को औपचारिक रूप से हस्ताक्षर करने की संभावना है। भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच व्यापारिक टैरिफ को कम करने के लिए एक व्यापक समझौते पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। रूस के साथ ऊर्जा सहयोग में प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को सुरक्षित करने के लिए दीर्घकालिक अनुबंध तैयार किया जा रहा है। चीन के साथ तकनीकी सहयोग में 5G और क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्रों में संयुक्त अनुसंधान केन्द्र स्थापित करने की योजना है। इन सभी समझौतों का उद्देश्य ब्रिक्स देशों के बीच आर्थिक निर्भरता को बढ़ाना और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मकता को सुदृढ़ करना है।

सत्र के बाद विभिन्न देशों के राजनयिक प्रतिनिधियों ने इस शिखर सम्मेलन को समय की मांग कहा। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति ने कहा कि विकासशील देशों को वर्तमान वैश्विक अस्थिरता के माहौल में एकजुट होना चाहिए। रूसी प्रतिनिधिमंडल ने उल्लेख किया कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए ब्रिक्स का सहयोग आवश्यक है। चीन के प्रवक्ता ने कहा कि डिजिटल अर्थव्यस्था में सहयोग से दोनों पक्षों को लाभ होगा। ब्राज़ील के राष्ट्रपति ने कृषि निर्यात के नए बाजारों की तलाश को प्राथमिकता देने की बात दोहराई। इन सब बयानों से स्पष्ट होता है कि सदस्य देशों की अपेक्षाएँ सामरिक और आर्थिक दोनों ही पहलुओं में गहरी हैं।

Updated: September 13, 2026

The summit’s bilateral meetings aim to formalize agreements that could deepen economic, energy and technology cooperation among BRICS members.
Such coordination is expected to strengthen the group’s collective influence in global trade and development discussions.