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पितृपक्ष आज से शुरू, 10 अक्टूबर को होगा पितृ विसर्जन, जानें श्राद्ध के नियम और मान्यताएं

पितृपक्ष, पितरों की स्मृति में समर्पित यह पवित्र पर्व, रविवार से शुरू होकर 10 अक्टूबर को पितृ विसर्जन अमावस्या पर समाप्त होगा। इस दौरान भक्त अपने पूर्वजों का तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान कर श्रद्धा प्रकट करेंगे। यह कार्यक्रम विशेष रूप से तब महत्व रखता है जब ज्योतिषाचार्य रासबिहारी उपाध्याय ने बताया है कि इस वर्ष के वार और ग्रहों की व्यवस्था इस पितृपक्ष को अनन्य बनाती है, जिससे श्राद्ध के प्रभाव में वृद्धि होगी।

पितृपक्ष की उत्पत्ति प्राचीन भारतीय धार्मिक परंपराओं में है, जहाँ पूर्वजों की आत्मा को शांति और अनंत सुख देने हेतु तर्पण और दान कार्य किए जाते हैं। इस पर्व को हिन्दू धर्म के अनुक्रम में श्री पितृक्षेत्र के रूप में मान्यता प्राप्त है, और इसे सामाजिक एवं आध्यात्मिक अनुष्ठानों का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है।

पिछले वर्ष इस पितृपक्ष के दौरान कई राज्यों में विशेष कार्यक्रम आयोजित हुए, जहाँ धूमधाम से पितृ तर्पण के साथ-साथ दान और भेंट के कार्य भी समन्वित किये गये। 2019 में इसी वर्ष का पितृ विसर्जन अमावस्या पर राज्य सरकारों ने पितृस्नेह कार्यक्रम को प्रायोजित किया, जिससे सामान्य जनसांख्यिकीय वर्गों में पितृपक्ष के प्रति जागरूकता बढ़ी।

इस वर्ष की पितृपक्ष के प्रमुख घटनाक्रम में सबसे पहले सुबह के 6 बजे से शुरू होने वाला पितृ तर्पण समारोह हुआ, जिसके दौरान 80 से अधिक परिवारों ने पिताओं के लिए जलपात्र और नारियल अर्पित किये। इसके बाद मध्याह्न में पितृ विसर्जन के लिए पवित्र नदी में पिंडदान किया गया। शाम को भक्तों ने पितृ पवित्र परिधान में नृत्य और भजन के साथ श्राद्ध समारोह समाप्त किया।

पारंपरिक पद्धति के अनुसार पितृ विसर्जन के दिन पूर्वजों के शरीर को धान, चावल, मक्का और शुद्ध जल में डुबोया जाता है, जिसे “पितृ विसर्जन” कहा जाता है। इस वर्ष के ज्योतिषीय अध्याय के अनुसार गुरु ग्रह और शुक्र की उपस्थिति से पितृ विसर्जन के प्रभाव को बढ़ावा मिलने का आभास हुआ, जिससे श्राद्ध के परिणाम अधिक प्रभावी होंगे।

ज्योतिषाचार्य रासबिहारी उपाध्याय का मानना है कि इस वर्ष के पितृपक्ष में पूर्वजों की आत्मा के लिए “शक्तिवान” ऊर्जा प्राप्त होगी, जिसके कारण श्राद्ध के दौरान दान के फल तेज़ी से मिल सकते हैं। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि “भक्तों को अनावश्यक व्यय से बचना चाहिए और केवल आवश्यक दान ही करना चाहिए।”

सामाजिक क्षेत्र से, पितृपक्ष के दौरान कई धर्मार्थ संगठन ने “कर्मा अभियान” चलाया, जिसमें पिताओं के नाम पर बाल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए धन इकट्ठा किया गया। इस पहल से समाज में दानशीलता के प्रति जागरूकता बढ़ी और पितृपक्ष को एक सामाजिक कार्यक्रम के रूप में भी अपनाया गया।

राजनीतिक दृष्टिकोण से, राज्य सरकार ने पितृपक्ष के दौरान पितृ विसर्जन के लिए विशेष प्रावधान बनाए, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर पवित्र जल के लिए सुरक्षा और स्वच्छता उपाय सुनिश्चित किए गए। इस पहल से राज्य की सामाजिक समरसता को बल मिला और नागरिकों को पवित्र अनुष्ठानों में भाग लेने की सुविधा मिली।

आर्थिक स्तर पर, पितृपक्ष के दौरान पिकनिक और दान कार्यक्रमों में व्यापारियों को लाभ हुआ, विशेषतः पवित्र वस्तुओं, फूलों और धातुओं के व्यापार में। इस कार्यक्रम के दौरान स्थानीय बाजारों में बिक्री में 12 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

सामाजिक प्रभाव के तौर पर, पितृपक्ष ने परिवारों के बीच संबंधों को मजबूती प्रदान की और बुजुर्गों के प्रति सम्मान बढ़ाया। पिताओं की यादों को

Updated: September 27, 2026


Summary: The annual Pitrapaksh, beginning Sunday and concluding on October 10’s new‑moon immersion, saw thousands perform rites for their ancestors, bolstered by astrologer Rasbihari Upadhyay’s claim of heightened planetary influence. State support, charitable drives and a surge in religious‑goods sales turned the observance into a notable social and economic event across the region.

The pithru‑paksh festival draws large community participation, reinforcing social bonds and traditional rites.
Its timing, per astrological guidance, is believed to amplify the spiritual efficacy of ancestral rites and charitable activities.

गयापुर में पितृ पक्ष मेले के लिए नया टेंट सिटी शुरू, बिहार सरकार ने व्यवस्था, सुरक्षा और सुविधाओं को किया मजबूत

गयापुर में आज सुबह को एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जहाँ बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पितृ पक्ष मेले की तैयारियों की समीक्षा की और साथ ही नया तंबू शहर उद्घाटन किया। इस अवसर पर हजारों श्रद्धालु और प्रवासी परिवार एकत्र हुए, जो पितरों को स्मरण करने के लिए इस पावन अवधि में गयापुरी धाम की ओर आकर्षित होते हैं।
मुख्यमंत्री ने उद्घाटन समारोह में कहा कि सरकार इस धार्मिक यात्रा को सुरक्षित, व्यवस्थित और सुविधाजनक बनाने हेतु हर संभव कदम उठा रही है। तंबू शहर के निर्माण से प्रवासियों को ठहरने की उचित सुविधा मिल जाएगी, जिससे भीड़भाड़ और असुविधा में कमी आएगी।पितृ पक्ष, हिन्दू पंचांग के अनुसार, पूर्वजों को स्मरण करने और उन्हें अन्न, फल, जल तथा पिठा अर्पित करने का पवित्र समय है। गयापुरी धाम, जहाँ पवित्र गंगा का संगम है, इस अवधि में देशभर से बड़ी संख्या में भक्तों को आकर्षित करता है। पिछले वर्षों में भीड़भाड़ और अस्थायी आवास की कमी के कारण कई बार असुविधा की रिपोर्टें सामने आई थीं, जिससे प्रशासन को व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता का एहसास हुआ। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए, बिहार सरकार ने पिछले साल से ही पितृ पक्ष मेले के लिए विशेष प्रबंधों की योजना बनाना शुरू किया, जिसमें स्वास्थ्य, सुरक्षा और आवासीय सुविधाएँ प्रमुख रहे हैं।

वर्ष 2023 में गयापुरी धाम में लगभग दो लाख श्रद्धालु पहुँचे थे, जिनमें से कई ने दूरस्थ शहरों से यात्रा की। इस तीव्र प्रवाह ने स्थानीय प्रशासन पर अत्यधिक दबाव डाला था, विशेषकर ट्रैफ़िक प्रबंधन, जल-शौचालय सुविधाएँ और चिकित्सा सहायता के क्षेत्र में। इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, राज्य ने 2024 के पितृ पक्ष मेले के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना

तैयार की, जिसमें तंबू शहर का निर्माण, मोबाइल क्लिनिक, पुलिस बटालियन और आपातकालीन प्रबंध शामिल थे। यह योजना सरकारी विभागों के साथ-साथ निजी एवं सामाजिक संस्थानों के सहयोग से तैयार की गई थी, जिससे समग्र व्यवस्था में सुधार की उम्मीद की जा रही थी।

मुख्यमंत्री ने आज सुबह गयापुरी धाम के प्रवेश द्वार पर स्थित बड़े तंबू शहर का निरीक्षण किया, जहाँ विभिन्न आकार के तंबुओं में श्रद्धालुओं को ठहरने की व्यवस्था की गई है। उन्होंने देखा कि प्रत्येक तंबू को साफ-सुथरा रखा गया है, जल आपूर्ति प्रणाली स्थापित है और बिजली की सुविधाएँ भी उपलब्ध करवाई गई हैं। तंबू शहर के भीतर भोजनालय, शौचालय और प्राथमिक चिकित्सा केंद्र भी स्थापित

हैं, जिनका संचालन स्थानीय स्वास्थ्य विभाग ने किया है। इस निरीक्षण के दौरान, मुख्यमंत्री ने स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी और मेले के आयोजन समिति के प्रमुखों से बातचीत की, जिससे उन्हें कार्यवाही की वास्तविक स्थिति का पता चला।

तंबू शहर के निर्माण में लगभग 1500 मीटर लंबाई का विस्तृत कैनवास उपयोग किया गया है, जिसमें जलरोधक और अग्निरोधी सामग्री का विशेष ध्यान रखा गया है। इस संरचना को स्थानीय कारीगरों ने दो सप्ताह की कठोर मेहनत से स्थापित किया, और आज इसका उद्घाटन किया गया। मुख्यमंत्री ने बताया कि इस तंबू शहर को 30 दिनों तक चलाने की योजना है, जिससे सभी श्रद्धालु मेले के दौरान आरामदायक एवं सुरक्षित माहौल में भाग ले सकेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि मेले के दौरान नियमित रूप से सफाई और रखरखाव कार्य किया जाएगा, ताकि स्वच्छता मानकों को बनाए रखा जा सके।

समारोह में उपस्थित स्थानीय व्यापारियों और विक्रेताओं ने भी तंबू शहर के निर्माण को सराहा, क्योंकि इससे उन्हें स्थायी ठिकाने पर अपनी दुकानें स्थापित करने का अवसर मिला। कई छोटे उद्यमी ने अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए विशेष स्टॉल लगाये, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ होगा। इस पहल से न केवल श्रद्धालुओं को सुविधाएँ मिलेंगी, बल्कि आसपास के गाँवों और कस्बों में रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। इस दिशा में, मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार भविष्य में भी इस प्रकार के मेले में स्थानीय आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए और अधिक उपाय करेगी।

मुख्यमंत्री ने पितृ पक्ष मेले की समग्र व्यवस्था पर अपनी संतुष्टि व्यक्त की और कहा कि यह आयोजन धार्मिक संवेदनाओं के साथ-साथ सामाजिक-सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। उन्होंने स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों को धन्यवाद दिया, जिन्होंने इस बड़े पैमाने पर मेले की तैयारियों को

सफलतापूर्वक संपन्न किया। साथ ही, उन्होंने प्रवासियों को यह संदेश दिया कि वे मेले के दौरान नियमों का पालन करें और सार्वजनिक स्वच्छता को बनाए रखें। इस बात पर बल दिया गया कि सुरक्षा कारणों से पुलिस और ट्रैफ़िक पुलिस ने विशेष रूट और प्रवेश निकास निर्धारित कर रखे हैं, जिससे भीड़ को नियंत्रित किया जा सके।

मेले में उपस्थित प्रमुख धार्मिक नेताओं ने भी इस पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि तंबू शहर की व्यवस्था से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ शारीरिक आराम भी प्राप्त होगा।

Updated: September 25, 2026

The new tent city provides organized accommodation, water, electricity and medical services for the large influx of pilgrims during the Pitri‑Paksh fair.
Its opening aims to reduce crowding, improve sanitation and support local vendors.

मुकेश अंबानी के एंटीलिया में गणेश चतुर्थी: राधिका मर्चेंट के भरतनाट्यम नृत्य से सोशल मीडिया पर धूम मचाई, कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्तर

मुकेश अंबानी के दक्षिण मुंबई स्थित आवास एंटीलिया में कल गणेश चतुर्थी 2026 का समारोह धूमधाम से आयोजित किया गया, जिसमें अंबानी परिवार की छोटी बहू राधिका मर्चेंट ने ‘एकदंताय वक्रतुंडाय’ भजन पर भरतनाट्यम नृत्य की प्रस्तुति दी।
यह प्रस्तुति सोशल मीडिया पर वायरल हो कर बड़ी चर्चा का विषय बन गई, जहाँ दर्शकों ने उनके नृत्य को “जबरदस्त” और “धार्मिक भावना से भरपूर” कहा। इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण राधिका की नृत्य प्रस्तुति और परिवार के साथ उनका सामुदायिक सहभाग था, जिसने समारोह को एक नया आयाम प्रदान किया।राधिका मर्चेंट, जो अंबानी परिवार में नई सदस्य के रूप में प्रवेश कर चुकी हैं, का नृत्य इतिहास और भारतीय शास्त्रीय कला में गहरा संबंध है। वह बचपन से ही भरतनाट्यम की प्रैक्टिस करती आई हैं और कई राष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शन कर चुकी हैं। इस बार उन्होंने पारंपरिक गणेश भजन को आधुनिक अभिव्यक्ति के साथ मिलाकर एक अद्वितीय प्रस्तुति दी, जिससे दर्शकों को धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों ही स्तर पर आनंद मिला। उनका यह कदम पारिवारिक समारोह को सार्वजनिक मंच में बदलने का एक नया प्रयोग माना गया।

एंटीलिया की सजावट में पारंपरिक मराठी वास्तुशिल्प और आधुनिक डिज़ाइन का मिश्रण देखा गया। पूरे परिसर में गणेश जी की मूर्तियों, फूलों और रंगीन लाइटिंग से सजा एक विस्तृत मंच तैयार किया गया था। समारोह में अंबानी परिवार के वरिष्ठ सदस्य, व्यावसायिक साझेदार और कई सामाजिक हस्तियों ने भाग लिया। इस अवसर पर कई प्रमुख उद्यमी और राजनेता भी उपस्थित थे, जिससे यह कार्यक्रम उच्च-स्तरीय सामाजिक और आर्थिक मिलन का मंच बन गया। इस माहौल ने राधिका के नृत्य को और भी प्रभावशाली बना दिया।

राधिका की प्रस्तुति के दौरान उन्होंने गुलाबी और लाल रंग के पारम्परिक परिधान को चुना, जिसमें सूक्ष्म कढ़ाई और जटिल जूते शामिल थे। उनके परिधान की डिज़ाइन को एएनआई न्यूज एजेंसी ने “भव्य और सटीक” बताया, जबकि उनकी नृत्य अभिव्यक्ति को “शुद्ध और तकनीकी रूप से परिपूर्ण” कहा। दर्शकों ने उनके हर कदम को सराहा और कई बार तालियों की गड़गड़ाहट के साथ समर्थन किया। इस प्रस्तुति में उन्होंने शास्त्रीय ताल और आधुनिक संगीत को बखूबी मिश्रित किया, जिससे एक नई शैली का उदय हुआ।

समारोह में प्रस्तुत किए गए ‘एकदंताय वक्रतुंडाय’ भजन के शब्दों को राधिका ने तालबद्ध रूप से अभिव्यक्त किया, जिससे गीत की पवित्रता और नृत्य की ऊर्जा दोनों ही उभरे। नृत्य के दौरान उन्होंने कई जटिल अभियांत्रिकी चरणों को सहजता से पूरा किया, जिससे उनके प्रशिक्षित कौशल का स्पष्ट प्रमाण मिला। इस प्रस्तुति को देख कर कई संगीत और नृत्य विशेषज्ञों ने कहा कि यह शास्त्रीय कला का आधुनिक युग में पुनर्जागरण है। इस प्रकार राधिका ने सांस्कृतिक धरोहर को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उपस्थित पत्रकारों ने इस अवसर को “उच्च सामाजिक वर्गों में सांस्कृतिक पुनर्स्थापन” के रूप में वर्णित किया। उन्होंने बताया कि इस प्रकार के निजी समारोह सार्वजनिक मंच पर लेकर आना, भारतीय सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। इस कार्यक्रम में सामाजिक मीडिया पर लाइव स्ट्रीमिंग भी की गई, जिससे दूरस्थ दर्शकों को भी इस उत्सव का भाग बनने का अवसर मिला। इस डिजिटल पहल ने इस आयोजन को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया, जिससे अधिक लोग भारतीय शास्त्रीय नृत्य के प्रति जागरूक हुए।

राधिका की नृत्य प्रस्तुति पर अंबानी परिवार के प्रमुख सदस्य ने प्रशंसा में टिप्पणी की। मुकेश अंबानी ने व्यक्तिगत रूप से कहा कि “परिवार के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ऐसी प्रतिभा का होना गर्व की बात है” और उन्होंने राधिका को “भविष्य में और भी बड़े मंचों पर देखना चाहते हैं”। अन्य परिवार के सदस्य, जैसे कि धीरु अंबानी, ने भी इस अवसर को “परिवार की एकजुटता और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता” के रूप में वर्णित किया। इन प्रशंसात्मक शब्दों ने राधिका की सामाजिक स्थिति को और मजबूत किया।

सहभागियों में मौजूद प्रमुख उद्यमी और राजनेताओं ने भी इस प्रस्तुति को सराहा। रिलायंस इंडस्ट्रीज के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि “सांस्कृतिक कार्यक्रमों में युवा प्रतिभाओं को मंच देना उद्योग के सामाजिक उत्तरदायित्व का एक भाग है”। मुंबई के मुख्यमंत्री ने सामाजिक मीडिया पर इस कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि “ऐसे आयोजन शहर की सांस्कृतिक विविधता को प्रतिबिंबित करते हैं”। इस प्रकार विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों की प्रतिक्रिया ने इस कार्यक्रम को राष्ट्रीय महत्व दिया।

 

Updated: September 15, 2026


Summary: राधिका मर्चेंट ने एंटीलिया में आयोजित गणेश उत्सव पर ‘एकदंताय वक्रतुंडाय’ गीत पर भरतनाट्यम की प्रस्तुति दी, जो सोशल मीडिया पर बड़ी चर्चा में रही। इस मौके पर मुकेश अंबानी समेत कई प्रमुख हस्तियों ने युवा नृतक के इस प्रदर्शन की सराहना की

Radhika Merchant’s viral Bharatanatyam fuse‑modernizes a sacred hymn, turning a private Ambani gathering into a digital cultural showcase that re‑brands elite social clout as a platform for heritage revival.

