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ज़रा सोचिए : बिहार में क्यों नहीं थम रहा है पलायन

बिहार से पलायन नही रुकेगा, अव्वल तो पलायन बिहार के लिए एक अभिशाप नही बल्कि एक वरदान है । रोजगार के लिए पलायन हमेशा बुरा भी नही होता । केरल में बिहार से भी अधिक पलायन है परंतु औसत आमदनी और समृद्धि बहुत अधिक है, जिसमे रेमिटेंस सेंड बैक का बड़ा योगदान है । पलायन का नेचर और रोजगार की प्रकृति अलग है, वहां अधिकांश पलायन मिडिल ईस्ट गल्फ देशों में है। पलायन से केरल में प्रति व्यक्ति आय बढ़ी, बिहार में भी बढ़ी है ।

पलायन का सबसे बड़ा लाभ बिहार में आर्थिक के बजाय #सामाजिक स्तर पर हुआ, बिहार में गरीब गुरबों को सर उठाने का जज़्बा और हिम्मत पलायन के बल पर ही मिला । याद करिये 60 और 70 का दशक जब बिहार के गांवों में छोटी जाती के भूमिहीन मजदूरों के साथ कितना बुरा बर्ताव होता था, उनकी समाजिक स्थिति कितनी बदतर थी । उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बना के रखा गया था । यदि कहूँ की, उन्हें इंसान नही माना जाता था, तो अतिश्योक्ति नही होगी । यही मजदूर जब पंजाब गया तो उसकी आमदनी बढ़ने लगी । जाहिर है इस रास्ते को श्रमिको और मजदूरों ने अपने परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर करने के माध्यम के साथ अपने आत्म स्वाभिमान को बढ़ाने के माध्यम के रूप में अपनाया, अब वो गांव के बड़े ज़मीदार की दासता से मुक्त था ।

बिहार में कृषि भूमि की औसत जोत पूरे भारत मे सबसे कम है, आबदी की वृद्धि दर सबसे अधिक है । अब भाइयों में बटवारें के पश्चात सिर्फ कृषि आमदनी से छोटे किसानों के बढ़ते परिवार को पालना कठिन होने लगा था । योजना आयोग की 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत मे कृषि क्षेत्र से अविलंब 22 करोड़ अतिरिक्त लोगों को दूसरे क्षेत्र में रोजगार देने की आवश्यकता है । खेती के मजदूरों का पहले बिहार से पंजाब हरियाणा जैसे राज्यो में पलायन हुआ जहाँ कृषि भूमि की जोत बड़ी थी ।

अब बात करें बिहार के #औद्योगिकरण की: तथ्य ये है कि बिहार आजादी के कई वर्षों बाद तक देश का औद्योगिक रूप से अग्रणी एवम सम्पन्न राज्य था । शुरुआती दौर में ही सबसे अधिक चीनी मिलें, सीमेंट कारखाने, जुट मिल आदि बिहार में खुली, डालमिया नगर 3700 एकड़ का औद्योगिक शहर बसा जिसमे 40 से अधिक विभिन्न केमिकल, शुगर, डिस्टिलरी, सीमेंट, पेपर मिल की इकाइयां थी, जमशेदपुर, बोकारो, धनबाद कोल माईनस, बिहार कई प्रदेशो से आगे था, लेकिन ये प्रक्रिया गति पकड़ने के बजाय थमने लगी जिसके अनेक कारण थे:

1) भेदभाव पूर्ण नीति: #फ्रेट_इकुलाइज़ेशन की पॉलिसी ने बिहार में उद्योग लगाने के एडवांटेज को समाप्त कर दिया, कोयला, लौह अयस्क एवं अन्य खनिज बिहार से जिस दाम में मिलेंगे उसी दाम पर जब दक्षिण और पश्चिम के राज्यो में उपलब्ध होंगे तो कोई बिहार में कारखाना क्यों लगाए ।

2) #लैंड_लॉक स्टेट होने के कारण बिहार में उद्योग लगाने में डिसडवांटेज है क्यों कि अगर रॉ मटेरियल इम्पोर्ट करना है या आउटपुट एक्सपोर्ट करना है ऐसे में बंदरगाह से नजदीकी मायने रखती है ।

