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झारखंड के पूर्व मंत्री सूनू का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार

सुधावन के बाद, झारखंड के पूर्व मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का 7 सितंबर को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हुआ, जहाँ उनके 12‑वर्षीय बेटे हर्ष ने काँपते हाथों से पिता को मुखाग्नि दी।
इस शोकसंघार में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, कई वरिष्ठ नेताओं और हजारों समर्थकों ने हिस्सा लिया, सभी ने शोक में डूबे मंत्री को श्रद्धांजलि अर्पित की। यह घटना राज्य की राजनीति में अचानक घटित हुई असामान्य मौत के कारणों को लेकर अनेक प्रश्न उठाती है, जबकि सार्वजनिक भावनाएँ गहरी शोक में डूबी हुई हैं।सुदिव्य कुमार सोनू, 58 वर्षीय, झारखण्ड के दलित सामाजिक उत्थान मंत्रालय एवं श्रम विभाग के पूर्व मंत्री, पिछले दो दशकों से राज्य राजनीति में सक्रिय रहे। उन्होंने विभिन्न जनकल्याण योजनाओं को लागू करने, शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन पर काम किया, और कई बार विधानसभा में अपने दृढ़ रुख के कारण चर्चा का केंद्र बने। उनकी राजनीतिक यात्रा शुरू हुई थी स्थानीय स्तर पर, जहाँ उन्होंने युवा संगठनों के माध्यम से आधार बनाकर धीरे‑धीरे पार्टी में अपना स्थान बनाया।

वह 2016 में झारखंड सरकार में प्रथम बार मंत्री पद पर आसीन हुए, और तब से कई बार विभिन्न पोर्टफोलियो संभाले। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार, शिक्षा के लिए नई योजना तथा सामाजिक न्याय के लिए कई नियम लागू किए। सोनू को उनके सामाजिक कार्यों के लिए कई बार प्रशंसा पत्र भी प्राप्त हुए। उनके निधन से राज्य के सामाजिक‑आर्थिक विकास की दिशा में संभावित परिवर्तन की आशंकाएँ उत्पन्न हुईं, क्योंकि उनके बिना कई चल रहे प्रोजेक्ट्स का भविष्य अनिश्चित है।

आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, सुदिव्य कुमार सोनू को 4 सितंबर को अचानक दिल‑से‑संबंधित दर्द का अनुभव हुआ, जिसके बाद उन्हें निजी अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर्स ने तुरंत स्टेंट लगाने की सलाह दी, परन्तु रोगी ने निजी कारणों से इसे टाल दिया। अगले दिन रात में उन्हें तीव्र सीने में दर्द हुआ, और तत्काल आपातकालीन सेवाओं को बुलाने पर भी उनका निधन हो गया। अस्पताल ने बताया कि उनके दिल की धमनियों में पहले से ही गंभीर अवरोध था, जो स्टेंट न लगवाने से बढ़ गया।

सोनू की मृत्यु के बाद, राज्य सरकार ने तुरंत उनके निधन को शोकसूचना घोषित किया और राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई की व्यवस्था की। झारखंड के राजमहल में शोक समारोह आयोजित किया गया, जहाँ प्रमुख नेता और परिवारजन ने शोक अभिव्यक्त किया। सरकार ने कहा कि वह इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के कारण गहरा शोक व्यक्त करती है और परिवार को सहायता प्रदान करेगी। कई राष्ट्रीय समाचार चैनलों ने इसे राष्ट्रीय स्तर का समाचार माना और विस्तृत कवरेज दिया।

विरोधी दलों ने इस घटना को राजनीतिक मुद्दे में बदलते हुए, स्वास्थ्य व्यवस्था में खामियों एवं राजनीतिक दबाव को उजागर करने की कोशिश की। कुछ नेता ने कहा कि यदि तत्काल चिकित्सीय उपचार किया जाता, तो संभवतः यह मृत्यु टली जा सकती थी, जिससे स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच की समग्र समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। दूसरी ओर, कांग्रेस नेताओं ने कहा कि यह एक व्यक्तिगत स्वास्थ्य निर्णय था, जिसमें राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने शोकसभा में कहा, “सुदिव्य जी की क्षति राज्य के लिए बहुत बड़ी है। उनका समर्पण और कार्यशैली हम सभी के लिए प्रेरणा रहेगी।” उन्होंने यह भी कहा कि सरकार उनके परिवार को सभी आवश्यक सहायता प्रदान करेगी और उनके नाम पर नई सामाजिक कल्याण योजनाएँ शुरू की जाएँगी। विपक्ष के नेता ने कहा, “सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियों में त्वरित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो, जिससे इस तरह के नुकसान को रोका जा सके।”

राज्य की स्वास्थ्य विभाग ने भी इस घटना के बाद एक आंतरिक जांच का आदेश दिया, जिससे यह पता चलेगा कि अस्पताल में उचित उपचार क्यों नहीं दिया गया। कई डॉक्टरों ने कहा कि स्टेंट जैसी जीवनरक्षक प्रक्रिया को टालना जोखिम भरा हो सकता है, और इस प्रकार की चेतावनी को सार्वजनिक जागरूकता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। स्थानीय चिकित्सक संघ ने भी इस मामले को गंभीरता से ले कर स्वास्थ्य नीति में सुधार की मांग की।

आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो सुदिव्य कुमार सोनू के निधन से कई विकास परियोजनाओं में विलंब की संभावना है। उनके अधीन चल रही कई बुनियादी ढांचे की योजना, जैसे ग्रामीण सड़कों का निर्माण और जल आपूर्ति प्रणाली, को नए प्रबंधकों को सौंपना पड़ेगा, जिससे लागत एवं समय में वृद्धि हो सकती है। निवेशकों ने भी कहा कि राजनीतिक अस्थिरता के कारण कुछ निवेश निर्णयों को पुनः विचार करने की संभावना है।

सामाजिक प्रभाव के संदर्भ में, सोनू की मृत्यु से कई सामाजिक समूहों में गहरा शोक फैला है, विशेषकर दलित समुदाय में, जहाँ उन्हें समानता और सामाजिक उत्थान के एक प्रमुख आवाज माना जाता था। कई सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि उनके बिना इस वर्ग के अधिकारों के लिए लड़ाई में कठिनाई आएगी

Updated: September 7, 2026

Sonia’s untimely death exposes a stark paradox: a champion of Dalit uplift is reduced to a cautionary tale about private‑health choices, turning personal tragedy into a political litmus test for Jharkhand’s medical safety net.

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