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नालंदा के सरमेरा में गंगा के बैकवॉटर से बाढ़, 350 बीघा फसल डूबी; बांध टूटने की आशंका

गंगा के बैकवाटर से नालंदा जिले के सरमेरा प्रखंड में बाढ़ की स्थिति तीव्र हो गई है, जिससे स्थानीय किसान और प्रशासन दोनों पर दबाव बढ़ा है।
चार लगातार दिनों तक जलस्तर में निरंतर वृद्धि ने पेंदी, सदहा और पुरानी इसुआ के जमींदारी बांधों पर अत्यधिक तनाव डाल दिया है, और लगभग 350 बीघा धान‑मक्का की फसल दस फीट गहरे पानी में डूब गई है। इस परिस्थिति को लेकर स्थानीय प्रशासन ने आपातकालीन उपायों की घोषणा की है, जबकि कई पक्षों ने संभावित बांध टूटने की चेतावनी दी है।सरमेरा प्रखंड का भू‑विज्ञानीय इतिहास दिखाता है कि यह इलाका गंगा के बैकवाटर से प्रभावित होने वाले जल‑समुच्चयों का एक प्रमुख बिंदु रहा है। पिछले दो दशकों में यहाँ कई बार बाढ़‑प्रवणता के कारण क्षति हुई है, परन्तु 2024 की इस बाढ़ में जलस्तर का अभूतपूर्व स्तर देखा गया है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से वर्षा‑पात में असमानता बढ़ी है, जिससे गंगा‑पाठ के निचले जल‑स्तर में अचानक वृद्धि हुई। इस संदर्भ में, स्थानीय जल विज्ञान विभाग ने कहा है कि गंगा के मुख्य प्रवाह में अतिरिक्त जलभार का प्रभाव बैकवाटर में अत्यधिक जल‑संभरण को प्रेरित कर रहा है।

बांधों के निर्माण की मौजूदा स्थिति पर भी सवाल उठे हैं। पेंदी, सदहा और पुरानी इसुआ के जमींदारी बांधों की आयु लगभग 30‑35 वर्ष बताई जाती है, और उनके रख‑रखाव में अंतराल रहे हैं। इन बांधों का मूल उद्देश्य वर्षा‑जल को नियंत्रित कर कृषि‑क्षेत्र को सिंचाई प्रदान करना था, परन्तु आज वे जल‑भारी परिस्थितियों में सुरक्षा के बजाय जोखिम का स्रोत बन गए हैं। विशेषज्ञों ने इस बात को दोहराया है कि इन पुरानी संरचनाओं को समय‑समय पर पुनरावलोकन और सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में ऐसी स्थितियों में जन‑सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

बाढ़ के प्रभाव को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने तत्काल उपायों की घोषणा की। जिला परिषद ने 5,000 परिवारों को अस्थायी आश्रय प्रदान करने के लिए स्कूल और सामुदायिक केंद्रों को खोल दिया है, और प्रभावित किसानों को बीज तथा ऋण राहत के लिए विशेष योजना लागू की जा रही है। इसके अलावा, जिला जल संसाधन विभाग ने जल‑निकासी के लिए अतिरिक्त पम्पिंग इकाइयों की तैनाती की है, और नदियों के किनारे पर नई बाढ़‑रोधी बाधाओं का निर्माण तेज किया गया है।

जमींदारी बांधों के आसपास की जल‑प्रवाह की निगरानी के लिए ड्रोन्स और सैटेलाइट इमेजरी का उपयोग किया गया है। इन तकनीकी उपायों से जल‑स्तर में होने वाले परिवर्तन को रीयल‑टाइम में ट्रैक किया जा रहा है, जिससे संभावित टूटने की स्थिति में शीघ्र कार्रवाई संभव हो सके। हालांकि, इन मॉनिटरिंग प्रणालियों की प्रभावशीलता अभी पूरी तरह सिद्ध नहीं हुई है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर तकनीकी प्रशिक्षण और उपकरणों की उपलब्धता सीमित है।

स्थानीय किसान संघों ने भी स्थिति पर अपनी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि धान‑मक्का की बर्बाद फसल के कारण किसानों की आय में भारी गिरावट आएगी, और कई परिवार बंधक‑रहित ऋण लेने के लिए मजबूर हो सकते हैं। संघ के प्रतिनिधि ने कहा कि सरकार को त्वरित रियायती ब्याज दरों के साथ फसल बीमा का विस्तार करना चाहिए, ताकि इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं के आर्थिक प्रभाव को कम किया जा सके।

सरकार की प्रतिक्रिया में राज्य जल संसाधन विभाग के मुख्य अधिकारी ने कहा कि बैकवाटर की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए गंगा‑अधिकारियों के साथ समन्वय बढ़ाया गया है। उन्होंने उल्लेख किया कि गंगा के मुख्य धारा में जल‑भार को कम करने के लिए upstream क्षेत्रों में जल‑रिलीज़ की प्रक्रिया को तेज किया जा रहा है। साथ ही, उन्होंने कहा कि भविष्य में समान परिस्थितियों से बचने के लिए निचले जल‑स्तर में बाढ़‑नियंत्रण हेतु अतिरिक्त जल‑धाराओं का विकास किया जाएगा।

बांधों के संभावित टूटने की आशंका को लेकर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने भी चेतावनी जारी की है। उन्होंने कहा कि यदि जल‑स्तर निर्धारित सीमा से ऊपर जाता है, तो तत्काल एवरीटिंग प्रोटोकॉल लागू किए जाएंगे, जिसमें बाढ़‑रोकथाम के लिए अतिरिक्त रेत‑बैरियर्स और निकासी मार्गों की स्थापना शामिल होगी। NDMA ने कहा कि इस स्थिति में प्रभावित क्षेत्रों में आपातकालीन बचाव दलों को तैनात किया जाएगा, और जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय स्तर पर सहायता भेजी जा सकती है।

 


Nalanda faces severe Ganga backwater flooding, submerging crops and straining aging dams.
Authorities deploy drones and shelters while farmers demand financial relief.

पुरानी जमींदारी बांध तब जोखिम बन जाते हैं, जब उनका उद्देश्य सिंचाई से सुरक्षा की जिम्मेदारी में बदल जाए। यह संकट केवल मौसम का नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचे की उम्र, उसकी मौजूदा स्थिति और समय पर रखरखाव की कमी से भी जुड़ा है। दशकों पुराने बांधों पर बढ़ती आबादी, बदलते जलप्रवाह और लगातार चरम मौसम की घटनाओं का दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बांध कब टूटेगा, बल्कि यह है कि प्रशासन उसकी कमजोरियों की पहचान कर उन्हें मजबूत करने के लिए कब गंभीर और स्थायी कदम उठाएगा।

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