जाँच के अनुसार, इस धोखाधड़ी की शुरुआत लगभग दो साल पहले हुई थी, जब राधास्वामी संगठनों ने अपने नेटवर्क को ग्रामीण इलाकों में फैलाना शुरू किया। उन्होंने स्थानीय पंचायतों और स्वयंसेवी समूहों के साथ मिलकर “सब्सिडी फंड” की घोषणा की और जनसंख्या के बीच भरोसा स्थापित किया। इस भरोसे का दुरुपयोग करते हुए उन्होंने लाभार्थियों को वादे के तहत एकत्रित राशि को “प्रशासनिक शुल्क” के रूप में जमा करवाया, जबकि वास्तविक फंड कभी नहीं पहुँचा।
मुख्य घटनाक्रम के अनुसार, दीपक शर्मा ने इस योजना को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट किया और विभिन्न राज्यों में अपने सहयोगियों को कार्य सौंपे। उन्होंने अपने सहयोगियों को “ऑफ़िशियल एजेंट” का दर्जा देकर स्थानीय स्तर पर धन संग्रह करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही, उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर झूठे विज्ञापन चलाए, जिसमें सरकारी सब्सिडी के आधिकारिक दस्तावेज़ों की नकल करके भरोसा दिलाया गया। इस प्रक्रिया में कई पीड़ितों ने अपने बचत और ऋण लेकर भागीदारों को पैसे भेजे।
जांच के दौरान पुलिस को कई ठगी के शिकारों के बयान मिले, जिनमें यह कहा गया कि उन्होंने अपनी जमीनी संपत्ति को गिरवी रख कर, या अपने बच्चों की शिक्षा के खर्च को कवर करने के लिये, इस फंड में बड़ी राशि जमा की थी। इन शिकारों ने बताया कि उन्हें पहले कोई भी लिखित दस्तावेज़ नहीं मिला, बल्कि केवल मौखिक आश्वासन और कुछ फॉर्म के माध्यम से प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया। इस प्रकार, कई परिवार आर्थिक संकट में धकेल दिए गए।
फिर भी, इस योजना को विस्तारित करने के पीछे एक और कारक था – राधास्वामी संगठनों की सामाजिक और धार्मिक प्रतिष्ठा। कई गांवों में इन संगठनों ने धर्मस्थल निर्माण, शौचालय निर्माण और स्कूलों के विस्तार जैसे सामाजिक कार्य किए थे, जिससे उनके प्रति जनविश्वास बढ़ा। इस भरोसे का फायदा उठाकर उन्होंने अपने फंड रेज़िंग को एक सामाजिक मिशन के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे कई स्थानीय नेता और सामाजिक कार्यकर्ता भी इस योजना के साथ जुड़े।
जब मामला सार्वजनिक हुआ, तो विभिन्न पक्षों ने प्रतिक्रिया दी। राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने कहा कि ऐसी धोखाधड़ी को सख्ती से दंडित किया जाएगा और सभी राज्य सरकारों को सतर्क रहने का आदेश दिया। इसके अलावा, कई राज्य सरकारों ने अपने सब्सिडी वितरण प्रक्रिया में सुधार करने और डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम लागू करने का इरादा जताया।
विपरीत रूप में, झारखंड और बिहार की पुलिस ने बताया कि उन्होंने इस मामले में कई संदिग्धों को गिरफ्तार कर लिया है, जिसमें दीपक शर्मा के कुछ करीबी सहयोगी भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इस धोखाधड़ी के कारण प्रभावित लोगों को पुनर्भुगतान की व्यवस्था भी की जाएगी, और सभी उपलब्ध दस्तावेज़ों को अदालत में पेश किया जाएगा।
राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे को अपनाया। कुछ प्रमुख विपक्षी नेताओं ने सरकार पर निगरानी ढीली रहने का आरोप लगाया, जबकि ruling party के प्रतिनिधियों ने कहा कि यह एक व्यक्तिगत अपराध है
The scandal exposes how religious charities can weaponize social capital to bypass state oversight, turning faith‑based trust into a covert revenue stream.
If digital verification becomes mandatory for any “subsidy‑linked” outreach, the profit margin for such fraud rings could collapse, forcing them to reinvent more sophisticated identity‑
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