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दरभंगा में सौर ऊर्जा से बदली खेती की तस्वीर, ‘आशा मॉडल’ से पानी की बचत 30% और बिजली खर्च 45% घटा

बिहार के दरभंगा जिले के एक छोटे से गाँव में सुबह के सवेरे ही धूप की पहली किरणें पनपती पंक्तियों में चमकी, जहाँ किसानों ने नया “आशा मॉडल” स्थापित देखा।
यह मॉडल, जिसका पूरा नाम ऑटोमेटेड सोलर‑पावर्ड बेस्ड हाई इफ़िशिएंसी इरिगेशन एप्लीकेशन है, पहली बार बिहार में किसानों को सौर ऊर्जा से चलित सिंचाई प्रणाली प्रदान करेगा। राज्य सरकार की इस पहल का मुख्य उद्देश्य बिजली के बिल में भारी कटौती और जल संसाधन की कुशल उपयोगिता सुनिश्चित करना है, जिससे कृषि उत्पादन में सुधार की उम्मीद है।पिछले दो दशकों में बिहार की कृषि क्षेत्र ने बिजली की अस्थिर आपूर्ति और जल अभाव जैसी चुनौतियों का सामना किया है। विशेषकर सूखे की स्थितियों में किसान अक्सर टन‑टन जल टैंकों पर निर्भर रहे, जबकि उच्च विद्युत दरों ने लागत को बढ़ा दिया। राज्य के कृषि विभाग ने कई बार वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश में विभिन्न प्रयोग किए, परंतु तकनीकी अड़चनें और वित्तीय बाधाओं ने उन्हें बड़े पैमाने पर लागू करने से रोका।

आशा मॉडल की योजना 2022 में बिहार सरकार के नवीनीकरण ऊर्जा विभाग और कृषि विज्ञान केन्द्र के संयुक्त अनुसंधान के बाद तैयार हुई। इस योजना में सोलर पैनलों को खेतों के किनारे स्थापित कर, ऊर्जा को सीधे पम्पों तक पहुँचाया जाएगा, जिससे जल निकासी और वितरण की प्रक्रिया स्वचालित हो जाएगी। मॉडल को लागू करने के लिए पहले 150 हेक्टेयर भूमि पर पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया, जिसमें 500 किसान भाग ले रहे थे।

पायलट चरण में, किसानों को सोलर पैनलों की स्थापना और रख‑रखाव के लिए तकनीशियनों की टीम द्वारा प्रशिक्षण दिया गया। किसानों को मोबाइल ऐप के माध्यम से पानी की जरूरत और पम्प की स्थिति का रीयल‑टाइम डेटा प्राप्त होने लगा, जिससे वे आवश्यकता अनुसार सिंचाई का समय निर्धारित कर सके। इस तकनीकी सहायता से जल की बर्बादी में 30 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई, जबकि बिजली खर्च में 45 प्रतिशत तक की बचत हुई।

स्थानीय समाचार एजेंसियों ने बताया कि पायलट प्रोजेक्ट के पहले दो महीनों में, किसान फसल के पैदावार में औसतन 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी देख रहे हैं। विशेषकर धान और गेहूँ की फसलों में जल उपलब्धता ने उनकी वृद्धि में प्रमुख भूमिका निभाई। इसके अलावा, किसान संघों ने बताया कि सौर ऊर्जा के उपयोग से धुएँ और कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहा।

सरकार ने इस मॉडल के सफल परिणामों को देखते हुए, अगले वित्तीय वर्ष में इसे पूरे राज्य में विस्तार करने का इरादा जाहिर किया है। इस योजना के तहत, अगले दो वर्षों में लगभग 20,000 हेक्टेयर खेतों को सौर‑सिंचाई प्रणाली से सुसज्जित किया जाएगा। इसके लिए राज्य के कृषि ऋण योजना के तहत विशेष सब्सिडी और न्यूनतम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाएगा।

किसानों ने इस पहल को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ व्यक्त कीं। कई छोटे किसान, जिन्होंने पहले बिजली की दरों के कारण भारी कर्ज उठाया था, उन्होंने कहा कि आशा मॉडल ने उन्हें आर्थिक बोझ से मुक्त किया है। वहीं, कुछ बड़े ज़मींदारों ने कहा कि प्रारम्भिक निवेश की लागत अभी भी उच्च है और उन्हें लाभ प्राप्त करने में समय लग सकता है।

राज्य के कृषि मंत्री ने इस अवसर पर कहा, “आशा मॉडल हमारे किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हम इसे पूरे बिहार में लागू करने के लिए तैयार हैं, जिससे हर किसान को सस्ती और स्थायी ऊर्जा उपलब्ध हो सके।” उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में इस प्रणाली को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाते हुए और भी उन्नत तकनीकियों के साथ जोड़ा जाएगा।

विपक्षी दल के प्रतिनिधियों ने सरकार की इस योजना की सराहना की, परंतु उन्होंने कहा कि वित्तीय प्रबंधन और निगरानी तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सोलर पैनलों की आयु और रख‑रखाव खर्च को स्पष्ट रूप से तय करके ही किसानों को पूर्ण लाभ मिलेगा। इस बीच, कुछ पर्यावरणीय NGOs ने कहा कि यह पहल जल संरक्षण और नवीनीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देती है, परंतु उन्हें निरंतर पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की आवश्यकता है।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि सौर‑सिंचाई प्रणाली से बिजली की आयात लागत में कमी आएगी, जिससे राज्य की कुल ऊर्जा खपत में कमी आएगी।

The “Asha Model” shows how coupling solar power with data‑driven irrigation can turn Bihar’s chronic water‑and‑energy shortages into a competitive edge, potentially reshaping farmer profitability and state‑level energy balances.

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