ब्रिक्स समूह का गठन 2010 में रूस, चीन, भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका द्वारा किया गया था, जिसका मूल उद्देश्य आर्थिक, वित्तीय और राजनयिक सहयोग को बढ़ावा देना था। समय के साथ इस गठबंधन ने कई आर्थिक परियोजनाएँ और मुद्रा विनिमय तंत्र स्थापित किए, जबकि राजनीतिक रूप से भी यह कई विकासशील देशों की आवाज़ बन गया। पिछले दो वर्षों में कुछ सदस्य देशों ने इस मंच को पश्चिम‑विरोधी रुख अपनाते हुए देखा, जिससे कई विश्लेषकों ने इस दिशा में संभावित जोखिमों को उजागर किया।
भारत ने 2023 में पहली बार ब्रिक्स शिखर सम्मलेन की मेजबानी की थी, और अब 2026 में फिर से इस कर्तव्य को संभाल रहा है। भारतीय सरकार ने इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी स्थिति मजबूत करने और ग्लोबल साउथ के मुद्दों को प्रमुखता देने का अवसर माना। इस दौरान, भारत ने कई विकासशील देशों के साथ व्यापार समझौते और तकनीकी सहयोग के लिए प्रस्तावित पहलें भी प्रस्तुत कीं, जो उसके आर्थिक हितों को प्रतिपादित करती हैं।
समिट के उद्घाटन सत्र में थरूर ने कहा कि ब्रिक्स को एक ऐसा मंच बनना चाहिए जहाँ सदस्य राष्ट्रों के बीच आर्थिक सहयोग को प्रोत्साहन मिले, न कि किसी एक ब्लॉक के विरुद्ध प्रतिद्वंद्विता का मंच। उन्होंने कहा, “हम एक ऐसे मंच की तलाश में हैं जहाँ विभिन्न विचारधाराओं को सम्मान मिले, और यह मंच केवल पश्चिम के प्रति विरोध नहीं, बल्कि वैश्विक शांति और समृद्धि के लिए सहयोगी बन सके।”
उनके इस बयान के बाद, चीन और रूस के प्रतिनिधियों ने इस बात पर जोर दिया कि ब्रिक्स को किसी भी बड़े शक्ति के दबाव से मुक्त रहना चाहिए, लेकिन वे थरूर की इस बात से सहमत थे कि मंच को केवल विरोधी रुख अपनाना चाहिए नहीं। दोनों देशों ने कहा कि आर्थिक सहयोग और तकनीकी साझेदारी ही इस समूह की मुख्य धारा होनी चाहिए, जिससे विकासशील देशों को वास्तविक लाभ मिले।
विपरीत रूप में, दक्षिण अफ्रीका के प्रतिनिधि ने थरूर के विचारों को “संतुलित” कहा और कहा कि सदस्य देशों को अपनी-अपनी राष्ट्रीय हितों के साथ-साथ समूह की सामूहिक दिशा को भी समझना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि ब्रिक्स को किसी भी बड़े भू‑राजनीतिक टकराव में फँसने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे समूह की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ सकते हैं।
इन प्रतिक्रियाओं के बीच, भारतीय व्यापार मंडलों ने थरूर के बयान का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि पश्चिम‑विरोधी रुख अपनाने से भारत के व्यापारिक अवसर सीमित हो सकते हैं, जबकि संतुलित नीति से नई बाजारों तक पहुंच आसान होगी। कई उद्योगपति इस बात को दोहराते हुए कहा कि भारत को अपनी आर्थिक नीतियों को वैश्विक स्तर पर अनुकूल बनाना चाहिए, ताकि ब्रिक्स मंच से अधिकतम लाभ मिल सके।
विदेशी नीति विशेषज्ञों ने भी इस बयान को महत्व दिया। एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर ने कहा कि थरूर का बयान भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को दर्शाता है, जहाँ वह न तो किसी बड़े ब्लॉक के अधीन रहेगा और न ही विरोधी मोर्चा अपनाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रकार की संतुलित स्थिति भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अधिक प्रभावशाली बना सकती है।
आर्थिक विश्लेषकों ने इस पर टिप्पणी की कि यदि भारत ब्रिक्स में अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता देता है, तो यह भारतीय निर्यातकों और निवेशकों के लिये नई संभावनाएँ खोल सकता है। उन्होंने उल्लेख किया कि ब्रिक्स के भीतर निर्माण, ऊर्जा और डिजिटल तकनीक के क्षेत्र में कई बड़े प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, जो भारत को तकनीकी उन्नति और रोजगार सृजन में मदद करेंगे।
राजनीतिक टिप्पणीकारों ने यह भी बताया कि थरूर का यह बयान घरेलू राजनीति में भी एक संकेत है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के रूप में थरूर ने इस मंच पर भारत की भूमिका को स्पष्ट करने का प्रयास किया, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय मामलों में अपनी सक्रिय भागीदारी को दर्शा सके। यह बयान आगामी चुनावी माहौल में भी महत्त्वपूर्ण हो सकता है, जहाँ विदेश नीति का मुद्दा अक्सर चर्चा में रहता है।
सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो ब्रिक्स मंच
Updated: September 11, 2026
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