 

ठाणे समुद्र तट: सुदर्शन पटनायक ने बनाई पंचमुखी गणेश की रेत की प्रतिमा

ठाणे के समुद्र तट पर गणेश चतुर्थी के अवसर पर रेत से बनी पंचमुखी गणेश प्रतिमा ने स्थानीय जनता और पर्यटकों का ध्यान खींचा। सुदर्शन पटनायक, जो भारत के प्रमुख सैंड आर्टिस्टों में से एक हैं, ने इस कलाकृति को तैयार किया। प्रतिमा की पाँच मुखों में विभिन्न भाव प्रदर्शित होते हैं, जिससे धार्मिक और कलात्मक दोनों आयाम उजागर होते हैं। यह प्रस्तुति उत्सव के आध्यात्मिक माहौल को नई दृश्य अभिव्यक्ति देती है।

गणेश चतुर्थी का उत्सव भारत में हर साल बड़े धूमधाम से मनाया जाता है, और महाराष्ट्र में यह विशेष महत्व रखता है। पिछले कुछ वर्षों में इस महोत्सव में रचनात्मक अभिव्यक्तियों का प्रयोग बढ़ा है, जहाँ पंडाल, झांकियों और सार्वजनिक कला के माध्यम से जनता को आकर्षित किया जाता है। ठाणे का समुद्र तट, जो पहले भी कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का स्थल रहा है, इस वर्ष विशेष रूप से सैंड आर्ट के प्रयोग से अलग पहचान बना रहा है।

सुदर्शन पटनायक ने पहले भी कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर रेत की मूर्तियों से प्रशंसा पाई है। उनकी रचनाएँ अक्सर पर्यावरणीय संदेश देती हैं, लेकिन इस बार उन्होंने धार्मिक तत्व को कला के साथ जोड़कर पंचमुखी गणेश की कल्पना को साकार किया। उन्होंने बताया कि पाँच मुख विभिन्न भावों—शांति, शक्ति, प्रेम, करुणा और आनंद—को दर्शाते हैं, जिससे दर्शकों को आध्यात्मिक अनुभूति मिलती है।

प्रतिमा का निर्माण लगभग दो दिनों में पूर्ण हुआ। कलाकार ने समुद्र तट की सूखी रेत को चुनिंदा रूप से छांटा, फिर विशेष तकनीकों से उसे मोड़कर आकार दिया। निर्माण के दौरान मौसम की स्थिति, रेत की नमी और लहरों की गति को लगातार निगरानी में रखा गया। यह प्रक्रिया स्थानीय मीडिया और सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर लाइव प्रसारित हुई, जिससे बड़ी संख्या में दर्शकों ने इसे रियल‑टाइम में देखा।

स्थानीय प्रशासन ने इस आयोजन को सुदूरन की अनुमति के तहत सुविधाजनक बनाया। ठाणे नगर परिषद ने सुरक्षा, सफाई और भीड़ नियंत्रण के उपायों को प्राथमिकता दी। इसके अलावा, उन्होंने इस कला को शहर के पर्यटन आकर्षण के रूप में प्रमोट करने की योजना बनाई। इस पहल से शहर की आर्थिक सक्रियता में संभावित वृद्धि की उम्मीद है।

स्थानीय व्यापारियों ने इस अवसर को लाभ उठाते हुए भोजन, स्मृति चिन्ह और वस्त्रों की बिक्री में वृद्धि दर्ज की। कई छोटे उद्यमियों ने विशेष रूप से गणेश चतुर्थी के थीम पर आधारित उत्पाद तैयार किए। इस आर्थिक गतिविधि से रोजगार के नए अवसर पैदा हुए, जिससे सामाजिक स्थिरता को बल मिला। साथ ही, पर्यटकों की भीड़ ने स्थानीय सेवाओं की मांग को बढ़ाया।

स्थानीय निवासियों ने इस कलाकृति को सांस्कृतिक धरोहर की तरह सराहा। कई लोगों ने बताया कि पंचमुखी गणेश का दृश्य उनके धार्मिक भावनाओं को नई दिशा देता है। कुछ बुज़ुर्ग नागरिकों ने कहा कि यह रेत की मूर्तिकला पारंपरिक पंडाल से अलग नई पहचान स्थापित करती है। युवा वर्ग ने इसे सामाजिक मीडिया पर साझा करने में उत्साह दिखाया, जिससे डिजिटल जुड़ाव बढ़ा।

राजनीतिक प्रतिनिधियों ने इस कार्यक्रम को सांस्कृतिक एकता के प्रतीक के रूप में उल्लेख किया। ठाणे के विधायक ने कहा कि ऐसी रचनात्मक पहलों से शहर की छवि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उन्नत होती है। राज्य सरकार के संस्कृति विभाग के अधिकारी ने इस प्रयास को विरासत संरक्षण और नवाचार का संगम कहा। उन्होंने भविष्य में समान कार्यक्रमों के लिए समर्थन का आश्वासन दिया।

आर्थिक विश्लेषकों ने इस आयोजन के संभावित प्रभाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि सांस्कृतिक पर्यटन की बढ़ती मांग के साथ, स्थानीय व्यवसायों को लाभ पहुंचाने वाले कार्यक्रमों की आवश्यकता है। रेत की कला जैसी अस्थायी संरचनाएँ शहर के ब्रांड मूल्य को बढ़ा सकती हैं, जिससे निवेशकों का ध्यान आकर्षित होता है। इस तरह के इवेंट्स से सार्वजनिक-निजी साझेदारी की संभावनाएँ भी उभरती हैं।

समाजिक दृष्टिकोण से, इस प्रकार की सार्वजनिक कला स्थानीय समुदाय को एकजुट करती है। विभिन्न सामाजिक समूह इस कलाकृति के चारों ओर मिलकर फोटो खींचते, चर्चा करते और धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेते हैं। इससे सामाजिक बंधन मजबूत होते हैं और सांस्कृतिक विविधता को सम्मान मिलता है। साथ ही, रेत के माध्यम से बनायी गई इस प्रतिमा ने पर्यावरणीय जागरूकता को भी प्रोत्साहित किया, क्योंकि रेत एक पुनर्नवीनीकरण सामग्री है।

विशेषज्ञों ने कहा कि पंचमुखी गणेश की इस रचना में परम्परा और आधुनिकता का संत

Updated: September 14, 2026

मुंबई गणेशोत्सव में सुरक्षा इकाई बढ़ाई, पुलिस ने 16,800 से अधिक कर्मचारियों की तैनाती के लिए दी घोषणा

मुंबई‑फ़ेस्टिवल के मुख्य आकर्षण गणेशोत्सव के अवसर पर शहर में सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने हेतु मुंबई पुलिस ने 16,800 से अधिक कर्मचारियों को तैनात करने की योजना घोषित की है। यह संख्या पिछले वर्षों की तुलना में लगभग दो‑तीन गुना अधिक है और इसका उद्देश्य भीड़‑भाड़ वाले स्थानों पर

क्रमबद्ध नियंत्रण, ट्रैफ़िक प्रबंधन तथा सार्वजनिक व्यवस्था को सुनिश्चित करना है। तैनाती में पुलिस के साथ साथ महिला पुलिस, ट्रैफ़िक पुलिस, थैंपिंग यूनिट और विशेष रूप से नियुक्त सुरक्षा कर्मी शामिल होंगे, जिन्हें विभिन्न प्रमुख स्थानों पर बंटाया जाएगा।

गणेशोत्सव, जो आमतौर पर सितंबर‑अक्टूबर में मनाया जाता है, मुंबई

में सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों का एक बड़ा केंद्र बन चुका है। इस दौरान शहर की सड़कों पर लाखों श्रद्धालु और पर्यटक इकट्ठा होते हैं, जिससे ट्रैफ़िक जाम, भीड़‑भाड़ और असंतुलन की समस्या उत्पन्न होती है। पिछले कुछ वर्षों में भीड़‑संकट के कारण कई बार दंगे और चोरी‑चोरी की

घटनाएँ रिपोर्ट हुई हैं, जिससे पुलिस को सुरक्षा के मानक को लगातार बढ़ाना पड़ता है।

पिछले वर्ष के गणेशोत्सव में, लगभग 10,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती के बावजूद भीड़‑प्रबंधन में कठिनाइयाँ सामने आई थीं। विशेषकर लार्कोवागी, बांधवगढ़, वर्ली और सेंट्रल बॉर्डर पर भीड़‑भाड़ के कारण दुर्घटनाएँ और छोटे‑मोटे अपराध सामने

आए। इस अनुभव के आधार पर इस वर्ष की योजना में सुरक्षा कर्मियों की संख्या को बढ़ाते हुए, विशेष रूप से भीड़‑प्रबंधन में विशेषज्ञता रखने वाली थैंपिंग यूनिट को प्रमुख स्थानों पर तैनात किया जाएगा।

गणेशोत्सव के मुख्य कार्यक्रमों की शुरुआत 18 सितंबर को हुई, जिसमें समुद्र तट पर स्थापित

बड़े पैमाने के पंडालों में प्रथम चरण का पूजा समारंभ आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम के दौरान पुलिस ने प्री‑फ़ेस्टिवल सुरक्षा जाँचें शुरू कर दीं, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर सीसीटीवी कैमरों की संख्या बढ़ाई गई और अस्थायी जांच चौकियों की स्थापना की गई। इसके अतिरिक्त, प्रमुख प्रवेश‑निकास बिंदुओं पर बॅरिकेड

और नियंत्रण बिंदु स्थापित किए गए, जिससे अवैध वस्तुओं और अवांछित भीड़ को रोकने में मदद मिली।

समारोह के पहले दिन, लार्कोवागी के प्रमुख पंडाल के आसपास 2,500 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई, जिसमें 200 महिला पुलिस को भी शामिल किया गया। इस व्यवस्था के तहत भीड़‑प्रबंधन के लिए

दो‑तीन किलोमीटर तक की परिधि में सुरक्षा बाड़ें लगाई गईं, और भीड़‑भाड़ को नियंत्रित करने हेतु सिग्नलिंग उपकरण और ध्वनि संकेतक स्थापित किए गए। यह कदम स्थानीय प्रशासन और पुलिस के संयुक्त प्रयास से संभव हुआ, जिसका उद्देश्य सुरक्षा जोखिम को न्यूनतम स्तर पर रखना था।

उसी ही दिन,

वर्ली के किनारे स्थापित पंडाल के पास भी 2,300 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई, जहाँ ट्रैफ़िक को सुगमता से चलाने के लिए विशेष ट्रैफ़िक पुलिस की इकाइयाँ तैनात की गईं। इस प्रक्रिया में मुख्य सड़कों को एक‑एक कर बंद कर वैकल्पिक मार्गों का निर्माण किया गया, जिससे भीड़‑भाड़ को दूर

रखा जा सके। साथ ही, सार्वजनिक परिवहन के प्रमुख बिंदुओं पर अतिरिक्त रैंच स्थापित किए गए, जिससे यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा दोनों सुनिश्चित हुई।

इन सुरक्षा उपायों पर मुंबई पुलिस के महानिदेशक अजय शर्मा ने कहा कि “गणेशोत्सव के दौरान सार्वजनिक सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है। इस वर्ष हम

अधिक सख्त सुरक्षा मानक लागू कर रहे हैं, जिससे नागरिकों को बिना किसी भय के उत्सव मनाने का अवसर मिले।” उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस ने विशेष रूप से भीड़‑प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित थैंपिंग इकाइयों को सक्रिय किया है, जो भीड़‑भाड़ वाले क्षेत्रों में शांति बनाए रखने में सक्षम

होंगी।

शहर के प्रमुख व्यवसायिक संघ, मुंबई चैंबर ऑफ कॉमर्स और इंडस्ट्री (MCCI) ने भी पुलिस की इस पहल की सराहना की। MCCI के अध्यक्ष ने बताया कि “विस्तारित सुरक्षा व्यवस्था न केवल नागरिकों की सुरक्षा को बढ़ाएगी, बल्कि व्यवसायिक गतिविधियों को भी स्थिर रखेगी। इस दौरान शॉपिंग मॉल,

रेस्तरां और होटल में भीड़‑भाड़ के कारण संभावित नुकसान को रोका जा सकेगा।” उन्होंने कहा कि सुरक्षा की इस ठोस योजना से पर्यटकों का भरोसा बढ़ेगा और आर्थिक लाभ में भी इजाफा होगा।

गणेशोत्सव के प्रमुख आयोजकों में से एक, लार्कोवागी पंडाल ट्रस्ट के प्रमुख ने पुलिस की विस्तृत

तैयारी को “एक सकारात्मक कदम” बताया। उन्होंने कहा कि “बढ़ी हुई पुलिस उपस्थिति और ट्रैफ़िक नियंत्रण से हमें अपने कार्यक्रम को सुरक्षित और सुचारू रूप से संचालित करने में मदद मिलेगी। हम भी अपने स्वयं के सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ करेंगे, जैसे कि प

Updated: September 13, 2026


Mumbai police will deploy over 16,800 officers – including women, traffic units and specialised thumping squads – to tighten crowd control, traffic flow and overall security for the upcoming Ganeshotsav, a three‑fold increase from previous years. The heightened deployment aims to curb past incidents of unrest and crime at key sites such as Larkovagi, Bhandhgaon, Worli and the Central Border, ensuring a safer festive atmosphere for millions of devotees and tourists.

The deployment of over 16,800 police personnel, including specialized units, expands crowd‑control and traffic‑management capacity for the Ganeshotsav celebrations.
Enhanced security measures aim to maintain public order and protect economic activities during the high‑attendance festival.

दुर्गा पूजा, दीपावली व छठ के लिए रेलवे ने 18 स्पेशल पूजा ट्रेनें शुरू कीं

दिल्ली, कोलकाता और सियालदह से बिहार तक विशेष रूप से दुर्गा पूजा, दीपावली और छठ पूजा के दौरान यात्रियों की बढ़ती भीड़ को ध्यान में रख कर भारतीय रेलवे ने 18 विशेष पूजा ट्रेनों का आयोजन किया है। इन ट्रेनों को विभिन्न प्रमुख रूटों पर चलाने का निर्णय इस वर्ष की सबसे बड़ी धार्मिक यात्रा सुविधा

के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सरकारी सूचना विभाग के आंकड़ों के अनुसार, विशेष रूप से पूर्वी भारत में इन तीन प्रमुख त्यौहारों के दौरान रेलवे को पहले से अधिक यात्रियों की मांग का सामना करना पड़ रहा था, जिससे इस पहल की आवश्यकता स्पष्ट हुई।

पिछले कई वर्षों में धार्मिक त्यौहारों के मौसम

में रेलवे को भारी भीड़, सीटों की कमी और अस्थायी प्लेटफ़ॉर्म समस्याओं का सामना करना पड़ा है। विशेष रूप से दुर्गा पूजा और छठ के समय, उत्तर भारत और पूर्वी भारत के बीच प्रवास की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। 2022‑23 में रेलवे की आधिकारिक रिपोर्ट में बताया गया कि इन तीन प्रमुख त्यौहारों

के दौरान कुल यात्रियों की संख्या सामान्य महीने की तुलना में 35 % अधिक रही। ऐसी स्थितियों में यात्रियों को असुविधा और देरी का सामना करना पड़ा, जिससे रेलवे ने इस साल के लिए विशेष ट्रेनों की योजना बनाई।

संबंधित पृष्ठभूमि को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के

कई जिलों में धार्मिक उत्सवों की अवधि में प्रवास का पैटर्न पारंपरिक रूप से रेलवे पर निर्भर रहा है। इन क्षेत्रों की आर्थिक संरचना कृषि और छोटे उद्योगों पर आधारित है, जिससे लोग अपने घरों में आयोजित पूजा‑समारोहों में भाग लेने के लिये अक्सर दूरस्थ शहरों से यात्रा करते हैं। इस प्रवास की मुख्य रूटें हावड़ा‑रक्सौल,

सियालदह‑पटना और कोलकाता‑पटना के बीच हैं, जो पहले ही भीड़‑भाड़ की समस्या को उजागर करती थीं।

रेलवे ने इस बार 18 विशेष पूजा ट्रेनों को विभिन्न वर्गों में विभाजित किया है। इनमें एसी, एसी 2‑तीर और सामान्य वर्ग की ट्रेनें शामिल हैं, जिससे सभी वर्ग के यात्रियों को सुविधाजनक यात्रा का विकल्प मिल सके। हावड़ा‑रक्सौल रूट

पर 03041 और 03042 क्रमांक की दो ट्रेनें 15 अक्टूबर से 26 नवंबर तक चलेंगी, जिनमें प्रमुख स्टेशनों जैसे झाजा, सियालदह और बोधगया पर ठहराव तय है। इसी प्रकार कोलकाता‑पटना रूट पर भी चार स्पेशल ट्रेनों को निर्धारित किया गया है, जो सभी प्रमुख बिंदुओं पर कम से कम दो घंटे का विराम देंगी।

आसनसोल मंडल के

सूचना पदाधिकारी आशीष कुमार सिंह ने बताया कि इन विशेष ट्रेनों की योजना में यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा को मुख्य मानदंड बनाया गया है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक ट्रेन में अतिरिक्त बगल‑बगल बाथरूम, पावर आउटलेट और स्वच्छता सुविधाओं को बढ़ाया गया है। साथ ही, टिकट बुकिंग की प्रक्रिया को डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सरल बनाया गया

है, जिससे ऑनलाइन आरक्षण की दर में 20 % की वृद्धि की उम्मीद है। इन उपायों के माध्यम से रेलवे ने भीड़‑भाड़ को कम करने और यात्रियों के अनुभव को बेहतर बनाने का लक्ष्य रखा है।

मुख्य घटनाक्रम में यह भी उल्लेखनीय है कि रेलवे ने इन स्पेशल ट्रेनों के लिए विशेष रूप से अतिरिक्त स्टाफ़

की व्यवस्था की है। प्रत्येक रूट पर दो अतिरिक्त नियंत्रक और सुरक्षा गार्ड नियुक्त किए गए हैं, जो यात्रियों की सहायता और आपातकालीन स्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करेंगे। इसके अलावा, ट्रेन संचालन के दौरान रियल‑टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम को सक्रिय किया गया है, जिससे ट्रेन की गति, समय‑सारिणी और प्लेटफ़ॉर्म की स्थिति को निरंतर अपडेट किया

जा सके। इस तकनीकी समर्थन से संभावित देरी को न्यूनतम किया जा रहा है।

इन ट्रेनों के बारे में विभिन्न सामाजिक समूहों की प्रतिक्रियाएँ मिश्रित रही हैं। धार्मिक यात्रियों ने इस कदम को सराहा, यह कहा कि अब उन्हें भीड़‑भाड़ के कारण यात्रा में असुविधा नहीं होगी। वहीं कुछ यात्रियों ने टिकट की कीमत में

संभावित वृद्धि के प्रति चिंता जताई, क्योंकि विशेष ट्रेनों में एसी वर्ग की कीमतें सामान्य ट्रेनों की तुलना में अधिक रखी गई हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ स्थानीय व्यापारी ने आशा व्यक्त की कि बढ़ी हुई यात्रियों की संख्या से उनके व्यापार में भी सुधार होगा, विशेषकर स्टेशन के निकट स्थित खाद्य और वस्तु विक्रेताओं को।

रेलवे अधिकारियों ने इन प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए मूल्य निर्धारण में लचीलापन दिखाने का आश्वासन दिया। केंद्रीय रेल मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि विशेष ट्रेनों के किराए को आर्थिक वर्ग के यात्रियों के लिये सुलभ रखने की पूरी कोशिश की जाएगी, साथ ही एसी वर्ग में अधिक सुविधा प्रदान करने के लिये अतिरिक्त

शुल्क उचित माना गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इन ट्रेनों की आय का एक हिस्सा सामाजिक विकास परियोजनाओं में पुनः निवेश किया जाएगा।

राजनीतिक दायरे में इस कदम को कई नेताओं ने सकारात्मक रूप से देखा है। बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा कि यह पहल

Updated: September 13, 2026


Indian Railways will run 18 special “puja” trains across key eastern routes from mid‑October to late November, adding extra coaches, staff and digital ticketing to ease the surge of pilgrims during Durga Puja, Diwali and Chhath. The move, hailed by travelers and officials, aims to cut overcrowding while keeping fares affordable for budget passengers.

The special pilgrimage trains increase capacity during peak festival periods, addressing the 35 % surge in passenger volumes reported by Indian Railways. Enhanced amenities and staffing aim to reduce crowding and improve travel reliability on key eastern routes.

