राजस्व विभाग के आंकड़ों के अनुसार, अब तक लगभग 45 लाख जमीनधारकों के रिकॉर्ड में ऐसे दोष पाए गए हैं, जिनमें से कई मामलों में दस्तावेज़ीकरण की कमी या पुराने सर्वेक्षण डेटा की गलतियाँ प्रमुख रही हैं। इस पृष्ठभूमि में राज्य सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर भूमि‑सुधार को सुदृढ़ करने के लिए केन्द्र सरकार के “डिजिटल इंडिया” एवं “भूमि‑संकलन” पहल के साथ समन्वय करने का आश्वासन दिया है।
अभियान के प्रारम्भिक चरण में, जिला स्तर पर विशेष टीमों का गठन किया गया है, जो भूमि‑सुधार कार्यालय, तहसील कार्यालय और स्थानीय पंजीकरण कार्यालयों के साथ मिलकर कार्य करेंगे। इन टीमों को प्रतिदिन 500 से अधिक फाइलों की जाँच‑परख करने और आवश्यक संशोधन करने का निर्देश दिया गया है।
प्रक्रिया के तहत, यदि जमीन के कागजात में नाम में गलती, पिता के नाम की त्रुटि, या खाता‑खेसरा में विसंगति पाई जाती है, तो जमीनधारक को केवल एक ही बार में सभी संशोधन करवाने की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। इस हेतु एकीकृत ऑनलाइन पोर्टल का उपयोग किया जाएगा, जिससे दस्तावेज़ीकरण की गति बढ़ेगी और भौतिक यात्रा की आवश्यकता कम होगी।
राज्य के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने यह भी बताया कि अभियान के दौरान, सभी जिलों में 100 से अधिक “डिजिटल वॉटर‑ड्रॉप” सत्र आयोजित किए जाएंगे, जिसमें जमीनधारकों को स्वयं अपने रिकॉर्ड को अपडेट करने के लिए मार्गदर्शन दिया जाएगा। इन सत्रों में स्थानीय अधिकारी, पंजीयक और कानूनी सलाहकार उपस्थित रहेंगे, जिससे प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहेगी।
इस कदम पर बिहार के मुख्य राजनयिक अधिकारी ने कहा कि “भू-आधारभूत सुधार न केवल किसानों की आर्थिक सुरक्षा को सुदृढ़ करता है, बल्कि निवेशकों के लिए भी स्पष्ट भूमि‑स्वामित्व का वातावरण बनाता है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस प्रकार की सुधारात्मक पहल भारत के कृषि‑आधारित राज्यों में आर्थिक स्थिरता के लिए मॉडल बन सकती है।
बिहार के कई किसान संघों ने इस अभियान की सराहना की, परंतु उन्होंने यह भी कहा कि कार्यवाही तेज़ और सटीक होनी चाहिए, ताकि दीर्घकालिक लाभ प्राप्त हो सके। वहीं, कुछ जमीनधारकों ने आशंका व्यक्त की कि रिकॉर्ड‑सुधार के दौरान उत्पन्न होने वाले अतिरिक्त शुल्क या प्रक्रिया‑सम्बंधी जटिलताएँ उन्हें आर्थिक बोझ में बदल सकती हैं।
विरोधी राजनीतिक दलों ने भी इस अभियान को “राज्य की प्रशासनिक अक्षमता को छुपाने की कोशिश” कहा, और मांग की कि इस प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र आयोग स्थापित किया जाए। उन्होंने कहा कि यदि सुधार के बाद भी त्रुटियों का निराकरण नहीं होता, तो यह पहल केवल सतही रहेगी।
आर्थिक दृष्टिकोण से, भूमि‑सुधार के सटीक रिकॉर्ड के कारण राज्य की आय में संभावित वृद्धि की संभावना है। सुधारित डेटा के आधार पर भूमि‑कर वसूल करने की दक्षता बढ़ेगी, जिससे राज्य के वार्षिक राजस्व में अनुमानित 4 % की वृद्धि हो सकती है। साथ ही, स्पष्ट संपत्ति‑रजिस्ट्री से कृषि‑उद्योग, रियल एस्टेट और बुनियादी ढाँचा विकास के निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा।
सामाजिक प्रभाव के लिहाज़ से, यह पहल उत्तराधिकार विवादों को कम करने, महिलाओं की सम्पत्ति अधिकारों को सुदृढ़ करने और भूमि‑सुरक्षा को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यदि सफल रहा, तो यह ग्रामीण सामाजिक संरचना में स्थिरता लाकर महिलाओं एवं कमजोर वर्गों के आर्थिक सशक्तिकरण में सहायक सिद्ध होगा।
भूमि‑सुधार विशेषज्ञ डॉ. अभिषेक सिंह ने बताया कि “डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से बड़े पैमाने पर रिकॉर्ड‑सुधार संभव हो रहा है, परंतु डेटा की शुद्धता एवं स्थानीय स्तर पर सतत निगरानी आवश्यक होगी।” उन्होंने यह भी कहा कि राज्य को भविष्य में “ब्लॉक‑लेवल डेटा‑वैलिडेशन हब” स्थापित करने की जरूरत है, जिससे त्रुटियों का त्वरित पता चल सके और सुधार प्रक्रिया निरंतर बनी रहे।
Bihar’s sprint to digitise 9 million land titles could convert chronic record‑errors into a fiscal lever, potentially boosting state revenue by about 4 % and signaling a template for other agrarian states.
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