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बिहार पेपर लीक: EOU पूछताछ में संजीव मुखिया ने NEET, सिपाही और BPSC लीक में सहभागिता स्वीकार की

संजीव मुखिया, जो बिहार में पेपर लीक के प्रमुख आरोपी के रूप में पहचाने जाते हैं, ने आर्थिक अपराध इकाई (EOU) के समक्ष अपने कई अपराधों को स्वीकार किया।
पूछताछ में उन्होंने 2017 की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NEET), 2023 की सिपाही भर्ती परीक्षा और बिहार सार्वजनिक सेवा आयोग (BPSC) के TRE‑3 परीक्षा में पेपर लीक के मामले में अपनी भागीदारी कबूल की। साथ ही उन्होंने इस गिरोह के अन्य प्रमुख सदस्यों के नाम भी स्पष्ट किए, जिससे जांच एजेंसी को आगे की कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण संकेत मिले हैं।पिछले कुछ वर्षों में भारत के विभिन्न प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में पेपर लीक के स्कैंडल लगातार उजागर होते रहे हैं। 2017 में NEET परीक्षा के दौरान लीक की जानकारी मिलने पर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक आलोचना उत्पन्न हुई थी। इसी प्रकार, 2023 की सिपाही भर्ती परीक्षा और हालिया BPSC TRE‑3 परीक्षा में भी समान प्रकार की घोटालों ने सार्वजनिक विश्वास को क्षीण किया। इन घटनाओं ने भारतीय परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और सुरक्षा पर सवाल उठाए हैं।

संदिग्ध नेटवर्क का गठन विभिन्न राज्य‑स्तर की परीक्षा बोर्डों के अंदरूनी स्त्रोतों और बाहरी तकनीकी विशेषज्ञों के सहयोग से हुआ था। प्रारम्भिक रिपोर्टों में यह कहा गया था कि इस गिरोह ने परीक्षा प्रश्नपत्रों की अग्रिम प्राप्ति, उनके डिजिटल रूपांतरण और चयनित उम्मीदवारों को असली प्रश्नपत्र प्रदान करने की व्यवस्था की थी। इस प्रकार की साजिश ने कई अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ पहुँचाया और परीक्षा की वैधता को गंभीर रूप से प्रभावित किया।

EOU ने संजीव मुखिया के खिलाफ कई घंटों की विस्तृत पूछताछ की, जिसमें उन्होंने गिरोह के कार्यप्रणाली, नेटवर्क के प्रमुख सदस्य और वित्तीय लेन‑देन के बारे में जानकारी दी। पूछताछ के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि इस गिरोह ने विभिन्न स्तरों पर मध्यस्थों को नियुक्त किया था, जो प्रश्नपत्र की चोरी से लेकर अंतिम डिलीवरी तक सभी चरणों को नियंत्रित करते थे। मुखिया ने यह भी बताया कि गिरोह ने लीक किए गए प्रश्नपत्रों के बदले में अभ्यर्थियों और उनके प्रतिनिधियों से बड़े पैमाने पर रिश्वत ली थी।

प्रश्नपत्रों की चोरी के अलावा, गिरोह ने अभ्यर्थियों को उत्तर कुंजी, समाधान पत्र और व्यक्तिगत कोचिंग प्रदान करके लाभ उठाने की रणनीति अपनाई थी। इस प्रक्रिया में उन्होंने विभिन्न डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग और निजी सर्वर का उपयोग किया, जिससे जांच को जटिल बनाया गया। जांच एजेंसी ने इन तकनीकी साधनों को भी ट्रेस किया और संबंधित डिजिटल ट्रैफ़िक के स्रोतों की पहचान की।

पिछले दो दशकों में भारत में कई बार इसी प्रकार की लीक स्कैंडल सामने आई हैं, परन्तु इस बार गिरोह का आकार और संचालन की जटिलता विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 2017 की NEET लीक में भी इसी तरह के नेटवर्क के अस्तित्व का संदेह था, परन्तु स्पष्ट साक्ष्य की कमी के कारण बड़े स्तर पर कार्रवाई नहीं हो पाई थी। अब EOU की गहन पूछताछ ने इन सबको एकत्रित कर एक मजबूत केस तैयार किया है।

संजीव मुखिया ने अपने बयान में यह भी कहा कि लीक के दौरान कई उच्च पदस्थ अधिकारियों और परीक्षा बोर्ड के कुछ कर्मचारियों ने अनजाने में या जानबूझकर सहयोग दिया। उन्होंने कुछ सहयोगियों के नाम सूचीबद्ध किए, जिनमें कुछ राज्य स्तर के परीक्षा प्रबंधकों और तकनीकी कर्मचारियों के नाम शामिल हैं। यह खुलासा परीक्षा प्रक्रिया की सुरक्षा में मौजूद गंभीर चूक को उजागर करता है।

ईओयू के प्रमुख अधिकारी ने इस पर सार्वजनिक बयान देते हुए कहा कि एजेंसी ने इस मामले में सभी कानूनी साधनों का उपयोग कर आगे की जांच जारी रखी है। उन्होंने बताया कि अब तक संकलित साक्ष्य और पूछताछ के परिणामों के आधार पर गिरोह के सदस्यों को अदालत में पेश किया जाएगा और आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी। एजेंसी ने यह भी कहा कि भविष्य में इस तरह के मामलों को रोकने हेतु तकनीकी सुरक्षा और निगरानी को कड़ाई से लागू किया जाएगा।

बिहार सरकार ने भी इस विकास पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वे राज्य के परीक्षा बोर्डों को सख्त निरीक्षण और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने का निर्देश देंगे। उन्होंने उल्लेख किया कि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता बहाल करने के लिए तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे। इसके अलावा, सरकार ने जांच को सहयोग देने और सभी संबंधित दस्तावेज़ प्रदान करने का आश्वासन भी दिया।

This isn’t just corruption; it’s a symptom of treating meritocracy as a commodity, eroding faith in the very ladder of social mobility.
Unless structural reforms outpace sophisticated criminal networks, every exam result will remain shadowed by doubt.

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