पिछले कुछ वर्षों में केंद्र एवं राज्य स्तर पर कई बार इस योजना को पुनरावलोकित किया गया, जिससे बजट आवंटन में बदलाव और तकनीकी पुनर्मूल्यांकन किया गया। विशेष रूप से 2022 में केंद्र सरकार के सड़क, परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने इस परियोजना को राष्ट्रीय महत्व की मान्यता दी, जिससे फंडिंग की प्रक्रिया तेज हुई। अब तैयार डीपीआर (डिज़ाइन प्रोजेक्ट रिपोर्ट) को मंत्रालय को भेजा गया है, जिससे परियोजना को औपचारिक मंजूरी मिलने की संभावना बढ़ी है।
तीसरा पैकेज मेहरौना घाट से भिटा मोड़ तक के 45 किमी की दूरी को कवर करेगा, जिसमें कई छोटे-छोटे कस्बे और ग्राम शामिल हैं। इस खंड में 22 पुल, 9 टनल और 18 सीवरेज स्टेशनों का निर्माण vorgesehen है, जिससे मौजूदा संकीर्ण मार्गों की जगह चौड़े दो‑लेन वाले राजमार्ग का निर्माण होगा। निर्माण में प्रयुक्त सामग्री को स्थानीय कंक्रीट प्लांटों से आपूर्ति किया जाएगा, जिससे रोजगार सृजन में भी योगदान रहेगा।
चौथे पैकेज में भिटा मोड़ से लेकर नेपाल सीमा तक का 38 किमी का विस्तार शामिल है, जिसमें दो अंतर्राष्ट्रीय सीमा चेक‑पॉइंट और एक बड़े लॉजिस्टिक हब की योजना बनाई गई है। यह खंड भारत‑नेपाल व्यापार को सुगम बनाने के लिये रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। योजना के अनुसार इस भाग में 15 किमी की लंबी बाईपास सड़क भी बनायी जाएगी, जिससे मौजूदा कस्बों के अंदरूनी ट्रैफ़िक में कमी आएगी।
इन प्रमुख घटनाक्रमों को देखते हुए बिहार के राजमार्ग एवं भवन विभाग के प्रमुख ने बताया कि डीपीआर के अंतिम रूप देने में तकनीकी एवं वित्तीय दोनों पहलुओं को ध्यान में रखा गया है। उन्होंने कहा कि अब इस रिपोर्ट को केंद्र के सड़क मंत्रालय को भेजना अंतिम चरण है, जिसके बाद निविदा प्रक्रिया शुरू होगी। इस प्रक्रिया में सार्वजनिक बोली के माध्यम से ठेकेदारों का चयन किया जाएगा, जिससे पारदर्शिता एवं प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित होगी।
परियोजना के प्रमुख हितधारकों ने इस विकास को सकारात्मक रूप से स्वीकार किया है। उत्तर प्रदेश के मेहरौना जिले के मुख्यमंत्री ने कहा कि यह राजमार्ग दो राज्य के बीच व्यापार को बढ़ाएगा और स्थानीय किसान एवं व्यवसायियों को नई बाजार सुविधाएँ प्रदान करेगा। वहीं बिहार के उद्योग मंत्री ने कहा कि इस पथ के पूरा होने से बिहार के औद्योगिक हबों, विशेषकर पटना‑बिहार शहरी क्षेत्र में निवेश आकर्षित होगा।
विपक्षी दलों ने इस परियोजना के फंडिंग स्रोत और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर सवाल उठाए हैं। एक प्रमुख विपक्षी नेता ने कहा कि 8 200 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत के बावजूद, इस राशि का अधिकांश भाग निजी निवेशकों से नहीं, बल्कि सार्वजनिक खजाने से आ रहा है, जिससे अन्य सामाजिक योजनाओं पर दबाव पड़ सकता है। दूसरी ओर, पर्यावरणीय NGOs ने कहा कि इस पथ के निर्माण में कई संवेदनशील वन्यजीव आवास और जल स्रोत पार हो रहे हैं, जिसके लिये विस्तृत पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) आवश्यक है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राम जानकी पथ का निर्माण बिहार के आगामी चुनावी माहौल में एक प्रमुख मुद्दा बन सकता है। यदि परियोजना समय पर और बिना किसी बड़ी बाधा के पूरी होती है, तो इसे सरकार की विकासात्मक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। लेकिन यदि भूमि अधिग्रहण या पर्यावरणीय मंजूरी में देरी होती है, तो इससे सरकार की छवि को नुकसान पहुंच सकता है और विपक्षी पार्टियों को आलोचना का मौका मिल सकता है।
आर्थिक रूप से इस पथ की महत्त्वपूर्ण भूमिका स्पष्ट है। विशेषज्ञों के अनुसार, बेहतर सड़क नेटवर्क के कारण परिवहन लागत में 15‑20 प्रतिशत की कमी आएगी, जिससे स्थानीय उत्पादों की बाजार पहुँच में सुधार होगा।
The new stretch of Ram Janaki Path could become Bihar’s “high‑speed artery,” slashing transport costs enough to reshape regional trade patterns and pull hinterland farms into national supply chains.
Be First to Comment