3) #भूमि की अनुपलब्धता – बिहार में आबादी का घनत्व अधिक है और अधिकांश भूमि कृषि योग्य है । बड़े उद्धयोग को जिस पैमाने पर भूमि की आवश्यकता होती है, बिहार में उसका सही स्थान पर प्रबन्ध कर पाना आज भी एक दुस्कर कार्य है । भूमि की दर भी बिहार में अन्य राज्यो की तुलना में बहुत अधिक है । समृद्ध राज्यो में भी जमीन बिहार से सस्ती उपलब्ध है ।

4) अब कुछ ऐसे कारण जो बिहार के औधोगिक पिछड़ेपन में सबसे अधिक महत्वपूर्ण रहे है – #उद्यमियोंकोहेयदृष्टिसे_देखना – राज्य की जनता और प्रशासन ने कभी भी जोखिम लेकर पूंजी निवेश करने वाले, रोजगार देने वाले, उद्यमी को उसका यथोचित सम्मान नही दिया । जनता नेताओ, प्रशासनिक अधिकारीयों, पुलिस अधिकारीयों का तो सम्मान करती है लेकिन उद्यमियों के राह में बाधाएं हर स्तर पर आते है । सामाजिक कार्यक्रमो में उन्हें उद्योगपति अथवा #व्यापारी कहने के बजाए #समाजसेवी कह कर परिचित कराना पड़ता है । उनकी मेहनत और जोखिम को नजरअंदाज कर उनसे जलने वाले उन्हें हमेशा नीचे लाने को ततपर रहते है । क्या नेता, पुलिस और अफ़सर ही सम्मानयोग्य है, क्या इनमे भरस्टाचार नही, शायद बहुत अधिक, एक उद्यमी का देश की तरक्की में योगदान इनसे अधिक होता है, चाहे राज्य को दिया जाने वाला सेल्स टैक्स (अब GST) हो, या केंद्र को दिया जाने वाला आयकर (हिस्सा राज्य को भी मिलता है) अथवा डायरेक्ट इनडायरेक्ट कर्मचारियों, सप्लायर्स, ट्रांसपोर्टर्स, डिस्ट्रीब्यूटर्स, रिटेलर्स के माध्यम से लोगो को दिए जाने वाला रोजगार हो, दूसरी और जो उत्पादन/ट्रेड वो कर रहे है अगर वो न करे तो आम लोगों के लिए वस्तुओं की उपलब्धता कम और महंगी होगी, किसानों की फसल का बेहतर मूल्य न मिले, लेकिन सारे लाभ होने के बाद भी इस राज्य ने उद्यमी को कभी भी सम्मान नही दिया, उसे हमेशा मुनाफ़ाखोर और दूसरे से काम लेकर खुद कमाने वाला के रूप में देखा, उससे लोग जलते , यही मुनाफा जब कोई बाहर की या विदेश की कम्पनी लेती है तो उसके आगे बिहार वाशी नतमस्तक रहते है । अरे मुनाफ़ा व्यापार की प्रगति और निरन्तरता के लिए परमावश्यक है, मुनाफ़ा ही नए निवेश का आधार होता है और उत्तरोत्तर प्रगति की नींव रखता है । आज बिहार में हर जिले में बन्द पड़ी सरकारी और निजी चीनी मिल, फर्टीलाइजर फैक्टरी, पेपर मिल आदि की ऐसी कहानियां बिखरी पड़ी है ।

5) #अपनेघरमेहनत_नहीं: बिहारी श्रमिकों के साथ भी एक तथ्य है कि अपने राज्य में उनकी श्रम शक्ति उस प्रकार प्रभावी नही होती जैसे वो बाहर जा कर क्रियाशील होते है । यहाँ अपने लोगो के बीच वो अपनी प्रथाओं, अस्मिता, राजनीति, तीज त्योहारों और आलस्य उत्सव में मग्न रहते है, जबकि परदेश में उनके साथ ये बधाये नही होती।

