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पितृपक्ष आज से शुरू, 10 अक्टूबर को होगा पितृ विसर्जन, जानें श्राद्ध के नियम और मान्यताएं

पितृपक्ष, पितरों की स्मृति में समर्पित यह पवित्र पर्व, रविवार से शुरू होकर 10 अक्टूबर को पितृ विसर्जन अमावस्या पर समाप्त होगा। इस दौरान भक्त अपने पूर्वजों का तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान कर श्रद्धा प्रकट करेंगे। यह कार्यक्रम विशेष रूप से तब महत्व रखता है जब ज्योतिषाचार्य रासबिहारी उपाध्याय ने बताया है कि इस वर्ष के वार और ग्रहों की व्यवस्था इस पितृपक्ष को अनन्य बनाती है, जिससे श्राद्ध के प्रभाव में वृद्धि होगी।

पितृपक्ष की उत्पत्ति प्राचीन भारतीय धार्मिक परंपराओं में है, जहाँ पूर्वजों की आत्मा को शांति और अनंत सुख देने हेतु तर्पण और दान कार्य किए जाते हैं। इस पर्व को हिन्दू धर्म के अनुक्रम में श्री पितृक्षेत्र के रूप में मान्यता प्राप्त है, और इसे सामाजिक एवं आध्यात्मिक अनुष्ठानों का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है।

पिछले वर्ष इस पितृपक्ष के दौरान कई राज्यों में विशेष कार्यक्रम आयोजित हुए, जहाँ धूमधाम से पितृ तर्पण के साथ-साथ दान और भेंट के कार्य भी समन्वित किये गये। 2019 में इसी वर्ष का पितृ विसर्जन अमावस्या पर राज्य सरकारों ने पितृस्नेह कार्यक्रम को प्रायोजित किया, जिससे सामान्य जनसांख्यिकीय वर्गों में पितृपक्ष के प्रति जागरूकता बढ़ी।

इस वर्ष की पितृपक्ष के प्रमुख घटनाक्रम में सबसे पहले सुबह के 6 बजे से शुरू होने वाला पितृ तर्पण समारोह हुआ, जिसके दौरान 80 से अधिक परिवारों ने पिताओं के लिए जलपात्र और नारियल अर्पित किये। इसके बाद मध्याह्न में पितृ विसर्जन के लिए पवित्र नदी में पिंडदान किया गया। शाम को भक्तों ने पितृ पवित्र परिधान में नृत्य और भजन के साथ श्राद्ध समारोह समाप्त किया।

पारंपरिक पद्धति के अनुसार पितृ विसर्जन के दिन पूर्वजों के शरीर को धान, चावल, मक्का और शुद्ध जल में डुबोया जाता है, जिसे “पितृ विसर्जन” कहा जाता है। इस वर्ष के ज्योतिषीय अध्याय के अनुसार गुरु ग्रह और शुक्र की उपस्थिति से पितृ विसर्जन के प्रभाव को बढ़ावा मिलने का आभास हुआ, जिससे श्राद्ध के परिणाम अधिक प्रभावी होंगे।

ज्योतिषाचार्य रासबिहारी उपाध्याय का मानना है कि इस वर्ष के पितृपक्ष में पूर्वजों की आत्मा के लिए “शक्तिवान” ऊर्जा प्राप्त होगी, जिसके कारण श्राद्ध के दौरान दान के फल तेज़ी से मिल सकते हैं। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि “भक्तों को अनावश्यक व्यय से बचना चाहिए और केवल आवश्यक दान ही करना चाहिए।”

सामाजिक क्षेत्र से, पितृपक्ष के दौरान कई धर्मार्थ संगठन ने “कर्मा अभियान” चलाया, जिसमें पिताओं के नाम पर बाल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए धन इकट्ठा किया गया। इस पहल से समाज में दानशीलता के प्रति जागरूकता बढ़ी और पितृपक्ष को एक सामाजिक कार्यक्रम के रूप में भी अपनाया गया।

राजनीतिक दृष्टिकोण से, राज्य सरकार ने पितृपक्ष के दौरान पितृ विसर्जन के लिए विशेष प्रावधान बनाए, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर पवित्र जल के लिए सुरक्षा और स्वच्छता उपाय सुनिश्चित किए गए। इस पहल से राज्य की सामाजिक समरसता को बल मिला और नागरिकों को पवित्र अनुष्ठानों में भाग लेने की सुविधा मिली।

आर्थिक स्तर पर, पितृपक्ष के दौरान पिकनिक और दान कार्यक्रमों में व्यापारियों को लाभ हुआ, विशेषतः पवित्र वस्तुओं, फूलों और धातुओं के व्यापार में। इस कार्यक्रम के दौरान स्थानीय बाजारों में बिक्री में 12 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

सामाजिक प्रभाव के तौर पर, पितृपक्ष ने परिवारों के बीच संबंधों को मजबूती प्रदान की और बुजुर्गों के प्रति सम्मान बढ़ाया। पिताओं की यादों को

Updated: September 27, 2026


Summary: The annual Pitrapaksh, beginning Sunday and concluding on October 10’s new‑moon immersion, saw thousands perform rites for their ancestors, bolstered by astrologer Rasbihari Upadhyay’s claim of heightened planetary influence. State support, charitable drives and a surge in religious‑goods sales turned the observance into a notable social and economic event across the region.

The pithru‑paksh festival draws large community participation, reinforcing social bonds and traditional rites.
Its timing, per astrological guidance, is believed to amplify the spiritual efficacy of ancestral rites and charitable activities.

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