हालाँकि, न्यायाधिकरणों की स्थापना के बाद भी कई कारकों ने प्रक्रिया को धीमा किया। न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी, अभिलेखीय दस्तावेज़ों का अधूरा संकलन, और पक्षकारों द्वारा पर्याप्त सबूत प्रस्तुत न करने जैसे कारणों से मामलों की सुनवाई में बाधाएँ उत्पन्न हुईं। इसके अलावा, तकनीकी संसाधनों की कमी और कोर्ट-रूम की सीमित उपलब्धता ने भी क्यू को बढ़ा दिया।
इन चुनौतियों के बावजूद, पिछले तीन महीनों में न्यायाधिकरणों ने 1.2 लाख मामलों का फैसला किया, जिससे कुछ राहत मिली। लेकिन कुल लंबित मामलों की संख्या में कोई उल्लेखनीय गिरावट नहीं देखी गई। कई मामलों में पक्षकारों ने पुनः अपील दायर की, जिससे प्रक्रिया में नई जटिलताएँ उत्पन्न हुईं। न्यायाधिकरणों के अध्यक्ष ने कहा कि वे कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए अतिरिक्त संसाधन और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की मांग कर रहे हैं।
विपक्षी दलों ने इस स्थिति को राजनीतिक लाभ के रूप में प्रस्तुत किया। कई कांग्रेस और एआईएमएफ नेताओं ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा न्यायाधिकरणों को उचित शक्ति नहीं दी जा रही, जिससे न्याय के देरी का लाभ उठाकर चुनावी रणनीति बनाई जा रही है। उन्होंने राज्य सरकार पर दबाव डाला कि वह न्यायिक प्रक्रिया को तेज़ करने के लिए विशेष आदेश जारी करे।
मुख्य विपक्षी नेता ने कहा, “यदि न्यायालय की कार्यवाही इस गति से चलती रही, तो आम जनता को न्याय मिलने में कई साल लगेंगे, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।” इस पर राज्य के मुख्य न्याय मंत्री ने कहा कि सरकार ने सभी आवश्यक कदम उठाए हैं और न्यायाधिकरणों को पूरी स्वायत्तता प्रदान की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में सुधार के लिए विशेष तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है।
वित्त मंत्री ने इस मुद्दे को आर्थिक दृष्टिकोण से उठाते हुए कहा कि लंबित मामलों के कारण निवेशकों का भरोसा घट रहा है, विशेषकर नगर विकास और बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में। उन्होंने कहा कि सरकार ने वित्तीय प्रोत्साहन और तेज़ निपटारे के लिए एक विशेष निधि स्थापित की है, जिससे न्यायाधिकरणों को आवश्यक संसाधन मिलेंगे।
शहरी विकास बोर्ड के अध्यक्ष ने कहा कि लंबित मामलों के कारण कई नगरपालिका परियोजनाओं में देरी हो रही है, जिससे सार्वजनिक सेवाओं में बाधा उत्पन्न हो रही है। उन्होंने कहा कि उन्होंने संबंधित विभागों के साथ मिलकर एक त्वरित कार्ययोजना बनाई है, जिसमें मामलों की प्राथमिकता तय कर शीघ्र समाधान किया जाएगा।
सामाजिक संगठनों ने भी इस स्थिति पर अपनी चिंता व्यक्त की। एक नागरिक अधिकार समूह के प्रवक्ता ने कहा कि न्याय की पहुंच हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, और लंबी प्रतीक्षा समय से न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता कम हो रही है। उन्होंने न्यायालयों से अपील की कि वे केस मैनेजमेंट सॉफ़्टवेयर अपनाकर प्रक्रिया को डिजिटल बनाएं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस अपील क्यू का चुनावी माहौल पर प्रत्यक्ष असर पड़ सकता है। वे कहते हैं कि यदि न्यायिक प्रक्रिया में सुधार नहीं हुआ, तो विपक्षी दल इस मुद्दे को अपने चुनावी एजेंडा में प्रमुखता से लेंगे, जिससे सरकार पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है। आर्थिक दृष्टिकोण से देखी जाए तो लंबी कानूनी प्रक्रियाएँ निवेश को रोकेगी और राज्य की आर्थिक वृद्धि को बाधित करेंगी।
आर्थिक विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक अड़चनें विशेषकर बुनियादी ढाँचा और उद्यमिता क्षेत्रों में निवेशकों के लिए जोखिम कारक बन सकती हैं।
The swelling appellate backlog is morphing from a bureaucratic nuisance into a political flashpoint, giving opposition parties a ready grievance to weaponize as elections loom.
If West Bengal cannot convert the promised digital overhaul into faster rulings, the lingering queues will not only stall municipal projects but also erode investor confidence