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दिल्ली में अकासवाणी भवन पर कांग्रेस समर्थकों का बलपूर्वक प्रवेश, 260 गिरफ्तार, चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध तीव्र

दिल्ली के अकासवाणी भवन के बाहर दो दिन पहले सुबह से भीड़ जमा थी, जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी व अन्य कई पार्टी कार्यकर्ताओं पर बलपूर्वक प्रवेश करने का आरोप लगा।
राष्ट्रीय स्तर के विरोध के दौरान, कई बार सशस्त्र सुरक्षा कर्मियों और पुलिस ने प्रवेश को रोकने की कोशिश की, परन्तु कुछ सैकड़ों लोगों ने बाधा तोड़ कर भवन के भीतर घुसने का प्रयास किया। इस घटना के बाद पुलिस ने तुरंत FIR दर्ज कर, कई प्रतिवादियों को गिरफ्तार कर लिया।पृष्ठभूमि में यह देखना आवश्यक है कि इस विरोध का मूल कारण भारतीय राष्ट्रीय चुनाव आयोग (CEC) के कार्यकारी प्रमुख ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस द्वारा उठाए गए गंभीर आरोप हैं। कांग्रेस ने कहा कि उन्होंने चुनाव प्रक्रिया में विभिन्न अनियमितताओं की सूचना दी है, जिसके कारण उन्होंने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग की। इस मांग के समर्थन में कई राज्यों में भारत ब्लॉक (INDIA) ने एकजुट हो कर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया।

दिल्ली पुलिस ने 24 जनवरी को लगभग 260 लोगों को हिरासत में लिया, जिनमें दस सांसद भी शामिल थे। यह कार्रवाई तब हुई जब संसद के बाहर एक बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहा था, जिसमें विभिन्न दलों के सदस्य और आम जनता भाग ले रहे थे। इस दौरान पुलिस ने कई बार रैली को विखंडित करने के प्रयास किए, परन्तु विरोधी समूहों ने दृढ़ता से आगे बढ़ते हुए सरकारी भवनों के सामने अपना विरोध दर्ज कराया।

आकासवाणी भवन की ओर बढ़ते हुए, कई विरोधी समूहों ने अपने हाथों में लालीट और जलाने वाले वस्त्रों को ध्वज की तरह लहराते हुए प्रवेश की कोशिश की। सुरक्षा कर्मियों ने बाधा डालने के बाद भी, कुछ समूहों ने बल प्रयोग करके दरवाजे तोड़ने का प्रयास किया। इस संघर्ष में दो-तीन लोगों को हल्की चोटें आईं, परन्तु कोई गंभीर हताहत नहीं हुआ।

पुलिस ने तुरंत घटना स्थल पर एकत्रित साक्ष्य और गवाहों के बयान एकत्र किए और FIR दर्ज की। FIR में बताया गया कि कई प्रतिवादी ने इरादतन बलपूर्वक प्रवेश किया और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। इसके साथ ही, पुलिस ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई को कानूनी प्रक्रिया के तहत कड़ा सजा दिलाने का इरादा है।

अगले ही दिन, पुलिस ने कई प्रतिवादियों को हिरासत में ले लिया और उन्हें अदालत में पेश किया। अदालत ने उन्हें जमानत के लिए आवेदन करने की अनुमति दी, परन्तु जमानत की शर्तें सख़्त रखी गईं। इस दौरान, कई मीडिया हाउस ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए, विरोधी दलों की मांगों को उजागर किया और सार्वजनिक राय को प्रभावित किया।

राहुल गांधी ने इस घटना के बाद एक सार्वजनिक बयान में कहा कि यह कार्रवाई लोकतंत्र की मूलभूत स्वतंत्रताओं पर हमला है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने हमेशा शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज़ उठाने का प्रयास किया है, परन्तु जब सरकार ने उनकी मांगों को नज़रअंदाज़ किया तो उन्हें मजबूरन अधिक दृढ़ कदम उठाने पड़े।

प्रियंका गांधी ने भी समान रुख अपनाते हुए कहा कि उनके पिता और उनके पिता द्वारा स्थापित मूल्यों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि यह विरोध केवल एक व्यक्तिगत संघर्ष नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय मुद्दा है, जिससे सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को खतरा है।

विरोधी दल के अन्य नेताओं ने भी इस बात को दोहराया कि चुनाव आयोग के कार्यकारी प्रमुख को इस्तीफ़ा देना चाहिए, अन्यथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास का नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि यदि सरकार इन मांगों को नहीं मानती, तो आगे भी ऐसे बड़े स्तर के विरोध होते रहेंगे।

राजनीतिक विश्लेषकों ने बताया कि इस प्रकार के बड़े विरोध और बलपूर्वक प्रवेश की घटनाएं भारतीय राजनीति में पहले भी देखी गई हैं, परन्तु अब जब मुख्यधारा के नेताओं को सीधे निशाना बनाया जा रहा है, तो यह स्थिति अधिक संवेदनशील हो रही है। वे यह भी संकेत दे रहे हैं कि आगामी राज्य चुनावों में यह मुद्दा प्रमुख रूप से उठाया जाएगा।

आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो, इस तरह के बड़े स्तर के विरोध से व्यापारिक गतिविधियों में अस्थायी व्यवधान उत्पन्न हो सकता है, विशेषकर दिल्ली के व्यावसायिक क्षेत्रों में। कई कंपनियों ने कर्मचारियों को काम से घर भेजा, और कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स में देरी की संभावना जताई गई।

Updated: October 7, 2026


Congress leaders Rahul and Priyanka Gandhi led a large protest at Delhi’s Akashvani building, forcing entry despite police resistance and resulting in dozens of arrests, including ten MPs. The demonstration stems from the party’s demand for the resignation of Election Commission chief Gyanesh Kumar over alleged irregularities, a issue likely to dominate upcoming state elections.

The forceful breach at Akashvani signals a tipping point where protest tactics are moving from symbolic dissent to direct confrontation, reflecting deepening distrust in electoral institutions. If unchecked, such escalations could re‑energize opposition narratives and make the upcoming state polls a referendum on the credibility of the Election Commission.

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