सत्तू, जो काली दाल और चना से बनाया जाता है, भारत में प्राचीन काल से उपभोग में रहा है और बिहार में यह मुख्य प्रोटीन स्रोत माना जाता है। मखाना, जिसे फोसा भी कहा जाता है, झारखंड‑बिहार की सीमावर्ती क्षेत्रों में उगाया जाता है और विश्व स्तर पर स्वास्थ्य‑वर्धक स्नैक के रूप में लोकप्रिय हो रहा है। दोनों उत्पादों का उत्पादन स्थानीय किसानों को रोजगार प्रदान करता है और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करता है।
बीआरआईसीएस के स्वागत किट में सत्तू की पाउडर, मखाना के भुने हुए दाने और इनकी रेसिपी पुस्तिकाएँ शामिल की गईं। इस पहल के पीछे भारत सरकार की “इंडिया स्टेज‑ग्लोबल” नीति का भी प्रभाव है, जो भारतीय उत्पादों को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने की दिशा में काम करती है। किट का वितरण बीआरआईसीएस शिखर सम्मेलन से पहले किया गया, जिससे प्रतिनिधियों को भारतीय खाद्य संस्कृति का परिचय मिल सके।
मुख्य पत्रकारों ने बताया कि किट तैयार करने की प्रक्रिया में बिहार सरकार ने स्थानीय संगठनों और एग्ज़ीक्यूटिव्स को शामिल किया। बिहार के कृषि मंत्री ने कहा कि यह कदम राज्य के किसानों के लिए नई बाजार संभावनाएँ खोलता है। किट में प्रयुक्त सत्तू और मखाना की गुणवत्ता राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप थी, जिससे अंतरराष्ट्रीय मानकों को भी पूरा किया गया।
बीआरआईसीएस के प्रमुख सदस्यों ने इस पहल की सराहना की। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि “भोजन के माध्यम से सांस्कृतिक आदान‑प्रदान दोनों देशों के बीच समझ को गहरा करता है।” रूस की दूतावास ने भी उल्लेख किया कि “स्थानीय उत्पादों की इस तरह की प्रस्तुति व्यापारिक सहयोग को नई दिशा देती है”। दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़ील की प्रतिनिधियों ने भारतीय खाद्य विविधता को “विश्व स्तर पर प्रशंसा योग्य” कहा।
आर्थिक दृष्टिकोण से यह कदम बिहार के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि का संकेत देता है। सत्तू और मखाना दोनों ही उच्च प्रोटीन वाले उत्पाद हैं, जिनकी वैश्विक मांग बढ़ रही है। बीआरआईसीएस देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौतों में इन वस्तुओं को शामिल करने की संभावना है, जिससे बिहार के किसानों को स्थायी आय स्रोत मिल सकता है। इस पहल से राज्य के छोटे‑और‑मध्यम उद्यम (एसएमई) को भी लाभ होगा।
सामाजिक प्रभाव के संदर्भ में, सत्तू और मखाना को अंतरराष्ट्रीय मंच पर लाने से ग्रामीण युवाओं में कृषि‑उद्यमिता का उत्साह बढ़ेगा। स्थानीय विश्वविद्यालयों ने इस अवसर को उपयोगी शोध विषय माना है, जिससे उत्पाद विकास और गुणवत्ता सुधार में वैज्ञानिक सहयोग की संभावना है। साथ ही, इस प्रकार की सांस्कृतिक निर्यात से क्षेत्रीय पहचान मजबूत होगी और पर्यटन को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
राजनीतिक रूप से, यह कदम भारत की बहुपक्षीय कूटनीति के तहत “खाद्य कूटनीति” को साकार करता है। बीआरआईसीएस के भीतर भारत की भूमिका को सुदृढ़ करने के लिए इस तरह की पहल को एक रणनीतिक उपकरण माना गया है। विपक्षी दलों ने भी इस निर्णय को “स्थानीय किसानों के हित में” कहा, जिससे यह कदम राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक समर्थन प्राप्त कर रहा है।
Including Bihar’s sattu and makhana in the BRICS welcome kit showcases regional food products to senior diplomats, promoting cultural exchange and opening potential export and trade opportunities for local producers.
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