झारखंड के देवघर स्थित विश्वप्रसिद्ध Baidyanath Temple में महाशिवरात्रि के पावन पर्व से पूर्व आस्था, परंपरा और वैदिक अनुष्ठानों का भव्य दृश्य देखने को मिला। रविवार को महाशिवरात्रि मनाई जानी है, लेकिन उससे एक दिन पहले शनिवार को मंदिर प्रांगण में वह विशेष धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न हुआ, जिसका इंतजार भक्त पूरे वर्ष करते हैं। बाबा बैद्यनाथ और मैया पार्वती मंदिरों के शिखरों पर स्थापित पंचशूलों को परंपरानुसार शुद्धिकरण, पूजन और पुनर्स्थापना की प्रक्रिया से गुजारा गया। इसके साथ ही बाबा और माता पार्वती के बीच पारंपरिक ‘गठबंधन’ की रस्म अदा की गई, जिसे इस धाम की अत्यंत प्राचीन और विशिष्ट परंपरा माना जाता है।
यह अनुष्ठान केवल धार्मिक क्रिया भर नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीकात्मक उत्सव है। देवघर धाम में महाशिवरात्रि से पूर्व पंचशूल उतारने, उनका पूजन करने और पुनः स्थापित करने की परंपरा सदियों से निभाई जा रही है। इस अवसर पर हजारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में उपस्थित रहे और पंचशूलों के दर्शन एवं स्पर्श कर स्वयं को धन्य महसूस किया।
पंचशूलों का महत्व और धार्मिक मान्यता
पंचशूल का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह त्रिशूल की ही एक विशेष संरचना मानी जाती है, जिसमें पाँच शूल होते हैं। शिव मंदिरों के शिखरों पर स्थापित पंचशूल दैवीय ऊर्जा, संरक्षण और आध्यात्मिक शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं। देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में यह परंपरा विशेष महत्व रखती है।
मान्यता है कि पंचशूल मंदिर और आसपास के क्षेत्र की नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करते हैं और भक्तों के जीवन में शुभता लाते हैं। इसी कारण महाशिवरात्रि से पूर्व इन पंचशूलों का विधिवत शुद्धिकरण और पुनर्पूजन अनिवार्य माना जाता है।
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शुद्धिकरण और पूजन
शनिवार को मंदिर के प्रधान पुजारी सह सरदार पंडा गुलाबनंद ओझा के नेतृत्व में षोडषोपचार विधि से पंचशूलों का पूजन सम्पन्न हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार, धूप-दीप, पुष्प, चंदन और पवित्र जल से इनका शुद्धिकरण किया गया।
यह पूजा केवल मुख्य मंदिर तक सीमित नहीं रही। बाबा बैद्यनाथ और मैया पार्वती मंदिर के अलावा मंदिर परिसर के अन्य 22 मंदिरों के शिखरों से उतारे गए पंचशूलों का भी सामूहिक पूजन किया गया। यह दृश्य अत्यंत भव्य और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण था।

शिखरों से उतारने की प्राचीन परंपरा
महाशिवरात्रि से एक या दो दिन पूर्व मंदिर परिसर के सभी मंदिरों के शिखरों से पंचशूलों को उतारने की परंपरा है। शुक्रवार को बाबा बैद्यनाथ और माता पार्वती मंदिर के शिखरों से पंचशूल उतारे गए थे, जबकि अन्य मंदिरों के पंचशूल पहले ही नीचे लाए जा चुके थे।
भंडारी परिवार की देखरेख में भंडारियों की टीम ने दोपहर के समय वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सावधानीपूर्वक पंचशूलों को शिखरों से उतारा। यह प्रक्रिया अत्यंत श्रद्धा और अनुशासन के साथ संपन्न की जाती है।
पंचशूलों का पारंपरिक मिलन
पंचशूलों के उतारने के बाद बाबा और पार्वती मंदिर के पंचशूलों का पारंपरिक मिलन कराया गया। यह मिलन शिव और शक्ति के दिव्य संगम का प्रतीक माना जाता है।
