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NDA में आरक्षण ‘सब‑कैटेगराइजेशन’ पर चिराग पासवान‑जीतन राम मांझी के बीच तीव्र टकराव, इस्तीफ़ा की मांगें

राष्ट्रीय गठबंधन (NDA) के भीतर आरक्षण मुद्दे पर तीव्र टकराव ने नई धारा खोली है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के प्रमुख जीतन राम मांझी के बीच बहस, जो आरक्षण के सब‑कैटेगराइजेशन और “क्रीमी लेयर” की पहचान को लेकर है, अब इस्तीफ़ा की मांग तक पहुँच गई है।मांझी ने अपने बेटे, बिहार सरकार के मंत्री संतोष सुमन को भी इस विवाद में शामिल किया, जबकि सुमन ने प्रतिवाद में पासवान को पद से हटाने की मांग की। इस विकास ने राजनीतिक माहौल को अस्थिर कर दिया है और आगामी चुनावी समीकरणों पर गहरा असर डाल सकता है।

आरक्षण मुद्दा, जो दशकों से सामाजिक न्याय के दायरे में चर्चा का विषय रहा, 2023‑24 में पुनः उठाया गया जब सुप्रीम कोर्ट‑सुप्रीम ट्रिब्यूनल (SC‑ST) ने “सब‑कैटेगराइजेशन” की संभावना को सुर्खियों में लाया। इस पहल का उद्देश्य पिछड़े वर्गों के भीतर अत्यधिक धनी और शक्तिशाली वर्गों को बाहर निकाल कर वास्तविक लाभ पहुंचाना था।

हालांकि, “क्रीमी लेयर” की पहचान को लेकर विभिन्न राजनैतिक दलों में मतभेद उत्पन्न हुए, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई।

NDA के दो प्रमुख स्तंभ, यानी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के अन्य साथी, इस मुद्दे को लेकर अपने‑अपने दृष्टिकोण रख रहे हैं। जबकि कुछ राज्य स्तर पर कोटे को घटाकर “कोटे के भीतर कोटा” लागू करने का समर्थन कर रहे हैं, वहीं कुछ ने इसे सामाजिक सामंजस्य के लिए हानिकारक बताया है। इस पृष्ठभूमि में चिराग पासवान ने HAM के संस्थापक, जीतन राम मांझी, को सार्वजनिक मंच पर “आरक्षण की सच्ची भावना” को धूमिल करने का आरोप लगाते हुए, उनके बेटे संतोष सुमन को इस्तीफ़ा देने की मांग की।

बयानबाजी की शुरुआत 28 जुलाई को नई दिल्ली के एक सार्वजनिक मंच से हुई, जहाँ पासवान ने “आरक्षण में सब‑कैटेगराइजेशन को लागू करने से ही वास्तविक समता स्थापित होगी” कहा। उन्होंने मांझी को “राजनीतिक हितों” के पीछे रहने का आरोप लगाया और स्पष्ट कर दिया कि “यदि आप इस आंदोलन को अस्वीकार नहीं करेंगे तो आप खुद ही अपने ही पद से हटेंगे”। इस टिप्पणी पर HAM ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “आरक्षण को कमजोर करने की कोई भी कोशिश लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध है”।

मांझी ने 29 जुलाई को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पासवान की टिप्पणी को “भ्रमित करने वाले बयान” कहा और बताया कि उनका बेटा संतोष सुमन, जो बिहार में विकास कार्यों के लिए प्रशंसित है, को इस बहस में खींचना “राजनीतिक खेल” है। उन्होंने यह भी कहा कि “यदि पासवान को आरक्षण में कोई वास्तविक बदलाव चाहिए तो उन्हें अपने ही विचारों को स्पष्ट करना चाहिए, न कि व्यक्तिगत आरोप‑प्रत्यारोप”। इस बीच, संतोष सुमन ने 30 जुलाई को “अगर इस्तीफ़ा का सवाल है तो मैं पहले पासवान को पद से हटाने की मांग करता हूँ” कह कर उत्तर दिया।

तीन दिन के भीतर इस टकराव ने मीडिया सर्कल में धूम मचा दी। विभिन्न समाचार चैनलों ने इस मुद्दे को प्रमुखता से दिखाया, जबकि सोशल मीडिया पर #ChiragVsManjhi हैशटैग ट्रेंड करने लगा। कई राजनैतिक विश्लेषकों ने इस विवाद को “NDA के भीतर सत्ता संतुलन के पुनः परीक्षण” के रूप में वर्णित किया। इस बीच, कई सामाजिक कार्यकर्ता और दलित संगठन ने इस बहस को “आरक्षण के मूल उद्देश्यों को धूमिल करने का प्रयास” कहा।

परिणामस्वरूप, कई राज्य सरकारों ने इस मुद्दे पर अपने‑अपने विचार व्यक्त किए। बिहार में, जहाँ संतोष सुमन मंत्री पद पर हैं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि “राजनीति को सामाजिक न्याय के मुद्दे पर खेल नहीं बनाना चाहिए” और “आइए हम सभी मिलकर समाधान ढूँढ़ें”। उत्तर प्रदेश में, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने “आरक्षण के सुधार में सभी दलों को मिलकर काम करना चाहिए” कहा, जबकि विपक्षी दलों ने इस टकराव को “भ्रष्ट राजनीति” का उदाहरण कहा।

संसदीय स्तर पर भी इस विवाद ने चर्चा को जन्म दिया। लोकसभा में कई सांसदों ने पासवान और मांझी दोनों के बयान पढ़े, और “आरक्षण नीति में पारदर्शिता” की मांग की। विपक्षी दलों ने पासवान के बयान को “आरक्षण को धूमिल करने का प्रयास” कहा, जबकि भाजपा के पक्षधर ने इसे “समाज में वास्तविक समता लाने की दिशा में कदम” बताया।

इस बहस ने पार्लमेंटरी कमेटी को भी इस विषय पर विशेष सत्र आयोजित करने का प्रस्ताव दिया।

आर्थिक दृष्टिकोण से देखे तो, आरक्षण के पुनः व्यवस्थित होने से सार्वजनिक रोजगार और शिक्षा संस्थानों में चयन प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।

The NDA rift over “sub‑categorisation” shows that reservation is no longer a policy issue but a loyalty test—those who can’t admit the “curry‑layer” argument risk being cast out.

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