की रक्षा हो सके। इस मांग को लेकर एएपी ने एक बड़े पैमाने पर धरना दिया, जिसमें स्थानीय निवासियों और व्यापारियों की भी भागीदारी रही। इस घटनाक्रम ने प्रदेश के सामाजिक‑राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया और नागरिक अधिकारों के मुद्दे को नई दिशा दी।
पिछले दो सालों में दिल्ली के विभिन्न उपनगरों में पीजी आवासों की संख्या में
तीव्र वृद्धि हुई है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, सत्या निकेतन सहित कई इलाकों में पीजी मकानों की संख्या 30 % से अधिक बढ़ी है, जिससे किरायेदारों की सुरक्षा और अधिकारों पर प्रश्न उठे हैं। कई किरायेदारों ने बताया कि बिना लिखित अनुबंध, सुरक्षा जमा नहीं लौटाया जाना, और अनुचित किराया वृद्धि जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
इस संदर्भ में एएपी ने कहा कि पीजी मालिकों की पहचान न होने से नियामक उपायों का कार्यान्वयन संभव नहीं हो पा रहा है, जिससे किरायेदारों की असुरक्षा बढ़ रही है।
बीजेपी सरकार ने इस मुद्दे को लेकर पहले कोई स्पष्ट नीति नहीं बनायी थी, जबकि विभिन्न न्यायालयीन मामलों में पीजी किरायेदारों के अधिकारों की उलझनें स्पष्ट हुई
थीं। कई नागरिक समूहों ने इस पर प्रकाश डालते हुए सरकार से पीजी मालिकों की एक राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने का प्रस्ताव रखा था, परंतु अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इस पृष्ठभूमि में एएपी द्वारा किया गया धरना सरकार की नीतिगत चूक को उजागर करने का एक प्रयास माना जा रहा है,
जिससे सार्वजनिक चर्चा में इस मुद्दे को नई ऊर्जा मिली है।
धरणा के दौरान एएपी के प्रमुख कार्यकर्ता ने कहा कि उन्होंने इस आंदोलन की तैयारी पिछले दो हफ्तों से की थी और स्थानीय निवासियों से समर्थन एकत्र किया। उन्होंने कहा कि पीजी मालिकों की सूची के बिना किरायेदारों की सुरक्षा असंभव है और यह एक सामाजिक अन्याय
का रूप है। उसी समय, कई पीजी मालिकों ने भी अपनी स्थिति को स्पष्ट किया, जिसमें उन्होंने कहा कि उन्हें भी कर और सुरक्षा जमा जैसे वित्तीय बोझ का सामना करना पड़ता है और वे भी नियमन से बाहर नहीं रहना चाहते। इस परिप्रेक्ष्य में धरना ने दो पक्षों के बीच तनाव को बढ़ा दिया।
धरणा के बाद
पुलिस ने व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त बल तैनात कर दिया, जबकि एएपी कार्यकर्ताओं ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन जारी रखने का इरादा जताया। कुछ स्थानीय व्यापारी भी इस मुद्दे को लेकर चिंतित दिखे, क्योंकि पीजी आवासों की बढ़ती संख्या से उनके ग्राहकों की आवासीय सुविधा पर असर पड़ रहा है। इस बीच, कुछ पत्रकारों ने बताया कि
धरने के दौरान कुछ छोटे‑छोटे टकराव हुए, परंतु बड़ी हानि या चोटिल नहीं हुए। पुलिस ने यह भी कहा कि यदि कोई अवैध कार्य हुआ तो उचित कार्रवाई की जाएगी।
भारी भीड़ के बीच, एएपी के एक वरिष्ठ सदस्य ने एक विस्तृत याचिका तैयार की और उसे स्थानीय प्रशासन के सामने प्रस्तुत किया। याचिका में पीजी मालिकों की
सूची बनाने की मांग के साथ‑साथ किरायेदारों को लिखित अनुबंध, सुरक्षा जमा की वापसी, और किराया वृद्धि पर नियामक नियंत्रण की भी माँग की गई। इस याचिका में 1500 से अधिक हस्ताक्षर भी संलग्न थे, जो स्थानीय निवासियों और व्यापारियों की समर्थन को दर्शाते हैं। याचिका को बाद में जिला परिषद के मुख्य सचिव ने स्वीकार किया,
परंतु इसकी कार्रवाई में अभी देरी की सूचना दी गई।
बीजेपी के प्रतिनिधियों ने इस धरने पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार ने पहले ही पीजी किरायेदारों के हित में कई नीतियाँ लागू की हैं, जैसे किरायेदारी अधिनियम में संशोधन और किराए की अधिकतम सीमा निर्धारित करना। उन्होंने यह भी कहा कि पीजी मालिकों की व्यक्तिगत जानकारी
सार्वजनिक करना निजता के अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है और इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया जाएगा। सरकार ने इस मुद्दे को हल करने के लिए एक विशेष समिति बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसमें विभिन्न विभागों के प्रतिनिधि शामिल होंगे, परंतु इस प्रस्ताव को अभी तक औपचारिक रूप नहीं दिया गया।
एएपी ने इस प्रस्ताव को
अस्वीकार कर दिया और कहा कि मौजूदा उपाय अपर्याप्त हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विशेष समिति की नियुक्ति केवल सतही समाधान होगी, जब तक वास्तविक डेटा उपलब्ध नहीं होगा तब तक किरायेदारों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इस बीच, कुछ स्थानीय नागरिक समूहों ने इस चर्चा को लेकर सामाजिक मीडिया पर भी आवाज़ उठाई,
जहाँ उन्होंने सरकार को तत्काल पीजी मालिकों की सूची जारी करने की माँग की। इन समूहों ने यह भी कहा कि सार्वजनिक सुरक्षा और सामाजिक न्याय के लिए इस मुद्दे को प्राथमिकता देनी चाहिए।
वित्तीय विशेषज्ञों ने बताया कि पीजी आवासों की वृद्धि से स्थानीय रियल एस्टेट बाजार में अस
The protest highlights demand for a public registry of PG landlords, citing tenant‑protection concerns amid rapid growth of such accommodations. It has prompted governmental response, including proposals for a regulatory committee to address the issue.
Be First to Comment