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होली पर बड़ी सौगात: श्रीगंगानगर से समस्तीपुर के लिए स्पेशल ट्रेन 04731/04732 का ऐलान, जानिए पूरा शेड्यूल और स्टॉपेज

होली के त्योहार पर घर लौटने वाले यात्रियों के लिए भारतीय रेल ने बड़ी राहत दी है। राजस्थान से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश जाने वाले हजारों यात्रियों की सुविधा के लिए श्रीगंगानगर से समस्तीपुर के बीच साप्ताहिक होली स्पेशल ट्रेन चलाने की घोषणा की गई है। इस विशेष ट्रेन के संचालन से त्योहार के दौरान टिकटों की भारी मांग और वेटिंग की समस्या से जूझ रहे यात्रियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

04731: श्रीगंगानगर से समस्तीपुर होली स्पेशल

Indian Railways द्वारा घोषित ट्रेन संख्या 04731 श्रीगंगानगर जंक्शन से 1 मार्च से 29 मार्च तक प्रत्येक रविवार को चलाई जाएगी। यह ट्रेन दोपहर 1:25 बजे Shri Ganganagar Junction से रवाना होगी।

ट्रेन अगले दिन शाम 6:15 बजे Chhapra Junction पहुंचेगी। इसके बाद यह ट्रेन सोनपुर, हाजीपुर और मुजफ्फरपुर होते हुए रात 11:30 बजे Samastipur Junction पहुंचेगी।

प्रमुख स्टॉपेज

यह होली स्पेशल ट्रेन कई महत्वपूर्ण स्टेशनों पर रुकेगी, जिससे बड़ी संख्या में यात्रियों को सुविधा मिलेगी। प्रमुख ठहराव इस प्रकार हैं:

  • दिल्ली
  • गाजियाबाद
  • मुरादाबाद
  • बरेली
  • गोंडा
  • बस्ती
  • गोरखपुर
  • देवरिया सदर
  • सिवान

इन स्टेशनों पर रुकने से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश जाने वाले यात्रियों के लिए यह ट्रेन बेहद उपयोगी साबित होगी।

कोच संरचना: 20 डिब्बों के साथ चलेगी ट्रेन

त्योहार के दौरान बढ़ती भीड़ को देखते हुए ट्रेन में कुल 20 कोच लगाए जाएंगे। इनमें शामिल हैं:

  • 1 एसी 2-टियर कोच
  • 2 एसी 3-टियर कोच
  • 11 स्लीपर क्लास कोच
  • 4 जनरल सेकंड क्लास कोच
  • 2 एसएलआर/डी कोच

इस कोच संरचना से विभिन्न श्रेणी के यात्रियों को अपनी सुविधा और बजट के अनुसार यात्रा का विकल्प मिलेगा।

04732: वापसी यात्रा का शेड्यूल

वापसी में ट्रेन संख्या 04732 3 मार्च से 31 मार्च तक प्रत्येक मंगलवार को चलेगी। यह ट्रेन रात 1:00 बजे Samastipur Junction से रवाना होगी और अगले दिन दोपहर 12:20 बजे Shri Ganganagar Junction पहुंचेगी।

यात्रियों को मिलेगी बड़ी राहत

होली के मौके पर राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में लोग बिहार और पूर्वी यूपी अपने घर लौटते हैं। ऐसे में नियमित ट्रेनों में लंबी वेटिंग लिस्ट और कन्फर्म टिकट की परेशानी आम हो जाती है। इस विशेष ट्रेन के संचालन से यात्रियों को सुगम और आरामदायक यात्रा का विकल्प मिलेगा।

रेलवे अधिकारियों के अनुसार, यदि मांग और बढ़ती है तो अतिरिक्त कोच या अन्य स्पेशल ट्रेनों पर भी विचार किया जा सकता है। फिलहाल, इस होली स्पेशल ट्रेन के ऐलान से हजारों यात्रियों को राहत मिली है और वे त्योहार अपने परिवार के साथ आराम से मना सकेंगे।

त्योहार के इस अवसर पर रेलवे की यह पहल यात्रियों के लिए बड़ी सौगात साबित हो सकती है।

होली से पहले खुशखबरी: बिहार सरकार ने कर्मचारियों को अग्रिम वेतन देने का किया ऐलान, विपक्ष के आरोपों को दिया जवाब

होली के त्योहार से पहले बिहार के लाखों सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए बड़ी राहत की खबर आई है। Nitish Kumar के नेतृत्व वाली बिहार सरकार ने घोषणा की है कि राज्य कर्मचारियों का वेतन होली से पहले जारी कर दिया जाएगा। मंगलवार को वित्त मंत्री Bijendra Prasad Yadav ने इस फैसले की सार्वजनिक घोषणा की।

इस ऐलान के साथ ही राज्य की आर्थिक स्थिति को लेकर चल रही अटकलों पर भी विराम लग गया है। सरकार ने साफ किया है कि खजाना पूरी तरह सक्षम है और वेतन भुगतान में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं आएगी।


विपक्ष के आरोपों पर सरकार का जवाब

हाल के दिनों में Rashtriya Janata Dal (राजद) ने राज्य सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन का आरोप लगाया था। नेता प्रतिपक्ष Tejashwi Yadav ने दावा किया था कि सरकार जल्द ही कर्मचारियों को वेतन देने में असमर्थ हो सकती है और राज्य का खजाना खाली होने की कगार पर है।

हालांकि वित्त मंत्री ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया। उन्होंने कहा कि राज्य की वित्तीय स्थिति स्थिर है और कर्मचारियों के वेतन तथा पेंशन भुगतान में किसी तरह की कोई समस्या नहीं है। उन्होंने सभी विभागों को समय पर वेतन निर्गत करने के निर्देश भी दे दिए हैं।


कर्मचारियों और पेंशनरों को बड़ी राहत

सरकारी कर्मचारी संगठनों ने इस निर्णय का स्वागत किया है। होली जैसे बड़े त्योहार से पहले वेतन मिलना कर्मचारियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे वे अपने परिवार की जरूरतें पूरी कर सकेंगे, खरीदारी कर पाएंगे और यात्रा व उत्सव की तैयारियां बिना किसी आर्थिक चिंता के कर सकेंगे।

पेंशनरों को भी समय पर उनकी पेंशन मिलने से राहत मिलेगी। सरकार ने आश्वासन दिया है कि कोषागार स्तर पर सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं ताकि भुगतान प्रक्रिया सुचारू रूप से संपन्न हो सके।


बाजार में बढ़ेगी रौनक, स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा बल

होली के अवसर पर वेतन का समय पर भुगतान स्थानीय बाजार के लिए भी सकारात्मक संकेत है। त्योहार के दौरान कपड़े, मिठाई, रंग-गुलाल और अन्य वस्तुओं की मांग बढ़ती है। कर्मचारियों के खातों में वेतन आने से बाजार में नकदी प्रवाह बढ़ेगा, जिससे व्यापारियों को लाभ होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राज्य की अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी। अधिक खरीदारी से बिक्री और राजस्व में वृद्धि होगी, जिसका सकारात्मक प्रभाव पूरे आर्थिक तंत्र पर पड़ेगा।


सरकार ने दोहराई प्रतिबद्धता

वित्त मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार अपने कर्मचारियों के हितों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है और त्योहार के दौरान उन्हें किसी भी प्रकार की वित्तीय परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि बिहार की आर्थिक स्थिति मजबूत है और सभी दायित्व समय पर पूरे किए जाएंगे।

कुल मिलाकर, होली से पहले वेतन भुगतान का यह फैसला कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए बड़ी राहत साबित होगा। साथ ही, यह कदम सरकार की वित्तीय प्रबंधन क्षमता और कर्मचारी कल्याण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।

देवघर के बाबा बैद्यनाथ मंदिर में पंचशूलों की विशेष पूजा, शिखरों पर पुनर्स्थापना के साथ बाबा-पार्वती का पारंपरिक गठबंधन सम्पन्न

झारखंड के देवघर स्थित विश्वप्रसिद्ध Baidyanath Temple में महाशिवरात्रि के पावन पर्व से पूर्व आस्था, परंपरा और वैदिक अनुष्ठानों का भव्य दृश्य देखने को मिला। रविवार को महाशिवरात्रि मनाई जानी है, लेकिन उससे एक दिन पहले शनिवार को मंदिर प्रांगण में वह विशेष धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न हुआ, जिसका इंतजार भक्त पूरे वर्ष करते हैं। बाबा बैद्यनाथ और मैया पार्वती मंदिरों के शिखरों पर स्थापित पंचशूलों को परंपरानुसार शुद्धिकरण, पूजन और पुनर्स्थापना की प्रक्रिया से गुजारा गया। इसके साथ ही बाबा और माता पार्वती के बीच पारंपरिक ‘गठबंधन’ की रस्म अदा की गई, जिसे इस धाम की अत्यंत प्राचीन और विशिष्ट परंपरा माना जाता है।

यह अनुष्ठान केवल धार्मिक क्रिया भर नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीकात्मक उत्सव है। देवघर धाम में महाशिवरात्रि से पूर्व पंचशूल उतारने, उनका पूजन करने और पुनः स्थापित करने की परंपरा सदियों से निभाई जा रही है। इस अवसर पर हजारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में उपस्थित रहे और पंचशूलों के दर्शन एवं स्पर्श कर स्वयं को धन्य महसूस किया।

पंचशूलों का महत्व और धार्मिक मान्यता

पंचशूल का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह त्रिशूल की ही एक विशेष संरचना मानी जाती है, जिसमें पाँच शूल होते हैं। शिव मंदिरों के शिखरों पर स्थापित पंचशूल दैवीय ऊर्जा, संरक्षण और आध्यात्मिक शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं। देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में यह परंपरा विशेष महत्व रखती है।

मान्यता है कि पंचशूल मंदिर और आसपास के क्षेत्र की नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करते हैं और भक्तों के जीवन में शुभता लाते हैं। इसी कारण महाशिवरात्रि से पूर्व इन पंचशूलों का विधिवत शुद्धिकरण और पुनर्पूजन अनिवार्य माना जाता है।

वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शुद्धिकरण और पूजन

शनिवार को मंदिर के प्रधान पुजारी सह सरदार पंडा गुलाबनंद ओझा के नेतृत्व में षोडषोपचार विधि से पंचशूलों का पूजन सम्पन्न हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार, धूप-दीप, पुष्प, चंदन और पवित्र जल से इनका शुद्धिकरण किया गया।

यह पूजा केवल मुख्य मंदिर तक सीमित नहीं रही। बाबा बैद्यनाथ और मैया पार्वती मंदिर के अलावा मंदिर परिसर के अन्य 22 मंदिरों के शिखरों से उतारे गए पंचशूलों का भी सामूहिक पूजन किया गया। यह दृश्य अत्यंत भव्य और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण था।

शिखरों से उतारने की प्राचीन परंपरा

महाशिवरात्रि से एक या दो दिन पूर्व मंदिर परिसर के सभी मंदिरों के शिखरों से पंचशूलों को उतारने की परंपरा है। शुक्रवार को बाबा बैद्यनाथ और माता पार्वती मंदिर के शिखरों से पंचशूल उतारे गए थे, जबकि अन्य मंदिरों के पंचशूल पहले ही नीचे लाए जा चुके थे।

भंडारी परिवार की देखरेख में भंडारियों की टीम ने दोपहर के समय वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सावधानीपूर्वक पंचशूलों को शिखरों से उतारा। यह प्रक्रिया अत्यंत श्रद्धा और अनुशासन के साथ संपन्न की जाती है।