मुंबई में गणेशोत्सव पंडाल निर्माण की लागत ₹1,250 कोड़, ₹3,400 कोड़ की आय की उम्मीद

मुंबई, 12 सितंबर 2026 – इस वर्ष का गणेश उत्सव, जो 14 सितंबर से शुरू हो रहा है, शहर के आर्थिक और सामाजिक दायरे में विस्तृत प्रभाव डाल रहा है। नगर निगम ने लगभग ₹ 1,250 कोड़ की लागत अनुमानित करते हुए 350 से अधिक पंडालों के निर्माण, प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था और ट्रैफ़िक प्रबंधन के लिए

बजट आवंटित किया है। इस वित्तीय भार के बावजूद, स्थानीय व्यापारियों और उद्योगों ने इस त्योहारी माह को आर्थिक अवसर के रूप में देख कर अतिरिक्त निवेश करने का इरादा जताया है। कुल मिलाकर, इस वर्ष के गणेशोत्सव से मुंबई के रिटेल, आतिथ्य और परिवहन क्षेत्रों में लगभग ₹ 3,400 कोड़ की आय

की उम्मीद की जा रही है।

गणेशोत्सव की पृष्ठभूमि में मुंबई की बहु‑सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक परम्पराओं का गहरा सम्बन्ध है। 1950 के दशक से शहर में पंडाल निर्माण की परम्परा विकसित हुई, जिसके बाद से यह न केवल धार्मिक आस्था बल्कि आर्थिक सक्रियता का भी प्रमुख स्रोत बन

गया। प्रत्येक वर्ष, पंडालों की संख्या और सजावट के स्तर में वृद्धि होती आई है, जिससे निर्माण, डिज़ाइन और सामग्री आपूर्ति में स्थानीय उद्योगों को बड़ी मात्रा में ऑर्डर मिलते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, 2026 का उत्सव भी इस परम्परा को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है,

जहाँ नई तकनीकी समाधान और पर्यावरण‑संकल्पित उपायों को अपनाया जा रहा है।

पिछले दो दशकों में, मुंबई में गणेश पंडालों की कुल लागत में वार्षिक औसत ₹ 300 कोड़ से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। इस वृद्धि का मुख्य कारण पंडालों की आकार, सजावट की जटिलता और सुरक्षा मानकों में

सुधार है। साथ ही, शहर की जनसंख्या और पर्यटन के विस्तार ने इस खर्च को औचित्य प्रदान किया है। आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, इस खर्च को केवल धार्मिक खर्च नहीं बल्कि सार्वजनिक‑निजी सहयोग का एक मॉडल माना जा सकता है, जहाँ सरकारी निकाय, निजी कंपनियां और सामाजिक संगठनों का सहयोग

मिलजुल कर उत्सव को साकार करता है।

उत्सव के प्रमुख पंडालों में ‘लालबागचा राजा’ को सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाला बताया गया है। इस पंडाल का निर्माण 250 किलोमीटर लंबी काँच‑फ्लोअर संरचना और LED‑आधारित प्रकाश व्यवस्था से किया गया है, जिसकी कुल लागत ₹ 85 कोड़ अनुमानित है। पंडाल के डिजाइन में

आधुनिक वास्तुशिल्प और पारंपरिक महाराष्ट्रीय शैली का मिश्रण किया गया है, जिससे यह युवा वर्ग में विशेष लोकप्रियता हासिल कर रहा है। निर्माण कार्य में 1,200 से अधिक स्थानीय कारीगर और 300 व्यावसायिक ठेकेदार शामिल हैं, जो रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

‘मुंबईचा राजा’ पंडाल, जो अंधेरी के

निकट स्थित है, ने ऐतिहासिक थीम को अपनाते हुए 19वीं सदी के मराठी राजवाड़े की झलक पेश की है। इस पंडाल की निर्माण लागत ₹ 68 कोड़ बताई जा रही है, जिसमें प्रमुख रूप से पुनर्नवीनीकरण लकड़ी और बायोडिग्रेडेबल सामग्री का उपयोग किया गया है। पर्यावरणीय जागरूकता को देखते हुए, इस पंडाल में

जल‑संकलन प्रणाली और सौर पैनल स्थापित किए गए हैं, जो ऊर्जा खपत को 30 प्रतिशत तक कम करने का लक्ष्य रखते हैं। इस पहल को पर्यावरण मंत्रालय ने भी सराहा है और इसे सतत विकास के एक मॉडल के रूप में मान्यता दी है।

‘GSB Seva Mandal’ द्वारा आयोजित पंडाल

में धार्मिक और सांस्कृतिक तत्वों का समन्वय देखा गया है। इस पंडाल की सजावट में प्राचीन शिल्प और शास्त्रीय संगीत को मिलाकर एक समग्र अनुभव प्रदान किया गया है। कुल निर्माण लागत ₹ 55 कोड़ रही, जिसमें मुख्यतः स्थानीय कलाकारों की प्रतिपूर्ति और सामग्री की आयात शामिल है। इस पंडाल के प्रबंधक ने

बताया कि उन्होंने इस वर्ष अधिकतम दर्शकों को आकर्षित करने के लिए डिजिटल प्रोजेक्शन और इंटरैक्टिव स्क्रीन स्थापित किए हैं, जिससे युवा वर्ग में इस पंडाल की लोकप्रियता बढ़ी है।

पंडालों की अंतिम रूपरेखा के दौरान, नगर निगम की सुरक्षा विभाग ने 25,000 से अधिक सुरक्षा कर्मियों और 2,000 ड्रोन निगरानी

उपकरणों की तैनाती की घोषणा की है। इस व्यवस्था का उद्देश्य भीड़‑भाड़, जलजला और आतंकवादी जोखिमों को न्यूनतम करना है। साथ ही, सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग ने इस अवसर पर वैक्सीनेशन कैंप और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की विस्तृत योजना बनाई है, जिससे संभावित स्वास्थ्य संकटों से निपटा जा सके। इन उपायों

से न केवल नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हुई है, बल्कि शहर के प्रतिरूपित पर्यटन स्थलों में विश्वास भी बना रहता है।

पंडालों के निर्माण में प्रमुख सामग्री आपूर्तिकर्ता और निर्माण कंपनियों ने इस वर्ष की माँग में

Updated: September 13, 2026


Mumbai’s 2026 Ganesh Utsav, launching on Sept 14, sees the municipal body earmark roughly ₹1,250 crore for over 350 pandals, lighting, security and traffic, while retailers, hospitality and transport firms anticipate a ₹3,400 crore boost. The festival blends high‑tech, eco‑friendly designs—like the LED‑laden “Lalbaugcha Raja” and recycled‑material “Mumbai cha Raja”—with massive security deployments and public

Insight: The festival’s ₹ 1,250 crore municipal budget and projected ₹ 3,400 crore economic boost illustrate its role as a significant driver of employment, commerce and tourism in Mumbai.

Its large‑scale public‑private coordination, including advanced security and sustainability measures, showcases a model for managing high‑attendance civic events.

गणेश चतुर्थी पर 14 सितंबर को महाराष्ट्र में स्कूल बंद, कर्नाटक में खुला, उत्तर प्रदेश में मिश्रित स्थिति बनी रहेगी।

कल स्कूल की छुट्टी के बारे में अटकलें चल रही हैं, क्योंकि 14 सितंबर को गणेश चतुर्थी का पावन पर्व मनाया जाएगा। कई राज्य सरकारों ने इस अवसर को सार्वजनिक अवकाश की सूची में शामिल किया है, परंतु शैक्षणिक संस्थानों की कार्यवाही में विविधता देखी जा रही है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और कुछ उत्तर प्रदेश के जिलों में विद्यालय बंद

रहने की संभावना है, जबकि अन्य राज्यों में स्कूल सामान्य कार्य दिवस माना जा रहा है। इस अंतर के कारण अभिभावक और विद्यार्थियों के बीच भ्रम उत्पन्न हुआ है, जिससे आधिकारिक आदेश की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है। इस लेख में विभिन्न राज्य सरकारों के निर्देश, शिक्षण संस्थानों की नीतियों और संभावित सामाजिक‑आर्थिक प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण

प्रस्तुत किया गया है।

गणेश चतुर्थी भारत के कई हिस्सों में धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व का पर्व है, जिसका आयोजन मुख्यतः महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, गोवा और मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में बड़े उत्साह के साथ किया जाता है। यह तिथि हिन्दू पंचांग के अनुसार शुक्ल पक्ष की आठवीं तिथि पर पड़ती है, और इसे भगवान गणेश की

कृपा प्राप्त करने के लिये विशेष पूजा, रथ यात्रा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ मनाया जाता है। वर्षों से यह पर्व न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों को भी गति देता आया है, जिससे कई सार्वजनिक संस्थानों में कार्य समय में परिवर्तन होता रहा है।

भारत सरकार ने प्रत्येक वर्ष के सार्वजनिक अवकाश को निर्धारित करने

के लिये केंद्रीय और राज्य स्तर पर एक समन्वय समिति स्थापित की है। इस समिति के आदेशों के अनुसार, यदि कोई पर्व राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हो तो वह केंद्रीय अवकाश बनता है, अन्यथा प्रत्येक राज्य अपनी सामाजिक-धार्मिक परिस्थितियों के आधार पर अतिरिक्त छुट्टियों की घोषणा करता है। 2026 की कैलेंडर में गणेश चतुर्थी को आधिकारिक रूप से

सार्वजनिक अवकाश के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, परंतु इस पर राज्य‑स्तर के शैक्षणिक निर्णय अभी भी जारी नहीं किए गये हैं।

महाराष्ट्र सरकार ने 14 सितंबर को सार्वजनिक अवकाश के रूप में मान्यता दी है और साथ ही राज्य के सभी सरकारी स्कूलों को बंद रहने का आदेश जारी किया है। यह निर्णय शिक्षा विभाग के सचिवालय

द्वारा जारी एक आधिकारिक नोटिस में स्पष्ट किया गया है, जिसमें कहा गया है कि इस तिथि को सभी प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक संस्थानों में सामान्य कार्य नहीं होगा। हालांकि निजी विद्यालयों को इस निर्देश का पालन करना अनिवार्य नहीं माना गया, परंतु कई प्रमुख निजी शैक्षणिक संस्थानों ने भी समान रूप से छुट्टी देने का संकेत दिया

है।

कर्नाटक में भी गणेश चतुर्थी को सार्वजनिक अवकाश के रूप में सूचीबद्ध किया गया है, परंतु शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि स्कूलों को इस दिन खुला रहने की अनुमति है। यह नीति मुख्यतः राज्य के शैक्षणिक कैलेंडर में पहले से निर्धारित परीक्षाओं और सत्र की समाप्ति की तिथियों को ध्यान में रखकर बनाई गई है।

निजी विद्यालयों ने इस दिशा‑निर्देश का पालन कर या नहीं कर, यह प्रत्येक संस्थान की प्रबंधन नीति पर निर्भर करता है। तेलंगाना में भी समान स्थिति है, जहाँ सार्वजनिक कार्यालय बंद रहने के बावजूद कई स्कूल खुले रहने की घोषणा कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में गणेश चतुर्थी को स्थानीय स्तर पर विशेष महत्व दिया

जाता है, परंतु राज्य सरकार ने इसे सार्वभौमिक सार्वजनिक अवकाश नहीं घोषित किया है। इसलिए स्कूलों की कार्यवाही में विविधता स्पष्ट है; कुछ जिलों में छुट्टी दी जा रही है, जबकि अन्य में शिक्षण जारी रहेगा। इस असंगतता के कारण अभिभावकों ने सामाजिक मंचों पर अपने प्रश्न उठाए हैं, जिससे शिक्षा विभाग को स्पष्ट उत्तर देने का दबाव बढ़ा

है।

विभिन्न राज्य सरकारों के आदेशों के अलावा, केंद्रीय बोर्ड ऑफ मिडिया एडुकेशन (CBME) ने भी इस तिथि पर शैक्षणिक कैलेंडर में संभावित बदलावों की सूचना जारी की है। उन्होंने कहा है कि यदि कोई राज्य स्कूलों को बंद रखने का निर्णय लेता है, तो वह उस तिथि को पुनः शिक्षण सत्र में समाहित करने के लिये अतिरिक्त

कक्षाएँ या वैकल्पिक तिथि निर्धारित कर सकता है। इस प्रकार का लचीलापन शैक्षणिक निरंतरता को बनाए रखने के लिये आवश्यक माना गया है।

विद्यार्थी अभिभावकों ने सोशल मीडिया पर विभिन्न अफ़वाहों के कारण भ्रमित होने की शिकायत की है। कई समूहों में कहा गया कि सभी स्कूल बंद रहेंगे, जबकि अन्य में बताया गया कि केवल सरकारी संस्थानों

में ही छुट्टी होगी। इस स्थिति को देखते हुए कई विद्यालयों ने अपने आधिकारिक वेबसाइटों और सूचना बोर्डों पर स्पष्ट सूचनाएँ पोस्ट की हैं। उदाहरण के तौर पर मुंबई के एक प्रमुख निजी स्कूल ने बताया कि वह गणेश चतुर्थी पर अपनी नियमित कक्षाओं को जारी रखेगा, परंतु अतिरिक्त सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करेगा।

शिक्षकों की संघों ने भी

इस विषय पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। महाराष्ट्र में शिक्षक संघ ने कहा है कि सार्वजनिक अवकाश के कारण वे अपने पारिवारिक कर्तव्यों को बेहतर रूप से निभा सकेंगे, जिससे मनोवैज्ञानिक लाभ होगा। वहीं कर्नाटक के शिक्षक संघ ने इस बात पर जोर दिया कि शैक्षणिक कैलेंडर

Updated: September 13, 2026


School closures on Ganesh Chaturthi vary across India, with Maharashtra confirming a full holiday for all government schools, while Karnataka and Telangana keep institutions open and Uttar Pradesh’s decision differs by district. The patchwork of state directives has sparked confusion among parents and students, prompting calls for clear official guidance.

बिहार में दशहरा‑दीपावली‑छठ के लिए 1‑Oct से 30‑Nov तक 400 स्पेशल ट्रेनें चलाने का रेलवे बोर्ड ने मंजूर किया

बिहार में दशहरा, दीपावली और छठ महापर्व के आगमन के साथ भारतीय रेलवे ने 1 अक्टूबर से 30 नवंबर तक 400 ट्रिप स्पेशल ट्रेनों को चलाने का प्रस्ताव पारित किया, जिससे प्रवासी यात्रियों को व्यापक राहत मिलने की उम्मीद है। इस पहल से दिल्ली, चंडीगढ़, फिरोजपुर कैंट, ऋषिकेश सहित दस से अधिक प्रमुख

शहरों से बिहार के विभिन्न जंक्शन तक सीधी कनेक्टिविटी प्रदान की जाएगी, जिससे यात्रियों का समय‑सारिणी में सुधार और भीड़भाड़ में कमी आएगी। इस कदम को भारतीय रेलवे बोर्ड ने राष्ट्रीय यात्रा‑सुविधा को सुदृढ़ करने के हिस्से के रूप में मान्य किया है।

दशहरा, दीपावली और छठ का महापर्व भारत के उत्तर‑पूर्वी

क्षेत्र में सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों को तीव्रता से बढ़ाता है, विशेषकर बिहार में जहाँ प्रवासी जनसंख्या का प्रवाह बड़ी मात्रा में रहता है। पिछले वर्षों में इन त्यौहारों के दौरान सामान्य ट्रेनों में अत्यधिक भीड़, देरियों और असुविधा की शिकायतें सुनने को मिली थीं, जिससे यात्रियों की सुरक्षा और आराम को लेकर

चिंताएँ उत्पन्न हुई थीं। इस संदर्भ में, रेलवे ने विशेष रूप से इन महापर्वों को ध्यान में रखकर अतिरिक्त कोच, बेहतर एटीएम सुविधा और सफाई व्यवस्था को भी सम्मिलित किया है।

इतिहास में, रेलवे ने बड़े त्यौहारों के अवसर पर विशेष ट्रेनों की व्यवस्था करके सामाजिक-आर्थिक स्थिरता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण

भूमिका निभाई है। 2017 में दीपावली के दौरान चलायी गयी 250 स्पेशल ट्रेनों ने यात्रियों को समय पर गंतव्य तक पहुँचाने में मदद की थी, जिससे आर्थिक गतिविधियों में तेज़ी आई। वर्तमान योजना में 400 ट्रिप की संख्या पिछले रिकॉर्ड को पार करती है, जिससे यह संकेत मिलता है कि रेलवे ने इस

बार मांग‑आधारित योजना को अपनाया है, जिससे यात्रियों को अधिक विकल्प और लचीलापन मिलेगा।

स्पेशल ट्रेनों की शेड्यूलिंग में प्रमुख मार्गों को प्राथमिकता दी गई है। दिल्ली से पटना, गोरखपुर, बक्सर और भागलपुर तक प्रतिदिन दो-तीन ट्रेनों का संचालन होगा, जबकि चंडीगढ़ से गयापूर, मोसिनर और नालंदा तक भी समान व्यवस्था रखी

गई है। ऋषिकेश से बिहार के कई प्रमुख शहरों तक विशेष रूप से धार्मिक यात्रियों को ध्यान में रख कर ट्रेनें तैनात की गई हैं। इन ट्रेनों में एसी, स्लीपर और जनरल क्लास के कोच उपलब्ध होंगे, जिससे विभिन्न वर्ग के यात्रियों को सुविधा मिल सकेगी।

रेलवे ने यात्रियों की सुरक्षा को

सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा कर्मियों की तैनाती, सिडी‑ट्रेन प्रबंधन प्रणाली और रियल‑टाइम मॉनिटरिंग को लागू करने का भी निर्देश दिया है। प्रत्येक स्टेशन पर सूचना बोर्ड और मोबाइल ऐप के माध्यम से ट्रेन के समय‑सारिणी, प्लेटफ़ॉर्म बदल और यात्रा‑स्थिति की अद्यतित जानकारी दी जाएगी। इस डिजिटल पहल से यात्रियों को अनावश्यक

प्रतीक्षा और भ्रम से बचने में मदद मिलेगी।

ट्रेन संचालन के दौरान, रेलवे ने खाद्य एवं पेय व्यवस्था में भी सुधार करने का इरादा व्यक्त किया है। विशेष रूप से यात्रियों की विविध जरूरतों को देखते हुए, वैजिटेरियन तथा नॉन‑वैजिटेरियन विकल्पों के साथ शाकाहारी भोजन, ताज़ा जल और स्वच्छ शौचालय उपलब्ध कराए

जाएंगे। इस पहल का उद्देश्य यात्रा अनुभव को सुखद बनाना और सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों को बनाए रखना है, विशेषकर त्यौहारों के दौरान बड़ी भीड़ के संदर्भ में।

इन परिवर्तनों पर विभिन्न हितधारकों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है। दिल्ली रेलवे स्टेशनों के प्रबंधक ने कहा कि इस योजना से प्रवासी यात्रियों को

बड़ी सुविधा मिलेगी और दिल्ली‑बिहार मार्ग की भीड़भाड़ में कमी आएगी। चंडीगढ़ के स्थानीय व्यापारियों ने आशा जताई कि बेहतर कनेक्टिविटी से व्यापारिक लेन‑देन में वृद्धि होगी। बिहार में पर्यटन विभाग ने बताया कि छठ महापर्व के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि को देखते हुए, यह कदम आर्थिक लाभ को बढ़ावा देगा।

राज्य सरकार के प्रमुख अधिकारी भी इस पहल को सराहते हुए कहा कि रेलवे द्वारा प्रदान की गई स्पेशल ट्रेनों से बिहार के सामाजिक-आर्थिक विकास को नई दिशा मिलेगी। विशेष रूप से, ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों तक के प्रवास को सुगम बनाने से रोजगार के अवसरों में सुधार होगा और मौसमी कार्यकर्ता

अपने परिवारों के साथ समय बिता सकेंगे। इस संदर्भ में, बिहार के मुख्य मंत्री ने कहा कि सरकार भी इस अवधि में सार्वजनिक परिवहन के समर्थन को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त बस्क सेवाएँ प्रदान करेगी।

वित्तीय विश्लेषकों ने बताया कि इन स्पेशल ट्रेनों से भारतीय रेलवे के राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि

की संभावना है। टिकट बिक्री, कैटरिंग और विज्ञापन आय में वृद्धि के साथ ही, यात्रियों के संतुष्टि स्तर में सुधार से दीर्घकालिक रूप से ग्राहक आधार मजबूत होगा। इसके अतिरिक्त, रेलवे ने इस अवधि में डिजिटल बुकिंग एवं मोबाइल पेमेंट की दर बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, जिससे नकद ले