6) #लो_एस्पिरेशन- मैंने बिहार के प्रत्येक जिले में छात्रों का सेमीनार लिया है, अक्सर छात्रों से पूछता था कि बताओ अगर तुम्हें अवसर मिले तो तुम किस नौकरी के लिए तैयारी करना चाहोगे? कौन सा जॉब करना है? कई बार छात्रों ने कहा कि टॉवर में गार्ड लगवा दीजिये, उस दौर में शिक्षा मित्र की बहाली आयी थी, तब वेतनमान मात्र 6000 प्रतिमाह था, लेकिन छात्रों में उसका जबरदस्त क्रेज था । आज विधानसभा में चपरासी, गार्ड, स्वीपर और माली की नौकरी के लिए 6 लाख लोगो ने आवेदन कर दिया, जिसमे स्नातकोत्तर और प्रोफेशनल कोर्स किये छात्र है, फैक्ट यही है कि लगातार छात्रों की एस्पिरेशन घटी है, पटना ssc, बैंकिंग और दरोगा-सिपाही बहाली के कोचिंग से भरा है IAS का कोचिंग पटना में एक भी स्तरीय नही । बिहार से आज भी भारी मात्रा में IAS के प्रतिभागी भाग लेते है, दिल्ली, इलाहाबाद में कोचिंग करते है, लेकिन बिहार का रिजल्ट लगातार गिरा है, अधिकांश हिंदी मीडियम से परीक्षा देते है, हिंदी मिडियम का ही रिजल्ट कुल सफल छात्रों में मात्र 2% है । उद्यमिता की बात ही वहाँ कैसे हो जहाँ एस्पिरेशन लेवल नीचे जा रहा हो । उद्यमिता की सबसे बड़ी ड्राइविंग फोर्स साहस और महत्वाकांक्षा होती है । ऊँचे सपनो के आधार पर ही उद्योग की नींव होती है ।

7) #पोस्टप्रोडक्शन के बजाय #प्रीप्रोडक्शन_स्कैम – बिहार में कही भी कोई उद्योग, विश्वविद्यालय लगाने की प्रक्रिया शुरु करेगा तो उस इलाके के राजनीतिज्ञ, अधीकारी, दबंग, जातीय मुखिया और गुंडे इस जुगत में लग जाते है कि कैसे इस इंडस्ट्रीलिस्ट / मारवाड़ी / पैइसावाले से माल टाना जाए । मुर्गी अंडा दे उसके बजाय उसका पेट ही चीर कर सारे अंडे एक साथ निकाल ले ।

8) आज स्थिति ये है कि इस राज्य में #बाहुबल और #राजनैतिक_संरक्षण के बिना उद्योग या कोई बड़ा प्रोजेक्ट लगाना सम्भव नही रह गया है । आप किस जाति के गांव में है, आपका प्रमुख मैनेजर किस जाति का है, भूमिहार का गांव है कि बाबूसाहब का है, बाभन एडवाइजर है कि नही, लाल झंडा का क्षेत्र तो नही न था? ऐसे कितने प्रश्न है जिसे कोई उद्यमी झेलना नही चाहेगा , निवेश ही करना है तो भारत मे विकल्प की कमी नही है ।

9) #रेडटेपब्योरोक्रेशी – माननीय मुख्यमंत्री की सबसे बड़ी विफलता अपने नौकरशाही में सुधार न ला पाने की है । जिस उद्यमी को सचिवालय का चक्कर लगता है उससे वहाँ के हाल पूछिये । सरकारी फाइल से स्लो कोई चीज़ भगवान ने बनाई नही, और ऊपर से अर्जेंट आदेश वाली फाइल सबकी बनती नही ।

10) #छवि : मुख्यमंत्री एक बार उद्यमियों के सम्मेलन में मुंबई गए थे, अगले दिन वहां के प्रमुख अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने छापा कि “नीतीश डेयर्स इन्वेस्टर्स” यानी कि मुख्यमंत्री ने निवेशकों को आमंत्रित करने का प्रयास जो किया उसे वहां के उद्यमियों ने डराने के प्रयास के रूप में लिया क्योंकि बिहार में निवेश बिना शर्तों के नहीं होता है जबकि उद्यमी ऐसे राज्यों को खोज रहे होते हैं जहां उनको रेड कारपेट वेलकम मिले कई बार ऐसी परिस्थितियां भी बनी जहां पर उद्यमी निवेश करने के पश्चात स्थानीय अथवा प्रशासनिक समस्याओं में उलझ गया, ऐसे में उच्च स्तर पर उद्यमी की परेशानी को समझने के बजाय सरकारी नियमों एवं वोट की राजनीति के मजबूरियों को महत्व दिया गया। यानी कि उच्चतम स्तर पर शासन की प्रतिबद्धता अपनी छवि और वोट बैंक की मजबूरियों के प्रति दृढ़ हैं जबकि राज्य के औद्योगिककरण के लक्ष्य को लगभग असंभव मानते हुए प्रयासों को छोड़ दिया गया है । यहाँ राजनेता उद्यमी की मदद करने की छवि बनने से डरते है, क्योंकि जनता इसे अच्छा नही मानती ।