पंचशूलों का पारंपरिक मिलन

पंचशूलों के उतारने के बाद बाबा और पार्वती मंदिर के पंचशूलों का पारंपरिक मिलन कराया गया। यह मिलन शिव और शक्ति के दिव्य संगम का प्रतीक माना जाता है।

इस अनुष्ठान को देखने के लिए मंदिर परिसर में भारी भीड़ उमड़ पड़ी। श्रद्धालु इस पावन क्षण के साक्षी बनने के लिए घंटों पहले से कतार में खड़े थे। जब पंचशूलों का मिलन हुआ, तो “हर-हर महादेव” और “बोल बम” के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठा।

पुनर्स्थापना की वैदिक प्रक्रिया

विशेष पूजा के बाद सभी 22 मंदिरों के शिखरों पर पंचशूलों को पुनर्स्थापित किया गया। यह प्रक्रिया भी वैदिक विधि-विधान के अनुसार सम्पन्न हुई।

पंचशूलों को पुनः स्थापित करते समय मंत्रोच्चार, पूजा-अर्चना और आशीर्वचन का क्रम चला। मान्यता है कि पुनर्स्थापना के साथ मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा और अधिक सशक्त हो जाती है।

बाबा और मैया पार्वती का ‘गठबंधन’

पंचशूल पुनर्स्थापना के उपरांत बाबा बैद्यनाथ और मैया पार्वती मंदिर के बीच पारंपरिक ‘गठबंधन’ की रस्म अदा की गई। यह देवघर धाम की अत्यंत विशिष्ट और प्राचीन परंपरा है।

गठबंधन शिव और शक्ति के अविभाज्य संबंध का प्रतीक है। भक्त इसे अत्यंत शुभ मानते हैं और मान्यता है कि इस अवसर पर दर्शन करने से दांपत्य सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।

श्रद्धालुओं की भारी भीड़

पंचशूलों के दर्शन और स्पर्श के लिए हजारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में उमड़ पड़े। भक्तों ने मस्तक सटाकर पंचशूलों को नमन किया और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।

मंदिर प्रशासन के अनुसार, इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु देवघर पहुंचे। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए विशेष सुरक्षा प्रबंध किए गए थे। कतारबद्ध दर्शन व्यवस्था लागू की गई और पुलिस बल तैनात रहा।

महाशिवरात्रि की चार प्रहर पूजा

मंदिर प्रशासन ने बताया कि महाशिवरात्रि की चार प्रहर की पूजा रात्रि में सम्पन्न होगी। तड़के सुबह 3:15 बजे मंदिर का पट खुलेगा। विशेष पूजा-अर्चना के बाद लगभग 4:25 बजे आम श्रद्धालुओं के लिए पट खोल दिए जाएंगे।

अनुमान है कि दो लाख से अधिक श्रद्धालु इस अवसर पर जलार्पण करेंगे। सुबह 4 बजे से 6 बजे तक जल चढ़ाने का विशेष क्रम चलेगा। इसके बाद अगले दिन सुबह 8 बजे पुनः पट खोलकर नियमित पूजा प्रारंभ होगी।

आस्था का महासागर

महाशिवरात्रि के अवसर पर देवघर धाम आस्था के महासागर में बदल जाता है। देश के विभिन्न राज्यों से शिवभक्त यहां पहुंचते हैं। “बोल बम” और “हर-हर महादेव” के जयकारों से पूरा शहर भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है।

पंचशूलों की पूजा और गठबंधन की रस्म ने इस आध्यात्मिक उत्सव की शुरुआत को और भी भव्य बना दिया है। श्रद्धालु इसे शुभ संकेत मानते हैं कि बाबा बैद्यनाथ और मैया पार्वती की कृपा पूरे वर्ष बनी रहेगी।

प्रशासनिक तैयारी

भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ने व्यापक तैयारी की है। सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाएं और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया गया है।

जलार्पण के लिए अलग-अलग कतारें बनाई गई हैं। महिला, वृद्ध और दिव्यांग श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्था की गई है।

सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत स्वरूप

देवघर में महाशिवरात्रि से पूर्व पंचशूल उतारने और पुनर्स्थापित करने की परंपरा सदियों से जीवंत है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।

हर वर्ष यह अनुष्ठान नई ऊर्जा और आस्था के साथ सम्पन्न होता है। पंचशूलों का स्पर्श कर भक्त अपने जीवन की बाधाओं को दूर करने और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

होली पर घर जाना हुआ आसान: दिल्ली-कोलकाता से बिहार के लिए 26 स्पेशल ट्रेनें

नई दिल्ली: होली के मद्देनजर यात्रियों की भारी भीड़ को संभालने के लिए Indian Railways ने बड़ा फैसला लिया है। East Central Railway ने दिल्ली और कोलकाता रूट से बिहार के विभिन्न शहरों के लिए 13 जोड़ी यानी कुल 26 होली स्पेशल ट्रेनों की समय-सारणी जारी की है।

इस फैसले से त्योहार पर घर लौटने वाले लाखों यात्रियों को कन्फर्म टिकट मिलने की संभावना बढ़ेगी और यात्रा अधिक सुगम हो सकेगी।

नई दिल्ली और आनंद विहार से स्पेशल ट्रेनें

रेलवे ने Anand Vihar Terminal और New Delhi Railway Station से बिहार के प्रमुख शहरों के लिए विशेष गाड़ियां चलाने की घोषणा की है।

प्रमुख ट्रेनें और तिथियां:

  • 04070 आनंद विहार–शेखपुरा: 20, 24, 27 फरवरी और 03, 06 मार्च
    वापसी: 04069 शेखपुरा–आनंद विहार समान तिथियों पर
  • 04054 नई दिल्ली–बरौनी: 20 फरवरी से 06 मार्च
    वापसी: 04053 बरौनी–नई दिल्ली 22 फरवरी से 08 मार्च
  • 04060 नई दिल्ली–सुपौल: 20 फरवरी से 06 मार्च
    वापसी: 04059 सुपौल–नई दिल्ली 22 फरवरी से 08 मार्च
  • 04010 दिल्ली–सीतामढ़ी: 26 फरवरी, 05 मार्च
    वापसी: 04009 सीतामढ़ी–दिल्ली 27 फरवरी, 06 मार्च
  • 04014 आनंद विहार–लौकहा बाजार: 27 फरवरी, 06 मार्च
    वापसी: 04013 लौकहा बाजार–आनंद विहार 28 फरवरी, 07 मार्च
  • 04066 आनंद विहार–खोरधा रोड जं.: 27 फरवरी से 03 मार्च
    वापसी: 04065 खोरधा रोड जं.–आनंद विहार 28 फरवरी से 04 मार्च

रेलवे अधिकारियों के अनुसार, मांग बढ़ने पर अतिरिक्त स्पेशल ट्रेनों की घोषणा भी की जा सकती है।

कोलकाता और हावड़ा से भी विशेष इंतजाम

पश्चिम बंगाल में रहने वाले बिहारियों के लिए भी खास व्यवस्था की गई है। Howrah Junction railway station, Sealdah railway station और Kolkata से रक्सौल, मधुबनी और अन्य स्टेशनों के लिए विशेष ट्रेनें चलाई जाएंगी।

प्रमुख ट्रेनें:

  • 03043 हावड़ा–रक्सौल: 28 फरवरी, 07 एवं 14 मार्च
    वापसी: 03044 रक्सौल–हावड़ा 01, 08 एवं 15 मार्च
  • 03045 हावड़ा–रक्सौल: 01, 02 मार्च
    वापसी: 03046 रक्सौल–हावड़ा 02, 03 मार्च
  • 03183 सियालदह–मधुबनी: 28 फरवरी, 07 मार्च
    वापसी: 03184 मधुबनी–सियालदह 01, 08 मार्च
  • 03185 कोलकाता–मधुबनी: 27 फरवरी
    वापसी: 03186 मधुबनी–लौकहा बाजार 27 फरवरी, 06 मार्च
  • 08753 दुर्ग–मधुबनी: 01 मार्च
    वापसी: 08754 मधुबनी–दुर्ग 02 मार्च
  • 03007 हावड़ा–खातीपुरा (जयपुर): 25 फरवरी, 11 मार्च
    वापसी: 03008 खातीपुरा–हावड़ा 27 फरवरी, 13 मार्च

क्लोन हमसफर एक्सप्रेस के फेरों में विस्तार

जयनगर और अमृतसर के बीच चलने वाली लोकप्रिय हमसफर क्लोन एक्सप्रेस (04651/04652) की परिचालन अवधि भी बढ़ा दी गई है। अब यह ट्रेन 1 मार्च से 31 मार्च तक चलेगी। इससे लंबी दूरी के यात्रियों को अतिरिक्त विकल्प मिलेगा और भीड़ का दबाव कम होगा।

टिकट बुकिंग और सुविधाएं

इन स्पेशल ट्रेनों में स्लीपर और एसी कोच दोनों की व्यवस्था की गई है। यात्री टिकट की बुकिंग IRCTC की आधिकारिक वेबसाइट या मोबाइल ऐप के माध्यम से कर सकते हैं।

रेलवे का कहना है कि जरूरत पड़ने पर और भी स्पेशल ट्रेनें चलाई जाएंगी। इस पहल से खासकर प्रवासी मजदूरों, छात्रों और नौकरीपेशा लोगों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

होली के इस खास मौके पर रेलवे की यह पहल बिहार के यात्रियों के लिए बड़ी सौगात साबित हो सकती है।

मुस्लिम कर्मचारियों को बिहार सरकार का तोहफा: रमज़ान के महीने में निर्धारित समय से एक घंटे पहले ऑफिस आ-जा सकेंगे

पटना । बिहार सरकार ने रमजान के महीने में मुस्लिम कर्मचारियों को निर्धारित समय से एक घंटे पहले कार्यालय आने और निर्धारित समय से एक घंटे पहले कार्यालय छोड़ने की अनुमति दे दी है। 

बिहार सरकार द्वारा शुक्रवार (17 मार्च 2023) को जारी नोटिफिकेशन में कहा गया है कि सरकार का यह आदेश हर साल रमजान के महीने में स्थायी तौर पर लागू रहेगा।

इस आदेश को बिहार सरकार के प्रधान सचिव की ओर से सभी विभागों, उनके अध्यक्षों, डीजीपी, जिले के अधिकारियों और अन्य अहम अधिकारियों को भेजा गया है। 

नीतीश सरकार के फैसले का RJD ने स्वागत किया है । सरकार के इस निर्णय को सत्ताधारी पार्टी JDU और RJD ने धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करने वाला बताया। इस कदम से देश की गंगा-जमुनी तहजीब और मजबूत होगी। 

वहीं, विपक्षी दल भाजपा ने तंज कसा है। सरकार के इस फैसले पर भाजपा ने कहा कि नीतीश कुमार ने नवरात्रि के दौरान हिंदुओं के लिए ऐसा कोई सुविधा नहीं दी गई।

महापर्व छठ पूजा की देशभर में धूम; कौन है छठी मैया,क्या महत्व है छठ पूजा का, पढ़ें पूरी कहानी

लोगों में एक आम जिज्ञासा यह रही है कि सूर्य की उपासना के इस महापर्व में सूर्य के साथ जिन छठी मैया की अथाह शक्तियों के गीत गाए जाते हैं, वे कौन हैं। ज्यादातर लोग इन्हें शास्त्र की नहीं, लोक कल्पना की उपज मानते हैं। लेकिन हमारे पुराणों में यत्र-तत्र इन देवी के संकेत जरूर खोजे जा सकते हैं।