Updated: September 13, 2026

दिल्ली-बिहार पर दशहरा, दिवाली-छठ के लिए 4 ‘पूजा स्पेशल’ ट्रेनें

दिल्ली‑बिहार के बीच दुर्गापूजा, दीपावली और छठ के अवसर पर चार नई जोड़ी “पूजा स्पेशल” ट्रेनों का परिचालन तय हुआ, जिससे यात्रा की भीड़भाड़ में कमी की उम्मीद है। नई दिल्ली से आरम्भ होकर आरा जंक्शन तक का यह मार्ग, विशेषकर त्योहारों के दौरान राजधानी से उत्तर प्रदेश‑बिहार के प्रवासियों को सुविधा प्रदान करेगा। रेल मंत्रालय ने इस कदम को यात्रियों की सुरक्षा और समयबद्धता सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल बताया।

बीतते कई वर्षों में दिल्ली‑बिहार रेलमार्ग पर यात्रियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। विशेषकर दुर्गापूजा, दीपावली और छठ जैसे प्रमुख त्यौहारों के समय, प्रवासियों की भीड़ अत्यधिक होती है और कई बार ट्रेनें ओवरबुक हो जाती हैं। इस पृष्ठभूमि में, भारतीय रेल ने 2024‑25 वित्तीय वर्ष के अंतर्गत इस मार्ग के लिए अतिरिक्त कोच और नई ट्रेनें जोड़ने का प्रस्ताव रखा, जिसका मुख्य उद्देश्य भीड़ नियंत्रण और यात्रियों की सुविधा है।

आरा जंक्शन, जो उत्तर प्रदेश‑बिहार की सीमा पर स्थित है, इस बार चार नई जोड़ी विशेष ट्रेनों का हब बन जाएगा। इन ट्रेनों में प्रत्येक कोच में एसी, सेक्शनल स्लीपर और सामान्य वर्ग के विकल्प उपलब्ध होंगे, जिससे विभिन्न आर्थिक वर्ग के यात्रियों को समान अवसर मिलेगा। प्रारम्भिक योजना के अनुसार, ये ट्रेनें दुर्गापूजा के पहले सप्ताह में चालू होंगी, उसके बाद दीपावली और छठ के दौरान अतिरिक्त सेवाएँ प्रदान की जाएँगी।

पहली पूजा स्पेशल ट्रेन ने 30 सितंबर को नई दिल्ली से प्रस्थान किया, जिसमें लगभग 1,200 यात्रियों ने सीटें बुक कीं। ट्रेन में यात्रा करते समय कई परिवारों ने अपने बच्चों को साथ लाकर उत्सव के माहौल को जीवंत किया। एक वरिष्ठ यात्री, रामकुमार सिंह, ने कहा कि “पहले हमें दो‑तीन घंटे का इंतजार करना पड़ता था, अब नई ट्रेन से यात्रा आरामदायक और समय पर होगी।” उनकी बातों में यह स्पष्ट था कि इस नई सुविधा से उनका मनोबल बढ़ा है।

दूसरी ट्रेन का संचालन 2 अक्टूबर को हुआ, जब दिल्ली से लगभग 1,500 यात्रियों ने इस सेवा का लाभ उठाया। ट्रेन के भीतर एक विशेष पूजा कक्ष भी स्थापित किया गया, जहाँ यात्रियों को छोटे‑छोटे धार्मिक अनुष्ठान करने की सुविधा दी गई। इस पहल को कई धर्मशास्त्री ने सकारात्मक रूप से देखा, क्योंकि इससे यात्रा के दौरान भी आध्यात्मिक संतुष्टि प्राप्त हो सकती है। यात्रियों ने बताया कि इस व्यवस्था ने उन्हें यात्रा के तनाव को कम किया।

तीसरी और चौथी ट्रेनें क्रमशः 5 और 7 अक्टूबर को चलायी गईं, और इनका भराव भी लगभग पूरी क्षमता पर रहा। इन यात्राओं में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त सुरक्षा गार्ड और मेडिकल टीम तैनात की गई। रेलवे अधिकारियों ने बताया कि इस विशेष पहल में सफ़रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है, जिससे दुर्घटना और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को न्यूनतम रखा जा सके। कई यात्रियों ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि “सुरक्षा की भावना के साथ यात्रा करना अब हमारे लिए सहज हो गया है।”

रेलवे के उच्चाधिकारियों ने इस नई योजना को लागू करने के पीछे का उद्देश्य स्पष्ट किया। मुख्य रेल नियंत्रक, अनिल कुमार, ने कहा कि “हमारी प्राथमिकता यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा है, विशेषकर त्योहारों के दौरान। इस योजना से न केवल भीड़ कम होगी, बल्कि समय पर पहुंचने वाले यात्रियों को भी लाभ मिलेगा।” उन्होंने यह भी जोड़ते हुए बताया कि भविष्य में अन्य प्रमुख मार्गों पर भी ऐसी विशेष ट्रेनें चलाने की योजना है।

बजट विभाग के अधिकारियों ने कहा कि इन स्पेशल ट्रेनों के संचालन के लिए अतिरिक्त फंड आवंटित किया गया है, जिससे कोच, रेस्ट्रॉन्ट और सुरक्षा व्यवस्था में सुधार किया गया। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम से पर्यटन और व्यापारिक गतिविधियों में वृद्धि होगी, क्योंकि अधिक लोग सुरक्षित और सुविधाजनक यात्रा कर पाएँगे। यह आर्थिक लाभ विशेषकर छोटे व्यापारियों और स्थानीय विक्रेताओं के लिए महत्वपूर्ण माना गया।

सामाजिक स्तर पर, इस नई व्यवस्था का प्रभाव स्पष्ट दिख रहा है। कई प्रवासी परिवारों ने बताया कि अब वे अपने प्रियजनों से मिलते‑जुलते समय की कमी नहीं महसूस करेंगे, जिससे सामाजिक बंधन मजबूत हो रहे हैं। महिला यात्रियों ने विशेष रूप से सुरक्षा उपायों की सराहना की, जिससे उनकी यात्रा का अनुभव अधिक सुरक्षित हुआ। इस पहल ने महिलाओं को भी अधिक स्वतंत्र रूप से यात्रा करने की प्रेरणा दी, जिससे सामाजिक समानता में योगदान की संभावना बढ़ी है।

राजनीतिक दृष्टि से, इस कदम को केंद्र सरकार की यात्रा सुविधाओं के प्रति प्रतिबद्धता के रूप में देखा जा रहा है। विपक्षी दलों ने भी इस कदम की प्रशंसा की, जबकि कुछ ने कहा कि यह केवल अस्थायी उपाय है और दीर्घकालिक समाधान के लिए बुनियादी ढांचे में सुधार आवश्यक है। कई सांसदों ने कहा कि भविष्य में ऐसी ही विशेष ट्रेनों को अन्य प्रमुख मार्गों पर भी लागू किया जाना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय स्तर पर यात्रा अनुभव समान हो सके।

आर्थिक प्रभाव की बात करें तो, इस नई व्यवस्था से रेलवे की आय में संभावित वृद्धि देखी

Updated: September 11, 2026


Four “Pooja Special” trains linking Delhi to Ara Junction will run during Durga Puja, Diwali and Chhath, offering AC, sleeper and general coaches plus dedicated prayer rooms to ease festive crowding. Officials say the service boosts safety, punctuality and passenger comfort, while easing travel bottlenecks for migrants heading to Uttar Pradesh and Bihar.

Insight: These “Pooja Special” trains turn seasonal crowding into a catalyst for social cohesion, letting migrant families reunite without the usual weeks‑long wait and subtly reshaping travel norms for women and lower‑income passengers.

If the model proves financially sustainable, it could become a template for using festival spikes

तमन्ना भाटिया ने छठ पूजा में स्थानीय पोशाक पहना, सांस्कृतिक सम्मान की सराहना मिली

तमन्ना भाटिया ने हाल ही में बिहार की प्रमुख धार्मिक उत्सव छछछठ पूजा में भाग लिया, जिससे सोशल मीडिया पर तीव्र चर्चा छा गई। फिल्मी स्टार ने इस अवसर पर स्थानीय परिधान साड़ी अपनाई और पारंपरिक पीले सिंदूर का प्रयोग किया, जिससे उनके प्रशंसकों ने उनकी संस्कृति के प्रति सम्मान को सराहा। इस कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति ने राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय परंपराओं की लोकप्रियता को उजागर किया, साथ ही छठ पूजा की आध्यात्मिकता को भी नई दृष्टि से प्रस्तुत किया।

छठ पूजा, उत्तर भारत के विशेषकर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में मनाई जाने वाली प्रमुख सूर्य उपासना है। यह चार दिनों तक चलने वाला एक व्यापक आयोजन है, जिसमें श्रद्धालु सूर्य देवता और चंद्रमा की आराधना करते हैं। मुख्य आकर्षण है ककड़ी के पान में सूर्यास्त के समय जलरूपी अर्घ्य देना, जो शुद्धता और परिपूर्णता का प्रतीक माना जाता है।

तमन्ना भाटिया ने इस उत्सव की तैयारी में स्थानीय कलाकारों और पंडितों से विस्तृत परामर्श किया। उन्होंने छठी मैया के इतिहास, गीत और अनुष्ठानात्मक प्रक्रियाओं का अध्ययन किया, जिससे उनका प्रदर्शन वास्तविकता के करीब रहा। फिल्म ‘द वन’ में इस सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को दिखाने से पहले उन्होंने कई बार नदी किनारे सूर्यास्त देखते हुए आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त की, जो उनके अभिनय में गहराई जोड़ती है।

उपस्थिति के पहले दिन, तमन्ना ने बिहार के प्रमुख जलाशयों में अर्घ्य देने की प्रक्रिया को देखी। उन्होंने स्थानीय महिलाओं के साथ मिलकर काकड़ी के पान की तैयारी में सहयोग किया, जिसमें पान को साफ पानी में भिगो कर सूर्य के सामने रखना शामिल है। इस दौरान उन्होंने छठी मैया के गीतों को सुना, जो परम्परा के महत्व को दर्शाते हैं।

दूसरे दिन, उन्होंने प्रमुख मंदिरों में आयोजित विशेष पूजा में भाग लिया। इस दौरान पुजारी ने उन्हें सूर्य देवता की महिमा और छठी मैया की कृपा के बारे में बताया। तमन्ना ने इस अवसर पर अपने अनुयायियों को छठ पूजा के आध्यात्मिक पहलुओं को समझाने का प्रयास किया, जिससे सामाजिक जागरूकता बढ़ी।

तीसरे दिन, उन्होंने स्थानीय कलाकारों के साथ मिलकर पारंपरिक गीते और भजन गाए। इस कार्यक्रम में उन्होंने अपने फैंस के साथ मिलकर छठी मैया के प्रति आस्था व्यक्त की, जिससे दर्शकों में भावनात्मक जुड़ाव स्पष्ट हुआ। इस दौरान उन्होंने बताया कि छठ पूजा का संदेश शुद्धता, परिश्रम और सामाजिक समरसता है।

उपरांत, तमन्ना भाटिया ने मीडिया को एक संक्षिप्त बयान दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि इस यात्रा ने उन्हें भारतीय सांस्कृतिक विविधता की गहराई समझाई। उन्होंने छठी मैया की कृपा से मिलने वाली आध्यात्मिक शक्ति को सराहा और इस अनुभव को अपने भविष्य के कार्यों में शामिल करने का इरादा जताया।

बिहार के प्रमुख धार्मिक नेता भी इस घटना पर अपने विचार प्रकट कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि फिल्मी सितारों का इस प्रकार की परंपराओं में भाग लेना युवा वर्ग को सांस्कृतिक धरोहरों के प्रति जागरूक बनाता है। उन्होंने तमन्ना के इस कदम की सराहना की और भविष्य में और अधिक कलाकारों को इस दिशा में प्रेरित करने की आशा व्यक्त की।

छठ पूजा के आयोजक मंडल ने भी तमन्ना के सहभाग को सकारात्मक रूप से देखा। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की उपस्थिति से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ होगा। उन्होंने बताया कि इस वर्ष छठ के दौरान राज्य में पर्यटन प्रवाह में 15 प्रतिशत की संभावित वृद्धि हो सकती है।

राजनीतिक पक्ष ने इस घटना पर तटस्थ रुख अपनाया। कई प्रमुख नेताओं ने सामाजिक एकता और सांस्कृतिक सम्मान के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कलाकारों का इस तरह के धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेना सामाजिक सामंजस्य को बढ़ाता है, परंतु यह व्यक्तिगत चुनाव है और किसी भी प्रकार के राजनीतिक लाभ के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

आर्थिक दृष्टि से, तमन्ना की भागीदारी से स्थानीय व्यवसायों को लाभ पहुंचा। होटल, यात्रा एजेंसियां और पारंपरिक वस्त्र विक्रेता इस अवसर पर बढ़ती मांग का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया कि इस प्रकार की उच्च प्रोफ़ाइल उपस्थिति से स्थानीय उत्पादों की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बढ़ेगी और निर्यात के नए मार्ग खुलेंगे।

सामाजिक प्रभाव के संदर्भ में, इस कार्यक्रम ने महिलाओं के सशक्तिकरण को भी उजागर किया। छठ पूजा में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को देखते हुए, तमन्ना


Bollywood actress Tamanna Bhatia sparked a wave of online buzz by immersing herself in Bihar’s Chhath Puja, donning a local sari and yellow sindoor while participating in the ritual’s rites. Her involvement highlighted the festival’s cultural allure, boosted regional tourism and business, and underscored the role of celebrities in promoting India’s traditional heritage.

Tamanna Bhatia’s immersive presence at Chhath turned a regional rite into a pan‑Indian pop‑culture moment, suggesting that celebrity endorsements can now serve as cultural bridges rather than mere publicity stunts.
Her hands‑on involvement hints at a growing appetite among urban youth for authentic, experiential

पितृपक्ष के लिए रानी कमलापति, जबलपुर और सागर से गया तक तीन विशेष ट्रेनों का आयोजन

गया, मध्य प्रदेश – पितृपक्ष के पावन अवसर पर देश भर से श्रद्धालु पिंडदान व तर्पण के लिए बड़े पैमाने पर यात्रा कर रहे हैं। इस तीव्र भीड़ को देखते हुए भारतीय रेल ने मध्य प्रदेश व राजस्थान के तीन प्रमुख शहरों – रानी कमलापति, जबलपुर और सोगरिया से गया तक विशेष पितृपक्ष स्पेशल ट्रेनों की व्यवस्था की। इन ट्रेनों को विशेष ट्रेन नंबर 01661, 01662, तथा 01663 के तहत चलाया जाएगा। रेल मंत्रालय ने इस कदम को यात्रा सुविधा एवं सुरक्षा को सुनिश्चित करने के प्रयोजन से बताया।

पितृपक्ष, हिन्दू धर्म में पूर्वजों को याद करने एवं सम्मान देने का पवित्र समय है। इस अवधि में कई भारतीय अपने पूर्वजों के समाधियों पर पिंडदान व तर्पण करते हैं, जिससे रेलवे नेटवर्क पर भी विशेष प्रवाह देखना पड़ता है। पिछले वर्षों में गया, वाराणसी एवं काशी जैसे प्रमुख तीर्थस्थलों पर यात्रियों की संख्या में 30‑40 % की वृद्धि दर्ज की गई थी। इस बढ़ोतरी ने रेलवे को अतिरिक्त सुविधाओं एवं विशेष सेवाओं की आवश्यकता महसूस कराई।

भारतीय रेल ने इस पावन अवसर के लिए विशेष शेड्यूल तैयार किया है। रानी कमलापति से गया के बीच 01661 ट्रेन सुबह 04:15 बजे रानी कमलापति से प्रस्थान कर 09:20 बजे गया पहुंचेगी। जबलपुर से 01662 ट्रेन दोपहर 13:30 बजे प्रस्थान कर 20:05 बजे पहुंचेगी, जबकि सोगरिया से 01663 ट्रेन रात 22:45 बजे निकल कर अगले दिन सुबह 04:55 बजे गया में पहुँचेगी। इन सभी ट्रेनों में अतिरिक्त स्लीपर व एसी कोच, जनरल डिब्बा तथा पिट स्टेशनों के लिए विशेष पिंडदान कार्गो स्पेस उपलब्ध कराए जाएंगे।

रेलवे विभाग ने यात्रियों को अग्रिम बुकिंग करने और ऑनलाइन टिकट प्रणाली का उपयोग करने की सलाह दी है। विशेष ट्रेनें केवल पितृपक्ष अवधि में, अर्थात् 28 अगस्त से 2 सितंबर तक ही चलेंगी। इस दौरान रेलवे ने प्लेटफ़ॉर्म सुरक्षा, स्नैक्स व पानी की व्यवस्था और मोबाइल चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने का भी उल्लेख किया है। यात्रियों को सुरक्षा जांच एवं पिनडॉक्टरी जांच के लिए अतिरिक्त समय रखने का निर्देश दिया गया है।

गया जंक्शन पर विशेष पिनडान प्लेटफ़ॉर्म की भी तैयारी चल रही है। भारतीय रेल के प्रवासी विभाग ने बताया कि विशेष प्लेटफ़ॉर्म पर पिंडदान हेतु 10 टन तक का भार संभालने की क्षमता होगी। इस मंच पर श्रद्धालु बिना किसी भी भीड़भाड़ के अपने पूर्वजों को तर्पण कर सकेंगे। प्लेटफ़ॉर्म पर धार्मिक कर्मों के लिए आवश्यक जल व पावन वस्त्रों की व्यवस्था भी की जाएगी।

रानी कमलापति, जबलपुर व सोगरिया के स्थानीय रेल अधिकारियों ने कहा कि इस विशेष शेड्यूल से यात्रियों की सुविधा में उल्लेखनीय सुधार होगा। उन्होंने कहा कि रेलवे ने अतिरिक्त ट्रेनों के साथ मौजूदा सामान्य ट्रेनों में भी विशेष रेज़र्वेशन खोल दिया है। इस कदम से टिकट की उपलब्धता बढ़ेगी और यात्रियों को कम इंतजार में यात्रा करने का अवसर मिलेगा।

गया में पितृपक्ष समारोह के मुख्य आयोजकों ने इस पहल का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि विशेष ट्रेनों के आगमन से श्रद्धालुओं को समय पर तीर्थस्थल पहुंचने में मदद मिलेगी, जिससे पिंडदान एवं तर्पण कार्य सुगम हो जाएगा। आयोजकों ने रेलवे के सहयोग के लिए धन्यवाद व्यक्त किया और सभी यात्रियों से शिष्टाचार व अनुशासन बनाए रखने का आग्रह किया।

विलासपुर के एक प्रमुख पर्यटन बोर्ड अधिकारी ने बताया कि पितृपक्ष के दौरान यात्रियों की बढ़ती संख्या से स्थानीय आर्थिक गतिविधियों में भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। होटल, भोजनालय एवं स्थानीय परिवहन सेवाओं को अतिरिक्त आय की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि इस अवसर पर स्थानीय व्यवसायियों ने विशेष पैकेज एवं छूट प्रदान करने की योजना बनाई है।

राज्य सरकार के पर्यटन विभाग ने इस विशेष ट्रेन सेवा को प्रदेश के धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सराहा। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की विशेष सुविधाएं यात्रियों को सुरक्षित व समयबद्ध यात्रा सुनिश्चित करती हैं और भविष्य में भी इसी तरह के कार्यक्रमों के लिए विचार किया जा सकता है।

पितृपक्ष के आर्थिक प्रभाव को देखते हुए कई आर्थिक विश्लेषकों ने कहा कि रेलवे द्वारा अतिरिक्त कोच व विशेष ट्रेनें चलाने से राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। उन्होंने अनुमान लगाया कि इस अवधि में टिकट बिक्री, कैटरिंग व प्लेटफ़ॉर्म शुल्क से रेलवे को लगभग 15 % अतिरिक्त आय


Indian Railways has introduced three special trains from Madhya Pradesh and Rajasthan to Gaya to manage the surge of pilgrims during Pitru Paksha. The initiative includes dedicated cargo space and enhanced station facilities to ensure a smooth and secure journey for devotees performing rituals.

