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महाराष्ट्र‑उत्तराखंड के ग्रामीण कचरा मॉडल ने राष्ट्रीय नीति‑निर्माताओं का ध्यान आकर्षित किया है

भारत के दो ग्रामीण जिलों ने कचरा प्रबंधन में अपनाए गए नवाचारी मॉडल ने राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्माताओं का ध्यान आकर्षित किया है। महाराष्ट्र के रत्नागिरी और उत्तराखंड के चमोली में शुरू किए गए सामुदायिक कचरा संकलन एवं पुनर्चक्रण कार्यक्रम, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण

क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन की वैश्विक समस्या का समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं। इन पहलों ने न केवल कचरे के खुले ढंग से जलाए जाने या नदियों में फेंके जाने को रोका है, बल्कि स्थानीय रोजगार सृजन और आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि की है। इस प्रकार, इन दो जिलों की सफलता

को भारत के ग्रामीण कचरा प्रबंधन में एक संभावित मॉडल माना जा रहा है।

रक्तनागिरी जिले का कचरा प्रबंधन मॉडल 2018 में स्थानीय स्वशासन संस्थान (Panchayat) और राज्य पर्यावरण विभाग के सहयोग से शुरू किया गया। इस कार्यक्रम के तहत प्रत्येक घर को बायोडिग्रेडेबल और नॉन‑बायोडिग्रेडेबल कचरे के लिए अलग-अलग डिब्बे

प्रदान किए गए। कचरे को एकत्रित कर सौर ऊर्जा संचालित कम्पोस्टिंग यूनिट में भेजा जाता है, जहाँ जैविक कचरे को उर्वरक में बदल दिया जाता है। वहीं, प्लास्टिक और कांच के कचरे को निकटवर्ती पुनर्चक्रण केंद्रों में भेजा जाता है, जहाँ उन्हें नई वस्तुओं में बदलने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इस

प्रणाली ने ग्रामीण घरों में कचरा निपटान की आदतों में मूलभूत परिवर्तन लाया है।

चमोली जिले ने 2019 में “ग्रामीण कचरा समाधान” नामक एक सामुदायिक पहल शुरू की, जिसमें गांव-स्तर पर स्वयंसेवक समूहों को प्रशिक्षित कर कचरा संग्रहण, वर्गीकरण और पुनर्चक्रण के कार्य सौंपे गए। इस पहल में स्थानीय महिलाओं को

विशेष रूप से शामिल किया गया, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय के स्रोत उपलब्ध हुए। कचरा संग्रह के लिए सौर ऊर्जा से चलने वाले इलेक्ट्रिक ट्रैक्टरों का प्रयोग किया गया, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रति भी सकारात्मक कदम उठाए गए। इन सभी उपायों ने ग्रामीण क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन को व्यवस्थित और टिकाऊ

बनाया है।

इन दोनों जिलों में कचरा संग्रहण की आवृत्ति अब सप्ताह में दो बार सुनिश्चित की जाती है, जबकि पहले यह अनियमित और अक्सर न करने योग्य था। स्थानीय प्रशासन ने कचरा प्रबंधन के लिए एक विशेष फंड स्थापित किया, जिसमें राज्य एवं केंद्र सरकार के अनुदान, तथा निजी दानदाता

शामिल हैं। इस फंड का प्रमुख उपयोग कचरा संग्रहण उपकरण, कम्पोस्टिंग टैंक और पुनर्चक्रण सुविधाओं के निर्माण में किया जाता है। इसके अतिरिक्त, ग्रामीण स्कूलों में कचरा जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाते हैं, जहाँ छात्रों को कचरा वर्गीकरण और पुनर्चक्रण के महत्व के बारे में शिक्षित किया जाता है।

रक्तनागिरी में स्थापित

कम्पोस्टिंग यूनिट ने पहली वर्ष में लगभग 10,000 टन जैविक कचरा संसाधित किया, जिससे स्थानीय कृषि में उपयोगी उर्वरक का उत्पादन हुआ। इस उर्वरक को स्थानीय किसानों को कम कीमत पर उपलब्ध कराया गया, जिससे कृषि उत्पादन में 8% तक की वृद्धि दर्ज हुई। पुनर्चक्रण केंद्र ने प्लास्टिक कचरे का 70% पुनः

उपयोग योग्य सामग्री में बदल दिया, जिससे न केवल कचरे की मात्रा घटी, बल्कि पर्यावरणीय प्रदूषण में भी कमी आई। इस प्रकार, कचरा प्रबंधन ने आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक तीनों क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव डाला है।

चमोली में महिलाओं द्वारा स्थापित “कचरा उद्यम” ने प्लास्टिक कचरे को पुनः निर्माण करके हस्तशिल्प

वस्तुओं में बदला, जो स्थानीय बाजार और पर्यटन स्थल में बिकती हैं। इस पहल ने महिलाओं को औसत 5,000 रुपये की मासिक आय प्रदान की, जिससे उनके आर्थिक सशक्तिकरण में योगदान मिला। साथ ही, सौर ट्रैक्टरों के उपयोग से डीजल खपत में 30% की कमी आई, जिससे ग्रामीण परिवहन लागत में भी

कमी आई। इन पहल के परिणामस्वरूप, जिले की कुल कचरा निपटान दर 85% तक पहुंच गई, जो राष्ट्रीय औसत 30% से कहीं अधिक है।

इन जिलों के मॉडल को देखते हुए, राष्ट्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने इनका अध्ययन करने के लिए एक विशेषज्ञ टीम गठित की। टीम ने कहा कि ग्रामीण कचरा

प्रबंधन में स्थानीय स्तर पर स्वायत्तता और समुदाय की भागीदारी मुख्य कारक हैं। उन्होंने उल्लेख किया कि इन जिलों की सफलता में सरकारी अनुदान, सौर ऊर्जा का उपयोग और महिला सशक्तिकरण के तत्व प्रमुख रहे। टीम ने सुझाव दिया कि इस प्रकार के मॉडल को अन्य राज्यों में दोहराया जाए, विशेषकर उन

क्षेत्रों में जहाँ कचरा संग्रहण की सुविधा नहीं है।

स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधियों ने इन पहलों की प्रशंसा की और कहा कि यह ग्रामीण विकास का एक नया आयाम प्रस्तुत करता है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने रत्नागिरी मॉडल को “देश की स्वच्छता दिशा का उदाहरण” कहा, जबकि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने च

Updated: September 1, 2026


India’s Ratanagiri and Chamoli districts have set a new benchmark for rural waste management, turning discarded materials into income‑generating resources and boosting local employment. The success of community‑led collection, solar‑powered composting and recycling has drawn national attention, prompting the Environment Ministry to consider scaling the model across the country.

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