पश्चिम बंगाल में फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट का चलन कई सालों से संदेह का विषय रहा था, परंतु इस बार बिहार से आए दस्तावेज़ों की जाँच ने इसे नई दिशा दी। बिहार मेडिकल काउंसिल ने 2022 में जारी किए गए एमबीबीएस प्रमाणपत्रों की सत्यता पर सवाल उठाया, जब एक शिकायत के बाद विस्तृत जाँच शुरू हुई। जांच में पता चला कि पाँच उम्मीदवारों ने समान फॉर्मेट वाला दस्तावेज़ प्रस्तुत किया था, जिसकी मूलभूत जानकारी में कई विसंगतियाँ थीं।
बिहार की चिकित्सा नियामक निकाय ने अपने सर्वेक्षण में बताया कि फर्जी प्रमाणपत्रों की पहचान करने के लिए उन्होंने डिजिटल हस्ताक्षर, सीरियल नंबर और जारी करने वाले संस्थान की वैधता की जाँच की। इस प्रक्रिया में पता चला कि प्रमाणपत्रों में उपयोग किए गए सीरियल नंबर सरकारी डेटाबेस में मौजूद नहीं थे। इसके साथ ही, संस्थान के नाम और पता भी असंगत पाया गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि ये दस्तावेज़ झूठे थे।
पश्चिम बंगाल मेडिकल काउंसिल ने इस जानकारी के आधार पर तत्काल पाँच डॉक्टरों के पंजीकरण को निरस्त कर दिया। काउंसिल के प्रवक्ता ने कहा कि हमारा मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा है, और ऐसी कोई भी अनैतिक प्रथा हमारे नियामक ढांचे में नहीं सहन की जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि भविष्य में इस तरह की जाँच को सख़्त बनाने के लिए तकनीकी उपाय अपनाए जाएंगे।
पांचों डॉक्टरों में से दो ने तुरंत अपील दायर की, जबकि बाकी तीन ने अपने पंजीकरण को पुनःस्थापित करने की मांग की। सभी को अब कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि फर्जी प्रमाणपत्र के साथ पंजीकरण कराना भारतीय मेडिकल एक्ट के तहत दंडनीय अपराध है। अदालत में सुनवाई की तिथि तय हो चुकी है, और इस प्रक्रिया में उन्हें जुर्माना तथा कैद की सजा भी मिल सकती है।
बिहार मेडिकल काउंसिल ने इस घटना को एक चेतावनी के रूप में पेश किया और कहा कि फर्जी प्रमाणपत्रों की आपूर्ति करने वाले नेटवर्क को तोड़ने के लिए अंतर-राज्य सहयोग को मजबूत किया जाएगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस मामले की जांच में अब तक 30 से अधिक संभावित फर्जी दस्तावेज़ों की पहचान की गई है, जो अन्य राज्यों में भी प्रभाव डाल सकते हैं।
पश्चिम बंगाल के स्वास्थ्य मंत्री ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि हम रोगियों की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हैं और किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी को बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि राज्य में मेडिकल शिक्षा के मानकों को उन्नत करने के लिए नई नीतियों पर विचार किया जाएगा।
बिहार के स्वास्थ्य विभाग ने बताया कि राज्य में फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट की समस्या अब तक अनदेखी रही थी, परंतु अब इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भविष्य में मेडिकल कॉलेजों और नियामक संस्थानों के बीच डेटा साझा करने की प्रक्रिया को तेज़ किया जाएगा, जिससे फर्जी दस्तावेज़ों का पता जल्दी चल सके।
राष्ट्रीय स्तर पर इस घटना ने कई स्वास्थ्य विशेषज्ञों को चेतावनी दी है कि फर्जी डॉक्टरी प्रमाणपत्रों से न केवल रोगियों की जान जोखिम में पड़ती है, बल्कि स्वास्थ्य प्रणाली की विश्वसनीयता भी क्षीण होती है। उन्होंने कहा कि डिजिटल प्रमाणपत्र प्रणाली और बायोमैट्रिक सत्यापन को अनिवार्य करने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं को रोका जा सके।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो फर्जी प्रमाणपत्रों के कारण स्वास्थ्य सेवाओं में विश्वास की कमी निवेशकों को हतोत्साहित कर सकती है। विदेशी स्वास्थ्य परियोजनाओं और निजी क्लिनिकों की योजना बनाते समय नियामक स्थिरता को प्रमुख मानदंड माना जाता है, और इस प्रकार की घटनाएँ निवेश माहौल को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकती हैं।
सामाजिक प्रभाव की बात करें तो रोगियों में स्वास्थ्य संस्थानों के प्रति अविश
Updated: September 16, 2026
The crackdown reveals how fragmented state registries act as a blind spot that criminal networks exploit, turning bogus degrees into a national‑level health risk. If regulators move to a unified, digitally‑signed credential system, the credibility of Indian medicine—and the foreign capital it attracts—could finally be insulated from such fraud













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