हालाँकि, 28 मई को बिहार सरकार ने अचानक परीक्षा को रद्द कर दिया, यह कहते हुए कि तकनीकी त्रुटियों और सुरक्षा कारणों से प्रक्रिया को पुनः समीक्षा करने की आवश्यकता है। इस निर्णय के बाद कई अभ्यर्थियों ने अपने वित्तीय नुकसान, समय व्यर्थ होने और सरकारी भरोसे की कमी को लेकर गहरी असंतुष्टि व्यक्त की। सामाजिक मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर तीव्र चर्चा शुरू हो गई, जहाँ कई ने सरकार को जवाबदेह ठहराया।
रद्दीकरण के बाद, अभ्यर्थियों ने गर्दनीबाग के प्रमुख चौराहे पर ध्वजवाहक और जुलूस का रूप ले लिया, जिससे शहरी ट्रैफिक में बाधा उत्पन्न हुई। पुलिस ने प्रारम्भिक चेतावनी के बाद भी प्रदर्शनकारियों को हटाने की कोशिश की, परन्तु कई अभ्यर्थियों ने दृढ़ता से विरोध किया और पुलिस के बलों के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे। इस बीच, कुछ युवा समूहों ने मंच पर सरकार की नीति पर प्रश्न उठाते हुए, क्लासरूम में पढ़ाई नहीं, बल्कि परीक्षा की निरंतरता चाहिए का नारा लगाया।
स्थानीय समाचार एजेंसियों ने बताया कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकते समय कई बार अल्पकालिक जाँच बिंदु स्थापित किए, जिससे भीड़ को क्रमबद्ध रूप से हटाया गया। लेकिन इस प्रक्रिया में कई अभ्यर्थियों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से कुछ को रात्रि भर हिरासत में रखा गया। पुलिस ने यह कहा कि यह कदम सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और किसी भी प्रकार की हिंसा को रोकने के लिए आवश्यक था।
बिहार सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया में कहा गया कि परीक्षा रद्दीकरण अनिवार्य था और सभी उम्मीदवारों के हित में ही किया गया। उन्होंने अभ्यर्थियों को एक प्रतिनिधि समूह (डेलीगेशन) तैयार करने का निर्देश दिया, जो आगे की पुनः परीक्षा प्रक्रिया, पुनः चयन या अन्य विकल्पों पर चर्चा करने के लिये सरकार के साथ संवाद स्थापित करेगा। इस डेलीगेशन को चयनित करने के लिये एक विस्तृत समय-सारणी भी जारी की गई है।
दूसरी ओर, अभ्यर्थियों के प्रतिनिधि संघ ने इस आदेश को अनुचित और असहायकारी कहा। उन्होंने बताया कि कई उम्मीदवारों ने पहले ही परीक्षा की तैयारी में बड़ी राशि खर्च कर दी है, और अब उन्हें पुनः तैयारी का भार उठाना पड़ेगा। संघ के प्रमुख ने कहा कि डेलीगेशन तैयार करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं होगी और इस पर सरकार को तुरंत स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
राज्य के मुख्य विपक्षी दल ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी की। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने बिना पर्याप्त कारण के परीक्षा रद्द कर अभ्यर्थियों को निराश किया और यह एक राजनीतिक चाल हो सकती है। विपक्षी नेता ने कहा कि यह मामला केवल भर्ती प्रक्रिया का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का भी परीक्षण है, और इसके लिये एक स्वतंत्र जांच आयोग का गठन आवश्यक है।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखे तो कई अभ्यर्थियों ने कोचिंग फीस, यात्रा खर्च और दस्तावेज़ तैयार करने में काफी निवेश किया था। इस निवेश का पुनः वसूली न हो पाने से कई मध्यम वर्गीय परिवारों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है। स्थानीय आर्थिक विशेषज्ञों ने बताया कि यदि सरकार पुनः परीक्षा नहीं आयोजित करती, तो इससे राज्य में बेरोजगार युवाओं की संख्या में वृद्धि और सामाजिक असंतोष की भावना को बढ़ावा मिल सकता है।
Updated: October 5, 2026
The cancellation affects the recruitment pipeline for Bihar’s police force, influencing staffing and training plans.
The ensuing protest and police response highlight challenges in maintaining public order during large‑scale examination disruptions.
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