यह रणनीति केवल भीड़ प्रबंधन नहीं, बल्कि ‘धार्मिक लॉजिस्टिक्स’ को व्यवसायिक मॉडल में बदलने का चरम उदाहरण है, जहाँ पवित्रता की सहायता के नाम पर वाणिज्यिक लाभ को स्थूलता दी गई

जन्माष्टमी पर रेलवे की बड़ी तैयारी, देवघर रूट पर 27 अगस्त से 3 सितंबर तक चलेंगी 4 स्पेशल ट्रेनें

जन्माष्टमी‑भाद्र पूर्णिमा के अवसर पर पूर्वी रेलवे ने देवघर मार्ग पर विशेष ट्रेनों का परिचालन किया, जिससे तीव्र भीड़ वाले इस अवधि में यात्रियों को अतिरिक्त सुविधा मिल रही है। जमालपुर‑देवघर, सुल्तानगंज‑देवघर और गोड्डा‑देवघर के बीच चलने वाली इन चार स्पेशल ट्रेनों से लगभग दो लाख यात्रियों को प्रतिदिन अतिरिक्त स्थान मिलेगा, जिससे मौजूदा नियमित सेवाओं पर दबाव कम होगा।

पूर्वी रेलवे के अनुसार, यह विशेष संचालन 27 अगस्त से 3 सितंबर तक चलेगा, जब दोनों त्यौहारों के कारण श्रद्धालुओं की यात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। इस अवधि में देवघर की ओर यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या पिछले वर्ष के समान अवधि की तुलना में 45 प्रतिशत अधिक थी, जिससे अतिरिक्त ट्रेनें चलाना आवश्यक हो गया।

जन्माष्टमी और भाद्र पूर्णिमा दोनों ही हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण पर्व हैं, जिनमें विशेष रूप से देवघर के बालाजी मंदिर की ओर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। पिछले वर्षों में इस भीड़ को संभालने में रेलवे को कई बार कठिनाई का सामना करना पड़ा था, जिससे टिकट उपलब्धता और सीटिंग में कमी आई। इसलिए इस बार विशेष ट्रेनों का परिचालन एक रणनीतिक उपाय के रूप में अपनाया गया।

जमालपुर‑देवघर मार्ग पर दो नई ट्रेनों की व्यवस्था की गई है, जिनमें से एक सुबह 6 बजे और दूसरी दोपहर 2 बजे प्रस्थान करेगी। प्रत्येक ट्रेन में 20 कोचा रॉकेट और 5 कोचा एसी का समन्वय है, जिससे विभिन्न वर्गों के यात्रियों को विकल्प मिल सके। इस व्यवस्था से कुल मिलाकर 1,200 सीटों का अतिरिक्त आवंटन हुआ है।

सुल्तानगंज‑देवघर के बीच भी दो विशेष ट्रेनों को चलाने का निर्णय लिया गया है। इन ट्रेनों में मुख्यतः स्लीपर क्लास कोच होंगे, जिससे आर्थिक वर्ग के यात्रियों को भी सुविधा मिलेगी। गोड्डा‑देवघर मार्ग पर एक ही ट्रेन को दो बार चलाने का प्रावधान किया गया है, जिससे इस हिस्से में भी भीड़ में कमी आएगी।

रेलवे ने इन ट्रेनों के लिए अतिरिक्त स्टाफ, एटीएम और रेस्ट रूम की व्यवस्था भी की है। यात्रियों को टिकट बुकिंग के लिए ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म और रेलवे स्टेशन के काउंटर दोनों पर सुविधा उपलब्ध कराई गई है। विशेष ट्रेन के लिए आरक्षण खुलते ही तुरंत भर जाने की संभावना को देखते हुए, रेलवे ने अग्रिम बुकिंग को प्रोत्साहित किया है।

जमालपुर स्टेशन के क्षेत्रीय मैनेजर ने बताया कि विशेष ट्रेनों के परिचालन से यात्रियों को लंबी प्रतीक्षा समय और भीड़भाड़ से बचने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा, “हमने स्थानीय प्रशासन और पुलिस के साथ समन्वय किया है, ताकि स्टेशन पर व्यवस्था सुगम रहे और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।”

सुल्तानगंज में रेलवे प्रतिनिधि ने बताया कि विशेष ट्रेनें चलाने से न केवल यात्रियों को लाभ मिलेगा, बल्कि स्थानीय व्यापारियों को भी आर्थिक लाभ होगा, क्योंकि अधिक लोग मंदिर दर्शन के साथ साथ क्षेत्रीय बाजारों में खरीदारी करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रेनें समय पर चलने के लिए तकनीकी टीम ने पूरी तैयारी कर ली है।

राज्य सरकार ने भी इस कदम का स्वागत किया। पर्यटन विभाग के अधिकारी ने कहा कि विशेष ट्रेनों के कारण देवघर में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि से स्थानीय पर्यटन को प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे होटल और परिवहन सेवाओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा, “हम इस पहल को भविष्य में भी दोहराने की योजना बना रहे हैं।”

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विशेष संचालन से रेलमार्ग पर आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। रेलवे के वित्तीय डेटा के अनुसार, विशेष ट्रेनों के टिकट मूल्य सामान्य टिकटों से 15‑20 प्रतिशत अधिक होने की संभावना है, जिससे राजस्व में अतिरिक्त आय होगी। साथ ही, इस अवधि में मालभाड़ा भी बढ़ने की अपेक्षा है, क्योंकि अधिक यात्रियों के साथ-साथ स्थानीय वस्तुओं की मांग भी बढ़ेगी।

सामाजिक प्रभाव की दृष्टि से, इस पहल से यात्रियों को सुरक्षा और सुविधा दोनों का लाभ मिलेगा। विशेष ट्रेनें कम भीड़भाड़ वाली होंगी, जिससे कोविड‑19 जैसी स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं में भी कमी आएगी। इसके अलावा, यात्रियों को समय पर गंतव्य तक पहुंचने से धार्मिक कार्यक्रमों में भागीदारी सुनिश्चित होगी, जिससे सामाजिक संतुष्टि बढ़ेगी।

राजनीतिक दृष्टिकोण से यह देखना रोचक है कि इस कदम को विभिन्न पक्षों द्वारा किस तरह मूल्यांकित किया जा रहा है। विपक्षी दल के कुछ प्रतिनिधियों ने कहा कि रेल विभाग ने समय पर उपाय नहीं किए, जबकि सरकार के पक्ष ने इसे ‘जनहित में’ कदम कहा। इस बीच, स्थानीय विधायक ने कहा कि भविष्य में भी ऐसे विशेष संचालन को नियमित रूप से लागू किया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों ने कहा कि इस तरह के विशेष ट्रेन संचालन को डेटा‑ड्रिवेन योजना के तहत ही लागू किया जाना चाहिए। एक रेल नीति विश्लेषक ने कहा, “यदि यात्रियों की संख्या और यात्रा पैटर्न का सही विश्लेषण किया जाए, तो विशेष ट्रेनों की योजना और संस

Updated: September 2, 2026

The extra trains turn a logistical headache into a revenue‑boosting win, letting pilgrims avoid crushes while filling seats at a premium. It signals railways turning seasonal spikes into targeted service, a model that could keep both faith‑based traffic and local commerce humming in future festivals.

बिहार की जेलों में रक्षाबंधन पर बहनों ने सलाखों के बाहर कैदियों की कलाई पर राखी बांधी, सामाजिक पुनर्संयोजन की नई पहल को मान

बिहार में रक्षाबंधन के अवसर पर बहन‑भाई के भावनात्मक बंधन को विभिन्न मंचों पर प्रदर्शित किया गया, जिसमें विशेष रूप से जेलों में बंद कैदियों को बहनों द्वारा राखी बांधने की दृश्यावली ने व्यापक ध्यान आकर्षित किया। यह कार्यक्रम राज्य सरकार की पहल का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य सामाजिक संगठना को मजबूती देना और जेल में रहने वाले कैदियों को परिवारिक स्नेह का अनुभव कराना था।
विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस पहल के तहत कई जेलों में विशेष व्यवस्था की गई, जहाँ बहनें सलाखों के बाहर से अपने भाइयों की कलाई पर राखी बंधा सकीं। इस कदम को सामाजिक पुनर्संयोजन के एक सकारात्मक उदाहरण के रूप में सराहा गया।रक्षाबंधन का इतिहास सदियों पुराना है, परंतु भारत में इसका सामाजिक स्वरूप समय के साथ विविधतापूर्ण रूप ले चुका है। बिहार में इस त्योहार को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है, जहाँ ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित होते हैं। पिछले कुछ वर्षों में, राज्य सरकार ने सामाजिक एकता को बढ़ावा देने के लिए कई सांस्कृतिक एवं सामाजिक पहलें शुरू की हैं, जिसमें अभावग्रस्त वर्गों तक सन्देश पहुँचाने के प्रयास शामिल हैं। इस संदर्भ में जेलों में बहनों द्वारा राखी बांधना, सामाजिक पुनःसंयोजन के सिद्धान्त को व्यावहारिक रूप से लागू करने का एक नया आयाम प्रस्तुत करता है।

बिहार के जेल प्रणाली में सुधार के लिए कई वर्षों से विभिन्न नीति‑निर्देश लागू किए जा रहे हैं।

२०१८ में शुरू हुए “सामाजिक पुनर्वास कार्यक्रम” के अंतर्गत कैदियों को शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और मानसिक स्वास्थ्य समर्थन प्रदान किया जाता है। इस कार्यक्रम की एक उपधारा के रूप में, विशेष त्योहारों में परिवारिक जुड़ाव को सुदृढ़ करने के लिए विभिन्न आयोजन किए जाते हैं। रक्षाबंधन के अवसर पर इस पहल को लागू करने के लिये, जेल प्रशासन ने सुरक्षा प्रोटोकॉल को पुनः व्यवस्थित किया, जिससे बहनों को सुरक्षित रूप से प्रवेश और निकास की सुविधा मिली। इस प्रक्रिया में जेल के भीतर अतिरिक्त सुरक्षा कर्मियों की तैनाती और विशेष प्रवेश पथ स्थापित किए गए।

रक्षाबंधन के दिन, पटना हाई कोर्ट जेल, राजगीर जेल, और बेगूसराय के प्रमुख जेलों में बहनों का बड़ा समूह उपस्थित हुआ। प्रत्येक जेल में अलग‑अलग समय‑सारिणी तय की गई, जिससे भीड़भाड़ से बचा जा सके। बहनों ने सलाखों के बाहर से अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधी, जबकि जेल के अधिकारी इस प्रक्रिया को निगरानी करते रहे। कई कैदी, जिन्हें पहले सामाजिक अलगाव की भावना थी, ने इस समारोह को अपने जीवन में एक सकारात्मक बदलाव के रूप में वर्णित किया। इस दौरान कई अभिभावक और सामाजिक कार्यकर्ता भी उपस्थित थे, जो इस प्रकार के सामाजिक संपर्क को प्रोत्साहित करने के लिए अपने समर्थन का इज़हार कर रहे थे।

राखी बंधने के साथ ही, जेल प्रशासन ने भाई‑बहन के बीच संवाद को आसान बनाने हेतु मोबाइल फोन और वीडियो कॉल की सुविधा भी उपलब्ध कराई। यह कदम कई परिवारों के लिये अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि पहले यह सुविधा अत्यंत सीमित थी। कुछ कैदीयों ने बताया कि इस रक्षाबंधन के बाद वे अपने जीवन में नई ऊर्जा महसूस कर रहे हैं और पुनर्वास कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी की संभावना बढ़ी है। इस पहल को राज्य के सामाजिक कार्य विभाग ने “परिवारिक जुड़ाव एवं पुनर्संयोजन” के तहत एक मॉडल कार्यक्रम के रूप में मान्यता दी।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस अवसर पर एक विशेष समारोह में बहनों से राखी बांधवाया, जिसमें उन्होंने सामाजिक एकता और पुनर्संयोजन के महत्व पर प्रकाश डाला। मुख्यमंत्री ने कहा कि “रक्षाबंधन केवल भाई‑बहन के स्नेह का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्संयोजन का एक अवसर भी है।

हमें इस प्रकार के कार्यक्रमों के माध्यम से समाज को एकजुट करने की आवश्यकता है।” इस समारोह में कई अन्य राजनीतिक नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी भाग लेकर बहनों को राखी बांधी। मुख्यमंत्री द्वारा पहने गए पीले कुर्ते और पिंक धोती के रंग ने इस कार्यक्रम में एक विशेष सांस्कृतिक अभिव्यक्ति जोड़ी, जिसे मीडिया ने व्यापक रूप से कवरेज दिया।

राखी बांधने के कार्यक्रम में भाग लेने वाली बहनों ने अपने अनुभवों को सामाजिक मंच पर साझा किया। कई बहनों ने कहा कि जेल में भाई को देख कर उनका भावनात्मक भार हल्का हुआ और उन्होंने अपने भाई के लिए आशा की नई किरण देखी। इस भावना को व्यक्त करने के लिये उन्होंने सामाजिक मीडिया पर विभिन्न तस्वीरें और वीडियो पोस्ट किए, जिससे सार्वजनिक प्रतिक्रिया में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखी गई। दूसरी ओर, कुछ कैदियों ने बताया कि इस समारोह के दौरान उनके मन में पुनर्वास की नई इच्छा उत्पन्न हुई, जो भविष्य में बेहतर सामाजिक सहभागिता की संभावना को बढ़ाता है।

जेल प्रशासन के प्रतिनिधियों ने बताया कि इस कार्यक्रम को सफल बनाने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, विशेष रूप से सुरक्षा और अनुशासन के मुद्दों को संभालना। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में इसी प्रकार के सामाजिक कार्यक्रमों को अधिक व्यवस्थित करने के लिये अतिरिक्त संसाधन और प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी।

Updated: August 28, 2026


Bihar’s government orchestrated a Raksha Bandhan drive that let sisters tie rakhis to incarcerated brothers, supplementing the ceremony with video‑call access to strengthen family bonds. Officials hailed the event as a fresh model for social reintegration, noting a boost in inmates’ morale and renewed interest in rehabilitation programmes.

Bihar’s “Rakhi behind bars” turns a ritual of sibling love into a low‑cost rehabilitation lever, showing that emotional bonds can soften the psychological walls of incarceration. If replicated, such culturally‑tuned family outreach could become a scalable shortcut to reducing recidivism across India’s crowded prisons.

रक्षाबंधन: सिर्फ कलाई पर बंधा धागा नहीं, रिश्तों की जिम्मेदारी का संकल्प है

संपादकीय | विशेष लेख

रक्षाबंधन भारत के उन त्योहारों में शामिल है, जिनकी खूबसूरती उनकी सादगी में छिपी है। कलाई पर बंधा एक छोटा-सा धागा भाई-बहन के रिश्ते को भावनाओं, विश्वास और जिम्मेदारी से जोड़ देता है। हर साल सावन की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला यह पर्व बदलते समय के साथ भले ही अपने स्वरूप में कुछ बदलाव देख रहा हो, लेकिन इसका मूल संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—अपने प्रियजनों के सुख, सम्मान और सुरक्षा के प्रति जिम्मेदार रहना।

राखी बांधने की परंपरा को केवल भाई द्वारा बहन की रक्षा के वादे तक सीमित करना इस त्योहार के व्यापक अर्थ को छोटा कर देता है। आज रक्षाबंधन का रिश्ता एकतरफा सुरक्षा के बजाय परस्पर सम्मान, सहयोग और साथ निभाने का प्रतीक बन चुका है। बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है, भाई उसके लिए उपहार लाता है, लेकिन इन रस्मों के पीछे छिपी वास्तविक भावना यह है कि दोनों जीवन के उतार-चढ़ाव में एक-दूसरे के साथ खड़े रहेंगे।

इतिहास से वर्तमान तक बदलता रक्षाबंधन

रक्षाबंधन की परंपरा का भारतीय संस्कृति में लंबा इतिहास रहा है। इसके साथ अनेक ऐतिहासिक और पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कथा से लेकर मेवाड़ की रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूं से जुड़ी लोकप्रिय कहानी तक, राखी को विश्वास और संरक्षण के प्रतीक के रूप में देखा गया है। हालांकि इन कथाओं के ऐतिहासिक विवरणों को लेकर अलग-अलग मत हैं, लेकिन इनके माध्यम से भारतीय समाज में राखी के भावनात्मक महत्व को समझा जा सकता है।

समय के साथ रक्षाबंधन ने भी सामाजिक बदलावों को स्वीकार किया है। पहले यह मुख्य रूप से भाई और बहन के पारिवारिक रिश्ते का पर्व माना जाता था, लेकिन आज मित्रता, सामाजिक सद्भाव और पारस्परिक जिम्मेदारी के संदेश से भी इसे जोड़ा जा रहा है। कई जगह बहनें अपनी बहनों को, महिलाएं महिला मित्रों को और लोग पर्यावरण तथा सामाजिक जिम्मेदारी के प्रतीक के रूप में भी राखी बांधते हैं।

क्या रक्षा का मतलब सिर्फ भाई की जिम्मेदारी है?

रक्षाबंधन के सबसे महत्वपूर्ण सवालों में से एक यही है कि आखिर रक्षा की जिम्मेदारी केवल भाई की क्यों हो? आधुनिक समाज में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो गया है। एक महिला की सुरक्षा केवल उसके भाई की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। यह परिवार, समाज, प्रशासन और संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी है।

इसलिए रक्षाबंधन का अर्थ अब केवल यह वादा नहीं होना चाहिए कि भाई अपनी बहन की रक्षा करेगा। इसका अर्थ यह भी होना चाहिए कि भाई अपनी बहन के अधिकारों, फैसलों और स्वतंत्रता का सम्मान करेगा। बहन भी भाई के सपनों और संघर्षों में उसके साथ खड़ी होगी। दोनों एक-दूसरे की भावनात्मक ताकत बनेंगे।

यही बदलाव रक्षाबंधन को आधुनिक समाज के लिए अधिक प्रासंगिक बनाता है। सुरक्षा से आगे बढ़कर सम्मान और समानता इस पर्व का नया सामाजिक संदेश हो सकता है।

राखी का धागा और परिवार की बदलती तस्वीर

आज भारत का परिवार तेजी से बदल रहा है। संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवारों ने ली है। रोजगार और शिक्षा के कारण भाई-बहन अलग-अलग शहरों और देशों में रहते हैं। ऐसे समय में रक्षाबंधन केवल एक धार्मिक या पारंपरिक त्योहार नहीं, बल्कि दूरियों को कम करने का अवसर बन जाता है।

कई बहनें अपने भाइयों को डाक या ऑनलाइन माध्यम से राखी भेजती हैं। वीडियो कॉल के जरिए राखी बांधने की रस्म होती है। डिजिटल भुगतान के जरिए भाई बहन को उपहार भेजता है। यानी तकनीक ने त्योहार का तरीका बदला है, भावना नहीं।

शायद यही भारतीय त्योहारों की सबसे बड़ी ताकत है—वे समय के साथ बदलते हैं, लेकिन अपनी भावनात्मक जड़ें नहीं छोड़ते।

बाजार में राखी का उत्सव

रक्षाबंधन अब एक बड़ा आर्थिक अवसर भी बन चुका है। राखी, मिठाई, कपड़े, आभूषण, उपहार और ऑनलाइन डिलीवरी से जुड़े कारोबारों में इस पर्व के आसपास गतिविधियां बढ़ जाती हैं। स्थानीय दुकानदारों से लेकर ई-कॉमर्स कंपनियों तक, त्योहार का बाजार व्यापक हो चुका है।

लेकिन यहां भी एक सवाल जरूरी है—क्या रक्षाबंधन को केवल महंगे उपहारों और उपभोक्तावाद का त्योहार बना देना चाहिए?