एक पौराणिक कथा के अनुसार सूर्य और षष्ठी या छठी का संबंध भाई और बहन का है। षष्ठी एक मातृका शक्ति हैं जिनकी पहली पूजा स्वयं सूर्य ने की थी। ‘मार्कण्डेय पुराण’ के अनुसार प्रकृति ने अपनी शक्तियों को कई-कई अंशों में विभाजित कर रखा है। प्रकृति के छठे अंश को ‘देवसेना’ कहा गया है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इनका एक नाम षष्ठी भी है। देवसेना या षष्ठी श्रेष्ठ मातृका और समस्त लोकों के बालकों की रक्षिका हैं।

इनका एक नाम कात्यायनी भी है जिनकी पूजा नवरात्रि की षष्ठी तिथि को होती है। पुराणों में निःसंतान राजा प्रियंवद द्वारा देवी षष्ठी का व्रत करने की कथा है। छठी षष्ठी का अपभ्रंश हो सकता है। आज भी छठव्रती छठी मैया से अपनी संतानों के लंबे जीवन, आरोग्य और सुख-समृद्धि का वरदान मांगते हैं। शिशु के जन्म के छह दिनों बाद इन्हीं षष्ठी या छठी देवी की पूजा का आयोजन होता है जिसे छठी या छठिहार कहते हैं।

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छठी मैया की इस परिकल्पना की एक आध्यात्मिक पृष्ठभूमि भी हो सकती है। अध्यात्म के अनुसार सूर्य की सात किरणों का मानव जीवन पर अलग – अलग प्रभाव पड़ता है। सूर्य की छठी किरण को आरोग्य और भक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला माना गया है। संभव है कि सूर्य की इस छठी किरण का प्रवेश अध्यात्म से लोकजीवन में छठी मैया के रूप में हुआ हो।

Chhath Puja: खरना के साथ ही शुरू हुआ 36 घंटे का निर्जला उपवास, परसो अर्घ्य के साथ समाप्त होगा लोक आस्था का पर्व

लोक आस्था का महापर्व छठ पूजा के खरना के मौके पर विभिन्न घाटों के साथ ही घरों पर छठ व्रतियों ने पूरी आस्था और विश्वास के साथ भगवान भास्कर का प्रसाद तैयार किया।

इस मौके पर छठ व्रतियों ने पूरी श्रद्धा भक्ति के साथ गंगाजल में अरवा चावल और गुड़ से बने खीर और रोटी तैयार कर छठी मैया और भगवान भास्कर को भोग लगाया। बाद में छठ व्रतियों ने प्रसाद ग्रहण किया। इस तरह से छठ व्रतियों का 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो गया।

छठ पूजा के तीसरे दिन यानी कल छठ व्रती अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य प्रदान करेंगे, वही महापर्व के चौथे और अंतिम दिन छठ व्रती उदयगामी सूर्य को अर्ध प्रदान करेंगे।

सभी मनोकामनाओं की पूर्ति को लेकर किए जाने वाले छठ महापर्व को लेकर श्रद्धालुओं की श्रद्धा भक्ति देखते ही बन रही है। इस मौके पर छठ व्रतियों का कहना था कि सच्चे हृदय से मांगी गई सभी मनो कामनाएं छठी मैया और भगवान भास्कर पूरी करते हैं।

मुजफ्फरपुर के शहीद खुदीराम बोस केंद्रीय कारा में बंदी कर रहें छठ पूजा

मुजफ्फरपुर। शहीद खुदीराम बोस केंद्रीय कारा में बंदी कर रहें छठ पूजा । 100 महिला बंदी और 85 पुरुष बंदियों ने की खरना पूजा।

जेल प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराई पूजा की सारी सामाग्री। पुरुष व्रती को धोती, गंजी और गमछा, वहीं महिला व्रतियों को भी दी गई साड़ी।

साथ ही बच्चों को भी जेल प्रशासन द्वारा दिया गया वस्त्र । जेल में छठ घाट को भी सजाया गया ।

धनतेरस के मौके पर बिहार के बाजारों में धन वर्षा, जमकर हो रही खरीदारी

धनतेरस के मौके पर बिहार के बाजारों की रौनक देखते ही बनी। बात चाहे स्वर्ण आभूषण दुकान की हो, बर्तन के दुकान की हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक्स दुकानों की, खरीदार जमकर इनकी खरीदारी करते नजर आए।

धनतेरस को लेकर माँ लक्ष्मी और गणेश की प्रतिमाओं की भी खूब बिक्री हुई, वही लावा, फरही और चीनी मिठाई की दुकानों पर भी खरीदारों की भारी भीड़ देखी गई। सजावट के सामानों और मिट्टी से बने दीयो की भी खूब बिक्री हुई।

2 साल के कोरोना काल के बाद मनाए जा रहे दीपावली को लेकर बाजारों में खासी चहल-पहल देखी गई। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक धनतेरस के दिन खरीदारी करने का विशेष महत्व है। खासकर धातु से बने सामानों की खरीदारी और मिट्टी से बने लक्ष्मी गणेश की प्रतिमा विशेष महत्व रखती है।

आज के दिन धन की देवी महालक्ष्मी और कुबेर की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। पौराणिक मान्यता यह भी है कि आज के दिन धातु की खरीदारी करने और लक्ष्मी और गणेश की विशेष पूजा अर्चना करने से दरिद्रता का नाश होता है और घर में लक्ष्मी का आगमन होता है।

CM के बाद डिप्टी सीएम पहुंचे मां के दरबार, ऐतिहासिक शीतला मंदिर में की पूजा

पटना । महा अष्टमी के मौके पर उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने आज देर शाम पटना सिटी का दौरा कर अगमकुआं स्थित ऐतिहासिक शीतला माता मंदिर पहुंचकर मां शीतला की विशेष पूजा अर्चना की।

इस मौके पर तेजस्वी यादव ने प्रदेश की खुशहाली के लिए मां से दुआएं भी मांगी। इस मौके पर तेजस्वी यादव ने बताया कि इस मंदिर से उनका पुराना रिश्ता रहा है। उन्होंने बताया कि वह बचपन से ही इस मंदिर में आते रहे हैं।

तेजस्वी यादव का कहना था कि दुर्गा पूजा के मौके पर वह मां के दरबार पहुंच कर उनसे आशीर्वाद लेने आए हैं।

बता दें कि इससे पहले सुबह सीएम नीतीश कुमार मां गौरी की पूजा को निकले थे उन्होंने पटना सिटी के कई मंदिरों का दौरा किया था और पूजा की थी उनके साथ कई नेता और अधिकारी भी मौजूद थे।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहुंचे हाजीगंज, ऐतिहासिक छोटी पटन देवी मंदिर पहुंच महाअष्टमी के मौके पर मां की विशेष पूजा अर्चना की

पटना सिटी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहुंचे हाजीगंज, ऐतिहासिक छोटी पटन देवी मंदिर पहुंचे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, महा अष्टमी के मौके पर मां की विशेष पूजा अर्चना की, मुख्यमंत्री ने मां की उतारी आरती, प्रदेश की खुशहाली के लिए मांगी दुआएं।

मां गौरी की पूजा करने निकले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, साथ में मंत्री विजय चौधरी भी मौजूद

पटना । महा अष्टमी के मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आज पटना सिटी का दौरा कर अगमकुंआ स्थित ऐतिहासिक शीतला माता मंदिर पहुंचकर मां शीतला की विशेष पूजा अर्चना की। इस मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ मां के चरणों में अपना शीश नमन कर प्रदेश की खुशहाली के लिए दुआएं मांगी।

मुख्यमंत्री ने पूरे निष्ठा भाव से जहां मां की आरती उतारी, वही मां के दरबार में नारियल भी फोड़ा। इस मौके पर मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों को दुर्गा पूजा की शुभकामनाएं भी दी। इस अवसर पर वाणिज्य एवं संसदीय कार्य मंत्री मंत्री विजय चौधरी भी मौजूद थे।

बाद में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पटना सिटी का दौरा कर गायघाट स्थित ऐतिहासिक शक्तिपीठ बड़ी पटन देवी मंदिर पहुंचकर मां दुर्गा की विशेष पूजा अर्चना की। इस मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ मां दुर्गा के चरणों में अपना शीश नमन कर प्रदेश की खुशहाली के लिए दुआएं मांगी। मुख्यमंत्री ने पूरे निष्ठा भाव से मां की आरती भी उतारी।

इस मौके पर मंदिर के महंत ने मुख्यमंत्री को मां की चुनरी भेंट की, वहीं उन्हें मां का प्रसाद भी खिलाया। इस मौके पर वाणिज्य एवं संसदीय कार्य मंत्री विजय कुमार चौधरी के अलावे एनएचएआई के डायरेक्टर चंचल कुमार भी मौजूद थे।

दो साल बाद काको में सूफी महोत्सव का आयोजन, पर्यटन विभाग ने निदेशक ने किया उदघाटन

अपनी दुआओं के असर के लिए विख्यात काको स्थित हजरत बीबी कमाल की दरगाह पर चादरपोशी कर सूफी महोत्सव का उद्घाटन पर्यटन विभाग के निदेशक कँवल कुंज, सांसद चंदेश्वर चंद्रवंशी विधायक सतीश दास ,रामबली सिंह यादव,सुदय यादव जिलाधिकारी रिची पांडेय,एस पी दीपक रंजन ने संयुक्त रूप से किया ।

बता दें कोरोना प्रतिबंधों के कारण यह महोत्सव दो वर्षों से स्थगित था इस मौके पर हजरत बीबी कमाल के मजार की महत्वता पर प्रकाश डालते हुए पर्यटन विभाग के निदेशक ने कहा के बिहार के ऐतिहासिक पुरातात्विक धर्मिक और साम्प्रदायिक सद्भाव केन्द्रों में से एक है। यह मकबरा बीबी कमाल तुगलक वंश के शासनकाल में एक सूफी संत महिला थी जिन्हे फ़िरोज़ शाह तुगलक ने महान साध्वी के तौर पर अलंकृत किया था।

जिला प्रशासन हजरत बीबी कमाल के मकबरे को विकसित करने के लिए दृढ़ संकल्पित है और इस दिशा में सरकार द्वारा कई कदम उठाये गये हैं।

सरकार ने इसे सूफी सर्किट से जोड़कर पर्यटन के नक्शे पर लाया है. और इसे पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने की एक बड़ी योजना बनाई है।

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चादरपोशी में डी डी सी परितोष कुमार, एस डी एम मनोज कुमार, एस डी पी ओ अशोक कुमार पांडेय सहित कई अधिकारीयों के साथ शिक्षाविद शकील अहमद काकवी, मुज़म्मिल इमाम, सज्जाद आलम रहमानी विनय कुमार विद्यार्थी फहदुल हक, अरशद इमाम, ताबिश निशात सहित सैकड़ों की संख्या में स्थानीय लोग मौजूद रहे।

पितृपक्ष मेला की तैयारियों का सीएम नीतीश कुमार ने लिया जायजा, अधिकारियों को दिए अहम निर्देश

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि पितृपक्ष मेला में देश-विदेश के श्रद्धालु आते हैं। मेला शुरू होने से पहले सभी विभागीय पदाधिकारी अपने-अपने विभागों की समीक्षा कर व्यवस्था को दुरुस्त कर लें। किसी भी पिंडदानियों को गया की पावन भूमि पर असुविधा नहीं होनी चाहिए।

उक्त बातें सोमवार को गया के समाहरणालय में पितृपक्ष मेला की समीक्षा बैठक में सीएम ने कहीं। गया एयरपोर्ट पर पहुंचने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विष्णुपद मंदिर पहुंचे. विष्णुपद पहुंचकर सीएम ने विष्णु चरण की पूजा की. इसके बाद वे बिहार के गया में बने पहले रबर डैम का निरीक्षण करने पहुंचे. रबड़ डैम का काम देख सीएम काफी प्रफुल्लित नजर आए।

