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बिहार में ऐतिहासिक बाढ़ से 5 मिलियन से अधिक प्रभावित, राहत कार्य में राजनीतिक टकराव हुआ तेज़

बिहार में लगातार बढ़ती जलस्तर और लगातार आने वाली वर्षा ने राज्य के कई जिलों को बाढ़ की आपदा में धकेल दिया है, जिससे पाँच मिलियन से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं।
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सड़कों पर जल के धारा जैसी लहरें उभरी हैं, घरों को जलमग्न कर दिया गया है और मौसमी राहत कार्यों के बीच राजनीतिक तकरार का माहौल भी गरम हो गया है। इस कठिन घड़ी में कई नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और फिल्मी हस्तियाँ राहत के लिए मैदान में उतर रही हैं, जबकि सरकारी एजेंसियों पर बिखरी हुई सहायता का समुचित समन्वय न करने का आरोप भी लगाया जा रहा है।बाढ़ का प्रकोप जुलाई के अंत में शुरू हुआ, जब गंगा, कोसी और सण्‍डरिया नदियों का जलस्तर अपने औसत से कई मीटर अधिक हो गया।
मौसम विभाग ने इस वर्ष की बाढ़ को ‘इतिहासिक’ दर्ज किया, क्योंकि पहले दर्ज किए गए रिकॉर्ड के मुकाबले जल स्तर में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। पिछले दो दशकों में बिहार में बाढ़ से औसत 2.5 मिलियन लोग प्रभावित हुए, परन्तु इस बार के आँकड़े पहले से ही दोगुने हो चुके हैं। राज्य के प्रमुख जलस्रोतों के किनारे स्थित बँधों की ढहने की आशंकाएँ भी लोगों के बीच भय उत्पन्न कर रही हैं।संकट के सामने राज्य सरकार ने तत्काल राहत कार्यों का आदेश दिया, जिसमें डिपार्टमेंट ऑफ़ रेस्क्यू एंड डिफेंस के तहत फौज और एआरए (आरटीए) की तैनाती हुई। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने भी अपनी टीमों को तैनात कर, जलस्तर की निगरानी और बचाव कार्यों में सहयोग किया। परंतु कई क्षेत्रों में राहत सामग्री का वितरण धीमा रहने से स्थानीय लोगों में असंतोष की लहर तेज़ हुई। ग्रामीण इलाकों में सड़कों का क्षति, विद्युत आपूर्ति की रुकावट और संचार नेटवर्क की बाधा ने राहत कार्यों को और जटिल बना दिया।

इन परिस्थितियों में पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने कई बार मीडिया को बताया कि उन्होंने अपने संसाधनों से बाढ़ पीड़ितों को आर्थिक मदद और भोजन सामग्री पहुँचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार की धीमी कार्रवाई को देखते हुए उन्होंने स्वयं राहत शिविर स्थापित किए, जिससे कई गांवों में अन्न और सफ़ेद पानी की कमी नहीं रही। यादव ने यह भी संकेत दिया कि उनके इस प्रयासों को राजनीतिक मंच पर मान्यता नहीं मिल रही, और यह असहयोगी राजनीति का परिणाम है।

इसी बीच तेजस्वी यादव, राजेंद्र सिंह यादव के पुत्र और राष्ट्रीय जनता दल (राज्य) के प्रमुख, ने भी अपनी पार्टी के माध्यम से कई राहत अभियानों का आयोजन किया। उन्होंने अपने समर्थकों को संगठित कर, बाढ़ पीड़ितों को कपड़े, भोजन और स्वास्थ्य किट वितरित करने का आह्वान किया। तेजस्वी ने कहा कि उनका उद्देश्य “भ्रष्टाचार रहित, जनसंपर्क पर आधारित” राहत प्रदान करना है, जिससे जनता का भरोसा फिर से स्थापित हो सके। हालांकि, उनका यह बयान पप्पू यादव के बयान के साथ टकराव में आ गया, जिससे दोनों पक्षों के बीच सार्वजनिक रूप से आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया।

पप्पू यादव ने तेजस्वी यादव पर “राजनीतिक दिखावा” करने का आरोप लगाया, यह कहा कि तेजस्वी के द्वारा किए जा रहे कार्य सिर्फ वोटों की खरीदारी का साधन हैं। उन्होंने कहा, “जब सरकार के पास पर्याप्त संसाधन नहीं है तो कुछ नेता खुद को उद्धारकर्ता बनाते हैं, पर असली मदद तो सरकार और केंद्र की होनी चाहिए।” इस बीच तेजस्वी ने अपने बयान में कहा कि वह “सिर्फ लोगों की जरूरतों को देख रहा हूँ, ना कि राजनीतिक लाभ की तलाश में”। दोनों पक्षों के इस विवाद ने बाढ़ राहत को एक राजनीतिक मंच में बदल दिया, जिससे आम जनता के बीच निराशा बढ़ी।

राजनीतिक तनाव के बीच राष्ट्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर तीखी बहस छिड़ गई। केंद्रीय सरकार के प्रमुख मंत्री ने बिहार के मुख्यमंत्री को बाढ़ राहत के लिए विशेष फंड आवंटित करने की बात कही, जबकि विपक्षी दलों ने इस फंड के वितरण में पारदर्शिता की मांग की। इस दौरान कई राष्ट्रीय समाचार चैनलों ने इस विवाद को प्रमुखता से दिखाया, जिससे सामाजिक मीडिया पर भी चर्चा तेज़ हो गई।

सामाजिक कार्यकर्ता और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) ने भी इस स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की।

उन्होंने कहा कि “राजनीतिक हस्तक्षेप से राहत कार्यों की गति धीमी हो रही है, और सबसे अधिक प्रभावित वर्ग—बुजुर्ग और बच्चे—सबसे ज्यादा जोखिम में हैं।” कई एनजीओ ने अपने स्वयं के आपूर्ति किट तैयार कर, स्थानीय स्वयंसेवकों के साथ मिलकर बाढ़ पीड़ितों को वितरित करने की पहल की। इनके अनुसार, सरकार और राजनीतिक दलों को राहत कार्य में सहयोगी बनना चाहिए, न कि प्रतिस्पर्धी।

आर्थिक दृष्टि से बाढ़ का असर गहरा है। कृषि क्षेत्र में बाढ़ के कारण फसलों की क्षति लगभग 30 प्रतिशत अनुमानित की गई है, जिससे किसानों की आय में भारी गिरावट आएगी।

Updated: September 16, 2026

The flood‑driven scramble reveals a deeper truth: when state machinery stalls, the political arena morphs into a survival market, turning relief into a vote‑buying platform and eroding public trust.

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