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बिहार में बाढ़ , CM ने राहत कार्य तेज करने के दिए निर्देश

बिहार में गंगा, कोसी, गंडक और सोन नदियों के जलस्तर में तेज़ी से वृद्धि ने प्रदेश में बाढ़ की गंभीर आशंका उत्पन्न कर दी है, जिससे स्थानीय प्रशासन ने आपातकालीन चेतावनी जारी की है।
मुख्यमंत्री ने हवाई सर्वेक्षण के बाद राहत एवं बचाव कार्य को तीव्र करने का निर्देश दिया, जबकि आपदा प्रबंधन विभाग ने आगामी बाढ़ प्रबंधन रणनीति पर चर्चा करने के लिए विशेष बैठक बुलाई है। इस चेतावनी के बाद नदियों के किनारे बसे कई गांवों में लोग सतर्कता के साथ तैयारियों में जुट गए हैं, जिससे प्रदेश में सामाजिक तनाव बढ़ने की संभावना स्पष्ट हुई है।पिछले दो दशकों में बिहार में वार्षिक बाढ़ की आवृत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। 2008 से 2023 के बीच गंगा और कोसी के किनारे 57 प्रतिशत अधिक जलभवन की रिपोर्टें दर्ज की गईं, जबकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को बढ़ाते हुए बरसात की मौसमी तीव्रता भी बढ़ी है। राष्ट्रीय जलवायु प्राधिकरण के आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में वर्षा के औसत स्तर में 12.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिससे नदियों के जलस्तर में अचानक उछाल की संभावना बढ़ गई है। इन आँकड़ों को देखते हुए, राज्य सरकार ने बाढ़ प्रतिरोधी बुनियादी ढांचा निर्माण में निवेश को प्राथमिकता दी थी, परंतु अभी तक पर्याप्त प्रभाव नहीं दिख रहा है।

वर्तमान स्थिति का मुख्य कारण हिमालयी जलस्रोतों से निकली धारा और पूर्वी नेपाल में तेज़ बर्फ पिघलने की प्रक्रिया को माना जा रहा है। नेपाल में पिछले हफ़्ते की बाढ़ के बाद जलवायु विज्ञानियों ने बताया कि ग्लेशियर पिघलने की दर में पिछले पाँच वर्षों में 18 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिससे गंगा और कोसी के प्रमुख स्रोतों में जल की मात्रा बढ़ी है। इसके अतिरिक्त, बागीचा, धान और जौ की खेती के लिए उपयोग की जाने वाली सिंचन प्रणाली ने भी नदियों के जलस्तर को बढ़ाने में योगदान दिया है। इन सभी कारकों ने मिलकर इस बार की बाढ़ को अत्यंत खतरनाक बना दिया है।

बिहार सरकार ने आपदा प्रबंधन विभाग के तहत एक त्वरित बैठक बुलाई, जिसमें विभाग प्रमुख, जल संसाधन प्रबंधक, पुलिस प्रमुख, स्वास्थ्य सेवा अधिकारी और स्थानीय निकाय के प्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक में तत्काल कार्यवाही के रूप में 1500 किमी की नदियों की जलस्थिति का निरंतर मॉनिटरिंग, 25 टन क्षमता वाले 10 अस्थायी बाढ़ शिविरों की स्थापना, और प्रभावित क्षेत्रों में 5000 किलॉमीटर तक की जलरोधी बाधाओं का निर्माण करने का प्रस्ताव रखा गया। साथ ही, आपदा सूचना प्रणाली को डिजिटल रूप में सुदृढ़ करने के लिए मोबाइल ऐप्लिकेशन के माध्यम से रीयल‑टाइम चेतावनी भेजने की योजना भी मंजूर हुई।

मुख्यमंत्री ने हवाई सर्वेक्षण के दौरान नदियों के किनारे स्थित प्रमुख गाँवों की स्थिति को देखा और कहा कि प्रशासन ने पहले से ही 12,000 से अधिक परिवारों को अस्थायी आश्रय प्रदान करने के लिए तैयारियों को तेज किया है। उन्होंने बताया कि राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने 3500 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को बाढ़ प्रबंधन के लिए विशेष उपकरण उपलब्ध कराए हैं, जबकि पुलिस ने 4000 पुलिसकर्मियों को विशेष जल बचाव दल के रूप में प्रशिक्षित किया है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि जल आपूर्ति और बिजली के निरंतर प्रावधान के लिए राज्य के विद्युत विभाग ने 800 किमी तक की वैकल्पिक पावर लाइनों की मरम्मत को प्राथमिकता दी है।

नदी किनारे स्थित प्रमुख शहरी केंद्रों में बाढ़ के प्रभाव को कम करने के लिए, राज्य सरकार ने 20 टन क्षमता वाले 12 जल-शोधन इकाइयों को स्थापित करने का आदेश दिया। इन इकाइयों से प्रभावित क्षेत्रों में साफ़ पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी, जिससे जलजनित रोगों के प्रकोप की संभावना घटेगी। इसके साथ ही, कृषि विभाग ने 10,000 एकड़ कृषि भूमि को बाढ़‑प्रतिकारक बीज और जल‑संकट‑सहायता पैकेज प्रदान

करने का प्रस्ताव रखा है, ताकि फसल क्षति को न्यूनतम किया जा सके। इन कदमों को लागू करने में राज्य के विभिन्न विभागों के बीच समन्वय को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया गया।

मुख्य राजनीतिक दलों ने इस बाढ़ चेतावनी पर विभिन्न प्रतिक्रियाएँ दर्ज की हैं। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि सरकार ने बाढ़ प्रबंधन में पर्याप्त कदम उठाए हैं, परन्तु कार्यान्वयन में तेजी लाने की जरूरत है। कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधियों ने कहा कि पिछले वर्षों में बाढ़ से हुई मानवीय क्षति को देखते हुए, केंद्र एवं राज्य दोनों स्तर पर अधिक वित्तीय सहायता प्रदान की जानी चाहिए। राजद के नेता ने विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में बुनियादी ढाँचे की कमी को उजागर किया, और कहा कि जल‑संरक्षण परियोजनाओं को तुरंत लागू किया जाना चाहिए।

 

सीमित बुनियादी ढांचे के बावजूद नेपाल में तेजी से पिघलता हिमनहीं बड़ी चुनौती है।
बिहार को अब केवल आपात राहत नहीं, बल्कि दीर्घकालिक जलवायु अनुकूलन रणनीति की ज़रूरत है

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