नीतीश कुमार ने ने रबर डैम का किया निरीक्षण

सीएम नीतीश ने रबर डैम का किया निरीक्षण: वहीं उन्होंने इसके संबंध में अधिकारियों से जानकारी भी ली. गौरतलब हो कि गया के विष्णुपद स्थित फल्गु नदी पर रबर डैम बनाया गया है, जिसमें 3 फीट तक पानी उपलब्ध रहेगा. सलिला मानी जाने वाली फल्गु नदी में इस बार 3 फीट तक पानी की उपलब्धता के बीच पिंडदान तर्पण श्रद्धालु कर सकेंगे।

9 सितंबर से पितृपक्ष मेला की शुरुआत: महागठबंधन की सरकार बनने के बाद यह पहली बैठक है, जिसमें कई विभागों के मंत्री और आला अधिकारी शामिल हैं. यह बैठक पटना से बाहर हो रही है. पितृपक्ष मेले की तैयारी की रिपोर्ट लेने के बाद मुख्यमंत्री दिशा निर्देश भी देंगे. 9 सितंबर को पितृपक्ष मेला 2022 की शुरुआत होगी. इसको लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज गया में उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक करेंगे।

इस बैठक में कला संस्कृति और युवा विभाग, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग, पर्यटन विभाग, जल संसाधन विभाग सहित कई विभागों के मंत्री और अधिकारी मौजूद रहेंगे. वहीं सीएम ने रबर डैम का भी निरीक्षण किया. श्रद्धालुओं के लिए पहली बार रबर डैम का निर्माण किया गया है, जिससे मंदिर के पास नदी का पानी श्रद्धालुओं को आसानी से मिल सकेगा।

पितृ पक्ष मैं क्यों करते हैं पिंडदान?

हिंदू धर्म में व्यक्ति के मृत्यु के पश्चात उसे पितृ की संज्ञा दी जाती है. मान्यता अनुसार मृतक का श्राद्ध या तर्पण न करने से पितरों की आत्मा को शांति नहीं मिलती है, जिससे घर में पितृ दोष लगता है और घर पर कई तरह की समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

वहीं जिनके घर के पितृ प्रसन्न रहते हैं उनके घर कभी कोई मुसीबत नहीं आती है. ऐसे में पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए आश्विन माह में 15 दिन का पितृ पक्ष समर्पित होता है, इस बीच पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्राद्ध किया जाता है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर जहानाबाद में भी उत्साह, पहली बार निकाली गई शोभा यात्रा

शहर के दक्षिणी दौलतपुर स्थित राधे कृष्ण मंदिर से भगवान श्री कृष्ण की भव्य शोभायात्रा निकाली गई. जो अरवल मोड़ होते हुए काको मोड़ पहुंची और फिर काको मोड़ से यात्रा में शामिल लोग वापस हो गए।

इस शोभायात्रा में बड़ी संख्या में शहर के लोगों के साथ श्रद्धालु शामिल हुए. आयोजक ने बताया कि अचानक दिल में यह ख्याल आया कि प्रभु श्री कृष्ण की यात्रा कृष्णाष्टमी पर निकाली जाए। अपने मन की बात को लेकर आयोजक मुन्ना केसरी थाने पहुंचे और थाने ने शोभायात्रा निकालने की अनुमति दे दी।

लोगों ने बताया कि छोटी मोट शोभायात्रा शहर में निकाली जाती थी । लेकिन कोरोना काल के चलते समाज की ओर से प्रतिवर्ष निकाली जाने वाली श्री कृष्ण की शोभायात्रा नहीं निकाली गई थी. इस बार पाबंदी हटने के बाद भव्य रुप से शोभायात्रा निकाली गई. जिसमें शहर के लोग जुड़ते चले गए।

शोभायात्रा में सबसे आगे केसरिया ध्वज लिए लोग चल रहे थे. इसके बाद ढोल की थाप पर युवा नाचते हुए चल रहे थे. शोभायात्रा में भगवान श्रीकृष्ण की मनमोहक झांकी भी शामिल थी, जिस पर लोगों ने रास्ते में जगह-जगह पुष्प वर्षा कर अभिनंदन किया. शोभा यात्रा को लेकर महिलाओं में भी खासा उत्साह नजर आया. बड़ी संख्या में महिलाएं और युवतियां डीजे की धुन पर नाचती हुई चल रही थी. और लोगों की सहूलियत के लिए जहानाबाद नगर थाने की टीम भी साथ साथ चलती नजर आआई।

बाबा सिद्ध नाथ के दरबार में जुटा श्रद्धालुओं का हुजूम, सोमवार को 50 हजार लोगों के जल अर्पण करने की संभावना

जहानाबाद जिले की प्रसिद्ध बराबर स्थित बाबा सिद्ध नाथ के मंदिर में सावन के दूसरे सोमवार को भक्त जनों के जनसैलाब उमड़ है। दूर-दूर से श्रद्धालु बाबा को जल अर्पण करने के लिए पहुंचे हुए हैं।

सुबह से ही महिला एवं पुरुष भक्तों की लंबी कतार लगी हुई है। बोलबम के नारे के साथ बाणवर पहाड़ गूंज उठा है। ज्ञात हो कि सावन के महीने में दूर-दूर से बाबा सिद्धनाथ के जल अर्पण करने के लिए भक्त पहुंचते हैं।

जिला प्रशासन द्वारा इसके लिए समुचित व्यवस्था भी की गई है। मंदिर के प्रबंधक ने बताया कि लगभग पचास हजार लोगों की जल अर्पण करने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

सुबह से ही भक्तों की लंबी कतार लगी हुई है। भीड़ को देखते हुए पुलिस प्रशासन भी चौकस है।

सुप्रसिद्ध बाबा हरी गिरी धाम में सावन की दूसरी सोमवारी पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुचें

बेगूसराय । सुप्रसिद्ध बाबा हरी गिरी धाम में सावन की दूसरी सोमवारी पर अहले सुबह से ही हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंच कर पूजा अर्चना करने में जुटे हुए हैं।

गढ़पुरा प्रखंड स्थित बाबा हरी गिरी धाम में सोमवारी को लेकर जिला प्रशासन की ओर से पुख्ता व्यवस्था की गई थी।

बाबा हरी गिरी धाम

दो साल बाद प्राचीन शिव मंदिर वाणावार में चहल–पहल, सांसद ने मेले का किया उद्घाटन

सावन का पावन महीना शुरू हो गया है। साथ ही जहानाबाद जिले के मखदुमपुर प्रखंड के ऐतिहासिक और प्राचीन शिव मंदिर वाणावार में श्रद्धालुओं की भीड़ लगने लगी है।

गुरुवार को सांसद चंद्रेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी, मखदुमपुर विधायक, डीएम रिची पांडेय, डीडीसी परितोष कुमार समेत कई अधिकारी और जिले के नेता मौजूद रहे। बराबर स्थित पातालगंगा पहुंचे, जहां श्रावणी मेला का शुभारंभ किया गया। इसके पहले डीएम, डीडीसी ने सामूहिक रूप से मेले का शुभारंभ करने के लिए भगवान भोलेनाथ की पूजा अर्चना की।


पातालगंगा के समीप सिद्धेश्वर चोटी जाने वाले मुख्य द्वार के समीप पंडितों के द्वारा धार्मिक अनुष्ठान कार्यक्रम की शुरुआत कराई गई। वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ भगवान गणेश के अलावा अन्य देवी देवताओं की आराधना की गई। भोलेनाथ का अभिषेक किया गया। इसके बाद सांसद ने श्रावणी मेला का उद्घाटन किया। भीषण गर्मी के बावजूद भी अनुष्ठान को लेकर लोगों में उत्साह देखते ही बन रहा था।

अनुमान है कि इस बार लगभग 10 लाख लोग जल अर्पण के लिए गुफा में पहुंचेंगे। विधिवत उद्घाटन के बाद सांसद ने पातालगंगा समय कई जगहों का निरीक्षण किया। साथी जल्द ही रोपवे के शुरू होने का आश्वासन भी दिया। सांसद ने कहा कि मेला क्षेत्र का दौरा दो दिन पहले भी उन्होंने किया था। साथ ही सुविधाओं को बेहतर बनाने को लेकर डीएम से बात भी की थी।

आज से शुरू हुआ मेला पूरे सावन तक चलेगा। जिसको लेकर बड़ी संख्या में पुलिस बल और मजिस्ट्रेट की तैनाती की गई है। कोरोना काल में 2 साल तक सुनसान रहने वाला बराबर पहाड़ इस बार लगे मेले की वजह से एक बार फिर से गुलजार हो गया है।

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Bihar Eid Celebration: दो साल बाद मिला मौका, लोगों ने खुलकर लगाया एक दूसरे को गले, जहानाबाद में दिखी बकरीद की रौनक

जहानाबाद जिला से लेकर प्रखंड मुख्यालय के अलावा ग्रामीण इलाके में बकरीद का त्योहार हर्षोल्लासपूर्ण माहौल में मनाया जा रहा है। कोरोना संक्रमण के कारण मस्जिदों में दो साल से नमाज अदा नहीं की जा रही थी। इस बार ईद के बाद बकरीद में भी लोगों का हुजूम दिख रहा है।

इस पर्व में गांगी-तहजीब के जीवंत दर्शन हो रहे हैं। सभी समुदाय के लोग मिलकर एक दूसरे को पर्व का मुबारकवाद दे रहे हैं। पटना-गया एनएच 83 के समीप अवस्थित ईदगाह के पास नमाजियों की भीड़ लगी। अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग समय में नमाज अदा की जा रही है। बकरीद का त्योहार को लेकर सभी घरों में कुर्बानी के अलावा स्वादिष्ट भोजन भी बनाया गया है।

मेहमानों के आने पर मुस्लिम भाई उनके सेवा में जुटे दिखे। पर्व की खुशियों को खास करने के लिए मुसलमानों ने अपने हिन्दू साथियों को भी आमंत्रित किया है। इसके अलावा आपस में भी एक दूसरे के घरों में जाकर लोगों ने बकरीद की मुबारकबाद दी। संवेदनशील जगह पर पुलिस की तैनाती भी की गई है।

बकरीद त्योहार को शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न कराने को लेकर चिन्हित संवेदनशील जगह के अलावा नगर परिषद के प्रत्येक चौक-चौराहों पर दंडाधिकारी के नेतृत्व में पुलिस बल की तैनाती की गई थी। अधिकारियों की नजर आने जाने वाले लोगों पर है।

Eid Celebration: पटना के गांधी मैदान में बकरीद को लेकर दिखा उत्साह

पटना । बकरीद को लेकर पटना के गांधी मैदान में अस्थाई रूप से ईदगाह बनाया गया जहां पर हजारों की हजार संख्या में पहुंचे नमाजियों ने नमाज अदा की।

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बकरीद के पूर्व संध्या पर पुलिस ने निकाला फ्लैग मार्च ,लोगों से शांति के साथ पर्व मनाने की अपील

जहानाबाद। बकरीद में शांति व्यवस्था कायम रखने के लिए जहानाबाद में पुलिस जवानों ने फ्लैग मार्च किया। जिसका नेतृत्व एएसपी और डीएसपी ने किया।

मार्च में शामिल पुलिस पदाधिकारी और जवानों ने बकरीद को शांति के साथ मनाने का आग्रह किया। कोई व्यवधान उपद्रवी और असामाजिक तत्वों द्वारा डाला जाता है, तो इसके लिए पुलिस प्रशासन तैयार है।

पुलिस प्रशासन ने सभी लोगों से सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की अपील की। आपसी भाईचारे और सौहार्द के साथ बकरीद मनाने की अपील की है।

