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बिहार में बाढ़ और डेंगू: पानी उतरने के बाद शुरू हो सकती है दूसरी चुनौती

बिहार इस समय एक ऐसी दोहरी चुनौती के सामने खड़ा है, जिसमें बाढ़ और सार्वजनिक स्वास्थ्य का संकट एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई दे रहे हैं। सितंबर 2026 के शुरुआती दिनों में गंगा, गंडक, कोसी, बूढ़ी गंडक, पुनपुन और घाघरा जैसी नदियों का जलस्तर कई स्थानों पर खतरे के निशान से ऊपर रहा।

5 सितंबर को राज्य में 33 NDRF-SDRF टीमों और करीब 693 सरकारी नावों की तैनाती की जानकारी सामने आई थी। 7-8 सितंबर तक अलग-अलग सरकारी आकलनों और मीडिया रिपोर्टों में प्रभावित आबादी का आंकड़ा 22 लाख से बढ़कर 34 लाख से अधिक बताया गया। इसका अर्थ है कि राहत और बचाव अभियान के साथ अब स्वास्थ्य सुरक्षा को भी समान प्राथमिकता देनी होगी।

बाढ़ का संकट नया नहीं, लेकिन उसका स्वरूप लगातार बदल रहा है

बिहार की बाढ़ को केवल एक मौसमी प्राकृतिक आपदा मानना अधूरा विश्लेषण होगा। उत्तर बिहार की बड़ी नदियों का जलग्रहण क्षेत्र नेपाल और हिमालयी इलाकों से जुड़ा है। भारी बारिश, नदी में सिल्ट का जमाव, तटबंधों पर दबाव, नदी के प्रवाह में बदलाव और कमजोर जलनिकासी व्यवस्था मिलकर कई इलाकों को बार-बार बाढ़ की चपेट में लाते हैं। एक अध्ययन के अनुसार 1998 से 2019 के बीच बिहार के लगभग 37.24 प्रतिशत भू-भाग ने किसी न किसी स्तर पर बाढ़ का अनुभव किया। यानी यह संकट किसी एक साल या एक सरकार की विफलता का परिणाम नहीं, बल्कि दशकों से बनती आ रही संरचनात्मक समस्या है।

2008 की कोसी बाढ़ आज भी सबसे बड़ी चेतावनी

18 अगस्त 2008 को कोसी नदी ने नेपाल में अपने पूर्वी तटबंध को तोड़कर अपना रास्ता बदल दिया था। इस आपदा में बिहार में लगभग 33 लाख लोग प्रभावित हुए और करीब 3,700 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बाढ़ का असर पड़ा। यह घटना बिहार के बाढ़ प्रबंधन के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ बनी।

2008 की बाढ़ का सबसे महत्वपूर्ण सबक यह था कि बाढ़ समाप्त होने के बाद भी संकट समाप्त नहीं होता। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के अध्ययन में पाया गया कि प्रभावित परिवारों में 93 प्रतिशत ने बाढ़ के बाद शुरुआती तीन महीनों में अपनी आय में 50 प्रतिशत से अधिक नुकसान की बात कही थी। कृषि, मजदूरी, पशुधन, घर और रोजमर्रा की आर्थिक गतिविधियों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। आज भी बिहार में बाढ़ के बाद स्वास्थ्य और आजीविका की यही दोहरी समस्या दोहराती दिखाई देती है।

2017, 2020, 2021 और 2024 ने भी दी चेतावनी

2017 में बिहार के बड़े हिस्से में आई बाढ़ ने फिर दिखाया कि नेपाल के तराई क्षेत्र और हिमालयी बारिश का असर कुछ ही समय में उत्तर बिहार की नदियों पर पड़ सकता है। एक अध्ययन के अनुसार 2017 की बाढ़ में 19 जिले प्रभावित हुए थे। 2020 में भी राज्य में लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित हुए और 2021 में 11 जिलों में 16.61 लाख से अधिक लोगों के प्रभावित होने की रिपोर्ट सामने आई थी।

2024 की बाढ़ भी सामान्य मानसूनी घटना नहीं थी। UNICEF की मानवीय स्थिति रिपोर्ट के अनुसार सितंबर 2024 के अंत से उत्तर बिहार में कई दशकों में देखी गई गंभीर बाढ़ ने बड़ी आबादी को प्रभावित किया था। इससे एक बात स्पष्ट है—बिहार में बाढ़ अब केवल राहत शिविर और नावों से निपटने वाली समस्या नहीं रह गई है। यह स्वास्थ्य, शहरी नियोजन, जलनिकासी, कृषि, पेयजल और स्थानीय अर्थव्यवस्था को एक साथ प्रभावित करने वाली बहु-क्षेत्रीय आपदा है।