इस अनुष्ठान को देखने के लिए मंदिर परिसर में भारी भीड़ उमड़ पड़ी। श्रद्धालु इस पावन क्षण के साक्षी बनने के लिए घंटों पहले से कतार में खड़े थे। जब पंचशूलों का मिलन हुआ, तो “हर-हर महादेव” और “बोल बम” के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठा।
पुनर्स्थापना की वैदिक प्रक्रिया
विशेष पूजा के बाद सभी 22 मंदिरों के शिखरों पर पंचशूलों को पुनर्स्थापित किया गया। यह प्रक्रिया भी वैदिक विधि-विधान के अनुसार सम्पन्न हुई।
पंचशूलों को पुनः स्थापित करते समय मंत्रोच्चार, पूजा-अर्चना और आशीर्वचन का क्रम चला। मान्यता है कि पुनर्स्थापना के साथ मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा और अधिक सशक्त हो जाती है।
बाबा और मैया पार्वती का ‘गठबंधन’
पंचशूल पुनर्स्थापना के उपरांत बाबा बैद्यनाथ और मैया पार्वती मंदिर के बीच पारंपरिक ‘गठबंधन’ की रस्म अदा की गई। यह देवघर धाम की अत्यंत विशिष्ट और प्राचीन परंपरा है।
गठबंधन शिव और शक्ति के अविभाज्य संबंध का प्रतीक है। भक्त इसे अत्यंत शुभ मानते हैं और मान्यता है कि इस अवसर पर दर्शन करने से दांपत्य सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।
श्रद्धालुओं की भारी भीड़
पंचशूलों के दर्शन और स्पर्श के लिए हजारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में उमड़ पड़े। भक्तों ने मस्तक सटाकर पंचशूलों को नमन किया और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
मंदिर प्रशासन के अनुसार, इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु देवघर पहुंचे। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए विशेष सुरक्षा प्रबंध किए गए थे। कतारबद्ध दर्शन व्यवस्था लागू की गई और पुलिस बल तैनात रहा।

महाशिवरात्रि की चार प्रहर पूजा
मंदिर प्रशासन ने बताया कि महाशिवरात्रि की चार प्रहर की पूजा रात्रि में सम्पन्न होगी। तड़के सुबह 3:15 बजे मंदिर का पट खुलेगा। विशेष पूजा-अर्चना के बाद लगभग 4:25 बजे आम श्रद्धालुओं के लिए पट खोल दिए जाएंगे।
अनुमान है कि दो लाख से अधिक श्रद्धालु इस अवसर पर जलार्पण करेंगे। सुबह 4 बजे से 6 बजे तक जल चढ़ाने का विशेष क्रम चलेगा। इसके बाद अगले दिन सुबह 8 बजे पुनः पट खोलकर नियमित पूजा प्रारंभ होगी।
आस्था का महासागर
महाशिवरात्रि के अवसर पर देवघर धाम आस्था के महासागर में बदल जाता है। देश के विभिन्न राज्यों से शिवभक्त यहां पहुंचते हैं। “बोल बम” और “हर-हर महादेव” के जयकारों से पूरा शहर भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है।
पंचशूलों की पूजा और गठबंधन की रस्म ने इस आध्यात्मिक उत्सव की शुरुआत को और भी भव्य बना दिया है। श्रद्धालु इसे शुभ संकेत मानते हैं कि बाबा बैद्यनाथ और मैया पार्वती की कृपा पूरे वर्ष बनी रहेगी।
प्रशासनिक तैयारी
भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ने व्यापक तैयारी की है। सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाएं और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया गया है।
जलार्पण के लिए अलग-अलग कतारें बनाई गई हैं। महिला, वृद्ध और दिव्यांग श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्था की गई है।
सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत स्वरूप
देवघर में महाशिवरात्रि से पूर्व पंचशूल उतारने और पुनर्स्थापित करने की परंपरा सदियों से जीवंत है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।
हर वर्ष यह अनुष्ठान नई ऊर्जा और आस्था के साथ सम्पन्न होता है। पंचशूलों का स्पर्श कर भक्त अपने जीवन की बाधाओं को दूर करने और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।