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बिहार CM सम्राट चौधरी ने गंगा जल समझौते की समीक्षा की मांग की, कहा कि सिर्फ चार महीने का जल पुरी तरह अपर्याप्त है

गंगा जल समझौते में बिहार के हितों पर प्रमुख बयान: मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बांग्लादेश के साथ हुए समझौते को पुनः देखे जाने की मांग की, यह कहते हुए कि बिहार को साल भर पर्याप्त जल आपूर्ति चाहिए, जबकि वर्तमान योजना केवल चार महीने की ही अनुमति देती है। इस मांग को उन्होंने मुंगेर के गंगटा में सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना के एकीकृत राशि वितरण समारोह के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर उठाया, जिससे जल‑संबंधी नीति पर व्यापक चर्चा उत्पन्न हुई।

गंगा‑बांग्लादेश जल समझौते की पृष्ठभूमि 1970 के दशक तक पहुँचती है, जब दो देशों ने जल प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए कई समझौते किए थे। 1996 के द्विपक्षीय समझौते में गंगा के जल को वर्षा‑संध्यावधि में दो पक्षों में बाँटा गया, लेकिन बिहार को इस समझौते में विशेष रूप से उल्लेख नहीं किया गया। 2016 में जल‑विज्ञान विशेषज्ञों की रिपोर्ट में कहा गया था कि मौजूदा जल वितरण प्रणाली में कई असंगतियों के कारण बिहार को अक्सर जल की कमी का सामना करना पड़ता है।

बिहार ने पिछले कुछ वर्षों में जल‑संकट के कारण कृषि उत्पादन में गिरावट, पीने के जल की गुणवत्ता में गिरावट और सामाजिक असंतोष के संकेत दिखाए हैं। राज्य के कई जिलों में जल‑स्रोतों का स्तर लगातार घट रहा है, जिससे किसानों को सिंचाई के लिए वैकल्पिक उपाय अपनाने पड़े। इसके अतिरिक्त, जल‑संबंधी समस्याओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों को भी बढ़ा दिया है, जहाँ जल‑जनित रोगों की घटनाएँ बढ़ी हैं।

मुख्यमंत्री ने इस समारोह में कहा कि वर्तमान समझौते के तहत केवल चार महीने का जल अधिकार बिहार को दिया गया है, जो राज्य की जल‑आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है। उन्होंने यह भी बताया कि बिहार को पूरे साल पीने, कृषि और उद्योगिक उपयोग के लिए पर्याप्त जल की आवश्यकता है, ताकि आर्थिक विकास में रुकावट न आए। मुख्यमंत्री ने इस बात पर बल दिया कि बांग्लादेश के साथ पुनः वार्ता करके जल‑वितरण को सॉलिड फॉर्म में बदला जाना चाहिए।

समारोह में उपस्थित कई राजनीतिक नेताओं ने भी इस मुद्दे को उजागर किया। कांग्रेस के बिहार प्रीफेक्ट ने कहा कि जल‑संकट एक राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है और इसे जल्द‑से‑जल्द समाधान किया जाना चाहिए। राजद के वरिष्ठ नेता ने राज्य के जल‑संसाधनों को संरक्षित करने के लिए केंद्र सरकार से त्वरित कदम मांगते हुए कहा कि जल‑समझौते में बिहार को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

बांग्लादेशी राजनयिक प्रतिनिधियों ने भी इस मंच पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जल‑समझौते में सभी पक्षों की जरूरतों को संतुलित करना आवश्यक है और उन्होंने भारत के साथ मिलकर जल‑प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए तकनीकी सहयोग की पेशकश की। बांग्लादेश के जल‑संसाधन विशेषज्ञ ने बताया कि जल‑संकट के समाधान के लिए दोनों देशों को जल‑संरक्षण, जल‑संग्रहण और जल‑शुद्धिकरण तकनीकों में निवेश करना होगा।

केन्द्रीय सरकार ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी। जल संसाधन मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि जल‑समझौते की समीक्षा प्रक्रिया चल रही है और सभी राज्यों की जल‑आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर एक समग्र योजना तैयार की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि जल‑वितरण में पारदर्शिता और वैज्ञानिक डेटा के आधार पर निर्णय लेने पर बल दिया गया है।

राज्य के कृषि विभाग ने बताया कि जल‑संकट के कारण पिछले दो फसल सत्रों में बागवानी और खाद्यान्न उत्पादन में 10‑15 प्रतिशत की गिरावट आई है। इस कारण किसानों को आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा है और उन्हें वैकल्पिक जल‑स्रोतों की तलाश करनी पड़ी। विभाग ने जल‑संकट को कम करने के लिए नयी जल‑संरक्षण नीतियों को लागू करने का प्रस्ताव रखा है।

वित्त विभाग ने भी बताया कि जल‑संकट के कारण राज्य की बजट में जल‑संबंधी खर्च में वृद्धि हुई है, जिससे अन्य विकासात्मक योजनाओं पर दबाव पड़ा है। उन्होंने कहा कि अगर जल‑समस्या का समाधान नहीं हुआ तो राज्य की औद्योगिक विकास दर पर भी असर पड़ेगा, जिससे निवेशकों की रुचि घटेगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की जल‑आवश्यकता को देखते हुए यह मुद्दा केवल राजनैतिक नहीं बल्कि आर्थिक भी है। एक प्रमुख राजनीतिक विश्लेषक ने कहा कि जल‑संकट को हल करने के लिए केंद्र‑राज्य सहयोग आवश्यक है और बांग्लादेशी पक्ष के साथ दीर्घकालिक जल‑संरचना बनाना होगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि जल‑समझौते की पुनः समीक्षा में जल‑विज्ञान, जल‑प्रबंधन और जल‑आर्थिक मॉडल को शामिल करना चाहिए।

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि जल‑संकट को हल करने में जल‑संरक्षण, जल‑पुनर्चक्रण और जल‑भंडारण परियोजनाओं में निवेश की आवश्यकता होगी। एक प्रमुख आर्थिक शोध संस्थान के प्रमुख ने बताया कि

Updated: September 10, 2026

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