2026 की बाढ़: राहत अभियान तेज, लेकिन खतरा अभी खत्म नहीं

सितंबर 2026 में सरकार ने प्रभावित इलाकों में NDRF और SDRF की टीमों को तैनात किया है। 5 सितंबर तक छह NDRF और 27 SDRF टीमों को संवेदनशील क्षेत्रों में रखा गया था तथा करीब 693 सरकारी नावें राहत और आवाजाही के लिए संचालित की जा रही थीं। कई स्थानों पर सामुदायिक रसोई और राहत शिविर भी चलाए गए हैं। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में नाव एंबुलेंस जैसी व्यवस्थाएं भी स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बनाए रखने के लिए इस्तेमाल की जा रही हैं।

लेकिन राहत की क्षमता और संकट की अवधि के बीच अंतर को समझना जरूरी है। पानी का स्तर घटने के साथ प्रशासनिक दबाव कम दिखाई दे सकता है, मगर स्वास्थ्य जोखिम उसी समय बढ़ सकता है। बाढ़ का पानी पीछे हटने के बाद गड्ढों, खाली प्लॉटों, निर्माण स्थलों, छतों, टूटे कंटेनरों और घरों के आसपास जमा पानी में मच्छरों के लिए नए प्रजनन स्थल बन सकते हैं। यही वह चरण है जब स्वास्थ्य विभाग की तैयारी की असली परीक्षा शुरू होती है।

डेंगू: आंकड़े अभी नियंत्रण में, लेकिन खतरा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र यानी NCVBDC के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार बिहार में 2021 में 633, 2022 में 13,972, 2023 में 20,224, 2024 में 10,157 और 2025 में 3,902 डेंगू मामले दर्ज किए गए थे। संबंधित वर्षों में मौतों की संख्या क्रमशः 2, 32, 74, 16 और 2 दर्ज की गई। 2026 के उपलब्ध राष्ट्रीय आंकड़े फिलहाल बिहार में 54 मामले और शून्य मौत दिखाते हैं। हालांकि 2026 का आंकड़ा वर्ष के दौरान अपडेट होने वाला डेटा है, इसलिए इसे पूरे वर्ष का अंतिम आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।

इन आंकड़ों से एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है। बिहार में डेंगू का संकट 2023 के स्तर की तुलना में पिछले दो वर्षों में काफी नीचे आया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि खतरा खत्म हो गया। 2023 में राज्य में 20,224 मामले और 74 मौतें दर्ज हुई थीं। इसलिए सितंबर-अक्टूबर के उस मौसम में, जब मानसून के बाद तापमान और नमी मच्छरों के लिए अनुकूल रह सकती है, निगरानी कमजोर करना जोखिम भरा होगा।

पटना का अनुभव बताता है कि डेंगू का असली मैदान शहर है

पटना इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। 2024 में पटना में 5,041 डेंगू मामले दर्ज होने की रिपोर्ट सामने आई थी, जबकि 2023 में यह संख्या 8,493 बताई गई थी। 2025 के शुरुआती मानसून चरण में संख्या कम थी, लेकिन प्रशासन ने फिर भी बड़े स्तर पर रोकथाम अभियान चलाया। पटना नगर निगम ने घर-घर निरीक्षण, मच्छर प्रजनन स्थलों की पहचान, फॉगिंग और एंटी-लार्वा गतिविधियां तेज की थीं। अभियान में 550 से अधिक फील्ड कर्मचारी, 75 हैंड-हेल्ड फॉगिंग मशीन, 59 वाहन-माउंटेड फॉगिंग यूनिट और 375 एंटी-लार्वा स्प्रेयर लगाए गए थे।

यह अनुभव बताता है कि डेंगू नियंत्रण केवल अस्पतालों में मरीजों की संख्या गिनने से संभव नहीं है। जिस शहर में खाली प्लॉट, निर्माणाधीन इमारतें, कूड़ा, बंद नालियां और खुले पानी के कंटेनर मौजूद रहेंगे, वहां केवल फॉगिंग करने से स्थायी समाधान नहीं मिलेगा। भारत के राष्ट्रीय वेक्टर नियंत्रण दिशानिर्देश भी स्रोत-नियंत्रण, एंटी-लार्वा कार्रवाई, जल प्रबंधन और समुदाय की भागीदारी पर जोर देते हैं।

बाढ़ और डेंगू के बीच असली कड़ी क्या है?

