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विपरीत पार्टियों ने SIR पर आरोप लगाते हुए सीईसी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग की, चुनाव आयोग

देश भर में मतदाता सूची के शुद्धिकरण (Special Intensive Review‑SIR) को लेकर उठे व्यापक विरोध को देखते हुए, विभिन्न राजनीतिक दलों ने सार्वजनिक मंच पर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। इस सप्ताह दिल्ली में आयोजित कई प्रदर्शन‑रैलियों में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग रखी, जबकि वामपंथी गठबंधन, आम आदमी पार्टी (AAP) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने समानांतर रूप से अलग‑अलग मुद्दों को उजागर किया। इस दौर में 12 साल की अवधि में कई बड़े आंदोलन – किसान‑पहेलवान आंदोलन से लेकर NEET पेपर लीक तक – को एक साथ जोड़ा गया, जिससे SIR प्रक्रिया पर सार्वजनिक भरोसा गंभीर रूप से क्षीण हो गया है।

पिछले वर्ष के अंत में, भारत में मतदाता सूची को अद्यतन करने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान शुरू किया गया था। यह पहल संविधान के अनुच्छेद‑324 के तहत स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के उद्देश्य से ली गई थी। प्रारम्भिक चरण में 1.5 करोड़ से अधिक अभिलेखों की जांच, डुप्लिकेशन व त्रुटियों का पता लगाने हेतु डिजिटल और भौतिक दोनों प्रकार के उपकरणों का प्रयोग किया गया। प्रारम्भिक रिपोर्टें यह संकेत देती थीं कि प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता बनी रहेगी, जिससे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को बढ़ावा मिलेगा।

हालांकि, SIR के मध्यावधि चरण में कई राज्यों में डेटा संग्रह में असंगतियां और अनुचित प्रबंधन की खबरें सामने आईं। कुछ क्षेत्रों में अभिलेखों को दोहराव से हटाने की प्रक्रिया में त्रुटियां, जबकि अन्य में स्थानीय अधिकारीयों द्वारा अनुचित दबाव का आरोप लगा। इस कारण कई नागरिक समूहों ने इस प्रक्रिया को “भ्रष्टाचार का नया रूप” कह कर सार्वजनिक रूप से उजागर किया। इन घटनाओं ने पहले से ही चल रहे राजनीतिक तनाव को और बढ़ा दिया, जिससे विरोध प्रदर्शनों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

NEET‑UG परीक्षा में पेपर लीक की घटना ने इस माहौल में नई ज्वाला जलाई। लीक की पुष्टि के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देने की मांगें तेज़ी से बढ़ीं। कॉकरोच जनता पार्टी ने इस मुद्दे को अपने मुख्य एजेंडा में शामिल कर, शिक्षा विभाग की पारदर्शिता पर सवाल उठाया। इस बीच, शिक्षा मंत्रालय ने लीक के स्रोत की जांच के लिए एक स्वतंत्र जांच समिति का गठन किया, परंतु इस कदम को कई आलोचकों ने “स्थगित कार्रवाई” कहा।

सीईसी ज्ञानेश कुमार की भूमिका भी इस संघर्ष में प्रमुख बनी। चुनाव आयोग के मुख्य कार्यकारी के रूप में उनके पद पर रहकर उन्होंने SIR की निगरानी में कई कठोर कदम उठाए, जिससे कुछ राजनैतिक दलों ने इसे “अधिनायकवादी” कहा। CJP ने विशेष रूप से ज्ञानेश कुमार की पदस्थापना को “अतिरिक्त शक्ति का दुरुपयोग” मानते हुए उनके इस्तीफे की मांग की। इस मांग को समर्थन देने वाले कई सामाजिक संगठनों ने भी अपने मंचों पर समान आवाज़ उठाई।

दिल्ली में आयोजित एक बड़े प्रदर्शन में, वामपंथी गठबंधन ने SIR प्रक्रिया को “जनसत्ता के शत्रु” कह कर आलोचना की। उनका कहना था कि इस प्रक्रिया में चुनावी परिणामों को प्रभावित करने के लिए डेटा में हेरफेर किया जा रहा है। इस दौरान, उन्होंने कई दस्तावेज़ों को उजागर किया, जिनमें संभावित “गुप्त वोटिंग मशीन” के प्रयोग के संकेत मिले। वामपंथी नेताओं ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की मांग की, जिससे इस संघर्ष का दायरा अधिक व्यापक हो गया।

आम आदमी पार्टी ने अपने प्रदर्शन में SIR के तकनीकी पहलुओं पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की सुरक्षा में कमी और डेटा लीक की संभावना ने मतदाता भरोसे को कमजोर कर दिया है। AAP के प्रमुख ने विशेष तौर पर “डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम” की कमी को उजागर किया, और इस अधिनियम के बिना किसी भी बड़े राष्ट्रीय परियोजना को आगे बढ़ाने की निंदा की।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने बयान में SIR को “न्यायिक प्रक्रिया में बाधा” कहा और कहा कि चुनाव आयोग को सभी चरणों में पारदर्शी रिपोर्टें जारी करनी चाहिए। कांग्रेस ने यह भी कहा कि यदि सीईसी को हटाया नहीं गया तो यह “न्यायिक स्वतंत्रता” के सिद्धांतों के खिलाफ जाएगा। इस बीच, कांग्रेस के कई वरिष्ठ सदस्य ने अपनी बैठकों में SIR की पुनः समीक्षा की मांग की, जिससे इस आंदोलन में नई ऊर्जा का संचार हुआ।

इन सभी प्रतिक्रियाओं के बीच, चुनाव आयोग ने एक संयुक्त प्रेस ब्रीफ़िंग आयोजित की, जिसमें उन्होंने कहा कि SIR के सभी चरणों में अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कार्यवाही जारी है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की सूचना मिलने पर तत्काल सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे। आयोग ने यह स्पष्ट किया कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की कोई आधिकारिक प्रक्रिया नहीं शुरू हुई है, और उनका पदस्थापन जारी रहेगा।

राजनीतिक दलों की तीव्र प्रतिक्रिया को देखते हुए, आर्थिक विश्लेषकों ने कहा कि यदि मतदाता सूची की विश्व

Updated: October 5, 2026

The SIR backlash reveals how procedural reforms, meant to cement electoral legitimacy, have become a flashpoint for broader mistrust in institutions, turning a technical update into a political weapon. If the Commission cannot swiftly restore transparency, the erosion of voter confidence may spill over into the next election, reshaping party narratives around “

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