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जहानाबाद में पहली बार रथ यात्रा का आयोजन, कार्यकर्ता और भक्तों में दिखा उत्साह

जगन्नाथ बलदेव सुभद्रा की रथ यात्रा जगन्नाथ पूरी समेत कई जगह आषाढ़ शुक्ल द्वितीय के टीवी दिन निकाला जाता है।

इस बार इस्कॉन मंदिर ने पहली बार एक भव्य रथ यात्रा का आयोजन जहानाबाद में किया।

यात्रा गाँधी मैदान से हॉस्पिटल मोड, अरवल मोड होते हुए काको मोड पहुंची। फिर वापसी में इन्हीं रास्तों से होते हुए गाँधी मैदान पहुंची। रथ के साथ साथ प्रसाद और गीता आदि धार्मिक पुस्तकों का वितरण किया गया। रथ यात्रा से पहले और अंत में भंडारा की व्यवस्था की गई।

इस्कॉन गया मंदिर समिति ने बताया कि पहले 9 जुलाई को रथ यात्रा रखा गया था, लेकिन बकरीद के कारण जहानाबाद प्रशासन ने 8 जुलाई को इसकी परमिशन दी थी ।

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वट सावित्री पूजन सोमवार को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया

पटना । सुहागन महिलाओं द्वारा अपने पति की स्वस्थ और दीर्घायु जीवन के लिए मनाया जाने वाला व्रत वट सावित्री पूजन सोमवार को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया।

इस दौरान व्रती महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाज और विधि विधान के साथ वट वृक्ष की पूजा-अर्चना कर अपने अक्षत सुहाग की कामना की।

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सूर्य भगवान की प्रतिमा की स्थापना को लेकर कलश यात्रा

जहानाबाद । जिले के घोसी गांव में सूर्य भगवान का मंदिर का निर्माण हुआ है इस मंदिर में सुय भगवान की प्रतिमा की स्थापना की जानी है। जिसके लिए गुरुवार को सुबह बड़ी संख्या में पुरुष एवं महिलाएं कलश यात्रा निकाला गया ।

घोसी गांव से चलकर फल्गु नदी से जल भरने के लिए बड़ी संख्या में पुरुष एवं महिलाएं इस कलश यात्रा में शामिल हुए घोसी बाजार होते हुए कलश यात्रा फल्गु नदी तक जाएगा। और वहां से जल लेकर घोसी गांव सूर्य मंदिर के प्रांगण में संपन्न किया जाएगा। इस कलश यात्रा में बैंड बाजे के साथ घोड़े इस सवारी को भी शामिल किया गया है।

घोसी गांव में यह कार्यक्रम 4 दिनों तक चलेगा 8 तारीख को भंडारा का आयोजन किया जाएगा । इस कार्यक्रम में बड़े-बड़े साधु महात्मा शामिल हो रहे हैं। इसमें प्रवचन का भी आयोजन किया जाएगा जिस में शामिल होकर लोग साधु महात्मा के मधुर वाणी के वचन सुनकर लोग लाभान्वित होंगे ।

ज्ञात हो कि सूर्य मंदिर बन जाने से छठ व्रतियों को काफी फायदा होगा लोग भगवान सूर्य के आराधना करने के लिए दूरदराज जाना पड़ता था। लेकिन घोसी गांव में पोखर के किनारे सूर्य मंदिर के निर्माण होने से आसपास के लोग को सूर्य भगवान की आराधना करने में काफी सुविधा होगी सूर्य भगवान का प्रतिमा स्थापना के कार्यक्रम प्रारंभ होते ही पूरे गांव में भक्ति की बयार बहने लगी है। गांव वासियों खुशी का इजहार करते हुए कहा कि आज हम लोगों के लिए अत्यंत खुशी का पल है।

छठ पर्व में सूर्य भगवान की आराधना करने के लिए दूरदराज जाना पड़ता था ।लेकिन मंदिर के निर्माण एवं सूर्य भगवान की प्रतिमा स्थापित होने से हम लोगों को अब कहीं दूर दराज छठ करने के लिए नहीं जाना पड़ेगा ।और गांव में ही छठ पूजा की आयोजन किया जाएगा इस कलश यात्रा में ढोल नगाड़े के साथ घुड़सवारी करते हुए जय श्रीराम के नारे लगाते हुए पुरुष एवं महिलाएं फल्गु नदी की पर जा रहे हैं इस कलश यात्रा से पूरा घोसी बाजार पूरा गांव एवं इलाका भक्ति में हो गया है।

सभी लोग अपने माथे पर कलश रखकर जय श्री राम एवं सूर्य भगवान की जय कार लगाते हुए इस कलश शोभायात्रा में शामिल हुए हैं।

गाँधी मैदान में आयोजित ईद के नवाज में शामिल हुए नीतीश कुमार

पटना – सीएम नीतिश कुमार ने ईद की बधाई देते हुये सभी को एक दुसरे के प्रति आदर का भाव रखने और बिहार की तरककी को लेकर काम।करने की नसीहत दी है

वही उन्होंने कहा कि लागातर कोविड की वजह से गांधी मैदान में कार्यक्रम नही हो रहा था, लेकिन इसबार कार्यक्रम हो रहा है खुशी की बात है

हम खुद लगातार यहां आते है काफी खुशी मिलती है।

उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करके हुआ आस्था के महापर्व चैती’छठ’ का समापन

छठ अकेली ऐसी पूजा है, जिसमें उगते हुए और अस्त होते हुए सूर्य की पूजा की जाती है। अस्त होता सूरज जहां आपको कालचक्र के बारे में बताता है तो वहीं उगता सूरज नई सोच और ऊर्जा का प्रतीक है और जीवन में आगे बढ़ने के लिए इन दोनों चीजों का होना बहुत ज्यादा जरूरी है। आपको बता दें कि आम से लेकर खास तक सभी ने पूरी श्रद्धा के साथ छठ पूजा की और अपने परिवार की खुशहाली के लिए सूर्य भगवान और छठ मैया से प्रार्थना की।

बगहा
आस्था के महापर्व चैती’छठ’ आज सुबह बगहा औऱ रामनगर छठ वर्ती महिलाओं ने उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया। श्रद्धालुओं ने सुबह-सुबह ही घाट पर पहुंचकर उगते सूर्य को अर्घ्य दिया। जिसके बाद उपवास रखने वाले व्रतियों ने छठ मैया का प्रसाद ग्रहण कर व्रत तोड़ा। आपको बता दें छठ पूजा करने का उद्देश्य जीवन में सूर्यदेव की कृपा और छठ मैया का प्रेम-आशीष पाना है। सूर्य की कृपा से आयु और आरोग्य की प्राप्ति होती है तो वहीं छठ मैया के आशीष से इंसान को सुख-शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

बेगूसराय
बेगूसराय में उगते सूर्य को अर्घ्य के साथ ही चार दिवसीय चैती छठ पर्व समाप्त हो गया। इस मौके पर बेगूसराय जिले के भी झमटिया गंगा घाटों पर छठ व्रतियों ने सूप के साथ  भगवान भास्कर को अर्घ्य देकर पूजा का समापन किया।  चैती छठ व्रत को लेकर लोगों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है एवं छठ व्रतियों के साथ-साथ बड़ी संख्या में लोग गंगा घाटों पर मौजूद हैं। जिले के कई पोखरों के साथ-साथ घरों पर भी लोगों ने लोक आस्था का पर्व चैती छठ को पूरे धूमधाम से मनाया। 4 दिनों तक चलने वाले इस छठ पर्व के अंतिम दिन उगते सूर्य की उपासना कर छठ पर्व का समापन हो गया। छठ व्रतियों ने घर परिवार समाज और देश की समृद्धि की कामना की है।

गया जिला के विभिन्न घाटों पर चैती छठ पूजा सम्पन हो गया, उगते हुए सूर्य का पूजा जल, दूध, धूप फल समर्पित कर किया गया।

रोसड़ा का एक ऐसा गांव जहां होती है अनोखी होली

राेसड़ा के भिरहा गांव की हाेली पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध है। यहां वृंदावन की तर्ज पर लाेग हाेली का जश्न मनाते हैं। इस बार न कोरोना है और न ही कोई दूसरी बंदिश। पिछले दो साल यहां की होली पाबंदियों की भेंट चढ़ गई थी। लेकिन इसबार पूरे गांव में होली को लेकर काफी उत्साह देखने को मिला।

स्थानीय लोग बताते है कि 1935 में गांव के कई लोग होली देखने वृंदावन गए थे। वहीं की तर्ज पर यहां भी होली मनाने का निर्णय लिया गया। पहली बार 1936 में वृंदावन की तर्ज पर होली हुई। वर्ष 1941 में यह गांव तीन भागों पुरवारी टोल,पछियारी टोल और उतरवारी टोल में बंटकर होली मनाने लगा।

लोगो ने बताया कि आज भी इन्हीं तीन टोलों के बीच होली के आयोजन में श्रेष्ठता साबित करने की होड़ रहती है। होलिका दहन की संध्या से ही तीनों टोले में अलग-अलग सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। गांव में बड़े-बड़े तोरणद्वार बनाए गए है। रंग बिरंगे रोशनी से पूरा भिरहा गांव होली में भी दिखता है तीनों टोलों के तीनों मंदिर परिसर में रात भर नृत्य और संगीत का आयोजन किया गया है। दूर दराज से गायिका और नृत्यांगना को बुलाया गया था।

आज होली के दिन नृत्य का आनंद लेने के बाद सभी लोग फगुआ पोखर पँहुच रंग से घोलू हुए पानी मे कुर्ता फार होली खेला गया बिरहा गांव की होली को देखते आसपास के गांव के साथ-साथ दूरदराज के जिले के लोग भी पहुंचे हुए थे।

बिहार में एक ऐसा गांव है जहां लड़किया जनेऊ पहनती है

बिहार में एक गांव ऐसा भी है जहां लड़किया जनेऊ पहनती है । यह सूनने में थोड़ा अटपटा लगा रहा होगा लेकिन यह सच्चाई है । बक्सर जिले के डुमरांव अनुमंडल के नावानगर प्रखंड में एक गांव है मणियां जहां प्रति वर्ष बसंत पंचमी के दिन लड़कियों का यज्ञोपवीत संस्कार कराया जाता है।

यह अनोखी परंपरा मणियां गांव स्थित दयानंद आर्य हाईस्कूल में प्रति वर्ष आयोजित होती है। इस स्कूल में पढ़ने वाली छात्राएं स्वेच्छा से जनेऊ धारण करती हैं। यहां जनेऊ धारण करने वाली छात्राएं रुढ़िवादी परंपरा को खत्म करने के साथ चरित्र निर्माण की शपथ लेती हैं। अभिभावकों का कहना कि इससे नारी शक्ति को बढ़ावा मिल रहा है।

परिवार व समाज का मिल रहा सहयोग
यज्ञोपवीत पहनने की मुहिम में लड़कियों को परिवार व समाज से भी भरपूर सहयोग मिल रहा है। पिछले साल आचार्य श्रीहरिनारायण आर्य और सिद्धेश्वर शर्मा के नेतृत्व में शिल्पी कुमारी, बसंती कुमारी, अनु कुमारी, नीतु कुमारी, खुशबू कुमारी एवं नीतु कुमारी सहित अन्य कई छात्राओं का उपनयन संस्कार किया गया था। इस बार भी बसंत पंचमी के दिन लड़कियों को जनेऊ पहनाने की तैयारी चल रही है। इस आयोजन को लेकर गांव में उत्‍सवी माहौल बना हुआ है।