11) #शिक्षा स्तर में गिरावट: पहले कर्पूरी फॉर्मूला, फिर परीक्षाओं में व्यापक कदाचार और अब मुखिया द्वारा बहाल अयोग्य शिक्षकों की वजह से बिहार की प्राइमरी, सेकेंडरी समेत पूरी शिक्षा व्यवस्था गर्त में चली गयी है । जिस बिहार की मेधा पर भारत को नाज़ था आज उस मेधा को बिहार में पुष्पित-पल्वित होने का अवसर ही नही मिल रहा । हायर एजुकेशन राजनीति और भ्रस्ट वाइस चांसलरों के भेंट चढ़ गई, बाद में वाइस चांसलर के ऊपर का पायदान भी दूषित हो गया, जब गंगोत्री ही दूषित हो जाये तो गंगा साफ कैसे रहे । खराब शिक्षा व्यवस्था से भविष्य के आन्तरिप्रेन्योर और स्टार्टअप फाउंडर्स की अपेक्षा करना कैसे संभव है ।

अनेको और वजहें है लेकिन मूल बात यहीं है कि बिहार की जनता जब तक औद्योगिकीकरण नही चाहेगी तब तक ये होगा नही, जो प्रदेश अपने #स्थानीय_उद्यमियों को सम्मान न दें, वहाँ बाहर से निवेश ज्यादा आएगा नही सिर्फ लोकल आबादी की खपत को स्थानीय स्तर पर पूरा करने के लिए कोई बिस्किट फैक्टरी लग जायेगी, कोई वाशिंग पॉवडर प्लांट, कोई छोटा सीमेंट कारखाना, उद्देश्य सिर्फ बाहर से लोकल खपत को मंगाने का माल भाड़ा बचाना होगा । बिहार ट्रेडिंग राज्य है, यहाँ ट्रेडर इंडस्ट्रीलिस्ट से ज्यादा कमाता है, यहाँ पढ़ाने वालो से ज्यादा डिग्री बेंचने वाले और दूसरे राज्यो में छात्रों का नामांकन कराने वाले एजेंटों/कंसल्टेंट का टर्नओवर है, और सबसे बड़ा मसला लोगो के दृष्टिकोण का है, उद्यमियों के प्रति व्यहवार का है ।

पलायन को अभी वरदान मानिए- कोशिश यही होनी चाहिये कि पलायन करने वाले श्रमिको को प्रशिक्षित किया जाए ताकि उनकी आमदनी बढ़े, जीवन स्तर बेहतर हो ।

मुख्यमंत्री हमेशा कहते थे कि बिहारी इतना मेधावी है कि अगर चांद पर भी वैकेंसी होगी तो बिहारी वहाँ अप्लाई करेंगे । मेरा सवाल था क्यो? जब महाराष्ट्र और आसाम में ग्रुप 4 की वैकेंसी के लिए आये बिहारी नौजवानों का विरोध हुआ तब मुझे यही लगा कि आखिर हमारे नौजवान चपरासी बनने बिहार से बाहर क्यो जाए? अगर बिहारी नौजवान, अफसर बनते है, उद्यमी बनते है, मैनेजर, प्रोग्रामर, डॉक्टर, साइंटिस्ट बनते है और किसी अन्य राज्य में कार्य करते है, उनका तो विरोध नही होता, कम वेतनमान के सरकारी जॉब पर स्थानीय गरीब यदि अपना हक़ चाहते है तो बुरा क्या, वो आखिर चपरासी बनने बिहार नही आते?

