चर्चा चल रही है, क्योंकि नामांकन से बाहर रहने वाले मतदाताओं को अपनी पहचान प्रमाणित करने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। चुनाव आयोग ने इस मसौदे को सार्वजनिक किया है और मतदाता अपने नाम को जांचने के लिये ऑनलाइन पोर्टल एवं मोबाइल एप्लिकेशन का उपयोग कर सकते हैं।
ड्राफ्ट
सूची के निर्माण में कई चरण शामिल रहे, जिनमें जनसंख्या डेटा, पिछले चुनावी सूची, और स्थानीय निकायों के अभिलेखों का सम्मिलन किया गया। 2022 में प्रारंभिक सूची तैयार करने के बाद, 2023‑2024 में कई बार संशोधन किए गए, जिससे डेटा की सटीकता और विश्वसनीयता बढ़ाने का प्रयास किया गया। इस
प्रक्रिया में विभिन्न सरकारी विभागों, जैसे गृह विभाग और नगरपालिका, ने सहयोग किया, जबकि कुछ क्षेत्रों में डेटा अभाव और डुप्लिकेशन की समस्याएँ सामने आईं।
इतिहास में देखे जाने पर, दिल्ली में पूर्व के चुनावी सूची में भी समान विसंगतियों का सामना किया गया था, जिससे मतदाता अभिगमन पर
प्रभाव पड़ा था। 2019 के आम चुनाव में लगभग 30 लाख नामांकनों को संशोधित किया गया था, और तब भी कई नागरिकों को अपने अधिकारों की प्राप्ति में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस बार, अधिक सटीक तकनीकी समाधान अपनाए गए, लेकिन फिर भी 47.7 लाख मतदाताओं का बाहर रहना
एक बड़ा प्रश्न बनकर सामने आया है।
ड्राफ्ट सूची जारी होने के बाद, दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक सार्वजनिक सुनवाई का आदेश दिया, जिसमें विभिन्न हितधारकों को अपनी-अपनी दलीलें प्रस्तुत करने का अवसर मिला। इस दौरान, कई नागरिक समूहों ने सूची में अपनी नामांकन को पुनःस्थापित करने की मांग
की, और कहा कि कई बार त्रुटियों के कारण योग्य मतदाताओं को बाहर रखा गया है। चुनाव आयोग ने कहा कि इस प्रक्रिया में तकनीकी गड़बड़ी के साथ-साथ मानवीय त्रुटियों का भी प्रभाव हो सकता है।
राजनीतिक पार्टियों ने इस विकास पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दीं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने
कहा कि यह ड्राफ्ट सूची डेमोक्रेसी के मूल सिद्धांतों को ठेस पहुंचाने वाली है और यह चुनावी प्रक्रिया में भरोसा कम कर रही है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने कहा कि सूची में सुधार के लिये उठाए गए कदम सही दिशा में हैं और यह सुरक्षित और पारदर्शी चुनाव
सुनिश्चित करेगा। कई छोटे दलों ने भी कहा कि वे इस सूची को सभी वर्गों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए पुनः जांच की मांग कर रहे हैं।
विपक्षी दलों ने यह भी कहा कि ड्राफ्ट सूची में बाहर रखे गए मतदाताओं की संख्या का उपयोग भ्रष्टाचारी राजनीति
के रूप में किया जा सकता है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि इस मुद्दे को समय पर हल नहीं किया गया, तो यह आगामी 2029 के लोकसभा चुनाव में मतदाता भागीदारी को प्रभावित कर सकता है। इस बीच, चुनाव आयोग ने कहा कि सभी विसंगतियों को दूर करने
के लिये एक विस्तृत पुनः जाँच प्रक्रिया शुरू की जाएगी, जिसमें डिजिटल एथेन्टिकेशन और व्यक्तिगत दस्तावेज़ सत्यापन शामिल होगा।
सामाजिक संगठनों ने इस मुद्दे को नागरिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में उठाया। एक प्रमुख नागरिक अधिकार समूह ने कहा कि 47.7 लाख मतदाताओं को बाहर रखना लोकतांत्रिक प्रक्रिया
की नाजुकता को उजागर करता है। उन्होंने यह भी कहा कि यह स्थिति विशेष रूप से उन कमजोर वर्गों को प्रभावित करेगी, जिनके पास पहचान प्रमाणपत्रों की कमी है। इन समूहों ने चुनाव आयोग से शीघ्र कार्रवाई की मांग की और कहा कि मतदाता शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रमों को तेज़ी
से लागू किया जाए।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखे तो, मतदाता सूची में त्रुटियों के कारण संभावित मतदान में कमी से सार्वजनिक खर्च में वृद्धि हो सकती है। चुनाव आयोग को अतिरिक्त संसाधन और तकनीकी समर्थन की आवश्यकता पड़ेगी, जिससे बजट पर दबाव बढ़ सकता है। साथ ही, यदि बड़ी
संख्या में मतदाता अपने अधिकारों को प्रयोग नहीं कर पाते हैं, तो यह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की वैधता को प्रभावित कर सकता है और भविष्य में नीति निर्माण प्रक्रियाओं पर भी असर डाल सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा कि
Updated: September 1, 2026
The draft list identifies 4.77 million voters excluded during the Special Iterative Roll, prompting verification through an online portal.
Accurate voter rolls are crucial for ensuring eligible participation in forthcoming elections.
Be First to Comment