विद्यालय के संस्थापक ने चलाई थी यह परंपरा
मणियां उच्च विद्यालय के संस्थापक और इसी क्षेत्र के छपरा गांव निवासी स्व. विश्वनाथ सिंह ने 1972 ई. में इस परंपरा की शुरुआत की थी। उन्होंने सर्वप्रथम अपनी पुत्रियों को जनेऊ धारण कराया था। उसके बाद फिर यह परंपरा चल पड़ी। तब से हर वर्ष यहां लड़‍कियों का यज्ञोपवीत संस्‍कार किया जाता है। स्व. सिंह आर्यसमाजी थे। मणियां के ग्रामीणों का कहना है कि गुरुजी का इसके पीछे मुख्य उद्देश्य था कि नारी शक्ति को श्रेष्ठ कराने से समाज का कल्याण हो सकता है।

मूर्तिपूजा का नहीं है प्रचलन
आचार्य सिद्धेश्वर शर्मा का कहना है, बसंत पंचमी के दिन विद्यालय की छात्र-छात्राएं हवनकुंड के समक्ष बैठकर आचार्य से श्रेष्ठ आचरण, आदर्श जीवन व सद्चरित्र का संस्कार ग्रहण करती हैं।

मकर संक्रान्ति को लेकर इस बार भी एक मत नहीं हैं विद्वान

मकर संक्रान्ति, 14 जनवरी, 2022 ई :

वर्ष भर में 12 राशियों की संक्रान्तियाँ होतीं हैं। इनमें मकर संक्रान्ति से छह महीने तक सूर्य उत्तरायण रहते हैं तथा कर्क राशि की संक्रान्ति से दक्षिणायन सूर्य आरम्भ होते हैं। उत्तरायण सूर्य में यज्ञ, देवप्रतिष्ठा आदि के लिए शुभ मुहूर्त होते हैं। ऐसी मान्यता है कि जबतक सूर्य उत्तरायण रहते हैं तब तक छह महीनों के लिए देवताओं का दिन रहता है तथा दक्षिणायन सूर्य के महीनों में देवताओं की रात रहती है। अतः मकर संक्रान्ति का यह दिन देवताओं के लिए प्रातःकाल माना जाता है। दिन भर में जो धार्मिक महत्त्व प्रातःकाल का होता है, वैसा ही महत्त्व मकर संक्रान्ति का भी वर्ष भर में होता है।

इस वर्ष दिनांक 14 जनवरी की रात्रि 8.34 मिनट पर संक्रमण हो रहा है। चूँकि संक्रमण काल रात्रि में भी हो सकता है; अतः धर्मशास्त्रियों ने संक्रमण काल के आधार पर पुण्यकाल तथा पुण्याह की व्यवस्था की है।

गणित-ज्योतिष के अनुसार संक्रान्ति के पहले या बाद 8 घंटा तक सूर्य का बिम्ब उस संक्रान्ति-बिन्दु पर रहता है। अतः संक्रमण-काल से 8 घंटा पहले अथवा बाद, जब भी उदित सूर्य मिलें, पुण्यकाल माना जायेगा। इस वर्ष रात्रि 8:34 बजे संक्रमण के पूर्व दिनांक 14 को हमें सूर्य-संक्रान्ति का बिम्ब प्राप्त होगा, अतः संक्रान्ति सम्बन्धी गणित के अनुसार भी 14 को ही मनाया जाना चाहिए।

मिथिला के सभी निबन्धकारों ने एकमत से निर्णय दिया है कि आधी रात से पहले यदि संक्रमण है, तो पुण्यकाल पूर्वदिन मध्याह्न के बाद होगा तथा वह पूरा दिन पुण्याह कहलायेगा। इन सभी प्रमाणों का संकलन कर म.म. मुकुन्द झा बख्शी ने ‘पर्वनिर्णय’ में यही व्यवस्था दी है। अतः मिथिला से प्रकाशित पंचाङ्ग में दिनांक 14 को मकर संक्रान्ति माना गया है।

निर्णयसिन्धु में कमलाकर भट्ट ने मकर-संक्रान्ति के सम्बन्ध में सभी मतों को उद्धृत कर दिया है, जिनमें माधव का मत है कि यदि रात्रि में संक्रमण हो तो दूसरे दिन पुण्यकाल माना जाए। किन्तु अनन्तभट्ट के अनुसार यदि आधी रात से पूर्व संक्रमण हो तो पूर्व दिन माना जाए। इस प्रकार कमलाकर में अपना कोई निर्णय नहीं दिया है। धर्मसिन्धुकार का मत है कि रात्रि के पूर्वभाग, परभाग अथवा निशीथ में संक्रमण हो तो दूसरे दिन पुण्यकाल होगा। इस मत से दिनांक 15 को मकर संक्रान्ति होगी।

इस विषय में कमलाकर भट्ट ने भी क्षेत्रीय परम्पराओं का महत्त्व दिया है, अतः धर्मशास्त्र के अनुसार जिनकी जो परम्परा है उस दिन मनाये

लेखक–आचार्य किशोर कुणात

पश्चिम में दिखे पूरब के रंग, अमेरिका में भारतीय-अमेरिकियों ने कुछ ऐसे की छठ पूजा

बिहार में मनाया जाने वाला छठ का त्योहार अमेरिका में भी मनाया गया। इस दौरान लोगों ने अस्थायी जलाशयों में पूजा की।
अमेरिका में मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के भारतीय-अमेरिकियों ने सूर्य भगवान की पूजा कर छठ पर्व मनाया।

सात समंदर पार बिखेर रहे छठ पूजा की अद्भुत छटा

महापर्व छठ बिहार की दहलीज से निकलकर विदेश में भी अद्भुत छटा बिखेर रहे हैं। अमेरिका के बोस्टन और बर्जीनिया में छठ पर्व को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा है।

अमेरिका के बोस्टन शहर छठ की गीत से गूंजा

विदेश में बसे बिहारियों का कहना है कि वे बाहर रहने गये हैं। लेकिन अपनी परंपरा और सूर्योपासना के पर्व छठ को कैसे भूल सकते हैं। सूर्य की महिमा पूरी दुनिया जान सके, यही उनका मकसद है।

अमेरिका के बर्जीनिया शहर छठ की गीत से गूंजा

कौन है छठी मैया

लोगों में एक आम जिज्ञासा यह रही है कि सूर्य की उपासना के इस महापर्व में सूर्य के साथ जिन छठी मैया की अथाह शक्तियों के गीत गाए जाते हैं, वे कौन हैं। ज्यादातर लोग इन्हें शास्त्र की नहीं, लोक कल्पना की उपज मानते हैं। लेकिन हमारे पुराणों में यत्र-तत्र इन देवी के संकेत जरूर खोजे जा सकते हैं।

एक पौराणिक कथा के अनुसार सूर्य और षष्ठी या छठी का संबंध भाई और बहन का है। षष्ठी एक मातृका शक्ति हैं जिनकी पहली पूजा स्वयं सूर्य ने की थी। ‘मार्कण्डेय पुराण’ के अनुसार प्रकृति ने अपनी शक्तियों को कई-कई अंशों में विभाजित कर रखा है। प्रकृति के छठे अंश को ‘देवसेना’ कहा गया है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इनका एक नाम षष्ठी भी है। देवसेना या षष्ठी श्रेष्ठ मातृका और समस्त लोकों के बालकों की रक्षिका हैं। इनका एक नाम कात्यायनी भी है जिनकी पूजा नवरात्रि की षष्ठी तिथि को होती है। पुराणों में निःसंतान राजा प्रियंवद द्वारा देवी षष्ठी का व्रत करने की कथा है। छठी षष्ठी का अपभ्रंश हो सकता है। आज भी छठव्रती छठी मैया से अपनी संतानों के लंबे जीवन, आरोग्य और सुख-समृद्धि का वरदान मांगते हैं। शिशु के जन्म के छह दिनों बाद इन्हीं षष्ठी या छठी देवी की पूजा का आयोजन होता है जिसे छठी या छठिहार कहते हैं।

छठी मैया की इस परिकल्पना की एक आध्यात्मिक पृष्ठभूमि भी हो सकती है। अध्यात्म के अनुसार सूर्य की सात किरणों का मानव जीवन पर अलग – अलग प्रभाव पड़ता है। सूर्य की छठी किरण को आरोग्य और भक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला माना गया है। संभव है कि सूर्य की इस छठी किरण का प्रवेश अध्यात्म से लोकजीवन में छठी मैया के रूप में हुआ हो।

लेखक –ध्रुव गुप्ता

स्त्री-शक्ति के प्रति सम्मान का नौ-दिवसीय आयोजन शारदीय नवरात्रि।

स्त्रीत्व का उत्सव !
स्त्री-शक्ति के प्रति सम्मान का नौ-दिवसीय आयोजन शारदीय नवरात्रि अवसर है नमन करने का उस सृजनात्मक शक्ति को जिसे ईश्वर ने सिर्फ स्त्रियों को सौंपा है। उस अथाह प्यार, ममता और करुणा को जो कभी मां के रूप में व्यक्त होता है, कभी बहन, कभी बेटी, कभी मित्र, कभी प्रिया और कभी पत्नी के रूप में।

दुर्गा पूजा, गौरी पूजा और काली पूजा वस्तुतः उसी स्त्री-शक्ति के तीन विभिन्न आयामों के सम्मान के प्रतीकात्मक आयोजन हैं। काली स्त्री का आदिम, अनगढ़, अनियंत्रित स्वरुप है जिस पर काबू करना पुरुष अहंकार के बस की बात नहीं। गौरी या पार्वती स्त्री का सामाजिक तौर पर नियंत्रित, गृहस्थ, ममतालु रूप है जो सृष्टि का जनन भी करती है और पालन भी। दुर्गा स्त्री के आदिम और गृहस्थ रूपों के बीच की वह स्थिति है जो परिस्थितियों के अनुरुप करूणामयी भी है, कभी संहारक भी।

कालान्तर में इन तीनों प्रतीकों के साथ असंख्य मिथक जुड़ते चले गए और इस आयोजन ने अपना उद्देश्य और अपनी अर्थवत्ता खोकर विशुद्ध कर्मकांड का रूप ले लिया। स्त्री के सांकेतिक रूप आज हमारे आराध्य बन बैठे हैं और जिस स्त्री के सम्मान के लिए ये तमाम प्रतीक गढ़े गए, वह पुरूष अहंकार के पैरों तले आज भी रौंदी जा रही हैं। जिस देश में सूअर, मगरमच्छ, उल्लूओ, बैलों और चूहों तक को देवताओं के अवतार और वाहन का दर्जा प्राप्त है, उस देश में स्त्रियों को सिर्फ इसलिए गर्भ में मार दिया जाता है कि वह कुल का दीपक नहीं, ज़िम्मेदारी है। इसलिए अपमानित किया जाता है कि उसने अपनी पसंद के कपडे पहन रखे हैं। इसलिए रौंद डाला जाता है कि उसने घर की दहलीज़ से बाहर क़दम रखने की कोशिश की।

स्त्रियों के प्रति हमारे विचारों और कर्म में विरोधाभास हमेशा से हमारी संस्कृति का बड़ा संकट रहा है। स्त्री एक साथ स्वर्ग की सीढ़ी भी रही है और नर्क का द्वार भी। घर की लक्ष्मी भी और ‘ताड़न’ की अधिकारी भी। मनुष्यता की जननी भी और मजे के लिए बिकने वाली देह भी। जबतक हम देवियों की काल्पनिक मूर्तियों की जगह जीवित देवियों का सम्मान करना नहीं सीख लेते, नवरात्रि के कर्मकांड का कोई अर्थ नहीं !

