इस विरोध का मूल कारण 2024 के राष्ट्रीय चुनावों में कई बार रिपोर्ट की गई प्रक्रिया‑संबंधी अनियमितताओं को लेकर NSUI का निराश होना है। पिछले महीनों में कई राज्यों में मतदान के दौरान ध्रुवीकरण, मशीन‑ट्रांसफ़र त्रुटियों और उम्मीदवारों के नामों में परिवर्तन की शिकायतें दर्ज हुईं। इन घटनाओं को लेकर छात्र संगठनों ने CEC के कार्यकाल पर सवाल उठाए और पारदर्शिता की मांग की।
विनोद जाखड़, NSUI के राष्ट्रीय अध्यक्ष, ने इस प्रदर्शन को “जन लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम” कहा। उन्होंने कहा कि यदि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया खुद ही क्षतिग्रस्त हो जाती है। जाखड़ ने यह भी उल्लेख किया कि इस तरह की नाटकीय प्रस्तुति जनता को जागरूक करने और दबाव बनाने का एक साधन है।
पिछले सप्ताह, दिल्ली में एक समान प्रदर्शन में भी कार्यकर्ताओं ने “जिंदा लाश” का रूप धारण किया था, जिससे CEC पर सार्वजनिक दबाव बढ़ा। इस बार जंतर‑मंतर में प्रदर्शन को अधिक व्यवस्थित रूप में आयोजित किया गया, जिसमें कई छात्र समूहों ने संयुक्त रूप से भाग लिया। प्रदर्शन की शुरुआत में कार्यकर्ताओं ने शांतिपूर्ण नारे लगाए, परन्तु पुलिस की भीड़ नियंत्रण कार्रवाई ने स्थिति को तनावपूर्ण बना दिया।
पुलिस ने बताया कि उन्होंने प्रदर्शन को रोकने के लिए कई बिंदुओं पर सुरक्षा बल तैनात किए थे। उन्होंने कहा कि “जनसमुदाय की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए”। पुलिस ने यह भी बताया कि प्रदर्शन के दौरान कई कार्यकर्ता अनुशासनहीनता और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप में गिरफ़्तार किए गए।
घटनास्थल पर मौजूद कई दर्शकों ने कहा कि उन्होंने पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प को देखा, जिसमें कुछ पुलिसकर्मियों ने रिबन और डंडे का प्रयोग किया। कुछ रिपोर्टों में बताया गया कि प्रदर्शनकारियों ने भी पुलिस के विरुद्ध विरोधी वस्तुएँ फेंकीं। इस बीच, कई पत्रकारों को भी सुरक्षा कर्मियों द्वारा रोक दिया गया, जिससे प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रश्न उठे।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इस घटना पर टिप्पणी करते हुए कहा, “हम चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कड़ी निगरानी रखते हैं। किसी भी प्रकार का अव्यवस्था या हिंसा हमारे कार्य को बाधित नहीं कर सकती।” उन्होंने आगे कहा कि CEC की कार्यवाही कानूनी ढांचे के अंतर्गत ही होगी और किसी भी दबाव को अस्वीकार किया गया।
NSUI ने CEC के खिलाफ अपना संपूर्ण समर्थन समाप्त कर दिया, और उन्होंने कहा कि यदि तत्काल इस्तीफ़ा नहीं किया गया, तो वे अगले स्तर पर आंदोलन करेंगे। संघ ने सामाजिक मंचों पर भी इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि “डेमोक्रेसी को बचाने के लिए सख़्त कदम उठाए जाने चाहिए”।
विरोधी राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे पर अलग‑अलग प्रतिक्रियाएँ दीं। भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकर्ता ने कहा कि “विकल्पी पार्टियों को चुनाव प्रक्रिया के प्रति सम्मान दिखाना चाहिए, न कि असंतोष को हिंसक रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।” वहीं, कांग्रेस के कुछ नेता ने CEC पर “सख़्त जांच” की मांग की और कहा कि “जनता का विश्वास फिर से स्थापित करने के लिए सुधार आवश्यक है”।
आर्थिक दृष्टिकोण से, इस प्रकार के बड़े स्तर के प्रदर्शन और संभावित अस्थिरता से बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। विशेषकर चुनावी अवधि में निवेशकों का ध्यान संवेदनशील रहता है, और ऐसी घटनाएँ जोखिम को बढ़ा सकती हैं। व्यापारिक वर्ग ने कहा कि “राजनीतिक अस्थिरता से व्यापारिक माहौल में अनिश्चितता उत्पन्न होती है, जिससे आर्थिक विकास पर असर पड़ सकता है”।
सामाजिक प्रभाव के संदर्भ में, छात्र संघों की यह तीव्रता युवा वर्ग में राजनीतिक जागरूकता को बढ़ा रही है। कई विश्वविद्यालयों में चुनाव‑संबंधी चर्चाएँ और कार्यशालाएँ आयोजित की जा रही हैं। परन्तु, पुलिस‑प्रदर्शनकारियों के बीच बढ़ती टकराव से सार्वजनिक सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन की चुनौती भी सामने आ रही है।
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. संगीता मेहरा ने कहा कि “वर्तमान में CEC के खिलाफ उठाए गए दावे और प्रदर्शन एक नया मोड़ लेकर आए हैं, जो चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता को चुनौती दे रहे हैं।” उन्होंने यह भी जोड़ते हुए कहा
Updated: October 5, 2026
NSUI’s “living corpse” stunt shows that student groups are moving beyond slogans, turning political discontent into visceral theatre that forces the public to confront perceived electoral malpractice.
If the CEC’s credibility keeps eroding, this performative pressure may shift the balance from democratic participation to a climate where legal
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