बिहार में #उच्चशिक्षा के लिए भी_पलायन होता है और पूरे देश में सबसे ज्यादा होता है । ये भी नही रुकेगा कोई रोकने की पॉलिसी नही वही समस्या है चाहे राजतंत्र के स्तर पर हो या जनता के स्तर पर, विस्तृत पोस्ट कभी और वैसे औद्योगिकरन कि एक बड़ी रीक़वाइरमेंट ट्रेंड मैनपॉवर के उपलब्धता भी होती है । जिसकी व्यवस्था बिहार में कभी हुई नही और जहाँ स्तरीय शिक्षण संस्थान होंगे उद्योग वही शुरू होते है, जैसे आईटी सेक्टर दक्षिण के राज्यो में बढ़ा क्योंकि तकनीकी संस्थानों की एक सपोर्ट चेन पहले से थी, उद्योगीकरण ने उस चेन को मजबूत कर दिया ।

पॉलिसी स्तर पर कितनी बाधा है, एक उदाहरण से समझे- कोटा में सबसे अधिक और बड़े कोचिंग वहाँ के औद्योगिक क्षेत्र में है यहां पाटलिपुत्र जैसे शहर के बीचों बीच स्थित औद्योगिक क्षेत्र में आप प्रदूषण वाला उद्योग लगा सकते है, पढ़ा नही सकते (हां सरकार वहाँ खुद आईआईटी खोले, इंजीनियरिंग कॉलेज, एटीडीसी ट्रेनिंग सेंटर, CA इंस्टीट्यूट खोल सकती है, लेकिन कोई निजी शैक्षणिक न्यास शिक्षण संस्थान नही खोल सकता, बाकी सत्ता से जोड़े है तो मॉल भी खोल ले । 8 साल पहले बिहटा में विवि स्थापना के लिए एमिटी और सिमेज ने सरकार से जमीन खरीदी, बाजार दर पर अलॉटमेंट हुआ, पेमेंट कर दिया गया, आजतक जमीन मिली नही, पैसा जमा है । अमेटी ने पूरे भारत मे अपना सबसे छोटा विवि बिहार में किराए के भवन में खोल दिया अब वो निश्चिंत है जब तक सरकार जमीन नही देगी उसका काम हो रहा है । वैसे ये पोस्ट मैंने किसी निजी अनुभवों को साझा करने के लिए नही लिखा परन्तु अनुभव से अधिक ऑथेंटिक सुनी बातें नही होती, इसलिए साझा कर रहा हूँ, वैसे इस दिशा में बीस वर्षों में हज़ारो निजी अनुभव है ।

याद है कोलकाता शहर में वो #हाथरिक्शा खींचने वाले, बड़ा बाजार में टोकरी पर बोझा ढोने वाले कुली लगभग सभी बिहार के थे और आज भी है । बिहार आज पूरे देश मे सुरक्षा गार्ड, रिक्शा-ठेला -ऑटो ड्राइवर, छोटे दुकान-फैक्टरी कर्मचारि और अन्य वर्कर्स/ एम्प्लोयी का सबसे बड़ा सप्लायर है । यही #बिहारकासबसेबड़ा_एक्सपोर्ट है और आमदनी का जरिया भी है । जरूरत ये है कि हम अपने प्रोडक्ट को कितना तैयार कर बाहर भेज रहे है, कितना एक्विप कर रहे है, कितना पॉलिश कर रहे है ताकि बाहर उसे अपनी प्रतिभा, मेधा और श्रम का उचित मूल्य मिले ।

आने वाला समय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का है, रोबोटिक्स का है, इंटरनेट ऑफ थिंग्स का है, बिग डेटा का है । ऐसे में जिन रोजगारों के लिए बिहार से श्रमिक बाहर जाते है वो आने वालों वर्षो में समाप्ति की ओर होंगे । अपनी श्रम शक्ति और मेधा को हमे भविष्य की इन चुनौतीयों के लिए तैयार करना होगा ।

इसलिए पलायन होगा- होने दीजिए, कोशिश यही होनी चाहिये कि पलायन के स्वरूप को बदला जाए ।

औद्योगिकरण के लिये अगर जनता और सरकार के मिज़ाज और व्यहवार में, नीति और नियत में परिवर्तन आ जाये तो सोने पर सुहागा होगा लेकिन ऐसा होगा नही यहां अभी जातिवाद के साथ साथ धर्म की राजनीति होगी ।

लेखक—नीरज अग्रवाल