जन्माष्टमी का महत्त्वपूर्ण धार्मिक पर्व हमेशा सामाजिक और सांस्कृतिक संदेशों के साथ जुड़ा रहा है। इस वर्ष के समारोह में कई राजनैतिक और सामाजिक हस्तियों ने भाग लेकर इस अवसर को राष्ट्रीय एकता और स्वास्थ्य जागरूकता के मंच के रूप में प्रस्तुत किया।
निशांत कुमार का यह भाषण बिहार में हाल के वर्षों में बढ़ती नशा प्रवृत्ति के मद्देनज़र आया है, जहाँ विशेष रूप से युवा वर्ग में ड्रग्स और तंबाकू का सेवन एक गंभीर समस्या बन चुका है। राज्य सरकार ने पिछले दो वर्षों में इस दिशा में कई नीति उपाय किए हैं, परन्तु प्रभावी नियंत्रण के लिये अधिक कड़ी मेहनत आवश्यक है।
वर्तमान में बिहार में नशीले पदार्थों के सेवन में वृद्धि के आंकड़े राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक दर्ज किए गए हैं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में ड्रग्स की लत में लगभग 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि तंबाकू के प्रयोग में भी उल्लेखनीय उछाल देखा गया है।
मंत्री ने इस संदर्भ में कहा कि “ईश्वर ने हमें जीवन दिया है, उसका सही उपयोग करना हमारा कर्तव्य है” और यह बात दोहराते हुए युवाओं से कहा कि वे अपने भविष्य को नशे के धुएँ में नहीं, बल्कि शिक्षा और रोजगार के अवसरों में लगाएँ। उन्होंने कहा कि नशा न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास में भी बाधा बनता है।
सत्रह वर्ष से कम उम्र के किशोरों में नशीले पदार्थों का प्रयोग विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि इस उम्र में आदतें बनती हैं जो जीवन भर साथ रहती हैं। मंत्री ने इस बात को रेखांकित किया कि विद्यालयों और कॉलेजों में नशा मुक्ति के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए, जिससे युवाओं में नकारात्मक प्रभावों को रोका जा सके।
बिहार सरकार ने इस दिशा में कई पहलें शुरू कर दी हैं, जैसे कि स्कूलों में ‘स्वस्थ जीवन’ मॉड्यूल का समावेश, तथा नशा मुक्त केंद्रों का विस्तार। इन केंद्रों में परामर्श, पुनर्वास और पुनः समाकलन की सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं, जो नशे के शिकार व्यक्तियों को सामाजिक जीवन में पुनः स्थापित करने में मददगार सिद्ध होती हैं।
इस कार्यक्रम पर राज्य के शिक्षा मंत्री ने भी टिप्पणी की और कहा कि “शिक्षा ही नशा से बचाव का सबसे प्रभावी साधन है। जब छात्र अपने अध्ययन में व्यस्त रहेंगे, तो नशे की लत में फँसने की संभावना कम रहेगी।” उन्होंने विद्यालयों में नशा-रहित वातावरण सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने का वचन दिया।
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने भी बिहार के इस कदम का स्वागत किया और कहा कि नशा मुक्ति के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समन्वित रणनीति तैयार की जा रही है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकारों को अपनी नीतियों को सुदृढ़ करने के लिये केंद्र से तकनीकी और वित्तीय सहयोग मिलेगा।
विपक्षी दल के एक प्रमुख नेता ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह केवल स्वास्थ्य मंत्रालय की नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक ढांचे की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि “रोकथाम और पुनर्वास दोनों पक्षों को समान महत्व देना आवश्यक है, तभी नशे के खिलाफ लड़ाई में सफलता मिल सकेगी।”
सामाजिक संगठनों ने भी इस संदेश को सकारात्मक रूप से लिया और कहा कि उन्हें अब तक के सबसे प्रभावी सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेशों में से एक यह माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह पहल युवा वर्ग में जागरूकता बढ़ाने के साथ साथ, नशा मुक्ति के लिए समर्थन संरचनाओं को भी मजबूत करेगी।
अर्थशास्त्री डॉ. अंशु मेहता ने इस घटना पर विश्लेषण किया और बताया कि नशा मुक्ति कार्यक्रमों का आर्थिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि नशा से जुड़ी बीमारियों और उत्पादन में कमी के कारण राज्य को हर साल अरबों रुपए का नुकसान होता है, इसलिए इस दिशा में निवेश दीर्घकालिक लाभदायक सिद्ध होगा।
Updated: September 4, 2026
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