दल (यूनाइटेड) (जदयू) और राष्ट्रवादी लघु मोर्चा (आरएलएम) के बीच अब तक की तुलना में अधिक तीव्र मतभेद सामने आए हैं। महागठबंधन में भी कांग्रेस, राजद और कई स्थानीय दलों के बीच सीटों के आवंटन को लेकर विवाद की लकीरें स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही हैं।
इन मतभेदों की जड़ें मुख्यतः दो पहलुओं में निहित हैं: पहला, प्रत्येक घटक दल की स्थानीय स्तर पर आधारशिला की ताकत और दूसरा, गठबंधन की राष्ट्रीय रणनीति में बदलाव की दिशा। जदयू ने पहले कुछ सीटों पर अपने उम्मीदवारों को बिना किसी विरोधी दल के समर्थन के पेश करने की बात कही थी, परन्तु अब आरएलएम ने इन ही सीटों पर अपने उम्मीदवार को प्राथमिकता देने का इरादा
जताया है। इस बदलाव ने गठबंधन के भीतर गहरी असहमति को जन्म दिया है, जिससे कई स्थानीय स्तर के नेताओं ने अपने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है।
एनडीए में बगावत की प्रमुख झलक तब सामने आई, जब जदयू के कई वरिष्ठ कार्यकर्ता ने सार्वजनिक तौर पर आरएलएम के उम्मीदवार को समर्थन दिया, जबकि भाजपा के स्थानीय प्रवर्तक इस कदम को गठबंधन के सिद्धांतों के विरुद्ध करार दे रहे हैं। इसी तरह, उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी, राष्ट्रीय लघु मोर्चा (आरएलएम), ने कुछ प्रमुख सीटों पर अपने उम्मीदवार को आधिकारिक समर्थन देने की घोषणा की, जिससे जदयू के आधिकारिक प्रत्याशी को चुनाव में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। इस परिदृश्य में कई जदयू के स्थानीय नेता, जो पहले गठबंधन के अनुशासन का पालन कर रहे थे, अब अपने स्वयं के आधार को सुरक्षित रखने के लिए स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का साहस दिखा रहे हैं।
महागठबंधन में भी समान स्थितियों का उदय हुआ है। कांग्रेस के कुछ जिलों में स्थानीय स्तर पर कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार के मुकाबले राष्ट्रीयवादी दल के उम्मीदवार को अधिक समर्थन मिल रहा है। इसके अलावा, राजद के कुछ प्रमुख नेता, जो पहले गठबंधन के साथ मिलकर लड़ रहे थे, अब अपने व्यक्तिगत मतदाता आधार को संरक्षित करने के लिए स्वतंत्र रूप से चुनाव में उतरने की योजना बना रहे हैं। इस तरह के कदमों ने महागठबंधन को भी आंतरिक रूप से कमजोर कर दिया है, जहाँ अब प्रत्येक घटक दल के भीतर प्रतिस्पर्धा बढ़ती जा रही है।
इन घटनाक्रमों को देखते हुए, कई सीटों पर अब गठबंधन के आधिकारिक उम्मीदवार और विरोधी उम्मीदवार दोनों का सामना करना पड़ेगा। उदाहरण के तौर पर, पटना के एक प्रमुख जिला में भाजपा के आधिकारिक
उम्मीदवार के सामने जदयू के एक वरिष्ठ नेता ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की घोषणा की है, जबकि उसी सीट में कांग्रेस के उम्मीदवार को भी एक स्थानीय दल का समर्थन प्राप्त है। इस प्रकार, मतदाता को अब विभिन्न दलों के बीच चयन करने के लिए कई विकल्प मिलने की संभावना है, जिससे मतदान के परिणाम में अनिश्चितता बढ़ रही है।
इन सभी घटनाओं पर राष्ट्रीय और राज्य स्तर के प्रमुख राजनीतिक नेताओं ने विभिन्न प्रतिक्रिया दी है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि गठबंधन के भीतर मतभेद अस्थायी हैं और पार्टी के मूलभूत सिद्धांतों को नहीं बदलेंगे। जदयू के राष्ट्रीय प्रमुख ने भी आश्वासन दिया कि हमारी प्राथमिकता बिहार के विकास के
लिए एकजुट रहना है, परन्तु उन्होंने आरएलएम के निर्णय पर स्पष्ट असहमति जताई। उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि हमारे उम्मीदवार जनता के भरोसे पर खरे उतरेंगे और उन्होंने गठबंधन के भीतर चल रही बगावत को राजनीतिक स्वार्थ कहा।
महागठबंधन की ओर से, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि गठबंधन के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए
सभी दलों को सहयोगी रहना चाहिए और उन्होंने राजद के कुछ नेताओं के स्वतंत्र चुनाव लड़ने के कदम को अवांछित कहा। राजद के प्रमुख ने फिर भी कहा कि हमारी मुख्य चुनौती बिहार के विकास में है, और हम इसे किसी भी रूप में प्राप्त करेंगे।
The upcoming eight‑seat Bihar Legislative Council election on Oct 23 has ignited fierce intra‑alliance fights, with both the NDA and the Mahagathbandhan seeing junior partners field independent candidates and dispute seat allocations. These rifts threaten coalition cohesion, complicate voter choices and raise doubts about the fairness and legitimacy of the poll outcome.
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