किया, जबकि उन्होंने कहा कि यह कदम केंद्र सरकार और सैन्य स्थापना दोनों के प्रति एक स्पष्ट संदेश होगा। इस घोषणा के बाद कई शहरों में पीटीआई के समर्थकों ने सड़कों पर इकट्ठा हो कर इस आंदोलन को समर्थन देने का इरादा जताया, जिससे क्षेत्रीय राजनीति में एक नया मोड़ आया।
पिछले कुछ महीनों में इमरान
खान की गिरफ्तारी और उनके कई सहयोगियों की जेल में बंदी ने पाकिस्तान के राजनीतिक परिदृश्य को अस्थिर कर दिया है। इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया और सुरक्षा एजेंसियों के बीच तनाव बढ़ता गया, जिससे जनता में असंतोष की लहर दौड़ गई। कई बार अदालतों में सुनवाई के दौरान भी विरोध प्रदर्शन हुए, और पीटीआई
ने कई बार राष्ट्रीय स्तर पर रैलियां आयोजित कर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की। इस संदर्भ में काबुल‑पख्तूनख़्वा के मुख्यमंत्री ने स्थानीय स्तर पर समर्थन जुटाते हुए इस आंदोलन को सशक्त बनाने की कोशिश की।
अफ़रीदी का मानना है कि इस लंबी मार्च से न केवल इमरान खान की रिहाई का मुद्दा उजागर होगा,
बल्कि अन्य जेल में बंद पीटीआई नेताओं के लिये भी न्याय की पुकार सुदृढ़ होगी। उन्होंने बताया कि यह मार्च काबुल‑पख्तूनख़्वा के विभिन्न जिलों से होकर गुजरेगा, जिसमें विशेष रूप से दक्षिणी क्षेत्रों की भागीदारी महत्वपूर्ण होगी। इस पहल के पीछे उनका उद्देश्य यह दर्शाना भी है कि पीटीआई का जनसमर्थन अब भी गहरा है
और वह सरकार के विरोध में एकजुट हो सकता है। इस प्रकार का कदम राजनीतिक दलों के बीच आम तौर पर देखे जाने वाले संघर्ष से अलग, जनसंचार और धरातल पर समर्थन को जोड़ने की रणनीति को दर्शाता है।
लक्की मारवाट में मार्च की तैयारी के दौरान, स्थानीय पीटीआई कार्यकर्ता और स्वयंसेवक बड़े उत्साह के साथ
मंच तैयार कर रहे थे। सड़कों पर झंडे लहराते हुए, प्रतिदिन हजारों लोग इकट्ठा हो रहे थे, जो इस आंदोलन की तीव्रता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। कई युवा समूहों ने स्वयंसेवा में हिस्सा लेना शुरू किया, जबकि महिला सशक्तिकरण समूहों ने भी महिलाओं की सुरक्षा और सहभागिता को लेकर विशेष योजना बनाई। इस
प्रकार की जमीन पर की गई तैयारियों ने यह संकेत दिया कि इस मार्च का प्रभाव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी गहरा हो सकता है।
मार्च के पहले दिन, लक्की मारवाट के मुख्य चौक पर एक बड़ी भीड़ इकट्ठा हुई, जहाँ अफ़रीदी ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि यह मार्च “लोकतांत्रिक अधिकारों
की रक्षा” के लिए आवश्यक है और “देश की सच्ची लोकतांत्रिक दिशा” की पुनः स्थापना का प्रयास है। उनकी इस बात पर भीड़ ने उत्साहपूर्वक तालियाँ बजाईं और कई नागरिकों ने अपने समर्थन का इज़हार किया। इस मंच पर कई पीटीआई के वरिष्ठ नेता भी उपस्थित थे, जिन्होंने सरकार की नीतियों को ‘दमनकारी’ कहकर आलोचना
की और मार्च के उद्देश्यों को स्पष्ट किया।
अगले दो दिनों में, मार्च ने बाग़ी बटालियन, मैनसिंग और पिस्कर जिलों को पार किया। प्रत्येक शहर में स्थानीय जनसमूह ने मार्च में भाग लिया, जिससे विभिन्न सामाजिक वर्गों की आवाज़ें एकत्रित हुईं। कुछ क्षेत्रों में पुलिस की उपस्थिति भी रही, लेकिन कोई बड़ी टकराव नहीं हुआ। स्थानीय
व्यापारियों ने भी अपने दाम घटाकर यात्रियों को समर्थन दिया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि आर्थिक सहयोग भी इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इस दौरान कई स्थानीय समाचार चैनलों ने लाइव कवरेज किया, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर इस घटना की जानकारी तेज़ी से फैल गई।
मार्च के मध्य में, केंद्र सरकार ने इस
आंदोलन को ‘अस्थिरता का कारण’ कहते हुए एक बयान जारी किया। सरकार ने कहा कि किसी भी प्रकार की सार्वजनिक असंतोष को ‘शांति और व्यवस्था’ के तहत नियंत्रित किया जाएगा और इस प्रकार के कार्यों को ‘देशभक्ति के विरुद्ध’ माना जाएगा। इस बयान के बाद, कई केंद्रीय एजेंसियों ने संभावित विरोध को रोकने के लिये
अतिरिक्त सुरक्षा उपाय अपनाए, परंतु स्थानीय पुलिस ने कहा कि उन्होंने किसी भी प्रकार के हिंसक संघर्ष को टालने के लिये तत्परता दिखाई है। इस बीच, सैन्य अधिकारियों ने भी इस मुद्दे पर कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं की, जिससे स्थिति और अस्पष्ट बनी रही।
पाकिस्तान के प्रमुख विपक्षी दलों ने इस मार्च को ‘लोकतांत्रिक संघर्ष’ के
रूप में सराहा, जबकि कुछ गठबंधन पार्टियों ने इसे ‘राजनीतिक उत्पात’ कहकर आलोचना की। राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न समाचार पत्रों ने इस घटना को विभिन्न दृष्टिकोणों से पेश किया, कुछ ने इसे ‘जन आंदोलन’ के रूप में प्रस्तुत किया तो कुछ ने
Updated: October 3, 2026
The long march, while framed as a push for Imran Khan’s freedom, subtly repositions PTI from a partisan bloc to a grassroots mobilizer, forcing the military‑civilian establishment to reckon with a civilian‑driven dissent network.
If the protest’s social cross‑section
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