चिलिमे टनाइल, जो काठमान्डु से पोखरा तक जल शक्ति के परिवहन के लिए मुख्य धारा है, 2022 में निर्माण के दौरान कई बार सुरक्षा मुद्दों से जूझी है। पिछले साल नवंबर में टनाइल के एक हिस्से में बड़ी मात्रा में ढहाव हुआ, जिससे 12 श्रमिक फँस गए थे। तत्पश्चात नेपाल सरकार ने आपातकालीन स्थिति घोषित की और भारत की विशेष बचाव टीम को सहयोग के लिए बुलाया।
भारत ने तत्काल अपनी राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के तहत एक विशेषज्ञ समूह तैनात किया, जिसमें खनन, भूविज्ञान और आपदा प्रबंधन के अनुभवी अधिकारी शामिल थे। इस टीम ने नेपाल के स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर बचाव के लिए आवश्यक उपकरण और तकनीकी सहायता प्रदान की। दोनों देशों के बीच पहले भी कई बार प्राकृतिक आपदाओं में सहयोग हुआ है, लेकिन इस बार का मिशन उसकी जटिलता और जोखिम के कारण विशेष महत्व रखता है।
बचाव कार्य का प्रारंभिक चरण टनाइल के अवरुद्ध हिस्से को साफ़ करने पर केंद्रित रहा। भारी मशीनरी, ड्रिल और विस्फोटक सामग्री का प्रयोग कर ढहाव को हटाने के लिए 48 घंटे का लगातार काम किया गया। इस प्रक्रिया में कई बार टनाइल की संरचनात्मक स्थिरता की जाँच की गई, ताकि आगे की कार्यवाही में अतिरिक्त जोखिम न पैदा हो।
सफाई कार्य के बाद, टीमों ने टनाइल के भीतर प्रवेश के लिए एक नई मार्गदर्शिका स्थापित की। इस मार्ग में सुरक्षित अंतराल, वायु गुणवत्ता मॉनिटर और संचार उपकरण लगाए गए, जिससे फँसे श्रमिकों तक पहुँचने में सुविधा होगी। भारत की बचाव टीम ने विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए रिमोट-ऑपरेटेड वैक्युम पंपों का उपयोग कर वायु संचार को सुनिश्चित किया।
आगे के चरण में, बचाव दल ने टनाइल के भीतर स्थित कार्यस्थल की स्थिति को रीयल-टाइम में मॉनिटर किया। उन्नत थर्मल इमेजिंग कैमरों और सेंसर्स के माध्यम से श्रमिकों की सटीक स्थिति का पता लगाया गया। इन तकनीकी साधनों ने बचाव प्रक्रिया को तेज़ और सुरक्षित बनाया, जिससे संभावित जोखिम को न्यूनतम रखा जा सका।
नेपाल सरकार के प्रमुख अधिकारी, इन्द्रा शर्मा, ने बताया कि बचाव कार्य में अब तक 8 श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका है। उन्होंने कहा कि शेष 4 श्रमिकों के जीवित रहने की संभावना अभी भी उच्च है और टीमें उन्हें बचाने के लिए पूरी तत्परता से कार्य कर रही हैं। शर्मा ने भारत की टीम के सहयोग को असाधारण कहा और भविष्य में और भी सहयोग की आशा व्यक्त की।
भारतीय बचाव टीम के प्रमुख, मेजर अर्जुन सिंह, ने कहा कि तकनीकी चुनौतियों के बावजूद टीम ने सभी सुरक्षा मानकों का पालन किया है। उन्होंने यह भी बताया कि टनाइल की संरचनात्मक जाँच के दौरान अतिरिक्त समर्थन के लिए नेपाल के स्थानीय इंजीनियरों को भी शामिल किया गया है। सिंह ने कहा कि इस तरह के आपातकालीन स्थितियों में दोनों देशों के बीच निरंतर संवाद और सहयोग अनिवार्य है।
सुरक्षा विशेषज्ञों ने यह रेखांकित किया कि टनाइल जैसी भूगर्भीय संरचनाओं में नियमित निरीक्षण और रखरखाव आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार डिजाइन और निर्माण प्रक्रिया को सुदृढ़ करना चाहिए। विशेषज्ञों ने यह भी सुझाव दिया कि ऐसी बड़ी परियोजनाओं में जोखिम मूल्यांकन को प्रारंभिक चरण से ही लागू किया जाना चाहिए।
राजनीतिक दृष्टिकोण से, इस बचाव मिशन ने दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग को नई दिशा दी है। नेपाल की सरकार ने इस अवसर को अपने अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सुदृढ़ करने के लिए उपयोग किया, जबकि भारत ने अपने मानवीय सहायता क्षमताओं को प्रदर्शित किया। इस प्रकार की सहयोगात्मक पहलें दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में विश्वास और समन्वय को बढ़ावा देती हैं।
Updated: September 15, 2026
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