इन रैलियों के दौरान कई बार पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के प्रयास किए, जिससे स्थिति और तनावपूर्ण हो गई। पुलिस की कार्रवाई को लेकर कई बार बल प्रयोग, थाने में हिरासत और फांसी जैसी खबरें सामने आईं। ऐसे माहौल में आदित्य ने अपने सवालों को लेकर भीड़ में आवाज़ उठाई, जिससे उसके वीडियो का प्रभाव और भी बढ़ गया।
आदित्य के पिता, रंजीत कुमार, ने बताया कि प्रदर्शन के बाद उन्हें पुलिस ने लगभग सात घंटे तक थाने में रखा। इस दौरान उन्हें कोई औपचारिक सूचना नहीं दी गई और न ही उनके अधिकारों के बारे में बताया गया। रंजीत ने कहा कि इस अवधि में उन्हें और उनके बेटे को पर्याप्त पानी, भोजन या चिकित्सकीय सुविधा नहीं मिली।
रंजीत ने पुलिस के इस व्यवहार को ‘अनुचित’ और ‘मानवाधिकारों का उल्लंघन’ कहा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने आदित्य को कई बार दबाव में रखकर उसके सवालों को रोकने की कोशिश की। इस बात को प्रमाणित करने के लिए रंजीत ने थाने में मौजूद CCTV फुटेज की मांग की है, जिसे उन्होंने आधिकारिक तौर पर मांगा है।
आदित्य के माँ, सविता कुमार ने बताया कि उनके बेटे को थाने में रखे जाने के दौरान बहुत तनाव और डर महसूस हुआ। सविता ने कहा कि उनके बेटे को उस उम्र में ही ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना चाहिए था। उन्होंने पुलिस से अनुरोध किया कि आगे से ऐसी घटनाओं में बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए विशेष प्रावधान किए जाएँ।
बिहार पुलिस ने इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रदर्शन के दौरान व्यवस्था बनाए रखना उनका कर्तव्य है। उन्होंने बताया कि उन्होंने आदित्य और उसके परिवार को उचित देखभाल प्रदान की, लेकिन थाने में रखे समय को ‘सुरक्षित प्रक्रिया’ के तहत किया गया। पुलिस ने आगे कहा कि किसी भी प्रकार की अनुचित व्यवहार की पुष्टि के लिए जांच जारी है।
विरोधी राजनीतिक दलों ने इस घटना को ‘सरकारी दमन’ का उदाहरण कहा। कई विधायक और सांसदों ने बिहार सरकार से मांग की है कि इस मामले की स्वतंत्र जांच की जाए और यदि कोई दोषी पाया जाए तो कड़ी कार्रवाई की जाए। उन्होंने यह भी कहा कि छात्र आंदोलन के मूल उद्देश्य को समझना आवश्यक है, न कि बच्चों को राजनीति के उपकरण बनाना।
सामाजिक संगठनों ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। मानवाधिकार आयोग ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर ऐसी घटनाएँ ‘अस्वीकार्य’ हैं और तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी नोट किया कि शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए छात्रों की आवाज़ को दबाने के बजाय उनका समर्थन किया जाना चाहिए।
आर्थिक दृष्टिकोण से इस आंदोलन का असर शिक्षा संस्थानों और भर्ती प्रक्रियाओं पर पड़ रहा है। कई उम्मीदवार अब सरकारी नौकरी की तैयारी में संकोच कर रहे हैं, जिससे भर्ती परीक्षाओं में आवेदन की संख्या घट रही है। यह स्थिति राज्य की आर्थिक विकास योजनाओं को भी प्रभावित कर सकती है, क्योंकि कुशल कर्मी की कमी से विभिन्न योजनाओं के कार्यान्वयन में देरी हो सकती है।
राजनीतिक रूप से यह घटना बिहार की ruling party के लिए एक बड़ा चुनौती बन गई है। सरकार को अब शिक्षा नीतियों में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देना पड़ेगा, नहीं तो विरोधी दल इसे चुनावी मुद्दा बना सकते हैं। इस बीच, राज्य के मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे को ‘गंभीर’ कहा और कहा कि वे ‘सभी पक्षों को सुनकर उचित निर्णय लेंगे’।
सामाजिक रूप से यह मामला बच्चों के अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर व्यापक चर्चा का कारण बन रहा है। कई अभिभावकों ने कहा कि यदि बच्चे को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार नहीं दिया जाता, तो भविष्य की पीढ़ी में लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण होगा। यह घटना सामाजिक जागरूकता बढ़ाने में भी एक कारक बन रही है।