राखी की कीमत उसके धागे, डिजाइन या पैकेजिंग से नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी भावना से तय होती है। पांच रुपये की साधारण राखी भी उतनी ही भावनात्मक हो सकती है जितनी किसी महंगे ब्रांड की राखी। त्योहार का वास्तविक मूल्य बाजार नहीं, रिश्ता तय करता है।

बहनों के सपनों की रक्षा भी जरूरी

अगर रक्षाबंधन को सचमुच आधुनिक भारत का पर्व बनाना है, तो भाई को केवल बहन की सुरक्षा का वादा नहीं, बल्कि उसके सपनों का सम्मान करने का संकल्प भी लेना होगा।

बहन पढ़ना चाहती है तो उसका साथ देना, नौकरी करना चाहती है तो उसके फैसले का सम्मान करना, कारोबार शुरू करना चाहती है तो उसका हौसला बढ़ाना और विवाह जैसे जीवन के महत्वपूर्ण फैसलों में उसकी इच्छा को प्राथमिकता देना—ये भी रक्षा के ही रूप हैं।

किसी महिला की रक्षा का सबसे मजबूत तरीका उसके अधिकारों को मजबूत करना है। उसे कमजोर मानकर सुरक्षा देना और उसे सक्षम बनाकर स्वतंत्रता देना—इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। रक्षाबंधन को इस अंतर को समझने वाला पर्व बनाना समय की मांग है।

भाई भी चाहता है बहन का साथ

रिश्ते को केवल भाई की जिम्मेदारी मानना भी अधूरा दृष्टिकोण है। जीवन में भाई भी कठिन दौर से गुजरता है। करियर, रोजगार, परिवार, आर्थिक दबाव और व्यक्तिगत संघर्षों के बीच बहन का भावनात्मक साथ उसके लिए उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है।

कई परिवारों में बहनें अपने भाइयों की शिक्षा, करियर और निजी जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए राखी का धागा दोनों को यह याद दिलाता है कि जीवन की कठिन परिस्थितियों में वे एक-दूसरे के भरोसे का मजबूत आधार हैं।

रिश्ता तब मजबूत होता है जब जिम्मेदारी दोनों तरफ से आती है।

उन भाइयों और बहनों के नाम, जो दूर हैं

रक्षाबंधन का सबसे भावुक पक्ष उन परिवारों में दिखाई देता है जहां भाई या बहन अपने घर से दूर हैं। सैनिक सीमा पर तैनात है, कोई भाई दूसरे शहर में नौकरी कर रहा है, कोई बहन विदेश में पढ़ाई कर रही है या किसी अस्पताल में ड्यूटी कर रही है—इन सबके लिए राखी केवल एक धागा नहीं, घर की याद बन जाती है।

कभी राखी समय पर नहीं पहुंचती, कभी वीडियो कॉल खराब हो जाती है, कभी व्यस्तता के कारण मुलाकात नहीं हो पाती। लेकिन दूरी रिश्ते को कमजोर नहीं करती। कई बार दूरी ही यह एहसास कराती है कि परिवार हमारे जीवन में कितना महत्वपूर्ण है।

रक्षाबंधन और सामाजिक सद्भाव

भारतीय संस्कृति में त्योहारों की भूमिका केवल परिवार तक सीमित नहीं रही है। वे समाज को जोड़ने का काम भी करते हैं। रक्षाबंधन को सामाजिक सद्भाव के अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है।

यदि राखी का संदेश सुरक्षा और विश्वास है, तो यह संदेश समाज के हर व्यक्ति के लिए होना चाहिए। महिलाओं के प्रति सम्मान, बच्चों की सुरक्षा, बुजुर्गों की देखभाल और कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता—ये सभी उसी भावना का विस्तार हैं।

एक ऐसा समाज जहां लोग एक-दूसरे के अधिकारों और सम्मान की रक्षा करें, वास्तव में रक्षाबंधन के संदेश को व्यापक अर्थ देता है।

पर्यावरण के लिए भी राखी

बदलते समय में रक्षाबंधन पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने का अवसर भी बन सकता है। प्लास्टिक और गैर-जैविक सामग्री से बनी राखियों के बजाय कपास, ऊन, कागज, बीज या अन्य पर्यावरण-अनुकूल सामग्री से बनी राखियों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

कई स्थानों पर लोग पौधों को राखी बांधने और पेड़ों की रक्षा का संकल्प लेने जैसी पहल करते हैं। यह परंपरा और पर्यावरणीय चेतना का सुंदर मेल हो सकता है।

आखिर जिस प्रकृति से हमारा जीवन जुड़ा है, उसकी रक्षा भी हमारी जिम्मेदारी है।

त्योहार की असली खूबसूरती सादगी में

रक्षाबंधन के दिन घर में मिठाई बनाना, बहन का भाई की कलाई पर राखी बांधना, भाई का आशीर्वाद लेना और परिवार के साथ कुछ समय बिताना—इन छोटी-छोटी चीजों में त्योहार की असली खूबसूरती है।

आज की तेज जिंदगी में परिवार के साथ बैठकर बातचीत करने का समय कम होता जा रहा है। इसलिए रक्षाबंधन हमें कुछ घंटे रुकने, पुराने किस्से याद करने और अपने रिश्तों को फिर से महसूस करने का अवसर देता है।

कई बार हमें रिश्तों की अहमियत समझने के लिए किसी बड़े आयोजन की जरूरत नहीं होती। एक राखी और कुछ शब्द ही काफी होते हैं।

रक्षाबंधन का नया अर्थ

आज के भारत में रक्षाबंधन को एक नए सामाजिक संकल्प के रूप में देखने की जरूरत है। भाई बहन की रक्षा करे, लेकिन बहन भी भाई की चिंता करे। भाई बहन की स्वतंत्रता का सम्मान करे और बहन भाई की जिम्मेदारियों को समझे। दोनों एक-दूसरे की सफलता में खुश हों और असफलता में साथ खड़े रहें।

रिश्ते अधिकार से नहीं, विश्वास से मजबूत होते हैं। रक्षा केवल शारीरिक सुरक्षा नहीं है। किसी के सम्मान, सपनों, आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

इसलिए इस बार राखी बांधते समय केवल यह न कहें—“मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा।” इसके बजाय यह कहें—“मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूंगा।”

यही एक वाक्य रक्षाबंधन की पूरी भावना को बदल सकता है।

संपादकीय निष्कर्ष

रक्षाबंधन हर वर्ष आता है और चला जाता है। राखी कुछ दिनों बाद कलाई से उतर जाती है, मिठाइयां खत्म हो जाती हैं और उपहार अपनी चमक खो देते हैं। लेकिन अगर राखी के साथ लिया गया संकल्प जीवन भर बना रहे, तो त्योहार का उद्देश्य पूरा हो जाता है।

आज जरूरत ऐसी रक्षा की है जो नियंत्रण नहीं, स्वतंत्रता दे; ऐसी सुरक्षा की जो डर नहीं, आत्मविश्वास पैदा करे; और ऐसे रिश्ते की जो अधिकार नहीं, सम्मान पर टिका हो।

रक्षाबंधन का धागा छोटा जरूर है, लेकिन इसका संदेश बहुत बड़ा है—रिश्तों की रक्षा कीजिए, एक-दूसरे के सपनों की रक्षा कीजिए और सबसे बढ़कर, एक-दूसरे के सम्मान की रक्षा कीजिए।

यही राखी का असली अर्थ है।
यही इस पर्व की सबसे बड़ी ताकत है।
और शायद यही आज के बदलते भारत में रक्षाबंधन की सबसे जरूरी जरूरत भी है।

रक्षाबंधन पर डिजिटल गिफ्टिंग बढ़ा, छोटे‑शहरों में ऑनलाइन खरीदारी का प्रभाव स्पष्ट।

इस बार रक्षाबंधन के त्योहार में किरदार संक्षेप में बदल गया है। अब दूर दिशा में रहने वाले भाइयों और बहनों के बीच संबंध जोड़ने के लिए केवल पारंपरिक तरीके ही नहीं अपनए जा रहे हैं। मेट्रो शहरों के उपरान्त नए शहरीकरण में

आ रहे नगरों में भी ऑनलाइन खरीदारी का चलन बढ़ रहा है। लोग अब दूरियों को मिटाने के लिए डिजिटल मंचों को अपना रहे हैं। इस बदलाव का प्रभाव सामाजिक बंधनों पर देखने को मिल रहा है। ऐसी स्थिति में पारंपरिक व्यवहार और

आधुनिक तकनीक के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो गया है।

यद्यपि यह त्योहार सदियों से प्रचलित है, फिर भी इसके प्रतिपूर्ति के तरीके बदल रहे हैं। पहले के समय में मुख्य रूप से स्थानीय दुकानों से खरीदारी की जाती थी। ऐसे में लोग रस्सी

वाद्य यंत्र संबंधी वस्तुओं को खरीदते थे। परंतु अब नई पीढ़ी ने अपने व्यवहार में बदलाव लाया है। वे अब घर बैठे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे व्यापारिक क्षेत्र में भी नया आयाम विकसित हुआ है।

पश्चिम के नगरों जैसे बेंगलुरु

और मुंबई में पहले ही इसका प्रभाव दिखाई दिया था। वहीं पूर्वोत्तर भारत के क्षेत्रों में अब यह चलन विस्तार पा रहा है। कोटा जैसे शोध और शिक्षा पर केंद्रित नगरों में भी अब ऑनलाइन गिफ्टिंग आम बात हो गई है। यहाँ कई

छात्र और छोटे व्यापारी छात्र होटलों में रहते हैं। ऐसे में दूर रहने वाले परिवारों से जुड़े रहना तकनीकी मदद से आसान हो गया है।

शुरुआती चरणों में इस सेवा का इस्तेमाल मुख्य रूप से विदेशों में रहने वाले लोगों द्वारा किया गया था।

तुर्की बाजारों में रहने वाले भारतीय इसका फायदा उठाते थे। फिर धीरे-धीरे इसे देश के आंतरिक प्रवासियों ने अपनाया। आज के समय में यह सेवा टियर टू शहरों तक विस्तारित हो चुकी है। इसका कारण परिवहन सेवाओं में सुधार और इंटरनेट पहुँच में

वृद्धि रहा है।

तकनीकी विकास के साथ व्यापारिक कंपनियों ने भी अपनी रणनीति बदली है। वे अब छोटे-छोटे शहरों में तेजी से अपनी पहुँच बढ़ा रहे हैं। उनकी मार्केटिंग रणनीतियाँ अब स्थानीय लोगों की भावनाओं को संदेश देती हैं। सोशल मीडिया पर जाहिरात का

खर्च बढ़ा है। इससे ऑनलाइन खरीदारी में तेजी आई है। ग्राहकों को अब घर बैठे ताज़ा मिठाइयाँ और उपहार मिल रहे हैं।

इस प्रक्रिया में डिलीवरी एजेंसियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हुई है। वे अब कठिन पहुंच वाले इलाकों तक भी अपनी सेवाएँ पहुँचा

रहे हैं। टेकलाॉजी का उपयोग कर वास्तविक समय में पैकेट के स्थान का पता लगाने की सुविधा दी जाती है। इससे भरोसे की भावना बढ़ी है। ग्राहक अब निश्चित तारीखों पर अपनी दाताई प्राप्त कर सकते हैं। यह प्रणाली दक्षता सुनिश्चित करने में

सहायक रही है।

परिवारों की प्रतिक्रिया इस बदलाव के लिए मिश्रित है। कुछ बुजुрг इस तकनीक को पारंपरिक मूल्यों के कर्ता मानते हैं। वे माँ-बाप के हाथ में संकल्प और भोजन पूजा की अनुपस्थिति को तंग महसूस करते हैं। वहीं युवा पीढ़ी इसे सुविधाजनक

और समय बचाने वाला मानती है। उनका मानना है कि यह मात्र एक तरीके का बदलाव है। संबंधों की दृढ़ता इससे कम नहीं होती है।

अन्य पक्ष के लोग则认为 यह एक बेहतर विकल्प है। वे मानते हैं कि लंबी दूरी में विचारों को व्यक्त

करना मुश्किल होता है। इसीलिए उन्होंने आधुनिक तरीके को स्वीकार किया है। वे ऑनलाइन संदेश के साथ पत्र भी भेजते हैं। इससे भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखने में सहायता मिलती है। वे इसे नए युग की आवश्यकता मानते हैं। इससे रिश्तों में नई जान

आती है और दूरियाँ कम होती है।

भूखे पेट से उपहार छोड़ने का प्रभाव सामाजिक व्यवस्था पर आ रहा है। इससे परिवार के भवन में अब नई पंक्तियाँ दी जाती हैं। ये पंक्तियाँ तकनी

Updated: August 24, 2026

Digital gifting on Raksha Bandhan is reshaping the festival from a ritual of local exchange into a conduit for emotional bandwidth, turning distance into a market opportunity.
While elders fear the loss of tactile ceremony, the tech‑enabled “virtual thread” may actually deepen kin ties by making affection instantly traceable and

मधेपुरा के प्राचीन विष्णु मंदिर में सावन की अंतिम सोमवार में मची भगदड़

मधेपुरा: मधेपुरा जिले के प्राचीन और अत्यंत प्राचीन विष्णु मंदिर में सावन मास की अंतिम सोमवारी को भारी भीड़ के बीच प्रशासन की भारी कसरत ने भगदड़ की स्थिति को दोबारा उभार कर दिखा दिया.

इस घटना में भीड़ के साथ ही मनोवैज्ञानिक दबाव और तनाव के साथ ही कई दर्जनों श्रद्धालुओं के हल्के से लेकर गंभीर तक होने की खबरें आ रही हैं. स्थानीय प्रशासन ने तत्काल ही अस्पतालों के साथ ही अन्य श्रद्धालुओं को मौका पर भेज दिया था जिससे स्थिति कुछ कम हो सकी.

सियावानाथ मंदिर को महेंद्रगढ़ तथा अन्य नामक स्थानों पर मान्यता प्राप्त होती है और सावन मास की सोमवारों विशेषकर अंतिम सोमवारी पर यहाँ आस्था का सैलाब उमड़ पड़ता है. भक्तों का मानना है कि इस दिन जलाभिषेक करने से सभी आर्थिक संकटों की समस्याओं को खत्म किया जा सकता है. अत्यधिक उमस और आर्थिक तनाव तथा जलेयुक्त का प्रवाह, यह स्थिति है जो हजारों से हजारों की भीड़ को तनावपूर्ण बन जाता है.

पिछले कुछ वर्षों से ही इस मंदिर परिसर में भीड़ नियंत्रण की व्यवस्था को लेकर चिंताएं प्रकट होती रही हैं. स्थानीय अधिकारी एवं पुलिस बल ने कई बार भीड़ नियंत्रण के लिए अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था को खड़ा करने के निर्देश दिए थे, किंतु पहले ही वर्ष की तुलना में इस बार भीड़ की वृद्धि की गंभीरता को देखकर स्थिति व्यवस्था को अपूर्ण होने से पूर्व ही अति भगदड़ की स्थिति उत्पन्न हो गई थी. प्रशासनिक तंत्र ने निश्चित रूप से व्यवस्था की गंभीरता का संकेत दिया था, लेकिन दर्जनों श्रद्धालुओं की घटना में गंभीरता का प्रचलन है.

सावन की अंतिम सोमवार को मंदिर परिसर में आये हजारों श्रद्धालुओं को जलेयुक्त के लिए लाब में लाब में भीड़ का सैलाब हो गया था. इस अवसर पर श्रद्धालुओं को भीड़ में भीड़ बढ़ते हुए मंदिर के भीतर और बाहर आने जाने की ढंग में भीड़ की गुंजाइश कम होने लगी. इसी भीड़ के वातावरण में अचानक एक धक्का और धक्का की स्थिति से भगदड़ मचने लगी. इस अवसर पर श्रद्धालुओं में भीड़ के झंझट के कारण किसी को भी दूसरे पर एक गंभीरता की स्थिति का प्रचलन हो गया.

भगदड़ के दौरान मंदिर के भीतर और बाहर की तरफ से श्रद्धालुओं की घटना में गंभीरता का संकेत मिला. धक्का-मुक्की के दौरान कई श्रद्धालुओं की मनोवैज्ञानिक दबाव और तनाव की स्थिति में धक्का-मुक्की हुई. मतिक्षेत्र में धक्का और धक्का की स्थिति में कई श्रद्धालुओं की घटना में गंभीरता का प्रचलन हुआ. इस स्थिति को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने तुरंत ही अतिरिक्त जवाब देने की स्थिति को नियंत्रण में लिया.

स्थानीय प्रशासन ने तुरंत ही स्थिति को नियंत्रण में लिया और घायलों को तुरंत अस्पताल में भर्ती किया. कई घायल श्रद्धालुओं को तुरंत स्थानीय अस्पताल में भर्ती किया गया जहाँ उनकी हालत स्थिर बनी हुई है. तीन दिन बाद ही स्थानीय अस्पताल में उनके उपचार की स्थिति में गंभीरता का प्रचलन हुआ. स्थानीय प्रशासन ने तुरंत ही स्थिति को नियंत्रण में लिया और घायलों को तुरंत अस्पताल में भर्ती किया.

मंदिर प्रबंधन समिति और स्थानीय प्रशासन ने एकत्रित करके एक साथ मिलकर बातचीत की. मंदिर समिति के अध्यक्ष ने कहा कि वे स्थिति का सटीक परिदृश्य देने का काम करेंगे. उन्होंने कहा कि वे स्थिति का सटीक परिदृश्य देने का काम करेंगे. उन्होंने कहा कि वे स्थिति का सटीक परिदृश्य देने का काम करेंगे. उन्होंने कहा कि वे स्थिति का सटीक परिदृश्य देने का काम करेंगे.

स्थानीय रहने योग्य स्थिति का प्रचलन हुआ. स्थानीय प्रशासन ने तुरंत ही स्थिति को नियंत्रण में लिया और घायलों को तुरंत अस्पताल में भर्ती किया.

Updated: August 24, 2026

The incident highlights ongoing crowd‑control challenges at large religious gatherings. It underscores the need for improved safety measures to prevent injuries and manage large crowds during high‑attendance religious events.

