लाख अपीलों में से केवल 1.02 लाख ही अब तक निपटा दी हैं। इस अनुपातिक रूप से धीमी प्रक्रिया ने चुनावी अभिलेखों की विश्वसनीयता और समयबद्धता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है, जिससे विभिन्न राजनीतिक दल और नागरिक समाज के बीच चिंता का माहौल बन गया है।
पिछले वर्ष के अंत में, भारतीय निर्वाचन
आयोग ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के व्यापक पुनरीक्षण का आदेश दिया था, जिसमें मौजूदा सूची में त्रुटियों, डुप्लिकेशन और अनुप्रयोग में गड़बड़ियों को दूर करने के लिए SIR प्रक्रिया अपनाई गई। इस प्रक्रिया का उद्देश्य वैध मतदाताओं की पहचान को सुदृढ़ करना और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को बढ़ाना था। प्रारम्भिक चरण
में लगभग 3.8 करोड़ नागरिकों की अपील दर्ज हुई, जिनमें नाम हटाने, जोड़ने या संशोधित करने की मांग की गई थी। आयोग ने इन सभी अपीलों को न्यायाधिकरणों को सौंपा, जिससे न्यायिक समीक्षा के माध्यम से अंतिम निर्णय अपेक्षित था।
वास्तविकता यह है कि पिछले दो वर्षों में न्यायाधिकरणों की कार्यवाही में उल्लेखनीय
देरी देखी गई है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, न्यायालय की कार्यवाही में लंबी लम्बी सुनवाई, दस्तावेजी सत्यापन में बाधाएं और तकनीकी मानकों की कमी ने इस देरी को उत्पन्न किया। आयोग ने इस बीच कई बार प्रक्रिया तेज करने के लिए विशेष समिति का गठन किया, परन्तु इन उपायों ने अपेक्षित परिणाम नहीं दिया।
परिणामस्वरूप, 37 लाख से अधिक अपीलें अभी भी लम्बित हैं, जबकि केवल 1.02 लाख अपीलें ही निपटाई गई हैं।
सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे को उठाने के बाद, न्यायपालिका ने आयोग को सख्त निर्देश जारी किए। न्यायाधीश ने कहा कि मतदाता सूची का विश्वसनीय होना लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की मूलभूत आवश्यकता है और इसे
शीघ्रता से निपटाया जाना चाहिए। अदालत ने विशेष रूप से 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए इस प्रक्रिया को तीव्र गति से पूरा करने का आदेश दिया। इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने आयोग को प्रत्येक न्यायाधिकरण की कार्यप्रणाली की विस्तृत रिपोर्ट अगले दो महीने में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
निर्वाचन
आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को स्वीकार किया और कहा कि वह सभी लंबित मामलों को त्वरित रूप से निपटाने के लिए अतिरिक्त मानवीय और तकनीकी संसाधन जुटा रहा है। आयोग ने बताया कि अब तक 10,000 से अधिक अतिरिक्त न्यायिक सदस्यों को नियुक्त किया गया है और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से
दस्तावेज़ सत्यापन प्रक्रिया को स्वचालित करने की योजना है। इस कदम से अपीलों की जाँच की गति बढ़ाने की आशा है, जबकि पारदर्शिता और न्यायिक सटीकता को बनाए रखने का लक्ष्य भी रखा गया है।
परिणामस्वरूप, कई राज्य स्तर के चुनाव अधिकारी और राजनीतिक दल ने इस विकास की सराहना की। भारतीय राष्ट्रीय
कांग्रेस के पश्चिम बंगाल प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश से मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित होगी और चुनावी प्रक्रिया में विश्वसनीयता बढ़ेगी। वहीं तृणमूल कांग्रेस के राज्य अध्यक्ष ने कहा कि अधिकारियों को अब तक की धीमी कार्यवाही पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए और भविष्य में ऐसी लम्बी देरी
नहीं होने देना चाहिए। विभिन्न नागरिक संगठनों ने भी इस परिलक्षित परिवर्तन को सकारात्मक रूप में देखा, परन्तु उन्होंने आगे की निगरानी की मांग की।
दूसरी ओर, भाजपा के प्रमुख नेताओं ने इस प्रक्रिया में अभी तक निपटाए गए 1.02 लाख मामलों की संख्या को कम आंकते हुए कहा कि वर्तमान गति से
चुनावी समयसीमा को खतरा है। उन्होंने आयोग से आग्रह किया कि वे सभी लंबित मामलों को दो महीने के भीतर निपटाने के लिए एक स्पष्ट कार्ययोजना प्रस्तुत करें। इस बीच, पश्चिम बंगाल के कुछ स्थानीय प्रबंधकों ने बताया कि कई क्षेत्रों में मतदाता सूची में त्रुटियों के कारण वैध मतदाताओं को मतदान से वंचित
किया गया है, जिससे सामाजिक असंतोष की भावना बढ़ी है।
आर्थिक दृष्टिकोण से, मतदाता सूची की असंगतता और देरी से चुनावी खर्च में अप्रत्याशित वृद्धि हो सकती है। यदि कई मतदाताओं को पुनः प्रमाणित करना पड़े तो अतिरिक्त प्रशासनिक लागत, इन्फ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड और तकनीकी सहायता की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञ अनुमान लगाते हैं कि
इस प्रक्रिया में कुल मिलाकर 200 करोड़ रुपए से अधिक का खर्च आ सकता है, जो राज्य के सामान्य विकास कार्यक्रमों पर दबाव डाल सकता है।
सामाजिक प्रभाव के संदर्भ में, लंबित अपीलों के कारण कई नागरिकों में विश्वास का अभाव उत्पन्न हो रहा
The snail‑pace SIR clearance exposes a structural gap between India’s ambition for pristine voter rolls and the capacity of its adjudicative machinery, turning a procedural reform into a political liability.
If the backlog isn’t crushed before the 2026 polls, the credibility boost promised by digitisation could backfire, feeding