आंकड़े सरकार की घरेलू आपूर्ति बढ़ाने और आयात को कम करने की नीतियों के प्रभाव को दर्शाते हैं। इस संदर्भ में, कोयला क्षेत्र में नई खनन परियोजनाओं की शुरुआत और मौजूदा पावर प्लांटों की कोयला उपयोग क्षमता में सुधार प्रमुख कारक माने जा रहे हैं।
IEA की रिपोर्ट का
आधार 2023‑2024 के औसत डेटा है, जिसमें भारत ने 2022 के बाद से कोयला खपत में निरंतर वृद्धि दर्ज की है। वैश्विक ऊर्जा मांग में तेजी, विशेषकर एशिया‑प्रशांत क्षेत्र में, और चीन एवं यूरोप में कोयले की आयात प्रतिबंधों ने भारत को घरेलू कोयले पर अधिक निर्भर बनाने की दिशा
में प्रेरित किया। साथ ही, भारत सरकार ने 2022 में राष्ट्रीय कोयला नीति में कई सुधार किए, जिसमें कोयला खनन लाइसेंस की प्रक्रिया को सरल बनाना और निजी निवेश को आकर्षित करना शामिल है।
पिछले दो वर्षों में भारत ने कोयला उत्पादन में 5 प्रतिशत से अधिक की वार्षिक वृद्धि
दर्ज की, और इस प्रवृत्ति को जारी रखने की उम्मीद है। कोयला उत्पादन में यह वृद्धि कई बड़े सार्वजनिक और निजी खनन कंपनियों के विस्तार योजनाओं से समर्थित है। राष्ट्रीय कोयला निगम (NTPC) ने अपनी कोयला उत्पादन क्षमता को 2025 तक 120 मिलियन टन तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, जबकि
निजी क्षेत्र में कई कंपनियों ने नई खनन परियोजनाओं के लिए लाइसेंस प्राप्त किए हैं। इन कदमों से कोयला की घरेलू आपूर्ति में स्थिरता आएगी और आयात लागत में कमी होगी।
सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए कोयला क्षेत्र में निवेश को तेज़ किया है। 2023 में
ऊर्जा मंत्रालय ने कोयला उत्पादन को बढ़ाने के लिए 15 बिलियन रुपये का विशेष कोष स्थापित किया, जिसमें खनन तकनीकी उन्नयन और पर्यावरणीय मानकों के पालन को प्रोत्साहित किया गया। साथ ही, कोयला निर्यात को नियंत्रित करने के लिए नई नीतियां लागू की गईं, जिससे घरेलू मांग को प्राथमिकता दी जा
सके। इस नीति के तहत कोयला खनन कंपनियों को उत्पादन लक्ष्य निर्धारित किए गए और उनकी पूर्ति न होने पर दंडात्मक उपाय लागू किए गए।
इन नीतियों के फलस्वरूप, भारत ने 2023‑24 में कोयला आयात में 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की, जबकि घरेलू उत्पादन में 6 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
आयात में कमी ने विदेशी मुद्रा बचत को बढ़ाया और ऊर्जा लागत में स्थिरता लाई। हालांकि, कोयला की कीमत में अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव ने भारतीय पावर प्लांटों को अस्थिर कर दिया, जिससे कई राज्य सरकारें वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की खोज में लगीं। इस पर ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है
कि कोयले पर अत्यधिक निर्भरता दीर्घकालिक ऊर्जा स्थिरता के लिए चुनौती बन सकती है।
IEA ने बताया कि भारत की कोयला उत्पादन क्षमता में वृद्धि का मुख्य कारण नई तकनीकी अपनाना है। अत्याधुनिक ड्रिलिंग तकनीक और स्वचालित खनन प्रक्रियाएं उत्पादन दक्षता को 15 प्रतिशत तक बढ़ा रही हैं। इसके अतिरिक्त,
पर्यावरणीय मानकों को पूरा करने के लिए जल पुनर्चक्रण और धूल नियंत्रण प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है। ये उपाय न केवल उत्पादन बढ़ाते हैं बल्कि पर्यावरणीय प्रभाव को भी सीमित करते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की ऊर्जा नीति को सकारात्मक रूप से देखा जा रहा है।
कोयला उत्पादन में इस तेजी पर विभिन्न पक्षों की प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। ऊर्जा मंत्रालय ने कहा कि यह वृद्धि राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करेगी और आर्थिक विकास को समर्थन देगी। दूसरी ओर, पर्यावरणीय गैर‑सरकारी संगठनों ने इस विकास को लेकर सतर्कता बरती है, कहती हैं कि कोयला
पर निर्भरता जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों को नुकसान पहुँचा सकती है। इस बीच, कोयला आयात पर निर्भर छोटे पावर प्लांटों ने भी अपनी उत्पादन योजना को संशोधित करने की घोषणा की, जिससे वे घरेलू कोयले पर अधिक भरोसा कर सकें।
राजनीतिक रूप से, कोयला उत्पादन में वृद्धि को सरकार
की ऊर्जा स्वावलंबन नीति के प्रमुख उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। विपक्षी दल ने कहा कि यह नीति आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरणीय लागत को नजरअंदाज करती है। संसद में इस मुद्दे पर कई बार चर्चा हुई, जहाँ विभिन्न पक्षों
Updated: September 10, 2026
भारत कोयला उत्पादन की तेज़ी को ‘ऊर्जा स्वावलंबन’ के रूप में पेश कर रहा है, जो कूटनीतिक रूप से आकर्षक लगता है।
लेकिन जलवायु दबाव और दीर्घकालिक स्थिरता के लिए यह केवल एक अस्थायी सुरक्षा
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