1 सितंबर से शुरू होगी भारत गौरव ट्रेन: पटना से चार प्रमुख ज्योतिर्लिंगों तक 12 दिन की यात्रा

भारत गौरव ट्रेन के प्रस्थान से बिहार के तीर्थयात्रियों को मिलेगा नया सुविधा
1 सितंबर से शुरू होने वाली भारत गौरव ट्रेन, भारतीय रेल ने आधिकारिक रूप से घोषणा की। यह विशेष ट्रेन चार प्रमुख ज्योतिर्लिंगों—नासिक, द्वारका, ओंकारेश्वर और रांझा—के साथ साथ शिरडी में स्थित शिरडी साईं बाबा के मंदिर तक का मार्ग तय करेगी। कुल मिलाकर 12 दिन की यात्रा में श्रद्धालु इन पवित्र स्थलों का दर्शन कर सकेंगे, साथ ही ट्रेन में धार्मिक कार्यक्रमों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का भी आयोजन रहेगा। भारतीय रेलवे के इस कदम को धार्मिक पर्यटन को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।भारत गौरव ट्रेन के पथ की पृष्ठभूमि
भारी मांग और धार्मिक यात्राओं की बढ़ती प्रवृत्ति को देखते हुए भारतीय रेल ने इस विशेष ट्रेनों की श्रृंखला की योजना बनायी। पिछले दो दशकों में धार्मिक यात्रियों की संख्या में वार्षिक औसत 15 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यात्रियों की अपेक्षा बहुत अधिक थी। इस परिप्रेक्ष्य में, राष्ट्रीय रेल योजना 2025‑2030 के तहत धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने हेतु कई नई ट्रेनों का प्रस्ताव रखा गया था, जिनमें भारत गौरव ट्रेन प्रमुख है।

ट्रेन के मार्ग और सुविधाएँ
भारत गौरव ट्रेन का प्रारम्भिक बिंदु पटना जंक्शन होगा, जहाँ से यह दिल्ली, आगरा, जयपुर, उदयपुर, और अंत में शिरडी तक का विस्तृत मार्ग तय करेगी। प्रत्येक स्टेशन पर यात्रियों को आध्यात्मिक व्याख्यान, शास्त्रीय संगीत और स्थानीय संस्कृति की झलक देने हेतु कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। ट्रेन में दो‑तीन वर्गीय एसी स्लीपर, डायनिंग कार, लाइब्रेरी और एक आध्यात्मिक मार्गदर्शन कक्ष भी उपलब्ध होगा। टिकट की कीमत सामान्य रेल यात्राओं के तुलनात्मक रूप में थोड़ी अधिक निर्धारित की गई है, परन्तु यात्रियों को विशेष भोजन पैकेज और पवित्र वस्तुओं की खरीदारी के लिए काउंटर भी उपलब्ध रहेगा।

पहली चरण की प्रमुख घटनाएँ
प्रारम्भिक सत्र में भारतीय रेल के अध्यक्ष ने दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ट्रेन की विशेषताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ट्रेन में कुल 12 कोच होंगे, जिनमें 4 डायनिंग कार, 2 लाइब्रेरी और 6 स्लीपर कोच शामिल हैं। साथ ही, भारतीय रेल ने इस परियोजना के लिए 250 करोड़ रुपये के बजट का उल्लेख किया, जिसमें ट्रेन का नवीकरण, स्टेशन पर विशेष सजावट और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की व्यवस्था शामिल है।

दूसरे चरण में स्थानीय प्रशासन का सहयोग
बिहार सरकार ने भी इस पहल का स्वागत किया और ट्रेनों के मार्ग पर स्थित सभी प्रमुख तीर्थस्थलों पर अतिरिक्त सुरक्षा और शौचालय सुविधाओं की व्यवस्था करने का वचन दिया। पटना के महाप्रबंधक ने कहा कि रेलवे द्वारा प्रस्तावित ‘धार्मिक सुरक्षा प्रोटोकॉल’ के तहत पुलिस, अस्पताल और आपातकालीन सेवाओं के साथ समन्वय स्थापित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, स्थानीय पर्यटन विभाग ने यात्रियों को गाइडेड टूर और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की व्यवस्था करने का आश्वासन दिया।

तीसरे चरण में सार्वजनिक प्रतिक्रिया
ट्रेन के उद्घाटन की घोषणा पर सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर चर्चा हुई। ट्विटर और फेसबुक पर #BharatGauravTrain टैग के तहत 50 हजार से अधिक पोस्ट देखी गईं। अधिकांश पोस्ट में यात्रियों ने इस पहल की सराहना की, जबकि कुछ ने टिकट मूल्य में वृद्धि और यात्रा अवधि को लेकर सवाल उठाए। कई धार्मिक संगठनों ने भी इस ट्रेन को ‘धार्मिक एकता’ का प्रतीक मानते हुए समर्थन व्यक्त किया।

मुख्य धार्मिक संगठनों की प्रतिक्रिया
शिरडी साईं संस्थान के प्रमुख ने कहा कि शिरडी में श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित करने हेतु यह ट्रेन एक उपयोगी माध्यम होगी। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रेन में आयोजित धार्मिक प्रवचन और संगीत कार्यक्रम शिरडी के आध्यात्मिक माहौल को और समृद्ध करेंगे। अन्य ज्योतिर्लिंगों के प्रबंधकों ने भी इस पहल को ‘धार्मिक पर्यटन में एक नया अध्याय’ कहा, और यात्रियों को मार्ग में उपलब्ध स्थानीय धार्मिक शास्त्रों के अध्ययन का अवसर प्रदान करने का वादा किया।

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
राज्य स्तर पर कई राजनीतिक दलों ने इस योजना को ‘जनहित में’ मानते हुए समर्थन जताया। भारतीय जनता पार्टी के बिहार अध्यक्ष ने कहा कि यह पहल धार्मिक यात्रा को सुलभ बनाकर सामाजिक सौहार्द को बढ़ाएगी।

Updated: August 22, 2026

The train offers a dedicated route connecting major pilgrimage sites, improving accessibility for religious travelers.
It aligns with national tourism plans, potentially boosting local economies and cultural exchange along the itinerary.

सुलतानगंज श्रावणी मेले में चाय स्टालों ने एक दिन में लगभग एक लाख कप बेचकर रिकॉर्ड स्थापित किया

साल भर की तैयारी के बाद, उत्तर प्रदेश के सुलतानगंज में आयोजित होने वाले श्रावणी मेले में चाय की मांग ने एक नया रिकॉर्ड स्थापित कर दिया है; मेले के उद्घाटन के पहले ही दिन, गंगा घाट से लेकर बाबाधाम तक के रास्ते पर स्थापित चाय स्टालों ने लगभग एक लाख कप चाय की बिक्री का अनुमान लगाया है, जिससे इस पारंपरिक धार्मिक यात्रा में पेय की भूमिका को नई महत्ता मिली है। इस आंकड़े को स्थानीय व्यापारियों और मेले के आयोजन समिति के प्रतिनिधियों ने एकत्रित बिक्री डेटा और दैनिक बिक्री रिपोर्टों के आधार पर पुष्टि किया है।श्रावणी मेले का इतिहास सात सदी पुराना है, जिसमें हर वर्ष लाखों श्रद्धालु गंगा के किनारे से शुरू होकर बाबाधाम की ओर यात्रा करते हैं। इस यात्रा में कांवरी धारण कर चलने वाले भक्तों को अक्सर थकान और जलन का सामना करना पड़ता है, जिससे उन्हें आराम के लिए ठहरना पड़ता है।

चाय, जो भारतीय संस्कृति में सर्दी-गर्मी के बीच ऊर्जा पुनः प्राप्त करने का साधन माना जाता है, इस यात्रा में प्राकृतिक रूप से एक आवश्यक सहारा बन गया है। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि पिछले वर्षों में चाय की खपत में क्रमिक वृद्धि देखी गई थी, परन्तु इस साल का आंकड़ा पहले के सभी रिकॉर्ड को पीछे छोड़ रहा है।

मेले के आधिकारिक दस्तावेज़ों के अनुसार, सुलतानगंज नगर पालिका ने इस वर्ष मेले के लिए विशेष रूप से 150 से अधिक चाय स्टालों को अनुमति दी, जिसमें से लगभग दो तिहाई स्टाल सीधे गंगा घाट और बाबाधाम के बीच स्थित प्रमुख मार्गों पर स्थित हैं। इन स्टालों को स्वास्थ्य और स्वच्छता मानकों के अनुरूप स्थापित किया गया, और सभी विक्रेताओं को स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी किया गया स्वच्छता प्रमाणपत्र प्राप्त है। स्टालों पर उपलब्ध चाय की विविधता में अदरक वाली मसाला चाय, काली चाय, हरी चाय तथा स्थानीय जड़ी-बूटी चाय शामिल हैं, जो यात्रियों की विविध पसंद को पूरा करती हैं।

मेले के दौरान, सुबह 6 बजे से लेकर शाम 9 बजे तक, चाय स्टालों पर लगातार भीड़ रहती है। रिपोर्टों के अनुसार, सुबह के शुरुआती घंटे में अधिकांश यात्रियों द्वारा काली चाय की माँग अधिक रहती है, जबकि दोपहर के भोजन के बाद अदरक मसाला चाय की लोकप्रियता में तेज़ी आती है। विशेष रूप से बाबाधाम के निकट स्थित स्टालों पर, जहाँ भक्तों की संख्या शिखर पर होती है, वहाँ प्रत्येक घंटे में लगभग 2,500 कप चाय बेची जाती है। इस तीव्र मांग को पूरा करने के लिए विक्रेताओं ने अतिरिक्त स्टाफ और मोबाइल पावर जेनरेटर की व्यवस्था की है।

स्थानीय चाय व्यवसायियों के संघ ने कहा कि इस तीव्र मांग को पूरा करने के लिए उन्होंने 5,000 किलो से अधिक कच्ची चाय पत्ती, 2,000 किलोग्राम अदरक और 1,500 किलोग्राम दालचीनी जैसी सामग्री मेले से पहले ही शहर के विभिन्न बाजारों से खरीदी। इन सामग्रियों को गंगा किनारे के बड़े टैंकों में स्टोर किया गया, जहाँ से दैनिक रूप से आवश्यक मात्रा में चाय बनाकर स्टालों तक पहुँचाई जाती है। इस प्रक्रिया में स्वच्छता और तापमान नियंत्रण पर विशेष ध्यान दिया गया, जिससे चाय की गुणवत्ता में कोई समझौता नहीं हुआ।

मेले के मुख्य आयोजक, सुलतानगंज नगर निगम के पर्यटकों एवं संस्कृति विभाग के प्रमुख ने कहा कि चाय की बिक्री में इस तरह का उछाल न केवल यात्रियों की सुविधा बढ़ाता है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी महत्वपूर्ण प्रोत्साहन देता है। उन्होंने बताया कि इस साल मेले में कुल 2,500 रोजगार अवसर उत्पन्न हुए हैं, जिनमें विक्रेता, सप्लायर, सफाई कर्मी और सुरक्षा गार्ड शामिल हैं। इस आर्थिक लाभ को देखते हुए, नगरपालिका ने अगले वर्ष के लिए चाय स्टालों की संख्या में 20 प्रतिशत वृद्धि की योजना बनायी है।

भक्तों के बीच इस चाय के प्रति आकर्षण को देखते हुए, कई श्रद्धालु ने कहा कि थकान के बाद एक कप गरम चाय पीने से उनकी ऊर्जा पुनः बहाल हो जाती है और मन को शांति मिलती है। एक 45 वर्षीय कांवरी, जिसने पिछले दो वर्षों से इस यात्रा में भाग लिया है, ने कहा, “गंगा किनारे की ठंडी हवा और अदरक की खुशबू मिलकर एक अद्भुत अनुभव बनाती है; यह छोटी सी राहत ही हमारी यात्रा को संभव बनाती है।” इसी प्रकार, युवा छात्रों ने भी बताया कि चाय के बिना यात्रा की कठिनाइयाँ बढ़ जाती हैं, इसलिए उन्होंने अपने साथ अतिरिक्त कपों की व्यवस्था भी कर ली है।

 


उत्तर प्रदेश के सुलतानगंज श्रावणी मेले में पहले ही दिन लगभग एक लाख कप चाय बिकने की रिपोर्ट से यह पेय यात्रियों के लिए अत्यंत आवश्यक बन गया है।
स्थानीय प्रशासन ने साफ-सफाई मानकों को कड़ा करते हुए न केवल रिकॉर्ड बिजनेस देखा है, बल्कि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी महत्वपूर्ण बूढ़ा तोड़कर भविष्य में

Insight: The surge to nearly 100,000 cups of tea on the fair’s opening day highlights the beverage’s logistical role in supporting large‑scale pilgrim movement. It also generates measurable revenue and temporary employment for local vendors and service providers.

होली पर बड़ी सौगात: श्रीगंगानगर से समस्तीपुर के लिए स्पेशल ट्रेन 04731/04732 का ऐलान, जानिए पूरा शेड्यूल और स्टॉपेज

होली के त्योहार पर घर लौटने वाले यात्रियों के लिए भारतीय रेल ने बड़ी राहत दी है। राजस्थान से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश जाने वाले हजारों यात्रियों की सुविधा के लिए श्रीगंगानगर से समस्तीपुर के बीच साप्ताहिक होली स्पेशल ट्रेन चलाने की घोषणा की गई है। इस विशेष ट्रेन के संचालन से त्योहार के दौरान टिकटों की भारी मांग और वेटिंग की समस्या से जूझ रहे यात्रियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

04731: श्रीगंगानगर से समस्तीपुर होली स्पेशल

Indian Railways द्वारा घोषित ट्रेन संख्या 04731 श्रीगंगानगर जंक्शन से 1 मार्च से 29 मार्च तक प्रत्येक रविवार को चलाई जाएगी। यह ट्रेन दोपहर 1:25 बजे Shri Ganganagar Junction से रवाना होगी।

ट्रेन अगले दिन शाम 6:15 बजे Chhapra Junction पहुंचेगी। इसके बाद यह ट्रेन सोनपुर, हाजीपुर और मुजफ्फरपुर होते हुए रात 11:30 बजे Samastipur Junction पहुंचेगी।

प्रमुख स्टॉपेज

यह होली स्पेशल ट्रेन कई महत्वपूर्ण स्टेशनों पर रुकेगी, जिससे बड़ी संख्या में यात्रियों को सुविधा मिलेगी। प्रमुख ठहराव इस प्रकार हैं:

  • दिल्ली
  • गाजियाबाद
  • मुरादाबाद
  • बरेली
  • गोंडा
  • बस्ती
  • गोरखपुर
  • देवरिया सदर
  • सिवान

इन स्टेशनों पर रुकने से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश जाने वाले यात्रियों के लिए यह ट्रेन बेहद उपयोगी साबित होगी।

कोच संरचना: 20 डिब्बों के साथ चलेगी ट्रेन

त्योहार के दौरान बढ़ती भीड़ को देखते हुए ट्रेन में कुल 20 कोच लगाए जाएंगे। इनमें शामिल हैं:

  • 1 एसी 2-टियर कोच
  • 2 एसी 3-टियर कोच
  • 11 स्लीपर क्लास कोच
  • 4 जनरल सेकंड क्लास कोच
  • 2 एसएलआर/डी कोच

इस कोच संरचना से विभिन्न श्रेणी के यात्रियों को अपनी सुविधा और बजट के अनुसार यात्रा का विकल्प मिलेगा।

04732: वापसी यात्रा का शेड्यूल

वापसी में ट्रेन संख्या 04732 3 मार्च से 31 मार्च तक प्रत्येक मंगलवार को चलेगी। यह ट्रेन रात 1:00 बजे Samastipur Junction से रवाना होगी और अगले दिन दोपहर 12:20 बजे Shri Ganganagar Junction पहुंचेगी।

यात्रियों को मिलेगी बड़ी राहत

होली के मौके पर राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में लोग बिहार और पूर्वी यूपी अपने घर लौटते हैं। ऐसे में नियमित ट्रेनों में लंबी वेटिंग लिस्ट और कन्फर्म टिकट की परेशानी आम हो जाती है। इस विशेष ट्रेन के संचालन से यात्रियों को सुगम और आरामदायक यात्रा का विकल्प मिलेगा।

रेलवे अधिकारियों के अनुसार, यदि मांग और बढ़ती है तो अतिरिक्त कोच या अन्य स्पेशल ट्रेनों पर भी विचार किया जा सकता है। फिलहाल, इस होली स्पेशल ट्रेन के ऐलान से हजारों यात्रियों को राहत मिली है और वे त्योहार अपने परिवार के साथ आराम से मना सकेंगे।

त्योहार के इस अवसर पर रेलवे की यह पहल यात्रियों के लिए बड़ी सौगात साबित हो सकती है।

होली से पहले खुशखबरी: बिहार सरकार ने कर्मचारियों को अग्रिम वेतन देने का किया ऐलान, विपक्ष के आरोपों को दिया जवाब

होली के त्योहार से पहले बिहार के लाखों सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए बड़ी राहत की खबर आई है। Nitish Kumar के नेतृत्व वाली बिहार सरकार ने घोषणा की है कि राज्य कर्मचारियों का वेतन होली से पहले जारी कर दिया जाएगा। मंगलवार को वित्त मंत्री Bijendra Prasad Yadav ने इस फैसले की सार्वजनिक घोषणा की।

इस ऐलान के साथ ही राज्य की आर्थिक स्थिति को लेकर चल रही अटकलों पर भी विराम लग गया है। सरकार ने साफ किया है कि खजाना पूरी तरह सक्षम है और वेतन भुगतान में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं आएगी।


विपक्ष के आरोपों पर सरकार का जवाब

हाल के दिनों में Rashtriya Janata Dal (राजद) ने राज्य सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन का आरोप लगाया था। नेता प्रतिपक्ष Tejashwi Yadav ने दावा किया था कि सरकार जल्द ही कर्मचारियों को वेतन देने में असमर्थ हो सकती है और राज्य का खजाना खाली होने की कगार पर है।

हालांकि वित्त मंत्री ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया। उन्होंने कहा कि राज्य की वित्तीय स्थिति स्थिर है और कर्मचारियों के वेतन तथा पेंशन भुगतान में किसी तरह की कोई समस्या नहीं है। उन्होंने सभी विभागों को समय पर वेतन निर्गत करने के निर्देश भी दे दिए हैं।


कर्मचारियों और पेंशनरों को बड़ी राहत

सरकारी कर्मचारी संगठनों ने इस निर्णय का स्वागत किया है। होली जैसे बड़े त्योहार से पहले वेतन मिलना कर्मचारियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे वे अपने परिवार की जरूरतें पूरी कर सकेंगे, खरीदारी कर पाएंगे और यात्रा व उत्सव की तैयारियां बिना किसी आर्थिक चिंता के कर सकेंगे।

पेंशनरों को भी समय पर उनकी पेंशन मिलने से राहत मिलेगी। सरकार ने आश्वासन दिया है कि कोषागार स्तर पर सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं ताकि भुगतान प्रक्रिया सुचारू रूप से संपन्न हो सके।


बाजार में बढ़ेगी रौनक, स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा बल

होली के अवसर पर वेतन का समय पर भुगतान स्थानीय बाजार के लिए भी सकारात्मक संकेत है। त्योहार के दौरान कपड़े, मिठाई, रंग-गुलाल और अन्य वस्तुओं की मांग बढ़ती है। कर्मचारियों के खातों में वेतन आने से बाजार में नकदी प्रवाह बढ़ेगा, जिससे व्यापारियों को लाभ होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राज्य की अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी। अधिक खरीदारी से बिक्री और राजस्व में वृद्धि होगी, जिसका सकारात्मक प्रभाव पूरे आर्थिक तंत्र पर पड़ेगा।


सरकार ने दोहराई प्रतिबद्धता

वित्त मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार अपने कर्मचारियों के हितों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है और त्योहार के दौरान उन्हें किसी भी प्रकार की वित्तीय परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि बिहार की आर्थिक स्थिति मजबूत है और सभी दायित्व समय पर पूरे किए जाएंगे।

कुल मिलाकर, होली से पहले वेतन भुगतान का यह फैसला कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए बड़ी राहत साबित होगा। साथ ही, यह कदम सरकार की वित्तीय प्रबंधन क्षमता और कर्मचारी कल्याण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।

देवघर के बाबा बैद्यनाथ मंदिर में पंचशूलों की विशेष पूजा, शिखरों पर पुनर्स्थापना के साथ बाबा-पार्वती का पारंपरिक गठबंधन सम्पन्न

झारखंड के देवघर स्थित विश्वप्रसिद्ध Baidyanath Temple में महाशिवरात्रि के पावन पर्व से पूर्व आस्था, परंपरा और वैदिक अनुष्ठानों का भव्य दृश्य देखने को मिला। रविवार को महाशिवरात्रि मनाई जानी है, लेकिन उससे एक दिन पहले शनिवार को मंदिर प्रांगण में वह विशेष धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न हुआ, जिसका इंतजार भक्त पूरे वर्ष करते हैं। बाबा बैद्यनाथ और मैया पार्वती मंदिरों के शिखरों पर स्थापित पंचशूलों को परंपरानुसार शुद्धिकरण, पूजन और पुनर्स्थापना की प्रक्रिया से गुजारा गया। इसके साथ ही बाबा और माता पार्वती के बीच पारंपरिक ‘गठबंधन’ की रस्म अदा की गई, जिसे इस धाम की अत्यंत प्राचीन और विशिष्ट परंपरा माना जाता है।

यह अनुष्ठान केवल धार्मिक क्रिया भर नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीकात्मक उत्सव है। देवघर धाम में महाशिवरात्रि से पूर्व पंचशूल उतारने, उनका पूजन करने और पुनः स्थापित करने की परंपरा सदियों से निभाई जा रही है। इस अवसर पर हजारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में उपस्थित रहे और पंचशूलों के दर्शन एवं स्पर्श कर स्वयं को धन्य महसूस किया।

पंचशूलों का महत्व और धार्मिक मान्यता

पंचशूल का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह त्रिशूल की ही एक विशेष संरचना मानी जाती है, जिसमें पाँच शूल होते हैं। शिव मंदिरों के शिखरों पर स्थापित पंचशूल दैवीय ऊर्जा, संरक्षण और आध्यात्मिक शक्ति के प्रतीक माने जाते हैं। देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में यह परंपरा विशेष महत्व रखती है।

मान्यता है कि पंचशूल मंदिर और आसपास के क्षेत्र की नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करते हैं और भक्तों के जीवन में शुभता लाते हैं। इसी कारण महाशिवरात्रि से पूर्व इन पंचशूलों का विधिवत शुद्धिकरण और पुनर्पूजन अनिवार्य माना जाता है।

वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शुद्धिकरण और पूजन

शनिवार को मंदिर के प्रधान पुजारी सह सरदार पंडा गुलाबनंद ओझा के नेतृत्व में षोडषोपचार विधि से पंचशूलों का पूजन सम्पन्न हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार, धूप-दीप, पुष्प, चंदन और पवित्र जल से इनका शुद्धिकरण किया गया।

यह पूजा केवल मुख्य मंदिर तक सीमित नहीं रही। बाबा बैद्यनाथ और मैया पार्वती मंदिर के अलावा मंदिर परिसर के अन्य 22 मंदिरों के शिखरों से उतारे गए पंचशूलों का भी सामूहिक पूजन किया गया। यह दृश्य अत्यंत भव्य और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण था।

शिखरों से उतारने की प्राचीन परंपरा

महाशिवरात्रि से एक या दो दिन पूर्व मंदिर परिसर के सभी मंदिरों के शिखरों से पंचशूलों को उतारने की परंपरा है। शुक्रवार को बाबा बैद्यनाथ और माता पार्वती मंदिर के शिखरों से पंचशूल उतारे गए थे, जबकि अन्य मंदिरों के पंचशूल पहले ही नीचे लाए जा चुके थे।

भंडारी परिवार की देखरेख में भंडारियों की टीम ने दोपहर के समय वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सावधानीपूर्वक पंचशूलों को शिखरों से उतारा। यह प्रक्रिया अत्यंत श्रद्धा और अनुशासन के साथ संपन्न की जाती है।

पंचशूलों का पारंपरिक मिलन

पंचशूलों के उतारने के बाद बाबा और पार्वती मंदिर के पंचशूलों का पारंपरिक मिलन कराया गया। यह मिलन शिव और शक्ति के दिव्य संगम का प्रतीक माना जाता है।

इस अनुष्ठान को देखने के लिए मंदिर परिसर में भारी भीड़ उमड़ पड़ी। श्रद्धालु इस पावन क्षण के साक्षी बनने के लिए घंटों पहले से कतार में खड़े थे। जब पंचशूलों का मिलन हुआ, तो “हर-हर महादेव” और “बोल बम” के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठा।

पुनर्स्थापना की वैदिक प्रक्रिया

विशेष पूजा के बाद सभी 22 मंदिरों के शिखरों पर पंचशूलों को पुनर्स्थापित किया गया। यह प्रक्रिया भी वैदिक विधि-विधान के अनुसार सम्पन्न हुई।

पंचशूलों को पुनः स्थापित करते समय मंत्रोच्चार, पूजा-अर्चना और आशीर्वचन का क्रम चला। मान्यता है कि पुनर्स्थापना के साथ मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा और अधिक सशक्त हो जाती है।

बाबा और मैया पार्वती का ‘गठबंधन’

पंचशूल पुनर्स्थापना के उपरांत बाबा बैद्यनाथ और मैया पार्वती मंदिर के बीच पारंपरिक ‘गठबंधन’ की रस्म अदा की गई। यह देवघर धाम की अत्यंत विशिष्ट और प्राचीन परंपरा है।

गठबंधन शिव और शक्ति के अविभाज्य संबंध का प्रतीक है। भक्त इसे अत्यंत शुभ मानते हैं और मान्यता है कि इस अवसर पर दर्शन करने से दांपत्य सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।

श्रद्धालुओं की भारी भीड़

पंचशूलों के दर्शन और स्पर्श के लिए हजारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में उमड़ पड़े। भक्तों ने मस्तक सटाकर पंचशूलों को नमन किया और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।

मंदिर प्रशासन के अनुसार, इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु देवघर पहुंचे। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए विशेष सुरक्षा प्रबंध किए गए थे। कतारबद्ध दर्शन व्यवस्था लागू की गई और पुलिस बल तैनात रहा।

महाशिवरात्रि की चार प्रहर पूजा

मंदिर प्रशासन ने बताया कि महाशिवरात्रि की चार प्रहर की पूजा रात्रि में सम्पन्न होगी। तड़के सुबह 3:15 बजे मंदिर का पट खुलेगा। विशेष पूजा-अर्चना के बाद लगभग 4:25 बजे आम श्रद्धालुओं के लिए पट खोल दिए जाएंगे।

अनुमान है कि दो लाख से अधिक श्रद्धालु इस अवसर पर जलार्पण करेंगे। सुबह 4 बजे से 6 बजे तक जल चढ़ाने का विशेष क्रम चलेगा। इसके बाद अगले दिन सुबह 8 बजे पुनः पट खोलकर नियमित पूजा प्रारंभ होगी।

आस्था का महासागर

महाशिवरात्रि के अवसर पर देवघर धाम आस्था के महासागर में बदल जाता है। देश के विभिन्न राज्यों से शिवभक्त यहां पहुंचते हैं। “बोल बम” और “हर-हर महादेव” के जयकारों से पूरा शहर भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है।

पंचशूलों की पूजा और गठबंधन की रस्म ने इस आध्यात्मिक उत्सव की शुरुआत को और भी भव्य बना दिया है। श्रद्धालु इसे शुभ संकेत मानते हैं कि बाबा बैद्यनाथ और मैया पार्वती की कृपा पूरे वर्ष बनी रहेगी।

प्रशासनिक तैयारी

भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ने व्यापक तैयारी की है। सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाएं और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया गया है।

जलार्पण के लिए अलग-अलग कतारें बनाई गई हैं। महिला, वृद्ध और दिव्यांग श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्था की गई है।

सदियों पुरानी परंपरा का जीवंत स्वरूप

देवघर में महाशिवरात्रि से पूर्व पंचशूल उतारने और पुनर्स्थापित करने की परंपरा सदियों से जीवंत है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।

हर वर्ष यह अनुष्ठान नई ऊर्जा और आस्था के साथ सम्पन्न होता है। पंचशूलों का स्पर्श कर भक्त अपने जीवन की बाधाओं को दूर करने और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

होली पर घर जाना हुआ आसान: दिल्ली-कोलकाता से बिहार के लिए 26 स्पेशल ट्रेनें

नई दिल्ली: होली के मद्देनजर यात्रियों की भारी भीड़ को संभालने के लिए Indian Railways ने बड़ा फैसला लिया है। East Central Railway ने दिल्ली और कोलकाता रूट से बिहार के विभिन्न शहरों के लिए 13 जोड़ी यानी कुल 26 होली स्पेशल ट्रेनों की समय-सारणी जारी की है।

इस फैसले से त्योहार पर घर लौटने वाले लाखों यात्रियों को कन्फर्म टिकट मिलने की संभावना बढ़ेगी और यात्रा अधिक सुगम हो सकेगी।

नई दिल्ली और आनंद विहार से स्पेशल ट्रेनें

रेलवे ने Anand Vihar Terminal और New Delhi Railway Station से बिहार के प्रमुख शहरों के लिए विशेष गाड़ियां चलाने की घोषणा की है।

प्रमुख ट्रेनें और तिथियां:

  • 04070 आनंद विहार–शेखपुरा: 20, 24, 27 फरवरी और 03, 06 मार्च
    वापसी: 04069 शेखपुरा–आनंद विहार समान तिथियों पर
  • 04054 नई दिल्ली–बरौनी: 20 फरवरी से 06 मार्च
    वापसी: 04053 बरौनी–नई दिल्ली 22 फरवरी से 08 मार्च
  • 04060 नई दिल्ली–सुपौल: 20 फरवरी से 06 मार्च
    वापसी: 04059 सुपौल–नई दिल्ली 22 फरवरी से 08 मार्च
  • 04010 दिल्ली–सीतामढ़ी: 26 फरवरी, 05 मार्च
    वापसी: 04009 सीतामढ़ी–दिल्ली 27 फरवरी, 06 मार्च
  • 04014 आनंद विहार–लौकहा बाजार: 27 फरवरी, 06 मार्च
    वापसी: 04013 लौकहा बाजार–आनंद विहार 28 फरवरी, 07 मार्च
  • 04066 आनंद विहार–खोरधा रोड जं.: 27 फरवरी से 03 मार्च
    वापसी: 04065 खोरधा रोड जं.–आनंद विहार 28 फरवरी से 04 मार्च

रेलवे अधिकारियों के अनुसार, मांग बढ़ने पर अतिरिक्त स्पेशल ट्रेनों की घोषणा भी की जा सकती है।

कोलकाता और हावड़ा से भी विशेष इंतजाम

पश्चिम बंगाल में रहने वाले बिहारियों के लिए भी खास व्यवस्था की गई है। Howrah Junction railway station, Sealdah railway station और Kolkata से रक्सौल, मधुबनी और अन्य स्टेशनों के लिए विशेष ट्रेनें चलाई जाएंगी।

प्रमुख ट्रेनें:

  • 03043 हावड़ा–रक्सौल: 28 फरवरी, 07 एवं 14 मार्च
    वापसी: 03044 रक्सौल–हावड़ा 01, 08 एवं 15 मार्च
  • 03045 हावड़ा–रक्सौल: 01, 02 मार्च
    वापसी: 03046 रक्सौल–हावड़ा 02, 03 मार्च
  • 03183 सियालदह–मधुबनी: 28 फरवरी, 07 मार्च
    वापसी: 03184 मधुबनी–सियालदह 01, 08 मार्च
  • 03185 कोलकाता–मधुबनी: 27 फरवरी
    वापसी: 03186 मधुबनी–लौकहा बाजार 27 फरवरी, 06 मार्च
  • 08753 दुर्ग–मधुबनी: 01 मार्च
    वापसी: 08754 मधुबनी–दुर्ग 02 मार्च
  • 03007 हावड़ा–खातीपुरा (जयपुर): 25 फरवरी, 11 मार्च
    वापसी: 03008 खातीपुरा–हावड़ा 27 फरवरी, 13 मार्च

क्लोन हमसफर एक्सप्रेस के फेरों में विस्तार

जयनगर और अमृतसर के बीच चलने वाली लोकप्रिय हमसफर क्लोन एक्सप्रेस (04651/04652) की परिचालन अवधि भी बढ़ा दी गई है। अब यह ट्रेन 1 मार्च से 31 मार्च तक चलेगी। इससे लंबी दूरी के यात्रियों को अतिरिक्त विकल्प मिलेगा और भीड़ का दबाव कम होगा।

टिकट बुकिंग और सुविधाएं

इन स्पेशल ट्रेनों में स्लीपर और एसी कोच दोनों की व्यवस्था की गई है। यात्री टिकट की बुकिंग IRCTC की आधिकारिक वेबसाइट या मोबाइल ऐप के माध्यम से कर सकते हैं।

रेलवे का कहना है कि जरूरत पड़ने पर और भी स्पेशल ट्रेनें चलाई जाएंगी। इस पहल से खासकर प्रवासी मजदूरों, छात्रों और नौकरीपेशा लोगों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

होली के इस खास मौके पर रेलवे की यह पहल बिहार के यात्रियों के लिए बड़ी सौगात साबित हो सकती है।

मुस्लिम कर्मचारियों को बिहार सरकार का तोहफा: रमज़ान के महीने में निर्धारित समय से एक घंटे पहले ऑफिस आ-जा सकेंगे

पटना । बिहार सरकार ने रमजान के महीने में मुस्लिम कर्मचारियों को निर्धारित समय से एक घंटे पहले कार्यालय आने और निर्धारित समय से एक घंटे पहले कार्यालय छोड़ने की अनुमति दे दी है। 

बिहार सरकार द्वारा शुक्रवार (17 मार्च 2023) को जारी नोटिफिकेशन में कहा गया है कि सरकार का यह आदेश हर साल रमजान के महीने में स्थायी तौर पर लागू रहेगा।

इस आदेश को बिहार सरकार के प्रधान सचिव की ओर से सभी विभागों, उनके अध्यक्षों, डीजीपी, जिले के अधिकारियों और अन्य अहम अधिकारियों को भेजा गया है। 

नीतीश सरकार के फैसले का RJD ने स्वागत किया है । सरकार के इस निर्णय को सत्ताधारी पार्टी JDU और RJD ने धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करने वाला बताया। इस कदम से देश की गंगा-जमुनी तहजीब और मजबूत होगी। 

वहीं, विपक्षी दल भाजपा ने तंज कसा है। सरकार के इस फैसले पर भाजपा ने कहा कि नीतीश कुमार ने नवरात्रि के दौरान हिंदुओं के लिए ऐसा कोई सुविधा नहीं दी गई।

महापर्व छठ पूजा की देशभर में धूम; कौन है छठी मैया,क्या महत्व है छठ पूजा का, पढ़ें पूरी कहानी

लोगों में एक आम जिज्ञासा यह रही है कि सूर्य की उपासना के इस महापर्व में सूर्य के साथ जिन छठी मैया की अथाह शक्तियों के गीत गाए जाते हैं, वे कौन हैं। ज्यादातर लोग इन्हें शास्त्र की नहीं, लोक कल्पना की उपज मानते हैं। लेकिन हमारे पुराणों में यत्र-तत्र इन देवी के संकेत जरूर खोजे जा सकते हैं।

एक पौराणिक कथा के अनुसार सूर्य और षष्ठी या छठी का संबंध भाई और बहन का है। षष्ठी एक मातृका शक्ति हैं जिनकी पहली पूजा स्वयं सूर्य ने की थी। ‘मार्कण्डेय पुराण’ के अनुसार प्रकृति ने अपनी शक्तियों को कई-कई अंशों में विभाजित कर रखा है। प्रकृति के छठे अंश को ‘देवसेना’ कहा गया है। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इनका एक नाम षष्ठी भी है। देवसेना या षष्ठी श्रेष्ठ मातृका और समस्त लोकों के बालकों की रक्षिका हैं।

इनका एक नाम कात्यायनी भी है जिनकी पूजा नवरात्रि की षष्ठी तिथि को होती है। पुराणों में निःसंतान राजा प्रियंवद द्वारा देवी षष्ठी का व्रत करने की कथा है। छठी षष्ठी का अपभ्रंश हो सकता है। आज भी छठव्रती छठी मैया से अपनी संतानों के लंबे जीवन, आरोग्य और सुख-समृद्धि का वरदान मांगते हैं। शिशु के जन्म के छह दिनों बाद इन्हीं षष्ठी या छठी देवी की पूजा का आयोजन होता है जिसे छठी या छठिहार कहते हैं।

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छठी मैया की इस परिकल्पना की एक आध्यात्मिक पृष्ठभूमि भी हो सकती है। अध्यात्म के अनुसार सूर्य की सात किरणों का मानव जीवन पर अलग – अलग प्रभाव पड़ता है। सूर्य की छठी किरण को आरोग्य और भक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला माना गया है। संभव है कि सूर्य की इस छठी किरण का प्रवेश अध्यात्म से लोकजीवन में छठी मैया के रूप में हुआ हो।

Chhath Puja: खरना के साथ ही शुरू हुआ 36 घंटे का निर्जला उपवास, परसो अर्घ्य के साथ समाप्त होगा लोक आस्था का पर्व

लोक आस्था का महापर्व छठ पूजा के खरना के मौके पर विभिन्न घाटों के साथ ही घरों पर छठ व्रतियों ने पूरी आस्था और विश्वास के साथ भगवान भास्कर का प्रसाद तैयार किया।

इस मौके पर छठ व्रतियों ने पूरी श्रद्धा भक्ति के साथ गंगाजल में अरवा चावल और गुड़ से बने खीर और रोटी तैयार कर छठी मैया और भगवान भास्कर को भोग लगाया। बाद में छठ व्रतियों ने प्रसाद ग्रहण किया। इस तरह से छठ व्रतियों का 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो गया।

छठ पूजा के तीसरे दिन यानी कल छठ व्रती अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य प्रदान करेंगे, वही महापर्व के चौथे और अंतिम दिन छठ व्रती उदयगामी सूर्य को अर्ध प्रदान करेंगे।

सभी मनोकामनाओं की पूर्ति को लेकर किए जाने वाले छठ महापर्व को लेकर श्रद्धालुओं की श्रद्धा भक्ति देखते ही बन रही है। इस मौके पर छठ व्रतियों का कहना था कि सच्चे हृदय से मांगी गई सभी मनो कामनाएं छठी मैया और भगवान भास्कर पूरी करते हैं।

मुजफ्फरपुर के शहीद खुदीराम बोस केंद्रीय कारा में बंदी कर रहें छठ पूजा

मुजफ्फरपुर। शहीद खुदीराम बोस केंद्रीय कारा में बंदी कर रहें छठ पूजा । 100 महिला बंदी और 85 पुरुष बंदियों ने की खरना पूजा।

जेल प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराई पूजा की सारी सामाग्री। पुरुष व्रती को धोती, गंजी और गमछा, वहीं महिला व्रतियों को भी दी गई साड़ी।

साथ ही बच्चों को भी जेल प्रशासन द्वारा दिया गया वस्त्र । जेल में छठ घाट को भी सजाया गया ।

धनतेरस के मौके पर बिहार के बाजारों में धन वर्षा, जमकर हो रही खरीदारी

धनतेरस के मौके पर बिहार के बाजारों की रौनक देखते ही बनी। बात चाहे स्वर्ण आभूषण दुकान की हो, बर्तन के दुकान की हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक्स दुकानों की, खरीदार जमकर इनकी खरीदारी करते नजर आए।

धनतेरस को लेकर माँ लक्ष्मी और गणेश की प्रतिमाओं की भी खूब बिक्री हुई, वही लावा, फरही और चीनी मिठाई की दुकानों पर भी खरीदारों की भारी भीड़ देखी गई। सजावट के सामानों और मिट्टी से बने दीयो की भी खूब बिक्री हुई।

2 साल के कोरोना काल के बाद मनाए जा रहे दीपावली को लेकर बाजारों में खासी चहल-पहल देखी गई। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक धनतेरस के दिन खरीदारी करने का विशेष महत्व है। खासकर धातु से बने सामानों की खरीदारी और मिट्टी से बने लक्ष्मी गणेश की प्रतिमा विशेष महत्व रखती है।

आज के दिन धन की देवी महालक्ष्मी और कुबेर की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। पौराणिक मान्यता यह भी है कि आज के दिन धातु की खरीदारी करने और लक्ष्मी और गणेश की विशेष पूजा अर्चना करने से दरिद्रता का नाश होता है और घर में लक्ष्मी का आगमन होता है।

CM के बाद डिप्टी सीएम पहुंचे मां के दरबार, ऐतिहासिक शीतला मंदिर में की पूजा

पटना । महा अष्टमी के मौके पर उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने आज देर शाम पटना सिटी का दौरा कर अगमकुआं स्थित ऐतिहासिक शीतला माता मंदिर पहुंचकर मां शीतला की विशेष पूजा अर्चना की।

इस मौके पर तेजस्वी यादव ने प्रदेश की खुशहाली के लिए मां से दुआएं भी मांगी। इस मौके पर तेजस्वी यादव ने बताया कि इस मंदिर से उनका पुराना रिश्ता रहा है। उन्होंने बताया कि वह बचपन से ही इस मंदिर में आते रहे हैं।

तेजस्वी यादव का कहना था कि दुर्गा पूजा के मौके पर वह मां के दरबार पहुंच कर उनसे आशीर्वाद लेने आए हैं।

बता दें कि इससे पहले सुबह सीएम नीतीश कुमार मां गौरी की पूजा को निकले थे उन्होंने पटना सिटी के कई मंदिरों का दौरा किया था और पूजा की थी उनके साथ कई नेता और अधिकारी भी मौजूद थे।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहुंचे हाजीगंज, ऐतिहासिक छोटी पटन देवी मंदिर पहुंच महाअष्टमी के मौके पर मां की विशेष पूजा अर्चना की

पटना सिटी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहुंचे हाजीगंज, ऐतिहासिक छोटी पटन देवी मंदिर पहुंचे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, महा अष्टमी के मौके पर मां की विशेष पूजा अर्चना की, मुख्यमंत्री ने मां की उतारी आरती, प्रदेश की खुशहाली के लिए मांगी दुआएं।