छह फरवरी दो हज़ार बीसतीस को जारी तांत्रिक रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि उत्तरी तट में गंगा के बढ़ते दबाव के कारण संरचनात्मक क्षति हो सकती है। रिपोर्ट में नवगछिया क्षेत्र को विशेष जोखिम मंडल के रूप में दर्शाया गया था जहाँ मिट्टी की क्षमता घट रही है। इंजीनियरों ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि यदि तत्काल मरम्मत और भुसांडी के काम शुरू नहीं किए गए तो भारी क्षति का स्तर बढ़ेगा।
बिहार सरकार के पथ निर्माण विभाग के तकनीकी कार्यालय को यह रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी ताकि वह आवश्यक बजट आवंटन और कार्यान्वयन योजना बना सके। रिपोर्ट में इंगित किया गया था कि मौजूदा तटबंध और सहायक संरचनाएं वर्तमान जलवायु paterns के अनुकूल नहीं हैं। विशेषज्ञों का कहना था कि छोटे स्तर की मरम्मत के बजाय व्यापक पुनर्निर्माण की आवश्यकता है ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की आपदा से निपटा जा सके।
समय के साथ स्थिति गंभीर होती गई क्योंकि रिपोर्ट में बताए गए जोखिमों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। बरसात की शुरुआत होते ही गंगा का स्तर तीव्र गति से बढ़ने लगा जिससे पहले से ही क्षतिग्रस्त क्षेत्रों में और अधिक तनाव उत्पन्न हुआ। अंतिम बैरियर तोड़ दिया गया। मरम्मत का कार्य अधूरा रहा और सुरक्षा दल की तैनाती में गड़बढ़ियां सामने आईं। यह सुस्ती विनाश के लिए पथ प्रशस्त करती दिखाई दी।
जब राघोपुर बांध ने अपनी रीढ़ खो दी, तो पानी का असहनीय प्रवाह निचले इलाकों में आ गया। स्थानीय व्यक्तियों को अचानक नोटिस मिला, जिससे भागने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला। प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, बांध के टूटने के कारण कई गांव पानी में डूब गए और संचार व्यवस्था पूरी तरह से बर्बाद हो गई। स्थानीय असतों की स्थिति कड़ी है।
राज्य स्तर पर जांच की मांग उठी है, जिसके तहत संबंधित अधिकारियों जिम्मेदार ठहराए जाने की मांग की जा रही है। सत्यनिष्ठ पत्रकारिता के तहत यह बात तथ्यों से ऐंठ दो खण्डी नहीं की जा सकती की चेतावनियां देखी गई थी कि रिपोर्ट अभी भी विचारार्थ थी। राज्य सरकार ने भी कमियों का उच्च स्तरीय समिति के करार पूर्वी घटना को औपचारिक स्तर पर स्वीकार करते हुए कार्यवाही शुरू करने की घोषणा की ताकि दायित्वों की स्थापना की जा सके।
विशेष रूप से तकनीकी खंडों को जांच साक्ष्य से जुड़े विश्लेषण स्तर पर वास्तविक मौत हो रही है कि यदि रिपोर्ट पर क्रियान्वयन किया जाता था।
Official reports had previously identified structural risks at the Raghopur dam.
The failure highlights critical gaps between technical warnings and administrative action.
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