प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दोपहर दो बजे भारत मंडप में मुलाकात करेंगे, जहाँ दोनों देशों के रणनीतिक साझेदारी, व्यापारिक संबंध और क्षेत्रीय स्थिरता पर चर्चा होगी। यह मुलाकात वैश्विक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि दोनों देशों की आर्थिक व सुरक्षा नीतियों का असर व्यापक अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर पड़ता है।
ब्रिक्स समूह, जिसमें
भारत, चीन, रूस, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं, का 2026 शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में आयोजित हो रहा है। यह समूह वैश्विक आर्थिक पुनःसंतुलन और बहुपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था। पिछले कुछ वर्षों में इस मंच ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली, ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी सहयोग के क्षेत्रों में
कई पहलें शुरू की हैं। विशेषकर चीन और भारत के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद, ब्रिक्स ने सदस्य देशों के बीच संवाद को सुदृढ़ करने का प्रयास किया है, जिससे वैश्विक शक्ति संरचना में बदलाव के संकेत मिलते हैं।
गॉलवन में हुए झड़प के बाद शी जिनपिंग के इस दौरे की पृष्ठभूमि में कई कारक
जुड़े हैं। अगस्त 2024 में गॉलवन में भारत और चीन के बीच सीमा पर विवाद ने दोनों पक्षों को सैन्य स्तर पर तनावपूर्ण स्थिति में डाल दिया था। इस घटना के बाद दोनों देशों ने कूटनीतिक संवाद को सीमित कर दिया था, जिससे विश्व समुदाय में अस्थिरता का माहौल बना। अब शी जिनपिंग की दिल्ली यात्रा
को कई विशेषज्ञों ने तनाव कम करने और आर्थिक सहयोग को पुनःस्थापित करने के इशारे के रूप में देखा है, जबकि कुछ विश्लेषकों ने इसे भू-राजनीतिक संतुलन के नए मोड़ के रूप में भी पहचाना है।
शिखर सम्मेलन के पहले दिन, ब्रिक्स देशों के प्रमुख आर्थिक कार्यकारी समिति (ECOFIN) के प्रतिनिधियों ने वैश्विक मंदी के
प्रभावों को कम करने के लिए सामूहिक वित्तीय उपायों पर चर्चा की। इस सत्र में सदस्य राष्ट्रों ने वैकल्पिक आरक्षित मुद्रा बास्केट, नई विकास बैंकों की पूंजी वृद्धि और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए संयुक्त फंड स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। इन प्रस्तावों को शी जिनपिंग और मोदी दोनों ने सकारात्मक रूप से स्वीकार किया, जिससे
ब्रिक्स के आर्थिक सहयोग में नई ऊर्जा का संचार हुआ।
दूसरे दिन के मुख्य सत्र में, ब्रिक्स के नेता व्यापार मुक्त क्षेत्र (FTA) के विस्तार पर चर्चा करेंगे। इस सत्र में भारत और चीन के बीच व्यापार बाधाओं को हटाने, वस्तु एवं सेवा प्रवाह को सुगम बनाने के लिए नियामक ढाँचे को सुदृढ़ करने की
योजना पेश की गई है। साथ ही, दोनों देशों ने तकनीकी सहयोग के लिए संयुक्त रिसर्च सेंटर स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है, जिससे नवाचार एवं डिजिटल अर्थव्यवस्था में सहयोग को बढ़ावा मिलेगा। इस पहल को कई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों ने समर्थन दिया है, जो वैश्विक सप्लाई चेन में विविधता लाने का लक्ष्य रखती हैं।
ब्रिक्स शिखर के दौरान, ऊर्जा सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया गया। सदस्य देशों ने सऊदी अरब, रूस और अन्य तेल निर्यातकों के साथ मिलकर नई ऊर्जा व्यापार प्रणाली बनाने की घोषणा की। इस पहल में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के निवेश, हाइड्रोजन इकोसिस्टम का विकास और ऊर्जा अवसंरचना की आपसी उपयोगिता को बढ़ावा देना शामिल है।
चीन और भारत दोनों ने इस दिशा में अपनी राष्ट्रीय नीतियों को समायोजित करने का आश्वासन दिया, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई गतिशीलता उत्पन्न होगी।
शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी की मुलाकात के बाद, दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी प्रतिक्रियाएँ दीं। भारतीय विदेश मंत्री ने कहा कि यह यात्रा
दोनों देशों के बीच रणनीतिक संवाद को पुनर्जीवित करने का अवसर है, और दोनों पक्षों को मिलकर क्षेत्रीय शांति और विकास के लिए काम करना चाहिए। वहीं, चीनी विदेश मंत्री ने कहा कि गॉलवन में हुए घटनाक्रम को समझते हुए, दोनों पक्षों को संवाद के माध्यम से मुद्दों को हल करना चाहिए, और ब्रिक्स मंच पर
सहयोग को मजबूत करना चाहिए। इन बयानों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय में आशा की लहर पैदा की।
अमेरिका और यूरोपीय संघ के प्रमुख प्रतिनिधियों ने भी इस शिखर पर अपने विचार प्रस्तुत किए। अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि ब्रिक्स के आर्थिक सहयोग को पारदर्शी और नियम आधारित होना चाहिए, तथा अंतरराष्ट्रीय मानकों का सम्मान करना
चाहिए। यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों ने ब्रिक्स के साथ सहयोग को सुदृढ़ करने की इच्छा जताई, जबकि व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को संतुलित करने की जरूरत पर बल दिया। इन प्रतिक्रियाओं ने वैश्विक शक्ति संतुलन में बहुपक्षीय संवाद के महत्व को रेखांकित किया।
शिखर सम्मेलन के आर्थिक सत्र में, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IM
Updated: September 12, 2026
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने गॉलवन संघर्ष के बाद भारत की सात साल बाद एक दौरे पर प्रमोदित किए, जिसने सुरक्षा मुद्दों पर चर्चा शुरू की। यह अप्रत्याशित चरण ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के योगदान के साथ भू-राजनीति के नए अवसर खोलता है।
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