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बदहाल बिहार का एक और सच शिक्षा के गुणवत में कही खड़ा नहीं उतर रहा है बिहार

बिहार से जुड़ी इन तीन तस्वीरों को गौर से देखिए पहली तस्वीर बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के अध्यक्ष आनंद किशोर की है इन्हें बिहार बोर्ड की परीक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार एवं नए प्रयोगों के कारण प्राइम मिनिस्टर्स अवार्ड फार एक्सीलेंस इन पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के लिए चयनित किया गया है। दूसरी तस्वीर पटना वीमेंस कॉलेज के बाहर एक ग्रेजुएट छात्रा प्रियंका गुप्ता द्वारा चाय बेचने की है। और तीसरी तस्वीर पटना के गंगा घाट पर हज़ारों की संख्या में रेलवे-एसएससी की परीक्षा के लिए पढ़ाई कर रहे छात्रों की है।हालांकि इस तरह की तस्वीरे आपको आरा और बक्सर के रेलवे स्टेशन पर भी दिख जाएगा जहां छात्र रेलवे स्टेशन के स्ट्रीट लाइट के नीचे छात्र पढ़ाई करते है ।

अब जरा इन तीनों तस्वीरों के सहारे बिहार को समझने की कोशिश करते हैं। पहली तस्वीर सरकार को स्कूल में पढ़ाई नहीं पढ़ाई होते हुए दिखनी चाहिए ,स्कूल और कांलेज में पढ़ाई हो या ना हो परीक्षा समय पर होते हुए दिखनी चाहिए ।
कोरोना काल में पढ़ाई पूरी तरह ठप रहा सीबीएसई ने तब तक परीक्षा की तिथि घोषित नहीं किया जब तक स्कूल कोर्स पूरा करने का लिखित आश्वासन बोर्ड को नहीं दिया अभी भी 10वीं और 12वीं की परीक्षा शुरु नहीं हुई है ,जिसको देखते हुए जेईई की परीक्षा की तिथि दूसरी बार बढ़ाई गयी है।

लेकिन बिहार बोर्ड का 10वीं और 12वीं के परीक्षा का रिजल्ट आये हुए एक माह होने जा रहा है ऐसा इसी बार नहीं हुआ है पिछली बार भी ऐसे ही बिना पढ़ाई किये हुए परीक्षा लिया गया था । 2016 से आनंद किशोर बिहार बोर्ड के अध्यक्ष है परीक्षा समय पर लेना इनकी उपलब्धि रही है लेकिन बात अगर शिक्षा में गुणवत्ता की करे तो ये बिफर पड़ते हैं, एक बार मैं ही यह सवाल कर दिया था कि आप पटना साइंस कांलेज के छात्र रहे हैं आपके साथ पढ़ने वाले टांप 10 छात्र कहां है, क्या कर रहे हैं एक को तो हमलोग देख ही रहे हैं शेष के बारे में आप जानते ही होगे, लेकिन आज आप जिस बोर्ड के अध्यक्ष हैं उसका टांपर कहां है, क्या कर रहा है ,पढ़ाई के मुकाम में कहां तक पहुंचा है,कोई जानकारी हो तो बताये इस सवाल पे ये गुस्से से लाल हो गये वैसे मुझसे इनकी बनती अच्छी है जब मिलते हैं उलझ ही जाते हैं इसलिए अब फोन से ही बात करना ये ज्यादा पसंद करते हैं पुरस्कार के लिए बधाई लेकिन सवाल तो बनता है इस तरह के पुरस्कार पाने के लिए चयन का आधार क्या है ।

बिहार में इस समय शिक्षा का बजट 38035.93 करोड़ रुपये का है इतनी बड़ी राशी खर्च करने के बावजूद बिहार शिक्षा के क्षेत्र मे कहां खड़ा है इस पर कभी ठंडे दिमाग से सोचिए हम बात आईआईटी ,नीट और यूपीएससी की नहीं कर रहे हैं इन परीक्षाओं में हाल तो यह है कि 2019 आते आते बिहार बोर्ड और बिहार के विश्वविधालय से पढ़ा छात्र गिनती के पांच दस पास कर रहे हैं।