यह आयोजन तब सार्थक होगा जब पुरूष स्त्रियों के विरुद्ध हजारों सालों से जारी भ्रूण-हत्या, लैंगिक भेदभाव, बलात्कार, उत्पीडन और उन्हें वस्तु या उपभोग का सामान समझने की मानसिकता बदलें और स्त्रियां खुद भी अपने भीतर मौजूद काली, पार्वती और दुर्गा को पहचानने और आवश्यकता के अनुरूप उनका इस्तेमाल करना सीखे !

लेखक -ध्रुव गुप्ता

गुप्ता काल से शुरु हुआ है भारत में स्त्री शक्ति की पूजा

शक्ति-पूजा का अर्थ

प्राचीन काल से ही हिन्दू धर्म तीन मुख्य संप्रदायों में बंटा रहा है – विष्णु का उपासक वैष्णव, शिव का उपासक शैव और शक्ति का उपासक शाक्त संप्रदाय। दुनिया के सभी दूसरे धर्मों की तरह वैष्णव और शैव संप्रदाय जहां सृष्टि की सर्वोच्च शक्ति पुरुष को मानते हैं, शाक्तों की दृष्टि में सृष्टि की सर्वोच्च शक्ति स्त्री शक्ति है। देवी को ईश्वर के रूप में पूजने वाला शाक्त धर्म दुनिया का संभवतः एकमात्र धर्म है।

स्त्री-शक्ति की आराधना की शुरुआत कब और कैसे हुई, इस विषय पर इतिहासकारों में मतभेद है। ज्यादातर लोग शक्ति पूजा की परंपरा की शुरुआत इतिहास के गुप्त काल से मानते हैं जब ‘देवी महात्मय’ नाम के ग्रंथ की रचना हुई थी। दसवीं से बारहवीं सदी के बीच ‘देवी भागवत पुराण’ की रचना के बाद शाक्त परंपरा उत्कर्ष पर पहुंची थी। सच यह है कि स्त्री-शक्ति की पूजा की जड़ें प्रागैतिहासिक काल में ही मौजूद हैं। सिंधु-सरस्वती घाटी की सभ्यता में मातृदेवी की उपासना का प्रचलन था। खुदाई में उस काल की देवी की कई मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। ऋग्वेद के दसवें मंडल में भी वाक्शक्ति की प्रशंसा में एक देवीसूक्त मिलता है, जिसमें वाक्शक्ति कहती है – मैं ही समस्त जगत की अधीश्वरी तथा देवताओं में प्रधान हूं। मैं सभी भूतों में स्थित हूं। देवगण जो भी कार्य करते हैं वह मेरे लिये ही करते हैं। वेदों की कई अन्य ऋचाओं में अदिति का मातृशक्ति के रूप में वर्णन है जो माता, पिता, देवगण, पंचजन, भूत, भविष्य सब कुछ हैं। कालांतर में शक्ति पूजा की इस प्राचीन परंपरा के साथ असंख्य मिथक और कर्मकांड जुड़ते चले गए।

योगियों की शक्ति उपासना की पद्धति थोड़ी अलग है। वे शक्ति का अस्तित्व किसी दूसरी दुनिया या आयाम में नहीं, मानव शरीर के भीतर ही मानते हैं। रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले हिस्से में कुंडलिनी शक्ति के रूप में। विभिन्न यौगिक क्रियाओं और ध्यान के माध्यम से इस शक्ति की ऊर्ध्व यात्रा शुरू कराई जाती है। जब यह शक्ति शरीर के छह चक्रों का भेदन करती हुई मष्तिष्क में स्थित सातवें चक्र में पहुंच जाती है तो योगी को असीम शक्ति और परमानंद की अनुभूति होती है।

मित्रों को स्त्री – शक्ति की उपासना के नौ-दिवसीय आयोजन नवररात्रि की शुभकामनाएं, इस आशा के साथ कि स्त्री-शक्ति की पूजा की यह गौरवशाली परंपरा स्त्रियों के प्रति सम्मान के अपने मूल उद्देश्य से भटककर महज कर्मकांड बनकर न रह जाए !

लेखक –ध्रुव गुप्ता

माँ दुर्गा डोली पर सवार होकर आयी है और हाथी पर सवार होकर लौटेगी।

आज से पूरा बिहार माँ दुर्गा के उपासना में डूब जायेगा आज मां दुर्गा डोली पर सवार होकर आयी है और हाथी पर सवार होकर लौटेगी इस बार शारदीय नवरात्र आठ दिन का ही होगा।

आज 7 अक्टूबर को कलश स्थापन होगा। चतुर्थ व पंचमी पूजा एक साथ होगी यह बदलाव पितृ पक्ष मेला की वजह से हुई है ।
इस बार चतुर्थी व पंचमी तिथि एक साथ होने से कुष्मांडा माता व स्कंदमाता की अराधना एक साथ होगी।

माता रानी डोली में सवार होकर आएगी। इस लिहाज से महिलाओं का वर्चस्व बढ़ेगा और मान सम्मान में वृद्धि होगी। लेकिन महामारी से लोग परेशान रहेंगे। शास्त्रों में ऐसा वर्णन है कि जब मां दुर्गा डोली पर सवार होकर आती है तो राजनीतिक उथल पुथल की स्थिति होती है। यह प्रभाव सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। माता का डोली पर आना ज्यादा शुभ संकेत नहीं माना जाता। लेकिन माता का प्रस्थान हाथी पर होगा जिसे शुभ माना गया है। 15 अक्टूबर को नवरात्रि का पारण किया जाएगा और दशहरा पर्व भी मनाया जाएगा।

आज से शुरु हो गया विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला लेकिन इस बार सिर्फ पिंडदान का होगा कार्यक्रम

आज से विश्व प्रसिद्ध गया पितृपक्ष मेला फल्गु नदीं में स्नान के साथ ही शुरु हो गया है हलाकि इस बार भी कोरोना का असर मेले पर साफ दिख रहा है। बाहर के प्रदेशों से लोगों का इस बार भी आना कम ही हुआ है ।पिंडदान कर्मकांड अगले 17 दिनों तक यानि 6 अक्टूबर को अंतिम स्नान के साथ समाप्त हो जायेंगा हलाकि कर्मकांड से जुड़े पंडितों का कहना है कि दो तीन दिनों में पहले जैसा रोनक देखने को मिलेगा।


प्रशासन के सख्त निर्देश को देखते हुए इस बार कोविड-19 गाइडलाइन का अनुपालन करते हुए पिंडदान की प्रक्रिया संपन्न कराई जा रही है। मास्क, सैनिटाइजर व आपस में दूरी रखने की सलाह तीर्थयात्रियों को दिया जा रहा है। एक जगह पर तीर्थयात्रियों की भीड़ ज्यादा ना हो इस बात का भी ख्याल रखा जा रहा है।

विगत 2 सालों से कोरोना के कारण पिंडदान कर्मकांड बंद था, जिस कारण इस कार्य में लगे पंडित की आर्थिक स्थिति काफी खराब है। इस बार पितृपक्ष मेला की स्वीकृति नहीं दी गई, लेकिन पिंडदान कर्मकांड की स्वीकृति सरकार ने दी है, इससे लोगों को थोड़ी आस जगी है।

जिला पदाधिकारी अभिषेक सिंह ने कहा कि पितृपक्ष मेला नहीं लगेगा, लेकिन गया आने वाले पिंडदानियों को कर्मकांड करने से नहीं रोका जाएगा। उन पिंडदानियों को कोरोना गाइडलाइन के तहत कर्मकांड करना है और इसकी निगरानी भी की जाएगी। नगर आयुक्त सावन कुमार ने बताया कि मेला नहीं लगेगा, लेकिन पिंडदानियों के आगमन की संभावना को देखते हुए मेला क्षेत्र में सफाई की विशेष व्यवस्था की गई है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से कई स्थानों पर शिविर लगाकर कोरोना जांच व टीकाकरण किया जाएगा।

भगवान विश्वकर्मा के रूप में दिखे मोदी

बिहार में आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जन्मदिन अलग अलग अंदाज में मनाया गया है लेकिन जो BJP विधायक हरिभूषण बचौल ने जिस अंदाज में जन्मदिन की बधाई दी है वह खुब चर्चा में है ।

मधुबनी के विस्फी से विधायक बचौल मोदी का चेहरा भगवान ‌विश्वकर्मा की तस्वीर में लगाकर उन्हें अगरबत्ती दिखाते दिखे। 17 सितंबर को प्रधानमंत्री का जन्मदिन है और विश्वकर्मा जी का। उन्होंने इन दोनों अवसरों को एक साथ जोड़ दिया है।

बिस्फी स्थित अपने आवास पर उन्होंने तस्वीर को लगाकर फल, प्रसाद और फूल के साथ विधिवत पूजा की है। अगरबत्ती दिखाते हुए बचौल, मोदी शरणम् गच्छामि और मोदी नाम केवलम् का भी जाप कर रहे हैं।

फिलहाल हाईकोर्ट फिजिकल नहीं चलेंगा दशहरा के बाद होगा निर्णय

पटना हाईकोर्ट दशहरा के अवकाश के बाद 20 अक्टूबर, 2021को कोरोना की स्थिति का जायजा लेगा।इसके बाद पटना हाईकोर्ट प्रशासन फिजिकल कोर्ट प्रारम्भ करने के सम्बन्ध में निर्णय लेगा।साथ ही यह भी निर्णय लिया जाएगा कि फिजिकल कोर्ट की कार्यवाही किस हद तक संभव होगा और किस प्रकार चलाया जा सकेगा।

पिछले वर्ष मार्च से कोर्ट में मुकद्दमों की सुनवाई वर्चुअल मोड़ पर की जा रही हैं।अधिवक्ता संघो ने पटना हाईकोर्ट प्रशासन से फिजिकल कोर्ट शुरू करने का अनुरोध किया।लेकिन करोना महामारी को देखते हुए हाई कोर्ट प्रशासन ने फिजिकल कोर्ट नहीं शुरू किया।

4 जनवरी,2021से पटना हाईकोर्ट में करोना के लिए जारी दिशानिर्देश व सुरक्षा नियमों के तहत हाइब्रिड कोर्ट शुरू किया गया।इसमें प्रथम पाली में फिजिकल कोर्ट के माध्यम से मामलों की सुनवाई होती थी और द्वितीय पाली में ऑनलाइन सुनवाई होती थी।

लेकिन मार्च,2021मे करोना महामारी के फिर से बढ़ने के कारण अप्रैल,2021 से फिर मामलों की ऑनलाइन सुनवाई शुरू हुई,जो अबतक चल रही हैं।

इस बीच वकीलों और अधिवक्ता संघो ने कई बार फिजिकल कोर्ट शुरू करने के चीफ जस्टिस से मांग की।इस करोना महामारी काल में वकीलों और उनके साथ जुड़े स्टाफ की स्थिति काफी खराब हो गई।उन्हें गहरे आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।बहुत सारे वकील अपने घर गांव चलें गए और उन्हें काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है।
एक ओर कोर्ट बंद होने से उनके आय का स्रोत खत्म हो गया,वहीं सरकार और बार कौन्सिल के द्वारा भी बहुत प्रभावी आर्थिक मदद नहीं।दी गई।

बिहार में एक मंदिर ऐसा जहाँ भाई बहन की पूजा होती है ,मुगल सिपाही से बहन की रक्षा करते जान गवा दिया

भारतीय समाज में रक्षाबंधन इतना महत्‍वपूर्ण त्‍योहार है कि इसे हिंदुओं के अलावा कई दूसरे मतों को मानने वाले परिवार भी मनाते हैं। इस पर्व को लेकर तमाम लोक कथाएं हैं किंवदंतियां हैं। यह पर्व भाई और बहन के प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। ऐसे मौके पर आपको बिहार के एक मंदिर की कहानी जानकर हैरानी हो सकती है, जहां भाई और बहन की बकायदा पूजा होती है। यह मंदिर है सिवान जिले के दारौंदा प्रखंड के भीखाबांध गांव में। यहां विशाल मेला लगता रहा है।

