सौर ऊर्जा को भारत की ऊर्जा सुरक्षा के प्रमुख स्तम्भ के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री सौर घर योजना 2023 में लॉन्च की गई, जिसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के घरों को सौर पैनल से सशक्त बनाना था। इस योजना के तहत प्रत्येक पात्र घर को 1.5 kW से 3 kW की क्षमता वाला सौर सिस्टम प्रदान किया जाता है, जिसके लिए केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर वित्तीय सहायता देती हैं। योजना की प्रारंभिक रिपोर्टों में कहा गया था कि इस वर्ष 30 लाख घरों तक सौर ऊर्जा से लाभान्वित होंगे।
परियोजना के कार्यान्वयन में मुख्यतः दो चरण होते हैं: पहले चरण में लाभार्थी का पंजीकरण और आवेदन प्रक्रिया, और दूसरे चरण में स्थानीय ठेकेदारों द्वारा सौर सिस्टम की स्थापना। कई राज्यों ने इस कार्य को निजी वेंडरों को सौंपा है, जिससे तेज़ी से कार्य पूरा होने की उम्मीद की गई। हालांकि, पिछले दो वर्षों में विभिन्न राज्यों में ठेकेदारों द्वारा अनुचित बिलिंग, कार्य में देरी और अधूरे कार्य की कई शिकायतें दर्ज हुई हैं। यह मुद्दा न केवल उपभोक्ताओं को प्रभावित कर रहा है, बल्कि सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता को भी नुकसान पहुँचा रहा है।
सुगंध राज ने बताया कि उन्होंने स्थानीय सौर मेले में भाग लेकर स्थापित ठेकेदार से संपर्क किया। वह वेंडर ने उन्हें योजना के बारे में विस्तृत जानकारी दी और ऑनलाइन आवेदन फॉर्म भरने का निर्देश दिया। आवेदन प्रक्रिया के बाद, वेंडर ने 2.25 लाख रुपये अग्रिम रूप में ले लिए, जबकि पूर्ण कार्य की लागत का विवरण स्पष्ट नहीं किया गया। अनुबंध में यह कहा गया था कि सिस्टम की स्थापना, कनेक्शन और प्रारंभिक परीक्षण सभी शामिल हैं, परंतु कई दिनों बाद भी पैनल की स्थापना पूरी नहीं हुई।
जब सुगंध राज ने कार्य में देरी और अधूरे काम की शिकायत की, तो ठेकेदार ने उन्हें कई बार कॉल किया और कहा कि अतिरिक्त भुगतान न करने पर प्रणाली को सक्रिय नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि शिकायत जारी रही तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी, जिससे उपभोक्ता को डर और असहजता का सामना करना पड़ा। इस प्रकार के दबावपूर्ण व्यवहार ने उपभोक्ता के अधिकारों के उल्लंघन का संकेत दिया, जो कि योजना के मूल उद्देश्यों के विरुद्ध है।
संबंधित वेंडर कंपनी के प्रतिनिधि ने बाद में कहा कि उन्होंने सभी आवश्यक दस्तावेज और कार्य आदेश प्राप्त कर लिए थे, परन्तु कुछ तकनीकी कारणों से स्थापित करने में देरी हुई। उन्होंने यह भी कहा कि अतिरिक्त भुगतान के बिना सिस्टम को चालू नहीं किया जा सकता, क्योंकि बुनियादी ढाँचे की मजबूती सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त उपकरणों की आवश्यकता थी। कंपनी ने कहा कि वे उपभोक्ता को शीघ्र कार्य पूर्ण करने का प्रयास कर रहे हैं और किसी भी प्रकार की धमकी देना नहीं चाहती।
उपभोक्ता संगठनों ने इस घटना को लेकर सरकार पर सवाल उठाए। राष्ट्रीय उपभोक्ता फोरम के एक सदस्य ने कहा कि ऐसी घटनाएँ योजनाओं की वास्तविक प्रभावशीलता को कमजोर करती हैं और उपभोक्ता को आर्थिक और सामाजिक दोनों स्तर पर नुकसान पहुंचाती हैं। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ठेकेदारों के चयन में पारदर्शिता और निगरानी की व्यवस्था को सख़्त बनाना आवश्यक है।
राज्य सरकार के ऊर्जा विभाग ने टिप्पणी में कहा कि शिकायत की जाँच की जा रही है और यदि वेंडर की कोई लापरवाही सिद्ध हुई तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की समस्याओं को रोकने के लिए भविष्य में अनुबंध में स्पष्ट भुगतान शर्तें और कार्य समयसीमा निर्धारित की जाएगी। विभाग ने यह संकेत भी दिया कि अन्य समान मामलों की समीक्षा भी की जाएगी ताकि योजना के लाभार्थियों को उचित सेवा मिल सके।
सौर ऊर्जा के समर्थन में कई राज्य सरकारों ने विशेष निगरानी समितियों का गठन किया है। उत्तर प्रदेश में भी एक ऐसी समिति स्थापित की गई है, जिसका कार्य वेंडर के प्रदर्शन की समीक्षा, समयबद्धता और वित्तीय लेन‑देन की पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। समिति के अध्यक्ष ने कहा कि उन्होंने इस मामले की प्रारम्भिक जांच शुरू कर दी है और आवश्यक होने पर ठेकेदार को अनुबंध रद्द करने की शक्ति रखती है।
आर्थिक दृष्टिकोण से इस प्रकार की घटनाएँ योजनाओं के बजट को अप्रभावी बना देती हैं। यदि ठेकेदारों को अनुचित भुगतान मिलते हैं और कार्य अधूरा रहता है, तो सार्वजनिक धन का दुरुपयोग हो सकता है। इससे सौर ऊर्जा के निवेश
Updated: October 7, 2026
The saga exposes a structural flaw: delegating solar roll‑outs to under‑vetted private vendors turns a subsidy meant to empower the poor into a fertile ground for rent‑seeking, eroding public trust before the technology even proves its worth. Unless the government tightens contractor vetting and enforces transparent,
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