बात बिहार की करे तो 2009 के बाद बिहार सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर बीपीएससी और बिहार पुलिस अवर सेवा आयोग द्वारा बिहार प्रशासनिक सेवा , बिहार पुलिस सेवा से लेकर सीओ .बीडीओ सहित राज्य सरकार के तमाम विभाग से जुड़े पदाधिकारियों का चयण किया है।

साथ ही बीपीएससी द्वारा बड़े स्तर पर प्रोफेसर की भी बहाली हुई है। 2009 के बाद जो दरोगा, की बहाली हुई है ,प्रोफेसर की बहाली हुई या फिर प्रशासनिक अधिकारियों की बहाली हुई है उस बहाली पर गौर करिएगा तो 2015 आते आते जो स्थिति पहले न्याययिक परीक्षा की होती थी जिसमें यूपी के बहुत सारे छात्र पास करते थे वैसे ही स्थिति बीपीएससी की भी हो गयी है 30 से 35 प्रतिशत छात्र यूपी,हरियाना ,उड़ीसा और झारखंड से आ रहे हैं। प्रोफेसर बहाली में तो राज्य सरकार पहले ही बिहार के विश्वविधालय से पीएचडी करने वाले या फिर बेट पास करने वाले छात्रों को परीक्षा के लिए योग्य माना ही नहीं था, 3300 मे गितनी के पचास भी नहीं हैं जिनकी पूरी पढ़ाई बिहार में हुई हो।

यही हाल बीपीएससी के परिणाम का भी है 64वीं और 65 वीं में मेरा भगीना पास किया है इस वजह से उसके बैंच के लड़कों से मिलने का मौका मिला,नवोदय विधालय ना होता तो समझिए बिहार में पढ़े छात्र किसी काम के नहीं रहता, गितनी के दो चार हैं जिसकी पढ़ाई बिहार के कांलेजों में हुई है जब इन छात्रों से मैं सवाल किया तो उनका कहना था बिहार की पहचान क्या रही है शिक्षा, दस वर्ष पहले तक बिहारी मतलब गणित और साइंस में मास्टर लेकिन आज बिहार की स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा राष्ट्रीय स्तर पर सबसे नीचे स्तर पर पहुंच गया है ।

पहले नोर्थ इस्ट के बच्चे कमजोर माने जाते थे अभी बिहारी बच्चों का हाल उससे भी बूरा है 64वीं बैंच का टांपर एमपी का है और पूरे बैच में बिहार के कांलेज से पढ़ा बच्चा दूर दूर तक दिखायी नहीं दे रहा है चयनित बच्चेअधिकांश इनजीनियरिंग बैग्रांउड के हैं उसमें भी बिहार के इंनजीनियरिग कांलेज से पढ़ा छात्र दो चार भी अभी तक ट्रेनिंग मेंं नहीं मिला है।बीपीएससी के 64वीं और 65 वीं बैच में हरियाणा की लड़की डीएसपी और एसडीओ बनी है उडीसा का कई छात्र है जो बीडीओ और सीओ बना है ,यूपी की तो बात ही छोड़िए ।

ऐसे में बिहार में पढ़े बच्चे प्रियंका गुप्ता की तरह चाय नहीं बेचेगा तो करेगा क्या और ये जो गंगा किनारे या फिर आरा बक्सर के रेलवे स्टेशन पर पढ़ते हुए बच्चों का जो भीड़ दिख रहा है उसे कौन समझाये की जिस स्तर का सवाल परीक्षा में पुछे जा रहे हैं उसकी पढ़ाई ही में कहां खड़ा है ये बच्चों का हाल प्रियंका के चाय बेचने से भी बूरा है पढ़ाई में फिसड्डी जी जान से मेहनक करके राष्ट्रीय लेवल पर पहुंच भी रहा है तो 10 वर्षो से बैंक ,रेलवे और एसएससी में नौकरी आधी से भी कम हो गयी वही भेकेन्सी कब निकलेगी इसका कोई पता नहीं है ये है बिहार का सच इसे देख कर आप मुस्कुरा
सकते हैं ।

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