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मद्रास हाई कोर्ट ने रेत खनन FIR याचिका पर त्वरित कार्यवाही का आदेश दिया, कंपनी ने दस्तावेज़‑आधारित आरोपों को चुनौती दी।

मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायालय में आज एक विशेष सुनवाई हुई, जिसमें चेन्नई के नागनल्लुर स्थित एक निजी निर्माण कंपनी के साझेदार ने डिपार्टमेंट ऑफ़ वॉयजेज़ एण्ड एन्क्लोजर (DVAC) द्वारा आर्थिक अपराधों की जांच एजेंसी (ED) के दो साल पुराने दस्तावेज़ के आधार पर एफआईआर दर्ज करने को रोकने की याचिका दायर की। याचिकाकर्ता ने कहा कि इस दस्तावेज़ में प्रस्तुत तथ्यों का कोई ठोस प्रमाण नहीं है और यह उनके व्यापारिक प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुँचा सकता है। अदालत ने इस याचिका को सुनने के लिए एक त्वरित कार्यवाही का आदेश दिया।

सैंड माइंग यानी रेत खनन के मामलों में तमिलनाडु में कई वर्षों से विवाद चलता आ रहा है। राज्य की जल निकायों से बिन अनुमति रेत निकालने वाले गुटों को अक्सर आर्थिक अपराधों की संधि में फँसाया जाता रहा है। इस संदर्भ में ED ने 2022 में एक विस्तृत डॉसियर तैयार किया, जिसमें कई निजी कंपनियों और उनके सहयोगियों के नाम शामिल थे। उक्त डॉसियर के आधार पर कई FIRs दायर किए गए, लेकिन इस बार एक विशेष कंपनी के साझेदार ने कानूनी चुनौती दी है।

नागनल्लुर के इस निर्माण उद्यम का प्रमुख हिस्सा सैंड सप्लाई सेक्टर में कार्य करता है, जहाँ वह बड़े सार्वजनिक और निजी प्रोजेक्टों के लिए रेत की आपूर्ति करता है। कंपनी के प्रवर्तकों का कहना है कि वे सभी लाइसेंस और अनुमति नियमों के तहत कार्य करते हैं और उन पर लगाए गए आरोप निराधार हैं। इस मुद्दे को लेकर स्थानीय व्यापार मंडल और उद्योग संघों ने भी अपनी चिंताएँ व्यक्त की हैं, क्योंकि यह मामले में अनिश्चितता व्यापारिक माहौल को प्रभावित कर रही है।

ED ने इस डॉसियर में बताया है कि 2019-2021 के दौरान कंपनी के कुछ अधिकारियों ने अनधिकृत रूप से रेत निकाली और सरकारी दस्तावेज़ों में हेरफेर किया। जांच के प्रारम्भिक चरण में कुछ ठेकेदारों और स्थानीय अधिकारियों को भी संदिग्ध के रूप में सूचीबद्ध किया गया था। इस दस्तावेज़ में उल्लेखित तथ्यों को लेकर कंपनी ने कहा कि यह सबूत अधूरा और पूर्वाग्रहित है।

सुनवाई में दोनों पक्षों ने अपने-अपने दस्तावेज़ प्रस्तुत किए। याचिकाकर्ता ने कंपनी के वित्तीय रिकॉर्ड, लाइसेंस की वैधता और कार्य प्रक्रियाओं के प्रमाण पेश किए, जबकि ED ने अपने डॉसियर में मौजूद इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजेक्शन डेटा और गवाहियों को प्रस्तुत किया। अदालत ने इन दोनों प्रस्तुतियों की तुलना करके ही निर्णय लेगा कि FIR दर्ज करना उचित है या नहीं।

वकालत पक्ष ने कहा कि यदि बिना ठोस प्रमाण के FIR दर्ज किया गया तो यह न केवल कंपनी की आर्थिक स्थिति को बुरी तरह प्रभावित करेगा, बल्कि अन्य वैध व्यापारियों के भी समान केस में असुरक्षा पैदा कर सकता है। दूसरी ओर, ED ने बताया कि रेत की अनधिकृत खनन से नदियों की जलधारा बिगड़ती है, जिससे जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय क्षति बढ़ती है, और यह एक सामाजिक समस्या भी है।

डिपार्टमेंट ऑफ़ वॉयजेज़ एण्ड एन्क्लोजर के डीजीपी ने कोर्ट में कहा कि उनका विभाग इस मामले में निष्पक्ष जांच कर रहा है और सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि FIR दर्ज नहीं हुई तो भविष्य में इसी प्रकार की अनियमितताओं को रोकना कठिन हो जाएगा।

राज्य के जल संसाधन विभाग के प्रमुख ने कहा कि रेत खनन के नियमन में कई खामियां हैं और उन्हें सुधारने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान में कई इलाकों में रेत की मांग बढ़ी हुई है, जिससे अनधिकृत खनन की संभावना बढ़ रही है।

मुख्य राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने इस मामले पर विभिन्न राय व्यक्त की। विपक्षी दल के नेता ने कहा कि इस तरह के बड़े आर्थिक अपराधों में सरकार को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, जबकि शासक दल के एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा कि न्यायपालिका को अपना काम करने देना चाहिए और किसी भी पूर्वाग्रह से बचना चाहिए।

आर्थिक विश्लेषकों ने इस केस के संभावित प्रभावों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यदि FIR दर्ज हुई, तो संबंधित कंपनी के शेयरों में गिरावट और निवेशकों के विश्वास में कमी आ सकती है। वहीं, यदि याचिका स्वीकार हुई, तो यह

Updated: October 7, 2026

The case tests the evidentiary basis for filing FIRs under a two‑year‑old ED dossier, potentially shaping how sand‑mining violations are pursued. A court‑ordered rapid hearing underscores procedural scrutiny of economic‑offence investigations.

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