भौगोलिक रूप से भागलपुर बिहार के मध्यमवर्ती शहरों में से एक है, जहाँ बिजली वितरण के प्रमुख कार्यभार बिहार राज्य विद्युत वितरण कंपनी (BBUD) के अधीन आते हैं। 2010 के दशक में इस क्षेत्र में बिजली कनेक्शन के विस्तार के साथ कई उपभोक्ताओं को NOC जारी करने की प्रक्रिया में देरी होने की शिकायतें सामने आई थीं। ऐसी ही एक शिकायत का मामला अब तेरह वर्षों के लंबित होने के बाद भी समाप्त नहीं हुआ, जिससे स्थानीय प्रशासनिक तंत्र की दक्षता पर प्रश्न उठ रहे हैं।
पिछले दो दशकों में भारतीय ऊर्जा नीति ने ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में विद्युत आपूर्ति को सुदृढ़ करने की दिशा में कई सुधारात्मक कदम उठाए हैं। विशेषकर 2015 में लागू हुए “डिजिटल इंडिया” पहल के तहत कनेक्शन प्रक्रिया को ऑनलाइन किया गया, परन्तु कई छोटे शहरों और कस्बों में अभी भी कागजी कार्यवाही और स्थानीय अधिकारियों के बीच समन्वय की कमी से प्रक्रिया में देरी होती है। भागलपुर का यह केस इस व्यापक प्रणालीगत बाधा का प्रतिनिधित्व करता है।
परिवार ने 2011 में अपने घर में बिजली की लाइन स्थापित करवाने के लिए आवेदन किया, परन्तु मीटर स्थापित होने के बाद भी विभाग ने अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी नहीं किया। इसके परिणामस्वरूप घर में नियमित बिजली कटौती और मीटर को बार‑बार हटाने की समस्या उत्पन्न हुई। कई बार शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद भी विभागीय रिकॉर्ड में इस मामले को “प्रलंबित” ही दर्शाया गया, जिससे परिवार को आर्थिक एवं सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
विभागीय अधिकारियों ने कहा कि इस मामले की जटिलता के कारण एक विशेष समिति गठित की गई है और रेवेन्यू विभाग द्वारा वित्तीय जांच चल रही है। कार्यपालक अभियंता ने बताया कि मामले की समुचित जाँच के बाद ही NOC जारी किया जा सकता है, और इस प्रक्रिया में दस्तावेज़ी सत्यापन, बकाया भुगतान एवं तकनीकी अनुपालन की कई चरण शामिल हैं। तथापि, इस प्रक्रिया में देरी के कारण प्रभावित परिवार को अब तक कोई स्पष्ट समयसीमा नहीं दी गई है।
वर्तमान में अरुण कुमार ने अपने पिता‑माता के मृत्यु के बाद सभी आवश्यक दस्तावेज़, जिसमें आय प्रमाणपत्र, जमीन के कागजात और बकाया बिलों की रसीदें शामिल हैं, संकलित कर लिये हैं। वह प्रतिदिन दो‑तीन बार अलीगंज विद्युत कार्यालय का दौरा कर रहे हैं, जहाँ उन्हें कई स्तरों के अधिकारीयों से मिलना पड़ता है। विभाग के कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें अब तक सभी दस्तावेज़ प्राप्त हो चुके हैं और आगे की कार्रवाई जल्द ही शुरू की जाएगी।
परिवार के वकील ने बताया कि उन्होंने कई बार विभाग को लिखित नोटिस भेजे हैं, परन्तु अब तक कोई ठोस उत्तर नहीं मिला है। वकील ने यह भी उल्लेख किया कि यदि NOC जारी नहीं किया गया, तो उपभोक्ता को वैधानिक उपायों के तहत उपभोक्ता फोरम में याचिका दायर करने का अधिकार है। यह कदम कई मामलों में विभागीय लापरवाही को समाप्त करने में सहायक सिद्ध हुआ है।
बिहार विद्युत विभाग ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह सभी लंबित मामलों को शीघ्र समाधान करने के लिए एक विशेष “ग्राहक सुलह समिति” स्थापित कर रहा है। इस समिति में वरिष्ठ प्रबंधक, रेवेन्यू अधिकारी और तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हैं, जो प्रत्येक केस का व्यक्तिगत मूल्यांकन करेंगे। विभाग ने यह भी कहा कि इस प्रकार की देरी से बचने के लिए ऑनलाइन पोर्टल को सशक्त किया जाएगा।
स्थानीय राजनैतिक नेताओं ने इस मामले को उठाते हुए कहा कि सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी आम जनता के अधिकारों को बाधित करती है। उन्होंने विभाग से अनुरोध किया कि इस केस को प्राथमिकता दे और प्रभावित परिवार को उचित मुआवजा प्रदान करे। कुछ सांसदों ने भी इस मुद्दे को संसद में उठाने की संभावना जताई है, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर भी इस प्रकार की समस्याओं पर ध्यान दिया जा सके।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि विद्युत आपूर्ति में देरी और अनापत्ति प्रमाणपत्र जैसी औपचारिकताओं में अड़चनें न केवल व्यक्तिगत उपभोक्ताओं को प्रभावित करती हैं, बल्कि निवेशकों के विश्वास को भी कमजोर करती हैं। यदि ऐसी समस्याएँ व्यापक स्तर पर बनी रहती हैं, तो ऊर्जा क्षेत्र में निजी निवेश को आकर्षित करने में बाधा उत्पन्न हो सकती है, जिससे राज्य के ऊर्जा लक्ष्यों को प्राप्त करना कठिन हो जाता है।
सामाजिक दृष्टिकोण से इस मामले ने स्थानीय समुदाय में असंतोष की भावना को बढ़ा दिया है। कई पड़ोसियों ने बताया कि बिजली कटौती के कारण घरों में अध्ययन, स्वास्थ्य देखभाल और छोटे व्यापारिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। ऐसी परिस्थितियों में परिवार के बच्चों के शै
Updated: September 12, 2026
Summary: A family in Aliganj, Bhagalpur has endured relentless power cuts and repeated meter removals for nearly 13 years because the electricity board never issued the required NOC, a delay that persisted even after both parents died. Their son Arun Kumar has now gathered all paperwork and is pressing the department daily, while officials cite pending verifications and a special committee, prompting calls for faster resolution and possible consumer‑forum action.
The 13‑year NOC limbo in Aliganj exposes how bureaucratic inertia can turn a routine utility service into a generational hardship, eroding public trust in a sector touted as a pillar of development.
If such procedural quagmires persist, they risk scaring off private investors and
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