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भारत‑रूस रणनीतिक साझेदारी को गहरा करने के लिए ऊर्जा‑रक्षा सहयोग पर नई दिल्ली‑मॉस्को बैठक हुई।

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रूस‑यूक्रेन संघर्ष पर भारत की नीति को “सिर्फ़ वकालत से परे” होने का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, “रूस और पूर्व सोवियत संघ, जब हमारी सुरक्षा व अखंडता को खतरा था, तब हमारे साथ खड़े रहे। उस समय कई देशों ने सैन्य तानाशाह को समर्थन दिया, परन्तु रूस ने हमारा सहयोग किया।” इस बयान में विदेश मंत्री ने भारत‑रूस संबंधों की ऐतिहासिक गहराई को दोहराते हुए, वर्तमान अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की रणनीतिक स्थिति को रेखांकित किया।

ज्यादातर विश्व देशों के रूस‑युक्रेन युद्ध पर स्पष्ट रुख अपनाने के बीच, नई दिल्ली ने अपने विदेश नीति में संतुलन बनाये रखने की कोशिश की है। पिछले दो दशकों में भारत‑रूस सहयोग ऊर्जा, रक्षा, विज्ञान‑प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष के कई क्षेत्रों में गहरा रहा है। विशेषकर 1990 के दशक में सोवियत संघ के पतन के बाद भी, रूस ने भारत को परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष प्रक्षेपण में सहयोग दिया। इस पृष्ठभूमि को समझते हुए, जयशंकर ने कहा कि “रूस ने हमारे कई प्रमुख परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है”।

रूस‑यूक्रेन संघर्ष के दौरान, संयुक्त राष्ट्र में भारत ने कई बार शांतिपूर्ण समाधान की वकालत की, जबकि दो पक्षों के बीच सीधे समर्थन या विरोध नहीं किया। विदेश मंत्रालय ने कई मंचों पर कहा कि “संघर्ष का समाधान वार्ता के माध्यम से ही संभव है” और “किसी भी प्रकार की बल प्रयोग को निरुत्साहित किया जाना चाहिए”। इस नीति को कई बार “संतुलित” कहा गया, जिससे भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मध्यस्थ के रूप में देखा गया।

हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में, भारत‑रूस संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत चर्चा हुई। इस बैठक में दोनों देशों के प्रमुख राजनयिक, व्यापार प्रतिनिधि और रक्षा विशेषज्ञ उपस्थित थे। चर्चा के मुख्य बिंदु ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग, तथा तकनीकी हस्तांतरण रहे। विशेषकर भारत ने रूस से आयरन-ऑक्साइड, एल्युमिनियम और नॉन‑फॉसिल ऊर्जा स्रोतों की आपूर्ति को स्थायी बनाने की मांग की।

रक्षा क्षेत्र में भी दो देशों के बीच समझौते नवीनीकृत हुए। भारत ने रूस के साथ कई प्रोजेक्ट्स, जैसे कि एंटी‑सैटेलाइट मिसाइल और हवाई रक्षा प्रणाली, को आगे बढ़ाने का इरादा जताया। इस सहयोग के तहत, दो देशों की कंपनियों ने संयुक्त रूप से नई तकनीकों का विकास करने की योजना बनाई है। इन कदमों को भारत के रणनीतिक आत्मनिर्भरता को बढ़ाने के रूप में देखा गया।

व्यापार संबंधों में भी नई दिल्ली ने रूसी वस्तुओं के आयात को बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। 2022 में रूस के प्रति भारत की कुल निर्यात‑आयात मात्रा लगभग 10‑12 अरब डॉलर रही, जिसमें प्रमुख रूप से ऊर्जा, रासायनिक पदार्थ और कृषि उपकरण शामिल हैं। इस व्यापारिक संतुलन को बनाए रखने के लिए दोनों पक्षों ने दीर्घकालिक अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए।

इन विकासों पर रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “भारत हमारी सबसे भरोसेमंद साझेदार है, और इस सहयोग को और गहरा करने में हमें खुशी है।” लावरोव ने विशेषकर ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों में दो देशों के बीच “भविष्य के सहयोग के कई द्वार” खोलने की बात कही।

भारत में विपक्षी दलों ने भी इस बयान पर सवाल उठाए। कुछ राजनैतिक विश्लेषकों ने कहा कि रूस‑यूक्रेन संघर्ष के संदर्भ में भारत का “संतुलन” कई बार विदेशी दबाव में बदल सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यह नीति भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित कर सकती है, विशेषकर यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ संबंधों में।

दूसरी ओर, भारत के प्रमुख व्यापार संघों ने इस नीति को सराहा। उन्होंने कहा कि रूस से आयातित ऊर्जा और कच्चे माल की कीमतों में स्थिरता भारतीय उद्योगों को लाभान्वित करेगी। विशेषकर कृषि और रासायनिक क्षेत्रों में यह सहयोग उत्पादन लागत को कम कर सकता है, जिससे निर्यात प्रतिस्पर्धा में सुधार होगा।

आर्थिक विश्लेषकों ने बताया कि भारत‑रूस व्यापार में वृद्धि से दोनों देशों के विदेशी मुद्रा भंडार में इजाफा होगा। उन्होंने अनुमान लगाया कि यदि इस सहयोग को अगले पाँच वर्षों में 15‑20 प्रतिशत तक बढ़ाया जाए, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा में

Updated: October 4, 2026


India’s foreign ministry says its stance on the Russia‑Ukraine war goes beyond rhetoric, emphasizing a historic partnership that underpins expanding energy, defence and technology ties with Moscow. While Delhi continues to push a neutral, dialogue‑focused line internationally, both governments have sealed long‑term deals to boost trade and strategic cooperation, drawing praise from industry and criticism from opposition.

The agreement strengthens India’s energy and defence self‑reliance by securing long‑term supplies and joint technology projects.
It also deepens bilateral trade, supporting economic stability and diversification of India’s external partnerships.

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