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अमित शाह ने 2029 तक 21 राज्यों में UCC लागू करने की संभावना जताई, जदयू ने विरोध

बिहार में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर राजनीतिक माहौल में अचानक तेज़ी से उथल-पुथल मची है, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2029 से पहले भाजपा‑नेतृत्व वाली 21 राज्यों में UCC लागू करने की संभावना जताई। इस घोषणा के बाद, उत्तर प्रदेश के प्रमुख राष्ट्रीय नेता रामकृपाल यादव ने सरकारी कदम को “सही” कहा, जबकि राज्य के प्रमुख विपक्षी दलों ने इस पर तीखा विरोध जताया। इस बीच, बिहार में जदयू के वरिष्ठ नेता ने स्पष्ट रूप से कहा कि उनके राज्य में UCC लागू होने की कोई संभावना नहीं है, जिससे राष्ट्रीय गठबंधन के भीतर तनाव बढ़ गया है।

UCC के प्रस्ताव का मूल उद्देश्य भारत के विविध धार्मिक समुदायों को एक समान नागरिक कानून के तहत लाना है, जिससे मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों की असमानताओं को समाप्त किया जा सके। यह विचार पहले 2019 में भारतीय संसद में कई बार चर्चा का विषय रहा, परन्तु सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक कारणों से कई बार टल जाता रहा। अब, प्रधानमंत्री कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, इस नीति को राष्ट्रीय एकता और न्यायसंगतता के दृष्टिकोण से आगे बढ़ाया जाना चाहिए, और इसे लागू करने के लिए विधायी प्रक्रिया तेज़ करने की योजना है।

बिहार में इस मुद्दे की जड़ें 2024 के राष्ट्रीय चुनावी माहौल से जुड़ी हैं, जब कई राज्यों में समान नागरिक संहिता के संभावित लाभ और हानि पर गहन बहस चल रही थी। विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे बड़े जनसंख्या वाले राज्यों में, सामाजिक संगठनों और धार्मिक संस्थाओं ने इस मुद्दे पर विभिन्न स्तरों पर विरोध प्रदर्शन किए। इस संदर्भ में, केंद्र सरकार ने कहा कि UCC का लक्ष्य सभी नागरिकों को समान अधिकार देना है, न कि किसी एक समुदाय को नुकसान पहुँचाना।

अमित शाह ने अपने हालिया बयान में कहा कि “हम 2029 तक इस दिशा में कार्य करेंगे, ताकि न्यायिक समानता को सुदृढ़ किया जा सके।” उन्होंने यह भी बताया कि यह कदम भारतीय लोकतंत्र की प्रगति का हिस्सा है, और इसे लागू करने के लिए संसद में आवश्यक विधायी संशोधन किए जाएंगे। इस बात को सुनकर राष्ट्रीय स्तर के कई राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा कि यह नीति आर्थिक विकास और सामाजिक स्थिरता दोनों के लिये आवश्यक है, क्योंकि इससे व्यक्तिगत कानूनों में विविधता कम होगी।

रामकृपाल यादव, जो वर्तमान में बिहार के राजनैतिक परिदृश्य में एक प्रमुख आवाज़ माने जाते हैं, ने इस पर “सरकार का फैसला सही है” कहकर समर्थन व्यक्त किया। उन्होंने यह भी कहा कि UCC को लागू करने से सामाजिक बंधनों में सुधार होगा और न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी। यादव ने यह स्पष्ट किया कि उनका समर्थन इस बात पर आधारित है कि यह कदम दीर्घकालिक सामाजिक सुधारों की दिशा में एक सकारात्मक कदम है, और यह व्यक्तिगत अधिकारों को सशक्त बनाने में मदद करेगा।

दूसरी ओर, जदयू के वरिष्ठ विधायक ने स्पष्ट रूप से कहा कि “बिहार में UCC लागू नहीं होगा” और यह कहा कि राज्य के सामाजिक ताने-बाने में इस बदलाव को लागू करना “असंभव” है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि जदयू की नीति हमेशा धर्मनिरपेक्षता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संरक्षित रखने की रही है, और इस कारण से उन्होंने इस प्रस्ताव का कड़ाई से विरोध किया। उनका यह बयान राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया, क्योंकि यह भाजपा‑नेतृत्व वाली गठबंधन के भीतर स्पष्ट मतभेद को दर्शाता है।

बिहार में जनसंख्या की विविधता, विशेषकर विभिन्न धर्मीय और जातीय समूहों की मौजूदगी, इस मुद्दे को और जटिल बना देती है। सामाजिक संगठनों, धार्मिक परिषदों और नागरिक अधिकार समूहों ने इस पर विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रिया दी है। कई संगठन ने कहा कि UCC के लागू होने से धार्मिक स्वतंत्रता को खतरा हो सकता है, जबकि अन्य ने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में एक आवश्यक कदम माना। इस प्रकार, राज्य में सामाजिक तनाव बढ़ने की आशंका है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ व्यक्तिगत कानूनों की गहरी जड़ें हैं।

राजनीतिक रूप से, इस विकास ने राष्ट्रीय गठबंधन के भीतर एक नया तनाव उत्पन्न किया है। भाजपा के कई वरिष्ठ नेता ने कहा कि यह नीति राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता को बढ़ावा देगी, परन्तु जदयू और अन्य विपक्षी दल इस पर प्रश्न उठाते रहेंगे। कांग्रेस के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने कहा कि “यदि सरकार इस मुद्दे को बिना व्यापक सामाजिक संवाद के आगे बढ़ाएगी, तो यह राजनीतिक अस्थिरता का कारण बन सकता है।” इस बीच, विभिन्न राज्य सरकारों ने भी इस पर अपने-अपने स्थितियों का उल्लेख किया, जहाँ कुछ ने इसे “विचाराधीन” कहा, जबकि अन्य ने “रोकथाम” की मांग की।

आर्थिक प्रभाव के दृष्टिकोण से, विशेषज्ञों का मानना है कि UCC का कार्यान्वयन निवेश माहौल को सकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है, क्योंकि एक समान कानूनी ढांचा निवेशकों के लिये स्पष्टता प्रदान करेगा। हालांकि, सामाजिक असंतोष के कारण संभावित विरोध प्रदर्शन और अस्थायी व्यवधान आर्थिक गतिविधियों को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं। विशेषकर कृषि और छोटे उद्यमों पर इसका असर दिख सकता है, जहाँ स्थानीय सामाजिक संरचनाएँ आर्थिक संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

सामाजिक दृष्टिकोण

Updated: September 14, 2026

The proposal could replace multiple personal laws with a single civil code, aiming for uniform legal rights across religious communities.
Its discussion is reshaping alliances among major parties in Bihar and other states, affecting national coalition dynamics.

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