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Bihar Flood: तेजस्वी यादव ने केंद्र से राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग की

बिहार में इस वर्ष की बारहवीं बार बारिश के कारण उत्पन्न हुई बाढ़ ने लाखों लोगों को विस्थापित कर दिया है, और जीवन-व्यवस्था को गहरा क्षति पहुँचा दी है।
इस आपदा के मद्देनज़र, राज्य के प्रमुख विपक्षी नेता तेजस्वी यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे एक पत्र में बाढ़ को ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित करने और केंद्र सरकार से त्वरित आर्थिक एवं वैधानिक सहायता की मांग की है। पत्र में उन्होंने यह तर्क रखा है कि बाढ़ की तीव्रता, विस्थापित जनसंख्या की संख्या और प्रभावित क्षेत्रों की विस्तृत सीमा को देखते हुए इस आपदा को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देना आवश्यक है, ताकि राहत कार्यों में समन्वय और संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो सके।बिहार में बाढ़ का इतिहास लंबा है; 1987, 2004 और 2007 जैसी पिछली बाढ़ों ने भी बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया था। पिछले दशकों में जलवायु परिवर्तन, बाढ़ नियंत्रण के लिए अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा, तथा नदी तट पर अनियंत्रित निर्माण ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। 2023 में भी राज्य ने लगभग 15 मिलियन लोग प्रभावित हुए थे, लेकिन उस समय राष्ट्रीय आपदा घोषित नहीं की गई, जिससे राहत कार्यों में देरी और संसाधनों की कमी देखी गई। वर्तमान बाढ़ ने इस पैटर्न को दोहराया है, जिससे प्रभावित लोगों को तत्काल सहायता की आवश्यकता स्पष्ट हुई है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस बाढ़ में 7.2 लाख लोग बाढ़-पीड़ित क्षेत्रों में रहने के लिए मजबूर हो गए हैं, जबकि 3,000 से अधिक घर बाढ़ में डूब गए हैं। कई जिलों में सड़कों, पुलों और विद्युत नेटवर्क को भारी क्षति हुई है, जिससे आपातकालीन सेवाओं का संचालन कठिन हो गया है। कृषि क्षेत्र भी बड़े नुकसान का शिकार हुआ, जहाँ लगभग 1.5 लाख हेक्टेयर फसलें जलमग्न हो गईं, जिससे किसानों की आय में भारी गिरावट आई है। इन आँकड़ों को देखते हुए राज्य सरकार ने तत्काल राहत के लिए विभिन्न उपाय किए हैं, परन्तु संसाधन सीमित होने के कारण कई क्षेत्रों में सहायता पहुँचना अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

तेजस्वी ने अपने पत्र में कहा है कि राष्ट्रीय आपदा घोषित होने पर केंद्र सरकार के पास विशेष फंड, आपूर्ति श्रृंखला और विशेषज्ञ टीमों तक पहुँच होगी, जिससे राहत कार्य तेज़ी से और प्रभावी ढंग से चल सकेगा। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि बाढ़ के कारण उत्पन्न आर्थिक क्षति को कम करने के लिए केंद्र से अतिरिक्त वित्तीय सहायता की आवश्यकता है, विशेषकर किसानों और छोटे व्यापारियों के लिए पुनरुद्धार योजना की त्वरित शुरुआत की मांग की गई है। पत्र में यह भी कहा गया कि बाढ़ से प्रभावित बच्चों के शैक्षिक व्यवधान को रोकने के लिए विशेष शैक्षिक सहायता प्रदान की जानी चाहिए।

बिहार सरकार ने इस पत्र को प्राप्त कर कहा कि वे केंद्र के साथ समन्वय बढ़ाने और राहत कार्यों को तेज़ करने के लिए सभी संभावित उपाय कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बाढ़ के कारण हुए नुकसान को कम करने के लिए विशेष आपातकालीन समिति का गठन किया है, जिसमें विभिन्न विभागों के प्रमुख शामिल हैं। उन्होंने कहा कि राज्य ने पहले ही 2,500 करोड़ रुपये की आपातकालीन निधि आवंटित कर दी है और आवश्यक सामग्री एवं जनशक्ति को प्रभावित क्षेत्रों में भेज दिया गया है।

केंद्र सरकार ने अब तक इस पत्र पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, परन्तु प्रधानमंत्री कार्यालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि केंद्रीय एजेंसियों को सभी राज्य सरकारों की आपदा प्रबंधन में सहायता प्रदान करने का निर्देश है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि राज्य द्वारा राष्ट्रीय आपदा की घोषणा की मांग को स्वीकार किया जाता है, तो केंद्र से अतिरिक्त वित्तीय एवं तकनीकी सहयोग प्रदान किया जा सकता है। इस संदर्भ में, राष्ट्रीय आपदा घोषणा की प्रक्रिया और उसके आर्थिक प्रभावों पर अभी भी कई प्रश्न अनुत्तरित हैं।

बिहार की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने इस बाढ़ पर अलग-अलग प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस ने राज्य सरकार की त्वरित कार्रवाई की प्रशंसा की,परन्तु कहा कि केंद्र की सहायता के बिना बाढ़ पीड़ितों को पर्याप्त राहत नहीं मिल पाएगी। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (NDA) के सदस्य दलों ने भी बाढ़ से प्रभावित लोगों के समर्थन में कहा कि राष्ट्रीय आपदा घोषणा के लिए सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए। विपक्षी दलों ने इस अवसर पर केंद्र-राज्य सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया, जबकि कुछ छोटे राजनैतिक समूहों ने बाढ़ के कारण जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को प्रमुखता देने की मांग की।

किसानों की संघों ने भी बाढ़ के आर्थिक प्रभाव को उजागर किया और कहा कि फसल क्षति के कारण कई किसान दिवालिया हो सकते हैं। उन्होंने केंद्र सरकार से फसल बीमा, ऋण माफी और पुनर्वित्तीय सहायता की मांग की। सामाजिक संगठनों ने विस्थापित लोगों के लिए अस्थायी शरणस्थलों, स्वच्छ पानी और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता पर जोर दिया। इन समूहों ने कहा कि यदि राष्ट्रीय आपदा घोषित नहीं की गई तो इन आवश्यकताओं को पूरा करना कठिन होगा।

 

The Bihar floods expose a structural fault line in India’s disaster architecture: without a national-disaster label, relief stays fragmented, turning climate-driven catastrophes into protracted humanitarian crises. Tejasvi Yadav’s appeal signals that opposition leaders are now leveraging federal aid mechanisms as political capital, forcing the Centre and state governments to publicly clarify how disaster assistance is assessed and distributed. Beyond the immediate political contest, the episode highlights the need for a more predictable framework for large-scale climate emergencies, with faster fund releases, clearer eligibility criteria and stronger coordination between state and central agencies. Without such reforms, repeated extreme-weather events could continue to leave vulnerable communities dependent on ad-hoc relief rather than a durable, nationally coordinated response.

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