भीखाबांध स्थित भैया-बहिनी मंदिर भाई- बहन के अटूट प्रेम एवं विश्वास का प्रतीक है। यह मंदिर प्रखंड मुख्यालय से 12 किलोमीटर उत्तर एवं महाराजगंज अनुमंडल से चार किलोमीटर पूरब सिवान -पैगंबरपुर पथ के किनारे स्थित है।

इस मंदिर के बारे में बताया जाता है कि मुगल शासक काल में एक भाई अपनी बहन को राखी के मौके पर दो दिन पहले ही डोली में बिठाकर भभुआ (कैमूर) से अपने गांव ला रहा था। भीखाबांध गांव के समीप मुगल सिपाहियों ने डोली में बैठी दुल्‍हन को देखा तो उस की सुंदरता देखकर उनके मन में गलत भावना भर गई। सिपाहियों ने डोली को रोक कर बहन के साथ गलत हरकत करने का प्रयास करने लगे। इस पर भाई अपनी बहन की रक्षा के लिए सिपाहियों से उलझ गया। कहा जाता है कि बहन अपने आप को असहाय महसूस करते हुए भगवान को याद की। उसी समय धरती फटी और भाई-बहन दोनों उसी में समा गए। डोली उठा रहे कुम्हारों ने वहां स्थित कुएं में कूद कर जान दे दी।

कहा जाता है कि इस घटना के दिनों बाद यहां एक ही स्थल पर दो वट वृक्ष निकले, जो कई बीघा जमीन पर फैल गए। ये वृक्ष ऐसे दिखाई देते हैं कि मानो लगता है कि एक-दूसरे की सुरक्षा कर रहे हों। यहां पूजा करने वालों की मनोकामनाएं पूरी होती गईं। इसके बाद यहां एक मंदिर का निर्माण हुआ। इसमें भाई-बहन के पेड़ की पूजा होती है। भाई-बहन सोनार जाति के होने के चलते सबसे पहले इन्हीं की जाति के लोगों द्वारा पूजा-अर्चना की जाती है।

हलाकि कोविड संक्रमण की वजह से यह मंदिर बंद है। बिहार में मंदिरों को खोलने की इजाजत अभी सरकार ने नहीं दी है। यहां कम श्रद्धालुओं की पहुंचने की उम्मीद है। ग्रामीणों ने बताया कि यहां अतिक्रमण के चलते वट वृक्ष कुछ कट्ठा में सिमट कर रह गया है। इस मंदिर की जीर्णोद्धार के लिए प्रशासनिक स्तर पर आज तक कुछ भी प्रक्रिया शुरू नहीं की गई। ग्रामीणों ने प्रशासन से इस मंदिर एवं वटवृक्ष की ऐतिहासिक धरोहर को बचाने की मांग की है।

जीविका दीदी ने कर दी कमाल भाई के हाथों में दीदी की बनी राखी से सजेंगी हाथ

कहते हैं रेशम के धागे की राखी का बड़ा महत्व होता है । पूर्णिया की दर्जनों जीविका दीदीयां इन दिनों मलबरी की खेती कर अपने हाथों से बेकार पड़े खराब कोकून से रेशम का धागा निकालकर आकर्षक राखियां बना रही है । इससे जहां उन्हें रोजगार मिल रहा है वहीं ये दीदीयां लोगों को रेशम की शुद्ध राखियां भी मुहैया करा रही है । पिछले साल 23 फरवरी 2020 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी मन की बात में धमदाहा के मलवरी की खेती कर आर्थिक उपार्जन करने वाले आदर्श जीविका समूह की सराहना की थी ।

पूर्णिया के धमदाहा अनुमंडल के अमारी कुकरन में आदर्श जीविका समूह समेत चार अन्य समूह की जीविका दीदीयां इन दिनों रेशम की राखी बना रही है । जीविका दीदी रीना कुमारी ने कहा कि पहले वे लोग खराब हो चुके कोकून को बेकार समझकर फेंक देते थे । लेकिन पिछले साल पटना के सरस मेला में उनलोगों ने देखा कि कुछ लोग किस तरह बेकार पड़े चीजों का इस्तेमाल कर अच्छा हैन्डीक्राफ्ट बना रहे हैं, तो उनलोगों के मन में भी कुछ नया करने की ललक जगी । इसके लिये उनलोगों ने पहले प्रशिक्षण लिया फिर पिछले साल कोरोना के समय अपने परिवार के साथ मिलकर 21 सौ राखियां बनायीं। इस तरह उन्हें कोरोना की मुश्किल घड़ी में तकरीबन 40 हजार रुपये की आमदनी हुई।

इस बार धमदाहा के पांच समूह की 40 जीविका दीदीयों ने बैठक कर राखी बनाने का काम शुरु किया । इस साल उनलोगों का लक्ष्य करीब पचास हजार राखियां बनाने का है और एक राखी की कीमत 15 रु. से 50 रु. तक तय किया गया है। उन्हें भरोसा है कि इससे उन्हें अच्छी आमदनी भी होगी और कुछ सकारात्मक पहल भी।

इस संदर्भ में डीएम राहुल कुमार ने बताया कि पूर्णिया की जीविका दीदीयां अच्छा काम कर रही हैं। धमदाहा की आदर्श मलवरी उत्पादक जीविका समूह की जीविका दीदीयों की प्रशंसा पिछले साल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी की थी । उन्होंने कहा कि धमदाहा की कई जीविका दीदीयां जहां रेशम की राखी के अलावे साड़ी समेत कई चीजें बना रही हैं वहीं कुछ जीविका दीदीयां मक्का उत्पादन और मक्का से सामग्री बनाकर आर्थिक उपार्जन कर रही है ।

पूर्णिया जीविका समूह की दीदियां लगातार अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए न सिर्फ प्रयास करती हैं बल्कि लगातार प्रशिक्षण ले कर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान भी बना रही है ।

बिहार में एक मंदिर ऐसा भी है जहाँ 11 शिवलिंग विराजमान है।

#एकादशरूद्र_शिव
बिहार का एक एेसा अनोखा शिवालय है जहां एक साथ ग्यारह शिवलिंग की पूजा की जाती है। यहां ग्यारह शिवलिंग एक साथ विराजमान है। जिला मुख्यालय से पांच किलोमीटर दूर राजनगर प्रखंड क्षेत्र का मंगरौनी गांव प्राचीन काल से तंत्र विद्या के साधकों लिए प्रसिद्ध रहा है। इस गांव में प्राचीन शक्तिपीठ बूढ़ी माई मंदिर, भुवनेश्वरी देवी मंदिर अवस्थित हैं। माता भुवनेश्वरी मंदिर के बगल में ही अपने आप में अद्भुत एकादशरूद्र शिव विराजमान हैं।लगभग आठ फुट लंबे व पांच फुट चौड़ाई में बनी एक ही पीठिका (जलढरी) पर शिव के 11 रूपों के रूप में11 शिवलिंग स्थापित हैं। पड़ोसी देश नेपाल सहित राज्य व राज्य के बाहर से शिवभक्त एक ही पीठिका पर विराजमान इन 11 अद्भुत शिवलिंगों के दर्शन, पूजन को पुहंचते हैं। सावन माह में तो यहां की छटा ही निराली हो उठती है। इनके दर्शन मात्र से मन को पूर्ण शांति मिल जाती है।यह शिवालय श्रद्धालुओं की असीम श्रद्धा का केंद्र है। इसकी स्थापना 1954 ई. में बाबूसाहेब जगदीश नंदन चौधरी ने की थी। यहां कांची कामकोटि के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती व पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती भी आकर पूजा कर चुके हैं। इन शंकराचार्यों ने भी यहां की महिमा का भरपूर बखान किया था। मंदिर गुंबदनुमा है। परिसर में नेपाल के एक शिवभक्त द्वारा लकड़ी का बनाया दो मंजिला भवन है। हालांकि अब यह जीर्ण-शीर्ण हो चुका है। कहा जाता है कि पूर्व में इसमें तंत्र विद्या, ज्योतिष के शिक्षार्थी रहते थे। मंदिर से पूरब चातुश्चरण यज्ञ किया तालाब है।

11 Shivling Temple in Bihar

तालाब के पश्चिमी घाट के पीछे श्राद्ध स्थली है। ऐसी मान्यता है कि बहुत से गरीब लोग अपने पितरों का गया में श्राद्ध करने की इच्छा रहने के बाद भी नहीं जा पाते थे। उनके लिए यहां तंत्र विद्या से अभिसंचित श्राद्ध स्थली बनाई गई। यहां पिंडदान करने पर गया जाने जैसा फल मिलता है। शिवमंदिर के सामने पंडित मुनेश्वर झा जो तंत्र साधक थे द्वारा स्थापित भगवती भुवनेश्वरी एक मंदिर में विराजमान हैं।सावन में यहां हजारों की संख्या में शिव भक्त पहुंचते हैं। यहां बाबूबरही के पिपराघाट स्थित कमला, बलान व सोनी के संगम से जल लेकर कांवरिए आते हैं। कांवरियों की सुविधा के लिए सावन की प्रत्येक सोमवारीको चार बजे दिन तक जलाभिषेक की व्यवस्था रहती है। चार से साढ़े छह बजे तक षोडषोपचार पूजा की जाती है। बाबा भोलेनाथ का श्रृंगार नयनाभिराम होता है।

11 Shivling Temple in Bihar

ऐसे पहुंचें मंगरौनी

मधुबनी जिला मुख्यालय से लगभग पांच किमी की दूरी पर यह शिवालय है। आप मधुबनी रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड से रिक्शा, ऑटो या निजी वाहन से मंदिर परिसर तक पहुंच सकते हैं। कहा-पुजारी आत्माराम ने ‘यहां आने वाले भक्तों की हरेक मनोकामना बाबा एकादशरूद्र पूरी करते हैं। इन शिवलिंगों के स्पर्श मात्र से मन को अद्भुत शांति मिलती है। महाशविरात्रि में मिथिला पंरपरा के अनुसार शिव-पार्वती विवाह का आयोजन होता है। यहां की परंपरा के अनुसार चार दिन तक विशेष विवाह श्रृंगार कादर्शन शिवभक्त करते हैं।चौथे दिन यह श्रृंगार हटा कर शिवलिंग की विशेषपूजा की जाती है। प्रत्येक सोमवार को होने वाले यहां के भंडारा में जो भोजन करता है वह पेट रोग से मुक्त हो जाता है। यहां एक साथ शिव के विभिन्न रूपों का दर्शन शिवभक्तों को अलौकिक आनंद देता है।’

सिवान में त्योहार

सिवान जिले में त्योहारों को बहुत उत्साह और उत्साह से मनाया जाता है सभी त्योहार बहुत रंगीन होते हैं और भाईचारे और सामाजिक एकता की भावना को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है। “छठ पूजा” सिवान का एक बड़ा त्योहार है, जो लोगों के बीच असीम विश्वास से मनाया जाता है। यह मुख्य रूप से एक हिंदू त्योहार है जिसे साल में दो बार मनाया जाता है। यह एक बार चैत्र के महीने में मिलता है, जो गर्मियों में है, और एक बार कार्तिक के महीने में, यह सर्दियों की शुरुआत के दौरान है। यह त्योहार सूर्य भगवान को खुश करने के लिए किया जाता है, जिसे स्थानीय तौर पर सूर्य षस्ठी कहा जाता है।