शुल्क नहीं देना पड़ेगा। नई व्यवस्था के तहत 0.4 प्रतिशत का शुल्क व्यापारी को देना होगा, जिससे डिजिटल भुगतान के पारदर्शी मूल्य‑निर्धारण को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है। इस कदम को भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तृत विकास के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
UPI के आरंभिक
वर्षों में ग्राहक‑से‑व्यापारी (P2M) लेन‑देन पर कोई शुल्क नहीं लगाया गया था, जिससे छोटे‑स्थानीय दुकानों से लेकर बड़े ई‑कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म तक इस प्रणाली का व्यापक उपयोग हुआ। 2020‑2022 के दौरान UPI के लेन‑देन में वार्षिक वृद्धि 150 प्रतिशत से अधिक रही, और दैनिक औसत लेन‑देन मूल्य 2 000 रुपये की सीमा को पार
करने लगा। इस वृद्धि के साथ ही NPCI ने लेन‑देन सुरक्षा, बैंकों के लागत‑संतुलन और राजस्व मॉडलों पर पुनः विचार किया, जिससे नई MDR नीति का आधार तैयार हुआ।
पिछले कुछ वर्षों में अन्य देशों में भी समान डिजिटल भुगतान शुल्क की प्रवृत्ति देखी गई, जहाँ यूरोपीय यूनियन और
यूएस के कुछ राज्य ने बड़े लेन‑देन पर व्यापारियों को न्यूनतम प्रतिशत शुल्क वसूलने की नीति अपनाई। भारतीय नियामक इस अंतरराष्ट्रीय प्रवृत्ति को अपनाते हुए, UPI इकोसिस्टम की स्थायित्व और वित्तीय समावेशन को संतुलित करने का लक्ष्य रखे हैं। इस संदर्भ में NPCI ने कहा कि यह कदम केवल उच्च‑मूल्य
लेन‑देन पर लागू होगा, जिससे छोटे‑व्यापारी और उपभोक्ता वर्ग पर प्रभाव न्यूनतम रहेगा।
नए नियम के तहत 2 000 रुपये से अधिक के P2M लेन‑देन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू किया जाएगा, जबकि 2 000 रुपये या उससे कम के लेन‑देन पर मौजूदा शून्य‑शुल्क नीति बनी रहेगी। यह शुल्क व्यापारी के बैंक खाते में
सीधे कटेगा, जिससे ग्राहक को अतिरिक्त बोझ नहीं उठाना पड़ेगा। NPCI ने बताया कि यह शुल्क बैंकों के बीच वितरण किया जाएगा, जिससे बुनियादी ढांचे की रख‑रखाव, सुरक्षा और नई तकनीकी नवाचारों के लिए निधि उपलब्ध होगी।
नियम के कार्यान्वयन से पहले NPCI ने 30 दिन का सार्वजनिक परामर्श अवधि
रखी, जिसमें व्यापारियों, बैंकों और उपभोक्ता संगठनों से विभिन्न प्रतिक्रिया मिली। कई बड़े रिटेलर और ई‑कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म ने इस कदम को सकारात्मक बताया, क्योंकि इससे लेन‑देन की पारदर्शिता बढ़ेगी और शुल्क संरचना स्पष्ट होगी। हालांकि, कुछ छोटे व्यापारी संगठनों ने चिंता व्यक्त की, क्योंकि उनका मानना है कि उच्च‑मूल्य लेन‑देन
में भी ग्राहक कभी‑कभी भुगतान की राशि को विभाजित करने की प्रवृत्ति रखते हैं, जिससे व्यावसायिक मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
व्यापारियों की प्रतिक्रियाओं में यह भी देखा गया कि कई बड़े चेन स्टोर्स ने पहले ही अपने प्राइसिंग मॉडल में इस संभावित शुल्क को शामिल करने की
योजना बना ली है। कुछ डिजिटल भुगतान गेटवे प्रदाता ने कहा कि वे इस नई MDR को अपने तकनीकी प्लेटफ़ॉर्म में सहजता से एकीकृत करेंगे, जिससे व्यापारी को अतिरिक्त प्रशासनिक बोझ नहीं होगा। साथ ही, बैंकों ने अपने ग्राहक सेवा केंद्रों में इस बदलाव के बारे में विस्तृत जानकारी देने
का वचन दिया, ताकि उपभोक्ता भ्रमित न हों।
उपभोक्ता समूहों ने भी इस परिवर्तन को लेकर अपनी प्रतिक्रियाएँ दर्ज करवाईं। अधिकांश उपयोगकर्ता यह समझते हैं कि भुगतान करने वाले को शुल्क नहीं देना चाहिए, और नई व्यवस्था के तहत यह सिद्धांत बना रहेगा। तथापि, कुछ उपभोक्ता संगठनों ने यह
कहा कि यदि व्यापारी इन शुल्क को अप्रत्यक्ष रूप से कीमत में जोड़ते हैं, तो अंतिम उपभोक्ता को प्रभाव पड़ेगा। इस संदर्भ में उपभोक्ता संरक्षण विभाग ने कहा कि वे बाजार की निगरानी करेंगे और अनुचित मूल्य वृद्धि के खिलाफ कार्रवाई करेंगे।
राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में, नई MDR नीति को
सरकार के डिजिटल इंडिया और वित्तीय समावेशन के उद्देश्यों के साथ संरेखित माना गया है। वित्त मंत्रालय ने बताया कि यह कदम वित्तीय स्थिरता और बैंकों के राजस्व मॉडल को संतुलित करने के लिए आवश्यक है, जबकि डिजिटल लेन‑देन को प्रोत्साहित करने की दिशा में कोई बाधा नहीं बनेगा। इसके
अलावा, यह नीति विदेशी निवेशकों को भारतीय डिजिटल भुगतान क्षेत्र में अधिक विश्वसनीयता प्रदान कर सकती है, जिससे प्रवाह में वृद्धि की संभावना है।
आर्थिक दृष्टि से, इस नई MDR का प्रभाव कई स्तरों पर देखना होगा
Updated: September 15, 2026
Insight: The 0.4 % merchant discount rate on UPI transactions above ₹2,000 creates a revenue stream for banks to support payment‑system infrastructure and security.
Limiting the fee to larger transactions aims to maintain low‑cost digital payments for most consumers and small merchants.
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