यहां एक वैज्ञानिक अंतर समझना जरूरी है। बाढ़ का गंदा पानी सीधे डेंगू पैदा नहीं करता। डेंगू वायरस संक्रमित एडीज मच्छरों के काटने से फैलता है। समस्या यह है कि भारी बारिश और बाढ़ के बाद जब पानी पूरी तरह निकल नहीं पाता, तो छोटे-छोटे साफ या अपेक्षाकृत साफ पानी के कंटेनर और जलभराव मच्छरों के प्रजनन स्थल बन सकते हैं। WHO भी डेंगू नियंत्रण में पानी और स्वच्छता प्रबंधन को महत्वपूर्ण मानता है।

इसलिए बिहार के लिए सबसे संवेदनशील समय संभवतः वह होगा जब बाढ़ का पानी घटने लगेगा। यही वह समय है जब घरों की छतों, बाल्टियों, टायरों, प्लास्टिक के डिब्बों, निर्माण स्थलों और नालियों में जमा पानी की व्यवस्थित पहचान जरूरी होगी। यदि इस चरण में सर्वेक्षण और स्रोत-नियंत्रण कमजोर पड़ा, तो अस्पतालों में बुखार और डेंगू के मरीज बढ़ने के बाद कार्रवाई शुरू करना देर हो सकती है।

सरकार के प्रयास: राहत मजबूत, लेकिन स्वास्थ्य-रोकथाम को और एकीकृत करने की जरूरत

बिहार सरकार ने इस बाढ़ में बचाव और राहत के स्तर पर कई कदम उठाए हैं—NDRF-SDRF की तैनाती, सरकारी नावों का संचालन, राहत शिविर, सामुदायिक रसोई, चिकित्सा सहायता और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी। यह आपातकालीन प्रतिक्रिया आवश्यक है और इससे तत्काल मानवीय संकट को कम करने में मदद मिलती है।

डेंगू के मोर्चे पर भी बिहार और स्थानीय निकायों के पास निगरानी, परीक्षण, फॉगिंग और एंटी-लार्वा नियंत्रण की व्यवस्था है। जुलाई 2026 में रिपोर्ट किए गए आंकड़ों में बिहार में डेंगू मामलों की संख्या 176 तक पहुंचने के बाद निगरानी, फॉगिंग और टेस्टिंग किट की उपलब्धता बढ़ाने की बात सामने आई थी। बाद के राष्ट्रीय आंकड़ों में संख्या कम दिखती है, लेकिन अलग-अलग रिपोर्टिंग कटऑफ और अपडेट चक्रों के कारण आंकड़ों को सीधे आपस में जोड़ना उचित नहीं होगा।

सबसे बड़ा सवाल: फॉगिंग या स्थायी स्रोत नियंत्रण?

बिहार को अब डेंगू के खिलाफ केवल ‘फॉगिंग अभियान’ की मानसिकता से आगे बढ़ना होगा। फॉगिंग वयस्क मच्छरों को अस्थायी रूप से कम कर सकती है, लेकिन यदि प्रजनन स्थल बने रहें तो कुछ समय बाद मच्छरों की आबादी फिर बढ़ सकती है। इसलिए हर बाढ़ प्रभावित वार्ड और पंचायत में बाढ़ के पानी के उतरने के बाद ‘मच्छर प्रजनन स्थल सर्वेक्षण’ चलाया जाना चाहिए।

इसमें स्वास्थ्य विभाग, नगर निकाय, पंचायत, जल संसाधन विभाग और आपदा प्रबंधन तंत्र को एक साझा कमांड सिस्टम में काम करना चाहिए। बाढ़ राहत शिविरों में केवल भोजन और दवा पहुंचाना पर्याप्त नहीं है। वहां मच्छरदानी, रिपेलेंट, साफ पानी, कचरा निपटान, नियमित स्वास्थ्य जांच और बुखार की निगरानी को भी अनिवार्य स्वास्थ्य प्रोटोकॉल का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

हर बुखार को डेंगू मानना भी गलत, और नजरअंदाज करना भी

बाढ़ के बाद बिहार में डेंगू के अलावा मलेरिया, चिकनगुनिया, जापानी इंसेफेलाइटिस, लेप्टोस्पायरोसिस तथा दूषित पानी से होने वाली बीमारियों का जोखिम भी अलग-अलग क्षेत्रों में बढ़ सकता है। इसलिए केवल डेंगू केंद्रित अभियान पर्याप्त नहीं होगा। बुखार आने पर मरीज को स्वयं दवा लेने के बजाय चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए, क्योंकि कई संक्रमणों के शुरुआती लक्षण एक जैसे हो सकते हैं। सही समय पर परीक्षण और चिकित्सकीय निगरानी गंभीर बीमारी और जटिलताओं को रोकने में महत्वपूर्ण है।

बिहार के लिए अगला मॉडल: ‘Flood-to-Health’ रणनीति

बिहार को बाढ़ प्रबंधन और सार्वजनिक स्वास्थ्य को अलग-अलग विभागीय विषयों के रूप में देखने के बजाय एक साझा ‘Flood-to-Health’ मॉडल विकसित करना चाहिए। जैसे ही किसी जिले में बाढ़ की चेतावनी जारी हो, उसी समय स्वास्थ्य विभाग को संभावित मच्छर प्रजनन स्थलों का नक्शा तैयार करना चाहिए। बाढ़ उतरने के 24-72 घंटे के भीतर जलभराव वाले क्षेत्रों का सर्वेक्षण, एंटी-लार्वा कार्रवाई और कचरा हटाने का अभियान शुरू होना चाहिए।

इसके साथ प्रत्येक बाढ़ प्रभावित जिले में बुखार निगरानी का डिजिटल डैशबोर्ड होना चाहिए। कितने लोगों को बुखार है, कितने डेंगू परीक्षण हुए, कितने पॉजिटिव मिले, कितने मरीज अस्पताल पहुंचे और किस इलाके में मच्छरों के प्रजनन स्थल मिले—इन सभी आंकड़ों को एक ही प्लेटफॉर्म पर जोड़ा जा सकता है। इससे प्रशासन बीमारी के बढ़ने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले ही हॉटस्पॉट पहचान सकेगा।

शहरों के साथ गांवों पर भी ध्यान देना होगा

डेंगू को केवल पटना की शहरी बीमारी समझना भविष्य के लिए खतरनाक होगा। शहरीकरण, बदलता मौसम और छोटे जल-स्रोतों का बढ़ना मच्छरों के प्रजनन के अवसर बदल सकता है। WHO के अनुसार डेंगू का नियंत्रण जल प्रबंधन, स्वच्छता और समुदाय आधारित वेक्टर नियंत्रण से गहराई से जुड़ा है। इसलिए पंचायत स्तर पर भी नियमित स्रोत-नियंत्रण अभियान जरूरी है।

बाढ़ प्रभावित गांवों में स्वास्थ्यकर्मियों और आशा कार्यकर्ताओं को केवल टीकाकरण या सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित रखने के बजाय बुखार निगरानी और मच्छर प्रजनन स्थल की रिपोर्टिंग में प्रशिक्षित किया जा सकता है। स्थानीय समुदाय के बिना डेंगू नियंत्रण संभव नहीं है। हर परिवार को यह समझना होगा कि घर के आसपास कुछ मिलीमीटर या कुछ सेंटीमीटर जमा पानी भी मच्छर के लिए पर्याप्त हो सकता है।

संपादकीय निष्कर्ष: पानी उतरना राहत है, संकट का अंत नहीं

बिहार की वर्तमान बाढ़ ने एक बार फिर यह साबित किया है कि राज्य की आपदा नीति को केवल ‘बाढ़ आने पर बचाव’ से आगे ले जाना होगा। 2008 की कोसी त्रासदी से लेकर 2017, 2020, 2021, 2024 और अब 2026 तक इतिहास एक ही संदेश देता है—बाढ़ बिहार की अस्थायी समस्या नहीं है। यह राज्य की भौगोलिक, आर्थिक और प्रशासनिक संरचना से जुड़ा स्थायी जोखिम है।

और इस साल एक दूसरी सीख भी उतनी ही महत्वपूर्ण है: बाढ़ का पानी कम होना स्वास्थ्य संकट के खत्म होने की गारंटी नहीं है। डेंगू के वर्तमान आधिकारिक आंकड़े अभी अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन बिहार का पिछला रिकॉर्ड बताता है कि मानसून के बाद संक्रमण तेजी से बढ़ सकता है। 2023 में 20,224 मामलों और 74 मौतों का रिकॉर्ड यह चेतावनी देने के लिए पर्याप्त है कि शुरुआती संख्या देखकर तैयारी ढीली नहीं पड़नी चाहिए।

सरकार की प्राथमिकता अभी तीन स्तरों पर होनी चाहिए—पहला, बाढ़ प्रभावित लोगों तक भोजन, सुरक्षित पानी और चिकित्सा सहायता पहुंचाना; दूसरा, पानी उतरते ही व्यापक मच्छर और लार्वा नियंत्रण अभियान शुरू करना; और तीसरा, सितंबर-अक्टूबर के संभावित डेंगू पीक से पहले प्रत्येक जिले में टेस्टिंग, अस्पताल बेड, प्लेटलेट/रक्त उपलब्धता और बुखार निगरानी की तैयारी सुनिश्चित करना।

बिहार को हर साल बाढ़ के बाद बीमारी का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। बाढ़ की चेतावनी को ही स्वास्थ्य चेतावनी में बदलना होगा। अगर नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ स्वास्थ्य विभाग भी अपने संसाधन जमीन पर उतार दे, तो राहत केवल नावों और राशन तक सीमित नहीं रहेगी—वह बीमारी को फैलने से पहले रोकने की रणनीति बन सकती है। यही बिहार की अगली आपदा-प्रबंधन नीति की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

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